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Sunday, January 23, 2011

'अनहद' के जनवरी अंक में एक कहानी



पिता
                                                  विमलेश त्रिपाठी

                                                                        
                                                    “The child is the father of a man.”  
                   - William Wordsworth
          

तेइस साल के उस युवक की बातें एक साथ सैकड़ों बरछे की तरह उनके सीने में चूभ गईं थीं। वे इतने असंयत कभी नहीं हुए थे – जैसे सिनेमा की रील घूमकर अचानक बहुत जमाने पहले के समय में चली गई हो – समय का सीना चीरते हुएकि समय की सिली पर कोई बेदर्द आरामशीन चला दी गई हो।


स्मृतियों के बुरादे झर-झर निकल रहे थे। समय पटरियों की तरह कई भागों में कटकर सपाट पड़ा हुआ था।
युवक के शब्द बार-बार उनके जेहन में गूंज रहे थे। उन्होंने सिगरेट सुलगाई और ताबड़तोड़ कई-कई कश खींच गए – उन्हें लगा कि एक पर एक कई कश उनके दिमागी तंतुओं को निष्क्रिय कर देगा। लेकिन गूंज थी कि बार-बार कानों में धांय-धांय बजती चली जाती थी।

घर मद्धिम अंधेरे में डूबा हुआ था। पत्नी शयनकक्ष में बेसुध सोई पड़ी होगी। उन्होंने सोचा। पता नहीं कितने समय से उसके घुटनों में असह्य दर्द था। ओम्नाकोटिल-10 की दो काली और चौकर गोलियां उन्होने अपने हाथों से खिलायी थी और नींद के लिए एक मटर जैसी गोली एलजोलम-0.25 भी दे दिया था साथ में। असंयत की अवस्था में वे कई बार बेडरूम का चक्कर लगा चुके थे – हर बार पत्नी का मुंह बेहोशी में खुला हुआ दिखा था और सांस की घरघराहट के बीच भी वे कई बार उसके चेहरे पर झुक- से गए थे। वे उसके सामने चीखना चाहते थे – अपनी बेवशी पर फूट-फूट कर रोना चाहते थे। पूछना चाहता था उनका संपूर्ण पुराना शरीर कि क्यो??? उनकी परवरिश में कहां गलती हुई – किस अपराध की सजा है यह,  जो देकर चला गया वह तेइस साल का लड़का।
लेकिन हर बार वे किसी पराजित योद्धा की तरह लौट जाते थे।

और एक के बाद एक यह चौथी-पांचवी सिगरेट थी जो होठों से होती हुई मेज के कोने पर पड़ी नि:शब्द सुलग रही थी। कई बार बदहवासी में उन्होंने फ्रीज का दरवाजा भी खोला था – रोजमर्रा की चीजों के बीच बोदका की आधी खाली बोतल बार-बार आंखों में चूभ जा रही थी। लेकिन ज्यों ही उसे उठाने के लिए उनके हाथ आगे बढ़ते थे, डॉ. अरूप साहू की हिदायत कान में किसी जरूरी सूचना की तरह बजने लगती थी कि एक बूंद शराब भी आपको मौत की अंधेरी खाई में धकेल सकती है। धड़-धड़ की आवाज से खुलती-बंद होती फ्रीज और डॉ. साहू की हिदायत के बीच के किसी पतले धागे पर वे सवार हो जाते – कई-कई बार।
सचमुच की याकि आभाषी दुनिया के बीच तेइस साल का वह लड़का!!
कितना             कुछ कह गया था वह - उनके आज तक के अस्तित्व को किसी गंदे कीड़े की तरह मसलता-रौंदता। कहते हुए उसके चेहरे पर शर्म और अपराधबोध की छाया तक न थी – और एक पिता का आज तक का देखा और समझा हुआ समय बेबशी की अदृश्य आंच पर धीमे-धीमे राख हो गया था।
समय ऐसे ही राख में बदल जाता है – शरीर और आत्मा की तरह!!

एक बार उन्होंने दीवार पर लटक रही अपनी पिता की तस्वीर को हताश-पराजित नजरों से देखा। उस हल्की मुस्कुराती तस्वीर के पार पीड़ा के पता नहीं कितने अदृश्य क्षण झीम-झीम जल रहे थे।
पिता समय की लंबी पगडंडियों के पार तुम्हारी पीठ पर लदी हुई एक बच्चे की देह – तुम्हारी ही देह पर लोटकर विकसित हुई तुम्हारी ही छाया के नीचे -  पिता क्या माफ कर दिया तुमने उस बच्चे को। उसे, जिसे तेइस साल का एक युवक कटघरे में खड़ा कर के निकल गया है। क्या यह तुम्ही थे आए हुए मुझसे बदला लेने। बदला??  क्या इसे महज बदला कह देना ठीक होगा पिता??

ऐसे ही राख होता है समय और मानुष के साथ मानुष होने की गंध। .....!!! मेरा निर्णय सच था पिता – तुम्हारे पितरों की करोड़ों वर्षों की मान्यताओं से अलग होकर भी – मेरा सच। वह एक मेरा सच, जिसकी आंच में तुम्हारा देखा और समझा हुआ असंख्य वर्षों का समय मोम की तरह पिघल चुका था – पानी बनकर जमीन में कही गहरे घंस गया था। ..और वह निर्णय बेहोश सी पड़ी महज उस औरत के कारण नहीं था। बल्कि एक विडंबना जिसे मेरी आत्मा स्वीकार नहीं कर सकती थी और मैं एक ही साथ इतिहास, पुराण, अपने पितरों के साथ तुमसे भी लड़ रहा था सिर्फ उस औरत के लिए नहीं उन तमाम लोगों के लिए जिन्हें आज तक आदमी नहीं समझा गया। क्या इसे  नहीं समझ सके तुम??...

उफ्फ पिता उसके बाद तुम न बोले – मैं तुम्हारी देह की खाक से और जलकर झांवर हो गई अस्थियों से चीख-चीख कर पूछता रहा – माफ किया पिता तुमने मुझे??

तुम न बोले थे। रूई की तरह सफेद तुम्हारी मूछों के पीछे छुपी जीभ न बोली थी। राख और हड्डियां क्या बोलतीं!!!

उफ्फ पिता उसके बाद तुम न बोले
और यह मेरा अपना खून क्या बोल गया वह??  उसके जन्म का कारण सिर्फ मजा…??  और क्या कुछ नहीं....।। आह, जैसे सदियों से महत्वपूर्ण रही विश्वास की कोई लकीर मिटा दी गई हो।

उनका बूढ़ा मन अतीत के पार से लौट आया था। तस्वीर वैसे ही लटक रही थी दीवार पर। माला के नकली फूलों पर धूल की परतें थीं। मटमैली दीवार के सपाट समतल के बीच मुस्कुराती – पीड़ा की आंच में झीम-झीम जलती।

मद्धिम अंधेरे की देह काली और खौफनाक रात की शक्ल में ढल गई थी।

बोदका की आधी खाली बोतल अब टेबल पर जिंदा खड़ी थी। शीशे के झक-झक सफेद गिलास का तरल सांसों के बुलबुले छोड़ रहा रहा था। सिगरेट अब भी सुलग रहा था कि समय के पृष्ठ पर स्याही के सैकड़ों निशान सुलग रहे थे साथ-साथ।

उस अंधेरे समय के बीच गिलास का पूरा जिंदा तरल क-कई बार उनकी देह में उतरा था। बोदका का बोतल समय के किसी खास टुकड़े की तरह एकदम खाली था – खाली और अपनी पीड़ा? में एकदम बेपरवाह।

बेचैनी के एक झोंके को सम्हालते हुए जब वे उठे तो उनके पैर लड़खड़ा रहे थे। लड़खड़ाते कदमों की आहट पाकर बीच में वर्षों पहले कहीं छूट गया एक लोरी का बंदिश अभी-अभी उनकी जीभ पर आकर बैठ गया था – समय की किसी पगडंडी से चलकर ..। ...सो जा....सो .....जा .... सो जा मेरे मन... और उसके बाद खांय-खांय की एक रतवारू खांसी।

लोरी की बंदिश के साथ वे लड़खड़ते कदमों से उस तेइस साल के लड़के के कमरे में पहुंचे। कमरे में सन्नाटे की सांय-सांय गूंज थी। और अंधेरे में भी बड़े फ्रेम की एक तस्वीर के सामने वे मुखातिब थे।
कितनी रातें ऐसे जागकर बीती हैं बच्चे। नींद और जागरण के बीच तुम्हारी वह किलकारी और चिचियाहट बेतरह। और तुमने कहा कि मजे के लिए............।।
उनका मन कसैला हो आया।

तस्वीर में कई चेहरे साथ थे। तेइस साल का वह लड़का तस्वीर में अधनंगा था। लड़खड़ाते कदमों वाला वह बूढ़ा तस्वीर में एक जवान हंसी के साथ एकदम जिंदा लगता था।
बच्चू!!! तुम्हारी औकात क्या है – मैने अपने इन हाथों से तुम्हारा गुह साफ किया है। - हंसी का एक कमजोर और बूढ़ा लम्हा चेहरे पर डोल गया था और इसके पेश्तर हिकारत के सैकड़ों सूअर एक साथ उनकी छाती पर दौड़ गए थे।

.. और खांय-खांय के बीच लोरी का वह खुरदरा टुकड़ा – सो...जा...सोजा मेरे मन।

उस कई शक्लों वाली तस्वीर को उन्होंने एक लाश की तरह उठाया। कांपते हाथ और लड़खड़ाते कदमों की आहट के बीच उसे पिता की पुरानी तस्वीर के साथ लटका दिया। उनकी आंखों से एक सूखती नदी की भाप छूट रही थी।
 बाद  इसके एक तेज खांसी उभरी थी और उसने उन्हे जोर से अंधेरे फर्श पर पटक दिया था – अचेत।

शायद उनकी बेचैन आत्मा दो साल के एक शिशु और तेइस साल के एक युवक के पीछे दौड़ कर गई थी। य़ुवक बादलों की कई परतों के बीच हवाई जहाज में बैठा किसी दूर देश को जा रहा था। बादलों की कई-कई परतों के पार स्वर्ग जैसी किन्ही जगहों के बीच दो साल का एक शिशु कि तेइस साल का एक युवक जहाज के भीतर बैठा हुआ और उसका लागातार पीछा करती एक पिता की आत्मा।

और पता नहीं कितने समय तक या कितनी सदी तक याकि कितनी सहस्त्राब्दी तक यह पीछा करने का  खेल लागातार चलता रहा।

पता नहीं शायद ........।         ….??


*********


हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Sunday, January 16, 2011

ऋतेश की दो कविताएं

ऋतेश काफी समय तक रंगमंच से जुड़े रहे। उन्होंने '..और अंत में प्रार्थना' और 'तख्त-ओ-ताब' जैसे सफल नाटकों का निर्देशन और मंचन किया। नीलांबर नामक साहित्यिक संस्था के गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। ऋतेश को मैं बिंदास कवि कहता हूं, वह इसलिए कि वे 'मूडी' कवि हैं। लेकिन उनकी कविताओं में एक अद्भुद किस्म का ओज और ऊंचाई है। कविता में जिस 'नीजपन' के खत्म होते जाने की बात आज उठाई जा रही है, वह ऋतेश के यहां अपनी कलात्मकता के साथ उपस्थित है। ऋतेश की कहीं भी छप रही या शामिल हो रही ये पहली कविताएं हैं। 
ऋतेश  संपर्कः 09874307700
आपकी प्रतिक्रिया इस कवि के लिए बहुत महत्वपूर्ण होगी।

घर जाता हूँ किसी अपराधी की तरह

(1)
अब तक, कब तक........
हिमालय से ऊँचे-ऊँचे शब्द
पार करने की कई असफल कोशिश कर चुका था
घिरा था। खड़ा था।  हाँफता था । शून्य में ताकता था
अरे यार तू
एक ज़ोर की धबक पड़ी पीठ पर
और फिल्म का पूरा रील घूम गया
मैं सड़क पर था
देखा
सामने एक बहुत पुराना मित्र

और आजकल क्या हो रहा है
ऐसा लगा उसके मुँह से एक भयंकर अजगर निकला हो
मुझे निगल गया हो
दम घुटने लगा
अजगर के पेट में बाऊजी का चिड़चिड़ाया चेहरा दिखा
अब भी कुछ बुदबुदा रहे थे
माँ शांत कर रही थी
मेरी ओर देखती थी
उसकी आँखों में
दिख रही थी मेरी लाचारी
अबे ओ तीसरी दुनिया के प्राणी
क्या सोचने लगा
तू बिल्कुल नहीं बदला
पर तुम तो सिर से पाँव तक बदल गए हो

वह शाहरुखी मुस्कान छोड़ता रहा
देख कुछ तो एडजस्ट करना ही पड़ता है दोस्त
अच्छा बता
तेरे सभी आदर्श किस काम के
क्या फायदा हुआ
दुनिया कहाँ से कहाँ पहुच गई और तू वहीं सड़ रहा है
मुझे लगा सचमुच मुझसे बदबू आ रही है
 “जैसा समय हो आदमी को वैसा ही होना चाहिए
बोल है कि नहीं वह हामी चाहता था


सभी अपने समय के जैसे ही होते हैं
फर्क ये है कि किसी का समय जेट विमान में बैठा है
और किसी का मर गया है

तू वही का वही....
खैर मैं चलता हूँ
वह खीज़ गया था
वैसे तुझे नहीं बुलाया

मैं चौंका
देखा सामने विवाह घर सजा है
बिजली की सजावट में चमक रहा है
मनोज संग बीना

मनोज ने तुझे....

अच्छा किया । अच्छा दोस्त है मनोज
समझदार है और.......

चेहरे से उसके असमंजस झाँक रहा था

मैंने चुप्पी तोड़ी
जाओ अब मैं भी घर जाऊँगा

(2)

कोई नहीं था दूर दूर तक
वीरान सुनसान

थीं तो केवल कट चुकी फसलों की खूटियाँ
और झाड़ झंखाड़

कि अचानक एक विशाल
गरूड़ मुझ पर झपटा
उस पर दिख गया वही पुराना दोस्त
अपनी शाहरूखी मुस्कान के साथ
मैंने बचने की कोशिश की
कि पैर एक खूँटी से टकराया
दर्द हुआ
मुंह से आह निकली
देखा सड़क पर ईंट से पैर टकरा गया है
आस पास देखा
घर करीब था

मैं घर की तरफ बढ़ा
जैसे कोई अपराधी जेल की तरफ बढ़ता हो।


समय के साथ चलो

समय के साथ चलो, समय के साथ चलो
सब समझाते रहें
मैंने भरपूर कोशिश की
समय की गति समझने की
और हर बार खुद को
पीछे बहुत पीछे हाँफता हुआ पाया

अब जब वर्षों बाद
यह समझ चुका हूँ
कि
समय के साथ चलना
यानि जो है वैसा नहीं दीखना
जो है वैसा नहीं कहना है
तब हाथ में समय नहीं है

पर
आप यह ना समझें कि मैं पछता रहा हूँ
नहीं
वास्तव में मैं इसी जद्दोजहद में हूँ
कि अपने लड़के को
इस मुहावरे का अर्थ समझाऊँ या नहीं

जबकि
अब और भी ऊँची आवाज़ में लोग यह मुहावरा
दुहरा रहे हैं
अपने बच्चों का भविष्य
सँवार रहे हैं

मैं सोचता हूँ
और सोच-सोच डरता हूँ
कहीं मेरा लड़का मुझे धिक्कारेगा तो नहीं


हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Friday, January 14, 2011

नील कमल की एक अद्भुद कविता

नील कमल समय के संजीदा कवि हैं । संपर्कः 09433123379

एक बार की बात
(बच्चों के लिये एक कविता)

एक बार की बात सुनो तुम
चमकीली वह रात सुनो तुम । 
अपने आंगन में   उतरी थी
तारों की बारात  सुनो तुम ॥

गोलू  आओ,   बेबू  आओ
निक्कू, चीनू तुम भी आओ ।
जब हम तुम जैसे बच्चे थे
मन के खरे और  सच्चे थे ।

क़लम डुबो कर लिखते जिसमें
शीशे की  दावात सुनो  तुम ॥

नीले स्याही का  जादू   जब
सिर चढ़ कर बोला करता था ।
कोरे पन्नों पर   सपनों  का
पंछी पर  तोला  करता  था ।

हर उड़ान में  शामिल  होती
अपने मन की बात सुनो तुम ॥

आम,बेर, इमली, जामुन  के
पेड़ हमारे बड़े  निकट   थे ।
गूलर, नीम और  बरगद के
पेड़ साथ ही खड़े विकट  थे ।

महुआ झरते  फूल  सुनहरे
पीपल झरते  पात सुनो तुम ॥

खेतों में पकते  अनाज  की
खुशबू से  मन भर जाता था ।
ढिबरी सांझ ढले जब  जलती
घन से घन तम डर जाता था ।

धुले-धुले से मन सबके  थे
नहीं कहीं थी घात सुनो तुम ॥

लिपे-पुते घर की देहरी पर
खुशियों का  बारहमासा था ।
राग रसोई का  मौसम तो
अपने घर अच्छा खासा था ।

कितने मन से हम खाते थे
तरकारी  और भात सुनो तुम ॥

विद्यालय था तीन कोस पर
कोस अढ़ाई  था   बाज़ार ।
दूरी बीच नहीं आती  थी 
चलते थे सब  कारोबार  ।

अपने आंगन  से  गंगातट
किलोमीटर सात सुनो तुम ॥

जब तुम कुछ लिख-पढ़ जाओगे
सचमुच आगे बढ़     जाओगे  ।
बचपन  अपना  याद करोगे 
घर आंगन  आबाद  करोगे  ।
मीठी यादों ने खिड़की   में
रक्खे होंगे  कान सुनो तुम ॥

हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Wednesday, January 5, 2011

आज लौटा हूं तो...

मेरा जन्म ऐसे परिवेश में हुआ जहां लिखने-पढ़ने की परम्परा दूर-दूर तक नहीं थी। कहने को हम ब्राह्मण थे, लेकिन मेरे बाबा को  क  भी लिखने नहीं आता था, शायद यही वजह है कि पुरोहिताई का काम मेरे परिवार से कभी नहीं जुड़ा। लेकिन अनपढ़ होने के बावजूद बाबा को तुलसी दास की चौपाइयां याद थी। गांव में जब भी गीत-गवनई होती और उसमें अक्सर रामचरित मानस के छन्द ही गाए जाते मैंने हमेशा देखा था कि बिना पुस्तक देखे बाबा छन्द गाते चले जाते थे, मेरा चुप-चाप उनके पीछे बैठना और गाते और झाल बजाते हुए उनकी हिलती हुई पीठ और उसपर रखा गमछा जरूर याद आते हैं।
मुझे स्वीकार करना चाहिए कि कविता से मेरा पहला परिचय यहीं से होता है बाद में जब मुझे अक्षरों का ज्ञान हुआ तो बाल भारती के अलावा जो पुस्तक सबसे ज्यादा आकर्षित करती थी वह रामचरित मानस ही थी मैं सबकी नजरें बचाकर ( यह संकोचबस ही था शायद) उस भारी-भरकम पुस्तक को लेकर किसी घर में बैठ जाता था और लय और पूरी तन्मयता के साथ गाता चला जाता था श्री राम चन्द्र कृपालु भजुमन....

बचपन गांव में बीता। लेकिन एक दिन बाबा को लगा कि यह लड़का नान्हों की संगत में पड़कर बिगड़ रहा है। उस समय मेरे मित्रों में ज्यादातर लड़के ऐसे थे जिन्हें उस समय की गंवई भाषा में चमार-दुसाध और मियां कहा जाता था। उन दोस्तों के साथ अक्सर मैं भैंस चराने निकल जाता, घांस काटता, नदी नहाता और उनके घर खाना भा खा लेता था। बाबा पढ़े-लिखे नहीं थे लेकिन उनके अन्दर ब्राह्मणत्व कूट-कूट कर भरा हुआ था। सो उन्होंने मेरे पिता को आदेश दिया कि इसे यहां से हटाओ नहीं तो यह लड़का हाथ से निकला जाता है।

इस तरह गांव छुटा या छुड़ा दिया गया। लेकिन गांव, खेत, बगीचे और दोस्तों के लिए मैं कितना रोया कितना रोया, आज उस छोटे बच्चे के बारे में सोचता हूं और उसका रोना याद आता है तो मेरी आंखें आज भी नम हो जाया करती हैं। अपने गांव से दूर मुझे कोलकाता भेज दिया गया था आदमी बनने के लिए। पंडी जी का पहाड़ा और शहर कविता उस याद की एक हल्की तस्वीर पेश करती है।

कविताओं की दुनिया ने हमेशा से ही आकर्षित किया। स्कूल में पढ़ते हुए सबसे पहले हिन्दी की किताब ही खत्म होती थी। खत्म होने के बाद भी बार-बार पढ़ी जाती थी- जब मन भर जाता तो बड़े भाई की हिन्दी की किताब पर भी हाथ साफ किया जाता रहा। यह क्रम लगभग दसवीं कक्षा तक बदस्तुर जारी रहा। 10 वीं कक्षा तक सबसे अधिक प्रभावित करने वाले कवियों में निराला, दिनकर और गुप्त जी रहे। एच.एस. में आने के बाद पहली बार नागार्जुन और अज्ञेय जैसे कवियों से पाला पड़ा। वैसे अज्ञेय की एक कविता दसवीं में पढ़ चुके थे मैने आहूति बनकर देखा। वह कविता तब की कंठस्थ हुई तो आज भी पूरी याद है।

मैं इतना संकोची स्वभाव का रहा हूं कि कभी-भी किसी शिक्षक से यह नहीं पूछा कि और क्या पढ़ना चाहिए। ले-देकर पिता थे जो दिनकर का नाम जानते थे और दिनकर की रश्मिरथि उन्हें पूरी याद थी। फल यह हुआ कि रश्मिरथि मुझे भी लगभग याद हो चली।

कॉलेज में पहली बार सर्वेश्वर दयाल सक्सेना से परिचय हुआ। उनकी कई कविताएं याद हो गईं। लेकिन सबसे ज्यादा निकट जो कवि लगा, वह थे केदारनाथ सिंह। उनकी जादुई भाषा और गांव से जुड़ी उनकी कविताएं बिल्कुल अपनी तरह की लगती थीं। पहली बार लिखने का साहस केदारनाथ सिंह को पढ़ते हुए ही हुआ। कविताएं लिखना तो बहुत समय से चल रहा था लेकिन कविताएं कैसी हैं, यह कौन बताए। अपनी लिखी हुई रचना किसे पढ़ाई जाय। यह समस्या बहुत दिन तक बनी रही। इसके बाद कई मित्र मिले जो लिखने को साध रहे थे। निशांत बाद में चलकर बड़े अच्छे मित्र बने। प्रफुल्ल कोलख्यान और नीलकमल से बातें होने लगीं तो लगा कि अभी बहुत कुछ करना बाकी है।
इसके बाद लगभग हर समकालीन कवियों को पढ़ा। एक-एक संग्रह खरीद-खरीद कर के। बांग्ला की कुछ कविताएं भी भाई निशांत के सौजन्य से पढ़ने को मिलीं।

पहली बार 2003 में वागर्थ में तीन कविताएं छपी। इसके बाद छपने का सिलसिला जारी रहा। इस बीच मानसिक परेशानियां भी खूब रहीं। मनीषा मेरे साथ ही पढ़ती थी और हम एक दूसरे को पसंद करने लगे थे। घर वालों को यह बात नागवार गुजरी थी और काफी जद्दोजहद और संघर्ष के पश्चात ही हमारी शादी हो सकी। मेरी कविताओं में उस संघर्ष की झलक मिलती है।

2006- से 2009 तक लगभग तीन साल तक मैने लिखना पढ़ना बंद कर दिया था। मुझे लगा कि ऐसे माहौल में कोई कैसे लिख सकता है। मेरे व्यक्तिगत जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं घटित हुईं .. साथ ही साहित्यिक जीवन में भी कि मैंने कसम खा ली कि अब लिखना पढ़ना सब बंद। लेकिन बाद में पता चला कि लिखने-पढ़ने के बिना मैं रह ही नहीं सकता। कि लिखने के बिना मेरी मुक्ति नहीं है। और मैं फिर लौटकर आया। इस बीच कोलकाता में उदय प्रकाश के साथ काव्य-पाठ हुआ, उन्होंने कविताओं की दिल से तारीफ की और कहा कि आपको लिखते रहना चाहिए। मेरे लिखने की तरफ लौटाने में भाई निशांत की भूमिका को मैं कभी नहीं भूल सकता। इसी वर्ष लिखना शुरू किया और इंटरनेट को भी साधना शुरू किया। अब सोच लिया है कि कुछ भी लिखूं वह सार्थक हो। इस लिखने के क्रम में कुछ भी सार्थक लिख पाया तो समझूंगा कि एक श्राप से मुझे मुक्ति मिली और साहित्य और समाज को कुछ ( बहुत छोटा अंश) मैं दे सका।

कविताओं में लोक और खासकर गांवों की स्मृतियां ज्यादा हैं। गांव से बचपन में खत्म हुआ जुड़ाव गहरे कहीं बैठ गया था और बार-बार मेरी कविताओं में वह उजागर हो जाता था। बहुत सारी कविताएं गांव की पृष्ठभूमि पर लिखी गई हैं और कई कविताओं में गांवों के ठेठ शब्दों का इस्तेमाल भी मैने किया है।

यह भी सही है कि अपनी कुछ ही कविताएं मुझे अच्छी लगती हैं। अभी जो कविताएं लिखी जा रही हैं, उनमें अधिकांश कविताएं मुझे स्पर्श नहीं करती लेकिन कई एक कविताएं झकझोरती भी हैं। मुझे हमेशा लगता है कि अबी मैं कविताएं लिखना सीख रहा हूं। लगभग 15 साल से लागातार लिखता हुआ मैं कभी तो किसी कविता या किसी कहानी से संतुष्ट हो पाता!!. यह अवसर अब तक नहीं आया है... कविताओं के कुछ अंश अच्छे लगते हैं पूरी कविता कभी नहीं।
एक और बात मुझे कहनी ही चाहिए। कई बार लोग कहते हैं कि तुम इस समय के लायक नहीं हो, तुम बहुत सीधे हो। ऐसे समय में तुम कैसै टिक पाओगे। तुम्हे थोड़ा समय के हिसाब से चालाक बनना चाहिए। लेकिन मैं बन नहीं पाता। मुझे बार-बार लगता है कि जिस दिन मैं चालू बन जाऊंगा, या समय के अनुरूप खुद को चालाक बना लूंगा उसी दिन मेरा लेखक मर जाएगा। इसलिए मैं जैसा हूं वैसा ही बना रहना चाहता हूं... आज न सही लेकिन कभी तो ऐसी कविता संभव हो पाएगी, जिसे लिखना चाहता हूं...।