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Monday, March 22, 2010

कथाकार मार्कण्डेय का न रहना


उनसे हमारा परिचय बस एक पाठक साहित्यकार का था। हमारी नजर में वे हमेशा एक बड़े कथाकार रहे। तमाम साहित्यिक गुटों से परे और बहुत सालों से चर्चा में न रह कर भी वे हमारे दिलों में बड़ा ही बने रहे। कवि मित्र संतोष कुमार चतुर्वेदी ने जब यह सूचना दी, लगभग रात के ग्यारह बजे। तो मन सचमुच बेचैन हो गया। अब मैं किससे कहुँ यह बात। पत्नी से कहा---मार्कण्डेय नहीं रहे। कौन मार्कण्डेय....?? पत्नी ने मेरे चेहरे पर आँख गड़ा दिया।

बहुत दिनों से कथा के लिए एक कहानी भेजने का अपना वादा बार-बार याद करता रहा। कोई कहानी पूरी हुई ही नहीं, भेजता कैसे। बहरहाल एक एसएमएस के जरिए मैंने भाई संतोष के मोबाईल पर एक श्रद्धांजली संदेश भेज दिया।
मार्कण्डेय अकेले ऐसे कथाकार थे, जिनकी कथा में आजादी के बाद का गाँव अपने पूरे यथार्थ के साथ प्रकट हुआ है। आज जब कि गाँव गाँव की तरह नहीं रह गए हैं, ऐसे समय में मार्कण्डेय का जाना नि:शब्द कर गया है हमें।

उसे सुनो कभी अपने एकांत में....

रविन्द्र, सच सिर्फ वही नहीं होता जो दिखता है, उसके आगे भी सच के कई छोर होते हैं। मुझे इस बात का कोई मलाल नहीं कि तुम उन छोरों तक पहुँचने की कोशिश नहीं करते कभी ---कम से कम मेरे मामले में तो कभी भी नहीं। लेकिन यदि लंबे समय तक अगर तुम सचमुच लिखना चाहते हो तो सच के उन अंधेरे गह्वरों में तुम्हे जाना ही होगा। मेरे लिए नहीं रविन्द्र अपनी रचना की बेचैनी के लिए। और तुम वहाँ जाकर ही खुद को बचा भी पाओगे।

यह सही है कि अपने कुछ न लिख पाने का कोई सही कारण तुम्हे नहीं बता पाता। लेकिन जरा सोचो, क्या भाषा के पास उतनी ताकत है कि न कह सकने को भी अपनी छाती पर धारण कर सके? उतनी ही शिद्दत के साथ?

मेरा न कहा हुआ मेरे कहे हुए से ज्यादा महत्वपूर्ण है मेरे भाई......उसे सुनो कभी अपने एकांत में । जिस दिन सुन लोगे, उस दिन मेरे सामने यह प्रश्न कभी नहीं रखोगे, कि मेरे इस निष्क्रिय उदासी के छोर किन घाटियों के किन अतल गह्वरों में सांस की आस में तड़प रहे हैं...

Friday, March 19, 2010

लौट आना चाहता हूँ.....

दोस्तों की शिकायतें बाजिब हैं, लेकिन क्या करूं कि कोई एक कहानी पूरी हो जाय। आपको जानकर शायद ही विश्वास हो कि मेरे पास १५ अधूरी कहानियाँ हैं, जो रोज रात को मुझसे हिसाब मांगती हैं, क्या यही कारण नहीं है कि मेरा रक्त चाप अनियमित हो गया है। उस दिन कुणाल फोन पर थे। सवाल वही कि क्या कर रहा हूँ। जवाब वही कि यार कई कहानियाँ हैं, पूरी नहीं कर पा रहा। और उनकी शिकायत कि आपने खुद को बर्बाद किया है।
कभी-कभी सोचता हूँ कि संकल्प के साथ एक दिन बैठूंगा और सबकी सुनूंगा, सारी कहानियों की शिकायतें और इस तरह निशांत, रधुराई, रविन्द्र, नीलकमल और कुणाल की शिकायतें भी। और एक के बाद एक सारी कहानियों को पूरा कर लूंगा। सचमुच एक बार फिर से नादानियों के उस समय में लौट आना चाहता हूँ ॥ वहीं जहां मेरी मुक्ति के गीत दफन हैं किसी भी भटकाव का एक किनारा यदि कहीं हैं, कोई है, तो यही है।.....शुरू यहीं...तो खत्म भी यहीं....उसके बाद का पता नहीं....
...

Monday, March 15, 2010

करता हूँ प्यार....


कहते हैं दुनिया जा रही नाउम्मिंदी की ओर
समय की पीठ पर रह गए हैं महज
हमारी अच्छाईयों के निशान

आज जो दिखता
वह एक अंधी दौड़
किसे किसकी फिकर
भागते लोग बेतहासा
स्वयं में सिमटे
ऐसे सपनों की गठरी कांधे पर लटकाए
जिनका दुनिया से नहीं कोई सरोकार

सबकी अपनी छोटी-मोटी दुनिया
सबके नीजि झमेले
वह आदमी जो दुनिया को बदलने का
लगा रहा नारा
उसकी जेब में भी उसकी अपनी दुनिया
जिसे वह बार-बार सहलाता- पोसता

इतनी हिंसा
इतने युद्ध
इतनी नफरत के बीच
जहाँ कभी भी मौत की आहट का अंदेशा

ऐसे में मेरे हमदम
दुनिया सुन्दर बनी रहे
इसलिए चलता हूँ रोज एक कदम

क्योंकि मैं इस दुनिया की तरह ही
तुम्हे करता हूँ प्यार....

Tuesday, March 9, 2010

विमलेश त्रिपाठी की गजलें.







तेरी ज़ुल्फों के आर पार कहीं इक दिल अजनबी सा रहता है


लम्हा लम्हा जो मिला था कि हादिसों जैसा
वो वक्त साथ मेरे हमनशीं सा रहता है

ये जो फैला है हवा में धुंआ-धुंआ जैसा
रात भर साथ मेरे जिंदगी सा रहता है

डूब कर जिसमें कभी मुझको फ़ना होना था
वो दरिया मुझमें कही तिष्नगी सा रहता है।।

-दो-

अजब है कश्मकश ये जिंदगी कि क्या करिए

हम बचा लें जरा उल्फ़त यही दुआ करिए

हर गली शहर अब महरूम है फ़रिश्तों से

ये नया दौर है बंदों को ही खुदा करिए

जानता कौन है कैसा है कि अंबर का जलवा

जो जमीं है मिली उसी को आसमां करिए।।



Friday, March 5, 2010

विमलेश त्रिपाठी, कुछ और कविताएँ


कविता से लंबी उदासी


कविताओं से बहुत लंबी है उदासी
यह समय की सबसे बड़ी उदासी है
जो मेरे चेहरे पर कहीं से उड़ती हुई चली आई है

मैं समय का सबसे कम जादुई कवि हूँ

मेरे पास शब्दों की जगह
एक किसान पिता की भूखी आंत है
बहन की सूनी मांग है
कपनी से निकाल दिया गया मेरा बेरोजगार भाई है
राख की ढेर से कुछ गरनी उधेड़ती
मां की सूजी हुई आँखें हैं
मैं जहाँ बैठकर लिखता हूँ कविताएँ
वहाँ तक अन्न की सुरीली गंध नहीं पहुंचती

यह मार्च के शुरूआती दिनों की उदासी है
जो मेरी कविताओं पर सूखे पत्ते की तरह झर रही है
जबकि हरे रंग हमारी जिंदगी से गायब होते जा रहे हैं
और चमचमाती रंगीनियों के शोर से
होने लगा है नादान शिशुओं का मनोरंजन
संसद में वहस करने लगे हैं हत्यारे

क्या मुझे कविता के शुरू में इतिहास से आती
लालटेनों की मद्धिम रोशनियों को याद करना चाहिए
मेरी चेतना को झंकझोरती
खेतों की लंबी पगडंडियों के लिए
मेरी कविता में कितनी जगह है


कविता में कितनी बार दुहराऊँ
कि जनाब हम चले तो थे पहुँचने को एक ऐसी जगह
जहाँ आसमान की ऊँचाई हमारे खपरैल के बराबर हो
और पहुँच गए एक ऐसे पाताल में
जहाँ से आसमान को देखना तक असंभव

(वहाँ कितनी उदासी होगी
जहाँ लोग शिशुओं को चित्र बनाकर
समझाते होंगे आसमान की परिभाषा
तोरों को मान लिया गया होगा एक विलुप्त प्रजाति)

कविता में जितनी बार लिखता हूँ आसमान
उतनी ही बार टपकते हैं माँ के आँसू
उतनी ही बार पिता की आंत रोटी-रोटी चिल्लाती है
जितने समय में लिखता हूँ एक शब्द
उससे कम समय में
मेरा बेरोजगार भाई आत्महत्या कर लेता है
उससे भी कम समय में
बहन औरत से धर्मशाला में तब्दील हो जाती है


क्या करूँ कि कविता से लंबी है समय की उदासी
और मैं हूँ समय का सबसे कम जादुई कवि
क्या आप मुझे क्षमा कर सकेंगे ??


शब्द जो साथ नहीं चलते

शब्द जो साथ नहीं चलते
पेड़ों की ओट से देखते हैं हमारा चलना
और जब हम पहुँच जाते हैं एक जगह
वे चुपके से आ जाते हैं साथ - ऐसे
जैसे कि कहीं गए ही न हों


लोग जो साथ नहीं रोते
खिड़की की ओट में रोते हैं कातर होकर
धुंधलाई आँखों से

Wednesday, March 3, 2010

अनहद की तरफ से प्रिय साथियों को होली की ढेर सारी रंग-विरंगी बधाईयाँ.....
साथियों हमें बेहद खुशी है कि आप हमारे ब्लॉग को इतनी शिद्दत से पसन्द कर रहे हैं....
यह सूचित करते हुए हमें बेहद खुशी है कि हम अन्य समकालीन हमारे प्रेरक साहित्यकारों की रचनाओं को भी यहाँ शामिल करेंगे..
आपके सहयोग की आशा सहित

आपका ही
अनहद

सबलोग यहाँ बोलते ही हैं

लेकिन ये अजीब ही बात है कि सबलोग यहाँ बोलते ही हैं, या बोलते रहना चाहते हैं। बोलने वाला सुनना नहीं चाहता, अब वो जमाना नहीं रहा जब लोग बोलते भी थे और सुनते भी थे और परस्पर बोलने और सुनने के बीच से कोई बड़ी बात उभर कर सामने आती थी। अच्छा, आज जितना बोला जा रहा है, पहले क्या इतना बोला जाता था। पहले कम बोलकर लोग अधिक कर गुजरते थे, आज बोलने के नाम पर सभी कमर कसे बैठे हैं और कर गुजरने का वक्त भी इस 'बोलने ने ही ले लिया है। सोचते हुए एक सोच उभर कर आई कि कितनी पत्रिकाएं, कितनी किताबों के ढेर, और आज के इस इंटरनेटी समय में हजारों ब्लॉग।।। लेकिन रोना वही, साहब कोई देखता तक नहीं, पढ़ने की बात तो दूर है।।
इतने सारे बकवासों के बीच यह बकवास भी क्या उसी बोलने की आवृति..?????...पता नहीं।।।