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Friday, April 30, 2010

संकलन "कविता से लंबी उदासी" की एक कविता

सपना                                 

गाँव से चिट्ठी आई है                                                                        
और सपने में गिरवी पड़े खेतों की
फिरौती लौटा रहा हूँ

पथराये कंधे पर हल लादे पिता
खेतों की तरफ जा रहे हैं
और मेरे सपने में बैलों के गले की घंटियाँ
घुंघरू की तान की तरह लयबद्ध बज रही हैं

समूची धरती सिर से पांव तक
हरियाली पहने मेरे तकिए के पास खड़ी है

गाँव से चिट्ठी आई है
और मैं हरनाथपुर जाने वाली
पहली गाड़ी के इंतजार में
स्टेशन पर अकेला खड़ा हूँ

Thursday, April 22, 2010

कहना सच को सच की तरह : विमलेश त्रिपाठी

कुछ अरसा पहले वागर्थ के संपादक विजय बहादुर सिंह ने अपने संपादकीय में एक बहुत ही अच्छी कविता लिखी थी। कविता के रूप में संपादकीय लिखने का शायद पहला सिससिला उन्होंने शुरू किया, जहाँ तक मेरी जानकारी है। कविता को पढ़ते हुए मैं काफी उद्वेलित हो गया और अनायास ही मेरे जेहन में एक कविता ने जन्म लेना शुरु किया। उस कविता को आपके साथ शेयर कर मुझे बहुत खुशी हो रही है।


कहना सच को सच की तरह

राहत मिलती है यह सुन-देखकर कि अब भी गुस्सा है
और भड़ास निकालने का साहस भी


इस अजीब सी हो गई दुनिया में
जहां सिर्फ नाच का शोर चमचमाती रंगिनियों में


एक पूरी पीढ़ी डिस्कोथेक और नाईट क्लब के हवाले
बूढ़े सब मोह भंग के शिकार
और जिनसे दुनिया को उम्मीद
वे शब्दों की बाजीगरी में ढुंढते अपने जिन्दा होने के सबुत


चुप रहो और करो इंतजार का नाकाब ओढ़े
जहाँ मर गए लोगों की एक लंबी जमात खड़ी


ऐसे में जब अचानक चीखने की हद तक चिल्लाता है
निकालता है भड़ास पूरी ताकत के साथ साठ पार का एक आदमी
तो भड़ास वह अच्छा लगता है
सच को सच की तरह कहना और सुनना सच को सच की तरह
जरूरी लगता है इस मुर्दगी सन्नाटे में


समय ऐसा यह जब पता नहीं कितने ‘अंत’ की घोषणा
और लगभग स्वीकार कर चुके लोग
कि सच का भी हो गया अन्त
कि फिसल जाने दिया हमने ही समय वह हाथ से
जब एक स्त्री की इस्मत के मसले पर
रच जाता था भारत इसी धरती पर इसी भारत में


भाई के चप्पलों को सिर पर रख
जंगल से घर तक की यात्रा का मिसाल भी यहीं देखने में आता
और कितना कुछ
कि पूरी दुनिया देखती थी हैरत से
नत होते थे गुरूर से भरे मस्तक
विस्मय से


क्या जरूरी है दुहराना कि कैसे-कैसे मंजर देखे
और झेले हमने अपनी छातियों पर
पर इतने अकेले नहीं हुए हम कभी
न इतने खाली
कि जिस जमीन पर खड़े हम
किसी भी पल उसी के खिसक जाने का अंदेसा


एक हत्यारा संसद में पहुंचकर करता है अट्टहास
हमें गुस्सा नहीं आता
क्या फर्क पड़ता है हमें
कि दुनिया में नहीं रहे ऐसे लोग
जिनके रहने से दुनिया को दुनिया की तरह
बने रहने की एक उम्मीद जगती थी


अभी कल ही कि बात है
इसी शहर के एक फूटपाथ पर पड़ी थी लाश एक अधेड़
गुजरे थे हजारों लोग उसी रास्ते से भागते
अपने-अपने दफ्तर दुकानों तक पहुँचने के लिए
गुजरी थी शहर के सबसे बड़े अधिकारी की गाड़ी उसी रास्ते के किनारे से
गुजरने वालों में शहर के लेखक कवि भी थे
जिन्हें पहुंचना था किसी गोष्ठी में और सुनानी थी कविता मनुष्य के बदहाल होते जाने पर
कहते हैं उसी शहर से गुजरती है राज्य के मुख्यमंत्री की कार भी
और उस दिन भी गुजरी थी


उसी रास्ते से गुजरना हुआ था स्कूल के कुछ बच्चों का
साथ में उनकी माताएं भी थी स्कूल के भारी भरकम बैग सम्हाले
पानी के बोतल
एक बच्चे ने पूछा था – मां कौन सो रहा है सड़क के किनारे।
-- कोइ नहीं बेटा, कोइ नशाखोर होगा। तुम चलो स्कूल के लिए देर हो रही है

और बच्चा कुछ सोचते हुए आगे बढ़ गया था


वह कोई नशाखोर नहीं था
था वह इसी देश का नागरिक
और अचानक स्ट्रोक के बाद सत्तरह घंटे तक पड़ी रही थी
उसकी बूढ़ी देह लावारिश
उस समय उसका इकलौता बेटा अमेरिका के किसी शहर में था


कब तक आखिर कब तक हम
अपनी ही पनही सम्हालने में करते रहेंगे उम्र यह शेष
एक न एक दिन खड़ा होना ही पड़ेगा
बोलना ही पड़ेगा वर्षों से दबी वह बात
जो आज तक बोली नहीं गई
कभी भय से कभी मजबूरी से और कभी जान बूझकर
कि बोलने से ही हमारा सदियों का बनाया
तिलस्मी दानव मोम की तरह पिघल सकता था।


और वह कल पिघल सकता था तो आज भी
जरूरी है कि हमारे अन्दर
सच को सच की तरह कह पाने का साहस हो
और एक जरूरी ताकत जिसे किसी बाजार से नहीं खरीदा जाता


तो शुरूआत एक भड़ास से ही
कि सच को सच की तरह कहने से ही सही......



हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad