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Wednesday, January 6, 2010

स्त्रियां


एक

इतिहास के जौहर से बच गई स्त्रियां
महानगर की अवारा गलियों में भटक रही थीं
उदास खुशबू की गठरी लिए
उनकी अधेड़ आँखों में दिख रहा था
अतीत की बीमार रातों का भय
अपनी पहचान से बचती हुई स्त्रियां
वर्तमान में अपने लिए
सुरक्षित जगह की तलाश कर रही थीं

दो

पुरूषों की नंगी छातियों में दुबकी स्त्रियाँ
जली रोटियों के दुःस्वप्न से
बेतरह डरी हुई थीं
उनके ममत्व पर
पुरूषों के जनने का असंख्य दबाव था
स्याह रातों में किवाडों के भीतर
अपने एकांत में
वे चुपचाप सिसक रही थीं सुबह के इंतजार में

तीन

स्त्रियां इल्जाम नहीं लगा रही थीं
कह रही थीं वही बातें
जो बिल्कुल सच थी उनकी नजर में
और अपने कहे हुए एक-एक शब्दों पर
वे मुक्त हो रही थीं

इस तरह इतिहास की
अंधी सुरंगों के बाहर
वे मनुष्य बनने की कठिन यात्रा कर रही थीं

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