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Monday, February 21, 2011

कैथरीन मैन्सफ़ील्ड की कविताएं


कैथरीन मैन्सफ़ील्ड (1889-1923) का जन्म न्युजीलैण्ड में हुआ था। इस बार अनहद पर उनकी कुछ कविताएं प्रस्तुत की जा रही हैं। अंग्रेजी से उनकी कविताओं का अनुवाद युवा कवि महेश वर्मा ने किया है। बहुत कम समय में महेश भाई ने ये कविताएं उपलब्ध कराई हैं, हम उनके बहुत आभारी हैं। 

कैथरीन मैन्सफ़ील्ड (1889-1923) 





लाल आकाश को चीरते हुए

लाल आकाश को चीरते हुए उड़ रहें हैं दो पखेरू,
उड़ रहे हैं शिथिल पंखों से.
शांत और एकान्तिक है उनकी यह शुभ उड़ान.

दिनभर अपनी पीली ध्वजाओं को विजय गर्व से फहराता
पृथ्वी को बारम्बार चुनौती देता सूर्य ,ठीक उसी समय छुरा भोंकता है
उसके सीने में , जब वह उपजा रही होती है अन्न,
और जमा कर लेता है उसका रक्त अपने प्याले में,
और बिखेर देता है इसे शाम के आकाश पर.

जब अंधेरे के पंखों से आच्छादित पखेरू उड़ते जाते हैं, उड़ते ही जाते हैं ,
शांत लेटी रहती है पृथ्वी  अपनी शोकाकुल छायाओं  में लिपटी,
उसकी दृष्टिहीन  आँखें मुड़ती हैं लाल आकाश की ओर
और बेचैनी से ढूँढती हैं पखेरुओ को.



तितली की हँसी

हमारी दलिया खाने की तश्तरियों के बीचोबीच
चित्रित थी एक नीली तितली
और हर सुबह नाश्ते के समय स्पर्धा सी होती हमारे बीच
              कि पहले कौन पहुँचता है तितली के नज़दीक.
और तभी कहा करती दादीमाँ : "बेचारी तितली को
                             मत  खा जाना तुमलोग."
इसपर हमलोग हँसने लगते.
वह हमेशा यह कहती और हमेशा हम हँसना शुरू कर देते.
यह एक प्यारा सा नन्हा मज़ाक था रोज़ का.

यह तय था कि एक सुनहरी सुबह
संसार की सबसे धीमी हँसी हँसती हुई,
तितली को उड़ जाना था हमारी तश्तरियों से,
और बैठ जाना था दादीमाँ की गोद में.

खाई

चुप्पी की एक खाई हमें अलग करती है एक दूसरे से.
खाई के एक किनारे पर खड़ी होती हूँ मैं , तुम दूसरे किनारे पर.
सुन नहीं सकती तुम्हारी आवाज़ ना देख सकती हूँ तुमको,
फिर भी जानती हूँ तुम्हारा वहाँ होना.
अक्सर पुकारती हूँ तुमको बचपन के नाम से
और भुलावा देती हूँ खुद को कि मेरे रुदन की प्रतिध्वनि ही है तुम्हारी आवाज़.
कैसे हम पार कर सकते हैं यह खाई? शब्दों और स्पर्शों से तो कभी नहीं.
एक बार मैने सोचा था हम इसे लबालब भर दें आँसुओं से.
अब चाहती हूँ इसे चूर-चूर करना हमारी साझी हँसी से.


शुरुआत के लिए कुछ नियम

बच्चों को कोयला नहीं खाना चाहिए
उन्हें मुँह नहीं बिचकाना चाहिए,
ना ही दावत के कपड़े पहनकर गुलाटी लगानी चाहिए
और ना कभी चेहरे पर काला रंग पोतना चाहिए.

उन्हें सीखना चाहिए कि किसी की ओर उंगली दिखाना असभ्यता है,
उन्हें स्थिर और चुपचाप बैठना  चाहिए टेबल पर,
उन्हें हमेशा परोसा गया खाना खाना चाहिए 
--अगर वे खा सकें.

अगर वे गिर पड़ें, उन्हें रोना नहीं चाहिए,
यद्यपि सर्वविदित है इससे होने वाली पीड़ा ;
फिर भी हमेशा माँ होती है उनके नज़दीक
ऐसे समय अपने चुंबनों से  उन्हें दुलारने  के लिए.


अकेलापन

अब यह अकेलापन है जो नींद की बजाए
आता है रात को , मेरे बिस्तरे के बगल में बैठने के लिए.
एक थके हुए बच्चे की तरह लेटी हुई, मैं प्रतीक्षा करती हूँ उसके पदचाप  की,
मैं देखती हूँ उसको बाहर , कोमलता से बहते हुए प्रकाश में.
अचल बैठा हुआ, ना बाएँ ना दाहिने घूमे,
और थका हुआ, थक कर शिथिलता से सर झुकाए.
बूढ़ा है वह भी, उसने भी लड़ी हैं लड़ाइयाँ.
इसीलिए उसे पहनाई गयी है जयपत्रों की माला.

उदास अंधेरे में धीरे से शांत होती हुई लहरें
बिखर जाती हैं बांझ किनारों पर , असंतुष्ट.
एक अजीब सी हवा बहती है...फिर सबकुछ शांत.
मैं तैयार हूँ  अकेलेपन की ओर मुड़ने के लिए, थामने के लिए उसका हाथ,
उससे चिपकी हुई , प्रतीक्षारत, जब तक बन्ध्या धरती
भर ना जाए वर्षा की भयानक एकस्वर आवाज़ से.




हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Friday, February 18, 2011

बांग्ला कवि विनय मजुमदार की एक कविता


बांग्ला के विलक्षण कवि विनय मजुमदार के यहां प्रेम कोई आध्यात्मिक वस्तु भले ही न हो किन्तु वह पवित्र अवश्य हैप्रकृति की तरहफूलोंझरनोंपहाड़ों और नदियों की तरह। यह अस्थि-मज्जा से युक्त रक्तमांस से भरपूर स्पन्दित प्रेम है। कवि की ही तरह उसकी काव्य-भाषा भी विलक्षण है। प्रस्तुत है कवि की "अकाल्पनिकशीर्षक कविता का हिन्दी अनुवाद। अनुवाद युवा कवि एवं समीक्षक नील कमल ने किया है।



अकाल्पनिक




तुम्हारे भीतर आऊंगा
हे नगरी 
कभी-कभी चुपचाप
बसन्त में कभी 

कभी बरसात में
जब दबे हुए ईर्श्या-द्वेष
पराजित होंगे इस क़लम के आगे
तब

जैसा कि तुमने चाहा था
एक सोने का हार भी लाऊंगा उपहार।

तुम्हारा सर्वांग ज्यों इश्तहार
यौवन के बाज़ार का

फिर भी तुम्हारे पास आकर
महसूस होता है

जैसे तुम्हारी अपनी
एक तहज़ीब है

सिर्फ़ तुम्हारी,
और जो आदमी के भीतर की
चिरन्तन वृत्ति का प्रकाश भी है।


हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Saturday, February 12, 2011

संजय राय की कविताएं

संजय राय की कविताएं इधर कई पत्रिकाओं में आयी हैं। उनकी कविताएं अपनी संक्षिप्तता में एक जादू जैसी हैं जो पाठकों के दिलो-दिमाग पर सीधे असर करती हैं। संजय जलपाईगुड़ी, पं बंगाल के एक विद्यालय में शिक्षक हैं और M.Phil. कर रहे हैं।  किसी भी ब्लॉग पर उनकी कविताएं पहली बार। आपकी बेबाक प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा। 
संजय राय  संपर्क : 093316292490/9883468442
                                                                                                                 -अनहद






प्रेम

प्रेम
आस्मां का विस्तार है
मैं आसमान से
टहनिया तोड़ता हूं

तुम्हें देखना

बारिश में भींगते हुए
तुम्हें देखना
किसी सुंदर फूल को
खिलते हुए देखना है

आदमी दौड़ रहा है

ट्रेन चल रही है
आदमी दौड़ रहा है

ट्रेन रूकने लगी है
आदमी दौड़ रहा है

ट्रेन रूक गई है
आदमी दौड़ रहा है

एक टुकड़ा शहर

वह जब भी
जाती है बाजार
एक टुकड़ा शहर ले आती है
अपने पर्स में

मेरे भीतर टूटता है
एक गांव
हर बार

वह लड़की

एक

वह शीशा है
उसमें
खनक है
पर वह टूटती नहीं

दो

एक पांव
बढ़ाते ही
वह बाहर हो जाती है घर से
और
एक कदम पीछे हटने पर
कैद हो जाती है
उल छोटे से दमघोंटू कमरे में

उसके घर में
आंगन नहीं है
शायद वह सांस नहीं लेती

तीन

उसने जब भी
कोई सपना देखा
एक चिडिया बोली

उसका जब भी
कोई सपना टूटा
एक चिडिया बोली

अब वह
सपना नहीं देखती
लेकिन वह चिडिया
रोज उसी तरह
बोलती है

चार

वह जब भी सोचती है - 'कविता'
शुरू होता है फूलों का खिलना

वह जब भी कहती है 'कविता'
फूल की एक पंखुरी टूटकर
गिरती है धरती पर

वह जब भी
एक पूरे सफेद कागज पर
कहीं लिखती है - 'कविता'
शब्द कागज पर दूब की तरह
उग आते हैं
बिल्कुल ताजे और टटके

वह लड़की
कविता नहीं लिखती।




हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad