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Tuesday, December 7, 2010

नील कमल की कविताएं

नील कमल का काव्य संग्रह

इस समय के समर्थ युवा कवि नील कमल का जन्म 15 अगस्त 1968 को वाराणसी के एक गांव भटेलहा में हुआ। देश की सभी पत्र-पत्रिकाओं में कविता, समीक्षा एवं आलोचनात्मक लेखों का प्रकाशन। वे फिलहाल प. बंगाल सरकार के एक महत्वपूर्ण विभाग में प्रशासनिक पद पर कार्यरत हैं। 
हाथ सुंदर लगते हैं नील कमल का पहला काव्य संग्रह है जो कलानिधि प्रकाशन, लखनऊ से हाल ही में छपकर आया है। उक्त संग्रह से तीन कविताएं यहां दी जा रही हैं। आपकी प्रतिक्रियाएं आमंत्रित हैं।


हाथ

हाथ सुंदर लगते हैं
जब होते हैं किसी दूसरे के हाथ में
पूरी गरमाहट के साथ

हाथ खतरनाक लगते हैं
जब उतरते हैं किसी गर्दन पर

हाथों को पकड़ने की कोशिश में
पाता हूं
कि उग आया है जंगल हाथों का
गर्दन के आस-पास
और दुनिया हाथों के जंगल में बदल गई है

वह जंगल हमें बुलाता है बार-बार
अब बचने का मतलब है
हाथों के जंगल से बच निकलना

बचना है तो
पैरों से लेने होंगे काम हाथों के
दुश्मन को पहचानने के लिए
चिपका देनी होंगी आंखें उन हाथों में
जो फिलहाल हैं गर्दन पर ।

दाढ़ी

अपराधी नहीं काटते दाढ़ी
दाढ़ी सन्यासी भी नहीं काटते

दाढ़ी में रहता है तिनका
तिनका डूबने का सहारा होता है

दाढ़ी वे भी नहीं काटते
जिनके पास इसके पैसे नहीं होते

दाढ़ी सिर्फ दाढ़ी नहीं होती
यह इतिहास के गुप्त प्रदेश में
उग आई झाड़ी है

इस झाड़ी में छिपे बटेर
ढ़ूंढ़ रहें हैं शंकराचार्य
ढूंढ़ रहे हैं शाही ईमाम ।


नींद में रेलगाड़ी

भोर की गाढ़ी नींद में
कोई सपना प्रवेश करता है
गुप्तचर की तरह
और पकड़ा जाता है
भोर की नींद के उचटते ही

यह सपना सदियों से
पीछा कर रहा है नींद का
और अब उसके पकड़े जाने के बाद
कसती है मुट्ठी
तो वह रेत बन जाता है

सपने रेत की तरह
पड़े रहते हैं चौड़े तटों पर
और बहती रहती है नींद
नदी की तरह

कितना प्यारा मजाक है
बुजुर्गों के जमाने से
चली आ रही यह बात
कि नदी का पेट
कभी मापा नहीं जा सकता

नींद में आती है रेलगाड़ी
जिसे समय रहते
पकड़ा न गया तो
अनर्थ हो जाएगा

एक आदमी दौड़ रहा है
पूरे दमखम से
उसके प्लेटफार्म तक आते-आते
आगे बढ़ चुकी होती है रेलगाड़ी
छुक-छुक, छुक-छुक रेलगाड़ी

शायद वह आदमी
नौकरी के इंटरव्यू के लिए
नहीं पहुंच पाएगा
और नौकरी का सपना
उसकी आंखों में
रेत-सा पसर जाएगा

सपने में आता है एक जहाज
पानी वाले जहाज में चढ़कर
जाना था जिस आदमी को
सात समुंदर पार
वह बेतहाशा दौड़ता हुआ आता है
कि इसके पहले ही
लंगर उठ चुका होता है
नदी के तट और चौड़े होते हैं
नदी के बीच ही
उभर आता है रेतीला टापू

सपने में एक आदमी को
मिलता है इम्तहान का पर्चा
पर्चे के सवाल देख
आदमी के हाथ के तोते
उड़ जाते हैं
कि किसी भी सवाल का जवाब
उसे नहीं आता है

अब नींद में रेत ही ज्यादा है
पानी बहुत कम
सपने में नदी पर होता है
एक बड़ा लंबा पुल
जिस पर चलती है रेलगाड़ी
छुक-छुक, छुक-छुक रेलगाड़ी

रेलगाड़ी में बैठा कोई मुसाफिर
नदी को देखकर हाथ जोड़ता है
एक लड़की, दांये हाथ से
छाती से माथे तक, और फिर
दोनों कंधों को छूती
एक क्रॉस बनाती है
और अपना रेशमी स्कार्फ
दुबारा कसकर बांधती है
रेलगाड़ी नदी के उपर से
गुजरती है तभी कोई नौजवान
एक सिक्का उछाल देता है नदी में

भोर की गाढ़ी नींद में डूबा हुआ
वह आदमी बस प्यार से देखता है नदी को।



हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Friday, December 3, 2010

संदीप प्रसाद की कविताएं


संदीप प्रसाद ने स्नातकोत्तर की पढ़ाई प्रेसिडेण्सी कॉलेज, कोलकाता से पूरी की है। स्कूल के समय से ही कविताएं लिख रहे हैं। कुछ पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित हुई हैं। फिलहाल वे पश्चिम बंगाल के एक विद्यालय में अध्यापन का कार्य कर रहे हैं। 
अनहद पर उनकी कविताएं पहली बार आपकी प्रतिक्रियाओं की उम्मीद के साथ। 



माँ, कविता और रोटियाँ

घर की चौखट पर बैठ
मैँ उसे सुनाया करता
अपनी कविता,
जब पीढ़े पर बैठे हुए वो सेँकती थी
रोटी।

अक्सर ऐसे समय मेँ
उसकी पुतलियाँ विचारोँ की लटाई थाम कर
ढीले छोड़ दिया करती-- अपने ख़्वाब।
मुझे लगता कि उसके ख़्वाब
अंधेरे माघ के चौदहवेँ दिन के
आकाश मेँ उड़ रहे हैँ
और उसमेँ लहरा रही हैँ
घबराहट और उत्सुकता भरी
दो पूँछेँ।

प्राय: मेरी कविताएँ
खड़बड़ाकर निकल जाती उसके सामने से
और रह जाती केवल उड़ती हुई धूल
जिन्हेँ वह छा जाने दिया करती
अपनी आँखोँ पर।

घर की चौखट पर
माँ को सुनाते हुए कविता,
मैँ लपेट लिया करता खुद को
कुहरे की कई तहोँ से
और जब कुहरा छँटता
तो सामने होती
अद्भुत उर्वरता और कविता की खुशबू से लबरेज
माँ की नरम-नरम रोटियाँ।

आज भी अक्सर बड़ी कसक के साथ
सोचता हूँ--
मैँ कविता सुनाते हुए
नहीँ बना सकता रोटियाँ,
जिन्हे वो बना लिया करती थी
सुनते हुए
कविता।

जब प्यार होता है
जब प्यार होता है
तो कम हो जाते हैँ दुनियां के मुद्दे
हकीकत और सपना फड़फड़ाते हैँ
एक ही धागे से चिपक कर ;
महजिद से बँधे रंगीन
कागजी झंडोँ की तरह।
अचानक सब कुछ लगने लगता है-
अलग-अलग सा।
खड़बिद्दर रास्तोँ पर धीमेँ
रिक्शे की दचकन
कसे हुए बस पे पिछली सीट पर
दबी हुई सी जगह
घड़ी की सुइयोँ की नोक पर दौड़ते शहरोँ के
चमचमाते दुकानो के लम्बे- लम्बे आइने
पीछे -पीछे आने वाली
संगीत की कोई मद्धम धुन
सफर मेँ किसी पुल के लम्बे अंधेरे मेँ
डूबा कोई लम्हा
तालाब के किनारोँ पर तैरते शैवालोँ को
खाती हुई नन्ही मछलियां
बाँस के किसी कुंज मेँ छिपते
किसी पीले साँप
को देख कर लगने वाला डर
या ऐसी ही बहुत सी चीजोँ का असर
वैसा नहीँ होता , जैसा होता है।
अक्सर ऐसे समय मेँ
कमजोर हो जाते हैँ दिल मेँ बैठे जानवर के
पैने दाँत और नाखून
अल्लाह और राम के नारोँ के बीच
दिख जाता है
टूटा हुआ राम का धनुष...
कतरा भर अल्लाह के आँसू।

वैलेन्टाईन्स डे

कै-कै की आवाज के साथ
अचानक उकियाती हुई
कुतिया मर गई रात को।
शायद ज़हर दे दिया किसी ने...!
सुबह को फुदकते-कूदते हुए
गली का कुत्ता
उसकी लाश के पास आकर ठिठक गया
और फिर चुपचाप अकेले मेँ
सुनसान हो कर बैठ गया और
उसकी आँखो के कोरोँ मेँ सिमट आई नमकीन बूँद
क्योँकि अपने रंगीन दिनोँ मेँ उसने
उसके साथ गुजारे थे , कई हसीन लम्हे-
शाम को कुत्ता
खीँच -खीँच कर मांस खा रहा था
और कुतिया के
पसलियोँ की हड्डियाँ
सफेद -सफेद दिख रही थीँ...!


हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad