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Friday, January 18, 2019

@कल्पना लाइव : एक पाठकीय प्रतिक्रिया - यतीश कुमार



@कल्पना लाइव :  एक पाठकीय प्रतिक्रिया
यतीश कुमार

'जाओ .... थोड़ा एकांत उठा लाओ
इन शब्दों को हद में रहने का सलीक़ा तो आये।'

एक ऐसी लेखिका जो तनहाई को क़लम पकड़ा कर कहती हैं ' काली रोशनाई तो तुम्हारे पास है और मैं कोरा काग़ज़ हूँ जो चाहो लिख दो.....'
कविता की त्वचा पर साँस भरने को नए छिद्र उगे है
'महावर सी ढ़लती लाख के सुर्ख़ होने की यात्रा' जैसे बिंब और रूपक से सजी कविताएँ आपको बिल्कुल ही एक नए सफ़र में ले चलती हैं ।
कविताएँ जिनमें तमाम ज़िक्र हैं - आधी कच्ची-आधी पकी नज़्मों के ताउम्र साँस साथ में लेने को जिसे तनहाई ने सलीक़े से उगाया है - समय के सफ़्हों पर बड़ी की तरह सूखकर किताबों में बदल जाने जैसी है ये कविताएँ।

नदी सा कर दे
इतना उफान भर दे
कि त्रुटियों की काई
जमने ही न पाए मुझमें

हाशिए से... फ़ेहरिस्त तक अपनी कविताओं में ले आती हैं । झील -नदी -समंदर सब स्त्री के रूप हैं जिसकी संरचना उसके अंतर्मन पर रची जा रही है, बड़ी ख़ूबी से कल्पना इसकी विवेचना करती चली जाती हैं।
काश -रिश्तों की भी एक ख़ूबसूरत प्रस्तुति होती जिसमें कई चीज़ें उपयुक्त तरीक़ों से रखा गया है, प्रेम और प्रेमियों को नायाब रूपक देते हुए जोड़ा गया है... सीप और मोती,पर्वत और निश्छल धारा, इंद्रधनुष और उसके रंग, सागर और उसकी लहर, हिरन और उसकी कस्तूरी, पेड़ और उससे लिपटी बेल, किताब और उसमें लिखे शब्द और अंत में 'तू और तेरी परछाई....'

शब्दों के आपसी गुफ़्तगू को भी बड़े ही ख़ालिस अंदाज ए बयाँ कर पक्तियों को ख़ूबसूरती से उभारा गया है। कविताएँ मानो लगता है आपस में बतिया रही हैं और पाठक चुपचाप सब सुन रहा है ।
बड़ी आसानी से लिखती हैं -
'कहाँ रखूँ....
पत्थर सा रख देने वाला प्रेम

मुझमे तो तुम भरे हुए हो
कहाँ धरूँ अबोला प्रेम'

कल्पना पांडेय
हम तुम की गलियों से निकल शहर की तन्हाई को भी उकेरा है कविता शहर में अपने और तन्हा बहते रिश्तों की अलग अलग अवस्था बतौर दृश्य फ़िल्म के रील की तरह उभरते हैं। पीले पड़ते रिश्ते कविता में एक सुंदर विवेचना कि जहाँ पीली बेलें और ऊँघते हुए रिश्तों में जो संबंध निभाए जा रहे हैं वह मृत त्वचा की तरह साथ बस हैं।रोज़ाना वाले रिश्ते जो चुभते नहीं पर चलते हैं साथ -साथ ।

कई दिन हुए -कविता भी बहुत सुलझी और प्यारी है
एक लय में ताल की तरह जो हर अंतराल पर एक ताली की तरह बज उठती है ।

झील वाली काई
नदी वाली ज़िद
समंदर वाली चाह लिए कल्पना अपने आपको समेटना चाहती है शब्दों में जिससे उन्हें सबसे ज़्यादा प्यार है।
नदी और समंदर से निकल झील में उतरती हैं और कहती हैं -

'जी करता है
झील हो जाऊँ
उलझन अपनी तह में छुपाऊँ
कुछ घुटन किनारे लगाऊँ
बस शांत हो जाऊँ'

और फिर थोड़ी दूर पर ही नदियों, झीलों और समंदर से निकल आप विचरने लगते हैं मरुस्थल में जहाँ एहसास बालू हुए जा रहा है। अपने-अपने वजूद को पानी देने की ज़िद में कैक्टस की बाड़ बन गयी है....
और फिर आप लिखती हैं
'दिन के बाद रात के पीछे भाग रही है ज़िंदगी
ख़्वाबों के ख़ातिर बस जाग रही है ज़िंदगी'

कल्पना की बड़ी मखमली ख़ूबसूरत प्रारूप को मुकम्मल ख्वाहिशों में आप लिखती हैं -

'सूरज सज़ा धज़ा तैयार खड़ा रहता है
मेरी मुकम्मल ख्वाइशों की रोशनाई अपने पर मलने को
अब तो मुस्कुरा कल्पना ....कहने को'

सिफ़र से सफ़र को जोड़ते हुए आप अपने शब्दों के क़ाफ़िलों के साथ आगे बढ़ती है और लिखती हैं

'अब रात में सूरजमुखी हूँ
और दिन में रात रानी भी
और इन दोनों के बीच
ना जाने क्या क्या'

क्या ख़ूब लिखा है, 'कभी दिन की चमक और रात की दमक हटा कर देखना
मेरे चाँद से माथे पर सूरज उगा मिलेगा।'

व्यक्तित्व का इतना सुंदर विस्तार जिसमें रिश्तों की सलवटों को भष्म कर देने और राख को फूँक में उड़ा देने की शक्ति हो और जहाँ से नई मूर्ति का फिर से गठन हो सके। नया बसंत फिर से उग सके। जहाँ बड़ी ख़ूबसूरत पंक्तियाँ मज़बूती से अपना पक्ष रखती हैं

'कि अगर मुझे बूझ पाए ....तो ठीक
अगर मुझे देख पाए ......तो ठीक
वर्ना हो सकता है
तुम्हें सिफ़र पर इक और सिफ़र लगा मिलेगा'

मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास रखा है की फ़ील लिए एक बहुत ही संवेदनशील कविता है -
'अजनबी दुःख
जहाँ पूछती है
बताओ क्या ये आसान है??
जाना भी और रुके रहना भी.....'

टहलते-टहलते अमृता-इमरोज -साहिर के बीच से गुज़र जाती हैं कुछ हिस्से समेट कर वहीं पसार देती है और लिख देती हैं
सहज से.....पर कितने कठिन

प्रेम प्रवाह से अचानक हटकर एक दाँव लिख देती हैं
ममता बरसाती हुई बेटियों की स्थिति को और मज़बूती से सामने रखते हुए कि
ये कैसे घरौंदे रख छोड़े हैं हमने बेटियों वाले
जिसमें दर तो था ही नहीं कभी
कुछ खिड़कियाँ थी
वो भी अंदर से बंद होने वाली
साँस एक तरफ़ा कब तक ज़िंदा रखेगी
अब तो दाँव खेलना होगा
आख़िरी वाला .......

लाल दुःख एक बहुत ही संवेदनशील कविता है
रंग फूल दुःख सिंदूर श्रिंगार सब को धागे में समेटकर गुथे हुए इस माले में ख़ुशबू नहीं दर्द की चिंगारी और जलने का दुर्गन्ध मिलता है।बहुत बेबाक़ी से एक विचित्र इंतिहान का ज़िक्र है जिसका सीधा सम्बन्ध सुर्ख़ रंग से है

बहुत सफ़ाई से आप कहती हैं

'पीला टूटा सीप हो गए हो तुम
पर
अब भी चमकती हुई मोती हूँ मैं'

प्रेम की ओस से दावानल रचने का हुनर है आपकी लेखनी में है
और आप लिख देती हैं

'स्त्री तुम लिखने लगी
तभी चुभने भी लगी'
यलगार हो...
रूमानी अग्नि से यलगार की बात करती हुई आगे बढ़ जाती हैं
और आगे सफ़र करती हुई कहती हैं
'कभी आना चाहो मुझ तलक तो इसी रास्ते आना
और सुनो ... हम नाम की तख़्ती ढूँढना
जल्दी पहुँचोगे
सुकून से आना ... मुझे शॉर्टकट्स और रैश ड्राइविंग से चिढ़ है.....'

वाह! मज़ा आ जाता है जब कोई ऐसे सफ़र पर साथ ले चले । ये कविताओं का सफ़र है कल्पना की जो बार बार यथार्थ पर पटक देती है पर सफ़र को लुभावनी रखती है।

चौकोर सूरज
कमाल की कविता
ज़्यादा लिखूँगा तो उसकी पकीज़गी को उकेरना होगा । पाठकों को बस पढ़ने की सलाह दे रहा हूँ

पाश और जाल का अंतर
तैरते शब्दों को असहज कर देगा..
पंक्तियाँ ख़ुद अपना पक्ष रखती है

और अंत में एक सलाह कुछ दुहराव से एकरसता पैदा होती है तो लेखिका इस ओर ध्यान दें।एक दो कविताओं को छोड़ विषय वस्तु प्रेम ,सम्बन्ध और डायरी जैसी है, आशा है इस अगली बार विषय में भी विविधता रहेगी हालाँकि जो भी विषय चुना है उसे ईमानदारी से निभाया है आपने ।

अहसास की परतें खोलती कविताओं का जमावड़ा बन बैठा है ये संग्रह ।एक निर्मलता है जो अब तक कुंठित शब्दों की प्रदूषण से बचा हुआ है ।भगवान, आपको शब्दों के कुपोषण और आज के भारत का वातावरण में फैले वाग्जाल प्रदूषण से बचाए रखे ताकी आप आगे भी ऐसी ही प्रवाह बरक़रार रखे।
शुभकामनाओं के साथ ..
पुस्तकः @ कल्पना लाइव/ कल्पना पाण्डेय/एपीन पब्लिकेशन


यतीश कुमार
समीक्षक पेशे से रेलवे की एक कंपनी में अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक और कोलकाता की साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था नीलांबर के वर्तमान अध्यक्ष हैं।
एक सचेत पाठक होने के साथ ही वे उदीयमान युवा कवि भी हैं।




हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Saturday, December 8, 2018

फ़रीद ख़ाँ की नई कविताएँ



फ़रीद ख़ाँ

कुछ कवियों ने हिन्दी कविता को एक अलग पहचान दी है। फ़रीद ख़ाँ का नाम उनमें प्रमुख है – इनकी कविताएँ घर और देश से होते हुए पूरे संसार को अपने में समेटती हुई लगती हैं। इनके यहाँ स्त्री है तो राजनीति भी है, खुदा है तो सपनों की लाशें भी हैं और वह एक टीस भी जो  हर कलाकार आज कहीं न कहीं महसूस कर रहा है कि उसकी पीड़ा झेल रहा है। फ़रीद की कविताएँ साहस और विवेक के साथ अपने कथ्य और शिल्प से भी हमारा ध्यान खिंचती हैं। फ़रीद को हम खूब उम्मीद और यकीन के साथ अनहद के पाठकों के लिए लेकर आए हैं। उनका आभार प्रकट करते हुए आपसे गुजारिश करते हैं कि आप अपनी महत्वपूर्ण प्रतिक्रियाएँ जरूर लिखेंगे।

माफ़ी

सबसे पहले मैं माफ़ी मांगता हूँ हज़रत हौव्वा से.
मैंने ही अफ़वाह उड़ाई थी कि उसने आदम को बहकाया था
और उसके मासिक धर्म की पीड़ा उसके गुनाहों की सज़ा है जो रहेगी सृष्टि के अंत तक.
मैंने ही बोये थे बलात्कार के सबसे प्राचीनतम बीज.

मैं माफ़ी माँगता हूँ उन तमाम औरतों से
जिन्हें मैंने पाप योनी में जन्मा हुआ घोषित करके
अज्ञान की कोठरी में धकेल दिया
और धरती पर कब्ज़ा कर लिया
और राजा बन बैठा. और वज़ीर बन बैठा. और द्वारपाल बन बैठा.
मेरी ही शिक्षा थी यह बताने की कि औरतें रहस्य होती हैं
ताकि कोई उन्हें समझने की कभी कोशिश भी न करे.
कभी कोशिश करे भी तो डरे, उनमें उसे चुड़ैल दिखे.

मैं माफ़ी मांगता हूँ उन तमाम राह चलते उठा ली गईं औरतों से
जो उठाकर ठूंस दी गईं हरम में.
मैं माफ़ी मांगता हूँ उन औरतों से जिन्हें मैंने मजबूर किया सती होने के लिए.
मैंने ही गढ़े थे वे पाठ कि द्रौपदी के कारण ही हुई थी महाभारत.
ताकि दुनिया के सारे मर्द एक हो कर घोड़ों से रौंद दें उन्हें
जैसे रौंदी है मैंने धरती.

मैं माफ़ी मांगता हूँ उन आदिवासी औरतों से भी
जिनकी योनी में हमारे राष्ट्रभक्त सिपाहियों ने घुसेड़ दी थी बन्दूकें.
वह मेरा ही आदेश था.
मुझे ही जंगल पर कब्ज़ा करना था. औरतों के जंगल पर.
उनकी उत्पादकता को मुझे ही करना था नियंत्रित.

मैं माफ़ी मांगता हूँ निर्भया से.
मैंने ही बता रखा था कि देर रात घूमने वाली लड़की बदचलन होती है
और किसी लड़के के साथ घूमने वाली लड़की तो निहायत ही बदचलन होती है.
वह लोहे की सरिया मेरी ही थी. मेरी संस्कृति की सरिया. 

मैं माफ़ी मांगता हूँ आसिफ़ा से.
जितनी भी आसिफ़ा हैं इस देश में उन सबसे माफ़ी मांगता हूँ.
जितने भी उन्नाव हैं इस देश में,
जितने भी सासाराम हैं इस देश में,
उन सबसे माफ़ी मांगता हूँ.

मैं माफ़ी मांगता हूँ अपने शब्दों और अपनी उन मुस्कुराहटों के लिए
जो औरतों का उपहास करते थे.
मैं माफ़ी मांगता हूँ अपनी माँ को जाहिल समझने के लिए.
बहन पर बंदिश लगाने के लिए. पत्नी का मज़ाक उड़ाने के लिए.

मैं माफ़ी चाहताहूँ उन लड़कों को दरिंदा बनाने के लिए,
मेरी बेटी जिनके लिए मांस का निवाला है.

मैंने रची है अन्याय की पराकाष्ठा.
मैंने रचा है अल्लाह और ईश्वर का भ्रम.
अब औरतों को रचना होगा इन सबसे मुक्ति का सैलाब.

आओ मिल कर बद्दुआ करें.

दुनिया का कोई क़ानून बद्दुआओं के लिए किसी को रोक नहीं सकता.
इसलिए आओ सब मिल कर बद्दुआ करें कि
इस व्यवस्था के पोषकों को कीड़े पड़ें.
आओ उनकी जड़ों में मट्ठा डालें.

जिस संसद, अदालत, और प्रशासन को नहीं दीखते आँसू उन्हें आंसुओं में बहा दें.
हमारी अदालत उन सबको मुजरिम करार देती है.
उन सबका पुतला बना कर थूक दें उन पर.
या घरती पर उनके चित्र बनाकर रौंद डालें.
दुनिया का कोई क़ानून कुछ नहीं कर पाएगा.

भले हम बोल न पाएँ, लेकिन सपना तो देख ही सकते हैं.
दुनिया में कोई भी सपना देखने से नहीं रोक पाएगा.
इसलिए जो कुछ भी अच्छा है उसका मिल कर सपना देखें. 
और सपना नींद में न देखें इस बात का ख़याल रहे.
दुनिया का कोई भी क़ानून खुली आँखों से सपना देखने से नहीं रोक पाएगा.

तो आओ मिल कर बद्दुआ करें उस व्यवस्था के लिए
जिन्हें लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार का कोई दोषी नहीं मिलता.
जिन्हें हत्यारे नहीं मिलते रोहित वेमुला के.
जिन्हें बलात्कारी नहीं मिलते मणिपुर के.
जिन्होंने सोनी सोरी की योनी में ठूंस दिए थे पत्थर
उनके लिए बद्दुआ करें.
हमने उस क़ानून को कभी नहीं तोड़ा जो हमारे दमन के काम आते हैं.
लेकिन आओ ग़ुस्से से देखे उन्हें.
दुनिया का कोई क़ानून ग़ुस्से से देखने पर हमें रोक नहीं सकता.

मन ही मन बना डालते हैं एक देश किसी को पता भी नहीं चलेगा.
और मन में कोई देश बनाना क़ानून का उल्लंघन भी नहीं है.
मन ही मन दोषियों को सज़ा देना भी क़ानून का उल्लंघन नहीं है.
और अदालत को पता भी नहीं चलेगा कि उनके छोड़े हुओं को हमने सज़ा दे डाली है.

जिन्हें नहीं सुनाई देता चीत्कार उनके सामने रोने की ज़रुरत नहीं है.
बम हम फोड़ नहीं सकते क्योंकि क़ानून का उल्लंघन हम कर नहीं सकते.
पर हमारे वश में जो है. वह तो हम कर ही सकते हैं.


ख़ुदा

मैं तो तुम्हारा पीछा करते हुए ही दुनिया में आया था
और पीछा करते हुए ही चला जाऊँगा.
मेरे सारे कौतुक तुम्हारे लिए ही थे.
मेरा हर बहुरूप तुम्हारे लिए ही था.
सरकती पैंट और बहती नाक के समय से लेकर
बढ़ती तोंद और झूलती झुर्रियों के समय तक
मेरे सारे कार्य व्यापार तुम्हारे लिए ही थे.
तुम हो कि रौशनी में, रंगों में, सुगंधों में मिलते हो.

सपनों की लाशें

शायद हम एक ऐसी दुनिया से विदा लेंगे जहाँ, 
कातिल ख़ुद से ही बरी कर लेता है ख़ुद को.
जज ख़ुद को ही बर्ख़ास्त कर लेता है. 
धमाके ख़ुद ही हो जाते हैं और लोग उनमें ख़ुद ही मर जाते हैं.
लड़कियाँ ख़ुद ही बलात्कार कर लेती हैं.
जाँच ख़ुद ही बदल जाया करती हैं.
फाँसी का फंदा ख़ुद ही बन जाता है.
किसानों और लड़कियों में ख़ुद ही होड़ मच जाती है
कि मरने में किसकी संख्या ज़्यादा होगी.

पैसे ख़ुद ही लुट जाते हैं. देश ख़ुद ही बर्बाद हो जाता है.
दलित ख़ुद ही अछूत हो जाते हैं.
बुरका ख़ुद ही पड़ जाता है औरतों की अक्ल पे.

किसी ने नहीं मारा नरेंद्र दाभोलकर को, गोविन्द पानसारे को, 
एम एम कलबुर्गी को, गौरी लंकेश को.
सत्य की बात करने वालों ने जंभाई लेते हुए एक दिन सोचा
कि अब मर जाते हैं और मर गए.

कोई भी  ज़िंदा नागरिक ख़ुद कुछ नहीं कर रहा हमारे देश में. 
नदी की सतह पर ख़ुद बख़ुद तैर रही हैं देश के सपनों की लाशें.

तोड़ने दो.

वे मजबूर हैं अपनी खिसियाहट से.
अगर विचार की कोई मूर्ति बन पाती तो वे उसे तोड़ते.
गाँधी को क्यों मारते ?
क्यों तोड़ते वे बुद्ध की प्रतिमा को बामियान में,
अगर समता की कोई मूर्ति बन पाती तो.

या वे भगत सिंह को फांसी पर क्यों चढ़ाते,
उस क्रांति को फाँसी पर न लटका देते
जिसका सपना उसकी आँखों में था ?

वे क्यों तोड़ते मंदिरों को, मस्जिदों को ?
उन्हें नहीं तोड़ना पड़ता अम्बेदकर की मूर्ति को
अगर संविधान की कोई मूर्ति बन पाती तो.

देवियो सज्जनो, सदियों से झुंझलाए लोगों पर तरस खाओ.
जब उन्हें भूख लगेगी तब करेंगे बात.


प्रधानमंत्रीजी !

अगर यह भी तय हो जाए कि अब से मूर्तियाँ ही तोड़ी जाएँगी दंगों में.
तो मैं इस तोड़ फोड़ का समर्थन करूँगा.
कम से कम कोई औरत बच तो जाएगी बलात्कार से.
नहींचीराजाएगाकिसीगर्भवतीकापेट.

मैं तो कहता हूँ कि मूर्ति तोड़ने वालों को सरकार द्वारा वज़ीफ़ा भी दिया जाए.
कम से कम कोई सिर्फ़ इस लिए मरने से तो बच जाएगा
कि दंगाईयों के धर्म से उनका धर्म मेल नहीं खाता.

इसे रोज़गार की तरह देखा जाना चाहिए.
कम से कम सभी धर्म के लोग समान रूप से जुड़ तो पाएंगे इस राष्ट्रीय उत्सव में.
तब किसी दलित पर किसी की नज़र नहीं पड़ेगी
और ऐसे में कोई दलित बिना किसी बाधा के मूँछ भी रख पाएगा
और घोड़ी पर भी चढ़ पाएगा.

प्रधानमंत्री जी,  वैसे तो आप जनता की बात सुनते नहीं हैं.
पर यकीन मानिए मैं मुकेश अंबानी बोल रहा हूँ.

.....................
फ़रीद ख़ाँ
29 जनवरी 1975, पटना (बिहार) में जन्म।
D-3/26, अस्मिता ज्योति कोआपरेटिव हाउसिंग सोसायटी लिमिटेड, मार्वे रोड, चारकोप नाका, मलाड वेस्ट, मुंबई – 400095 (महाराष्ट्र)


हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad