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Tuesday, June 29, 2010

राकेश श्रीमाल की एक कविता

राकेश जी की यह कविता जब मुझे पढ़ने को मिली तो सचमुच मैं विस्मित रह गया। इस कविता ने मुझे इतना प्रभावित किया कि मैंने इसे अपने ब्लॉग पर प्रकाशित करने की अनुमति राकेश जी से ले ली.  यह कविता यहां आप सबके लिए आपकी प्रतिक्रियाओं की आशा सहित....   


स्त्री का आदिम गीत


कहीं कँटीली झाड़ियों के पीछे
ना मालूम कब से बसी कन्दरा में
सुबक रही है एक स्त्री

उसी के गर्भ में जा रहे हैं उसके आँसू
अपनी नई पीढ़ी को देने के लिए

बूढ़ी दाई कहती है,
यह परम्परा ना जाने कब से चली आ रही है
उस स्त्री के दबे हाथ
मिट्टी से बाहर आकर
कथक का ह्स्तसंचालन कर रहे हैं
कलाप्रेमी उसका रस ले रहे हैं

साँस लेने को तड़प रही है
मिट्टी में लथ – पथ उसकी नाभि
उसके शरीर के बालों ने
फैला दी हैं मिट्टी में अपनी जड़ें
रूप – लावण्य की फसल पैदा करने के लिए

काटो --- काटो
जल्दी काटो इस फसल को
कहीं यहाँ सूख न जाए

बड़े जतन से
धैर्य और भावनाऑं के
लोहे को प्रशंसा की आग में पिघलाकर
तैयार किए जाते हैं हंसिये
फसल काटने के लिए

भिड़ गए हैं युद्ध –स्तर पर
सभी धर्म... कयदे – कानून
यहाँ तक कि प्रेम भी
कहीं फसल बरबाद न हो जाए

चुपचाप कटती रहती है स्त्री
प्रेम में, गृहस्थी में
और समय में

किसी को पता नहीं चलता
उसका बीतना
फिर – फिर जन्मते हुए

प्रतिपल बोई जाती है उसकी फसल
प्रतिपल काटने के लिए
जमींदार भी बन गए हैं मजदूर

यह सबसे बड़ा समाचार
सुनाना नहीं चाहता कोई भी
स्त्री इसके सुनने के पहले ही
कर लेती है आत्महत्या
बिना यह जाने
उसकी फसल उसी ने काट ली है

काटने की मेहनत किए बिना
समूची दुनिया
उसका स्वाद लेती रही है

कबीर को होना था स्त्री
कुछ और लिखने के लिए
मीरा तो दीवानी ही मर गई

पुल्लिंग है, शब्द का लिंग भी
लपलपाते विष – वीर्य को समाते हुए

आओ...खेलो मुझसे
आओ...
रचो मेरे साथ सारे उपनिषद....पुराण
नित नई महान रचनाएं और आचार - संहिताएं

होगा तो वही जो चला आ रहा है
इस सृष्टी की शुरुआत से

बरगद के बूढे पेड़ पर बैठकर
कोयल कब से यहाँ गीत सुना रही है
ऎसा कोई नहीं
जो उसकी लय को पकड़ पाए
 
हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

15 comments:

  1. विमलेश जी आपका बहुत-बहुत शुक्रिया जो आपने इतनी अच्छी कविता प्रकाशित की. स्त्री का दर्द उसकी सच्चाई को शिद्दत से प्रस्तुत किया है श्रीमाल जी ने.... उन्हें ढेर सारी बधाई

    --- नगेन्द्र सिंह

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  2. राकेश जी की अद्भुत रचना को पढ़वाने का आभार.

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  3. इतनी शक्तिशाली रचना !! मै तो विस्मित रह गई ! सचमुच ये तो स्त्री का रक्त मांस वाला इतिहास है ! यहाँ तो पुरुषों की भी मनाही है ! यह कौन प्रेमी पुरुष है जो यहाँ तक आया ! मेरे कोर में अटका है एक आंसू ! सब कुछ दे डालने के बाद स्त्री है क्या चीज ! विमलेश जी ! लेखक से कहिये मेरे प्रश्नों के जवाब दें ! शुभ कामनाओ के साथ !

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  4. Very nice poem. THAX.

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  5. bahut hi behtareen kavita. rakesh ji aap itnee gahri baat itne sahaj bhaav se kah daalne ke liye badhaai ke paatra hain. aage bhi aapse aisi umda kavitaaon kee ummeed banee rahegi.

    bimlesh ise apne blog men daalne ke liye shuqriya.

    kalpana

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  6. shandaar
    aj doosri baar yahan padhe ki bhi utni hi sihran hui
    aabhar

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  7. राकेशजी की कविता उम्‍दा है. एक आदिम संघर्ष गाथा है. उन्‍हें बधाई. आपको प्रस्‍तुति के लिए आभार.

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  8. झकझोर दिया……………एक कटु सत्य को उजागर कर दिया जिसके लिये शब्द कम है कहने के लिये…………बस दिल मे उतर गयी।

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  9. Khaamosh bahte aansuon kaa itihaas...dharti ki tarah keval aur keval dete rahne vaali aurat...nahin..... maan ki jiti jaagti kahaani.rakesh ji aapke andar ki samvedanshil stri ko pahchaan gayaa hun main.Aao gale milte hain.

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  10. मेरे पास शब्द नही है, रोंगटे खड़े है, आँखे नम.
    दक्षिण भारत मे रहता हू ,पता ही नहीं के कविता मे हिन्दी अभी भी कोई कम नही
    शायद इन कविताओं से प्रेरित हो कर मैं भी मेरी स्वर्गिय माँ
    की तरह कुछ पंक्तियों का निर्माण करू.
    वरना अभिव्यक्ति की भाषा सिर्फ़ मेरे लिए अँग्रेज़ी मात्र है

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  11. बहुत ही बढ़िया व्लाग है। एकदम आपकी तरह। बधाई। कविताएँ भी बस देखी है। इसलिए उस पर बातचीत फिर कभी ....

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  12. होगा तो वही जो चला आ रहा है
    इस सृष्टी की शुरुआत से

    बरगद के बूढे पेड़ पर बैठकर
    कोयल कब से यहाँ गीत सुना रही है
    ऎसा कोई नहीं
    जो उसकी लय को पकड़ पाए
    satya vyatha katha vyakt hui hai...
    regards,

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  13. राकेशजी को/की कविता के लिये बधाई !

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  14. सांसे थम सी गयी ........ आँखों के आगे सारा दृश्य उभर गया . उफ्फ्फ्फफ्फ्फ्फ़ . अच्छा लगा .

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  15. ऐसी कविताएँ स्मृति मेँ खाद बन कर समा जाती है। कुछ पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीँ- "...उसी के गर्भ मेँ जा रहे हैँ उसके आँसू/ अपनी नयी पीढ़ी को देने के लिए...","...चुपचाप कटती रही स्त्री/प्रेम मेँ, गृहस्ती मेँ/ और समय मेँ...","...कबीर को होना..........और आचार संहिताएँ..."
    राकेश जी को उनकी बेहतरीन कविता के लिए बधाईयाँ !
    कला माध्यमोँ मेँ एक शब्द 'Hidden Beauty' का बड़ा महत्व होता है। विमलेश भैया ने भी ऐसी जबरदस्त कविता को ब्लॉग पर प्रकाशित कर के कला धर्म को निभाया है। आपको भी धन्यवाद!

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