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Sunday, January 17, 2010

एक युग का अन्त

ज्योति बसु का न होना एक युग का अंत है। जब ऐसे लोग जो अपने सिद्धान्तों व वसूलों के लिए जीवन भर लड़ते रहे, कभी समझौता नहीं किया-- जब नहीं रहते तो एक खालीपन रह जाता है....मन ये सोचकर बहुत बेचैन हो उठता है कि ऐसे लोग क्या अब भी बन सकेंगे....समय इतना अजीब होता जा रहा है कि कई बार लगता है कि वे पुरानी दिवारें जो ढहती जा रही हैं, उनकी भरपाई शायद न हो सकेगी।....ऐसे मौकापरस्त और फरेब समय में हम कैसे उनकी रक्षा कर सकेंगे, जो मानव जाति के लिए सचमुच जरूरी थे...वे मूल्य....वे आदर्श......
ऐसे समय में जिनके होने से उनके होने का विश्वास जगता था....
उनके न रहने पर बहुत मुश्किल होता है उस डोर को थामे रखना जिसे विश्वास कहते हैं.....

Wednesday, January 6, 2010

स्त्रियां


एक

इतिहास के जौहर से बच गई स्त्रियां
महानगर की अवारा गलियों में भटक रही थीं
उदास खुशबू की गठरी लिए
उनकी अधेड़ आँखों में दिख रहा था
अतीत की बीमार रातों का भय
अपनी पहचान से बचती हुई स्त्रियां
वर्तमान में अपने लिए
सुरक्षित जगह की तलाश कर रही थीं

दो

पुरूषों की नंगी छातियों में दुबकी स्त्रियाँ
जली रोटियों के दुःस्वप्न से
बेतरह डरी हुई थीं
उनके ममत्व पर
पुरूषों के जनने का असंख्य दबाव था
स्याह रातों में किवाडों के भीतर
अपने एकांत में
वे चुपचाप सिसक रही थीं सुबह के इंतजार में

तीन

स्त्रियां इल्जाम नहीं लगा रही थीं
कह रही थीं वही बातें
जो बिल्कुल सच थी उनकी नजर में
और अपने कहे हुए एक-एक शब्दों पर
वे मुक्त हो रही थीं

इस तरह इतिहास की
अंधी सुरंगों के बाहर
वे मनुष्य बनने की कठिन यात्रा कर रही थीं

Tuesday, January 5, 2010

यह समय और हम


यह समय मौकापरस्तों और सट्टेबाजों का समय है। इस समय सबसे ज्यादा खतरा हमारे संस्कृति को है। यह इसलिए कि कभी हमारी संस्कृति की जान समझे जाने वाले जीवन मूल्य आज बेमानी साबित होते जा रहे हैं। आज एक इमानदार आदमी खुद को ‘बैकडेटेड’ और ‘मिसफिट’ महसूस कर रहा है तो इसके कारण कहीं न कहीं हमारे इस समय में है जो आदमी को आदमी से अलग एक यंत्र में तब्दील करता जा रहा है। और भारी संख्या उन लोगों की है जो समय के साथ चलने में ही अपनी सफलता मान रहे हैं। जो चल नहीं पा रहे और प्रतिरोध में खड़े हैं उन्हें समय और समाज हाशिए पर ठेलता जा रहा है। क्या यही वजह नहीं है कि साहित्य, संस्कृति और समाज के लिए हमें एकजूट होने की जरूरत है।
हमें एकजूट ही नहीं होना अपने मन को खंगालना भी है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम साहित्य और संस्कृति का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए या अपनी कद ऊंची करने के लिए कर रहे हैं। यदि ऐसी बात है तो हम भी समय की मार के शिकार हो गए हैं। और उससे भी अधिक खतरा यह कि हमने मान लिया है कि मूल्यों की बात पुरानी हो गई, यह समय सबकुछ को, चाहे वह मानवता के लिए कितना भी खतरनाक क्युं न हो, तिलांजली देकर खुद को सफल साबित करने का है।
हमें याद रखना होगा कि संस्कृति सिर्फ अपनों के लिए नहीं होती, सबके लिए होती है। जो अपनों के साथ ही दूसरों के लिए भी उतनी ही शिद्दत से सोचते हैं, साहित्य और संस्कृति से उनका ही जुड़ाव समझना चाहिए। जो अपनी लोकप्रियता और अपनों की भलाई में लग गए वे समय के रंग में रंग गए। इस समय सबसे खतरा ऐसे ही लोगों से है क्यूंकि समय के सट्टेबाज और मौकापरस्त चाल से लड़ने के लिए सच्चे संस्कृतिकर्मी, सच्चे साहित्यसेवी और निष्काम समाजचिंतकों की जरूरत है, रंगे सियारों से काम नहीं चलने का।
साहित्य और संस्कृति का भला तब तक नहीं हो सकता जब तक कि मौकापरस्त और सट्टेबाज लोग साहित्य संस्कृति और समाज के केन्द्र में बने रहेंगे।

अर्थ-विस्तार


जब हम प्यार कर रहे होते हैं
तो ऐसा नहीं
कि दुनिया बदल जाती है

बस यही
कि हमें जन्म देने वाली मां के
चेहरे की हंसी बदल जाती है

हमारे जन्म से ही
पिता के मन में दुबका रहा
सपना बदल जाता है

और
घर में सुबह-शाम
गूंजने वाले
मंत्रों के अर्थ बदल जाते हैं।

कविता

जैसे एक लाल-पीली
तितली
बैठ गई हो
कोरे कागज पर नीर्भिक
याद दिला गई हो
बचपन के दिन....

वैसे ही आऊँगा

मंदिर की घंटियों की आवाज के साथ
रात के चौथे पहर
जैसे पंछियों की नींद को चेतना आती है

किसी समय के बवडर में
खो गए
किसी बिसरे साथी के
जैसे दो अदृश्य हाथ
उठ आते हैं हार गए क्षणों में

हर रात सपने में
मृत्यु का एक मिथक जब टूटता है
और पत्नी के झुराए होंठो से छनकर
हर सुबह
जीवन में जीवन आता है पुनः जैसे

कई उदास दिनों के
फांके क्षणों के बाद
बासन की खड़खड़ाहट के साथ
जैसे अंतड़ी की घाटियों में
अन्न की सोंधी भाप आती है

जैसे लंबे इंतजार के बाद
सुरक्षित घर पहुँचा देने का
मधुर संगीत लिए
प्लेटफॉर्म पर पैसेंजर आती है

वैसे ही आऊँगा मैं.....