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Wednesday, April 27, 2011

नील कमल की एक कविता श्रृंखला


नील कमल / संपर्कः 09433123379

नील कमल का काव्य संग्रह हाथ सुंदर लगते हैं हाल ही में प्रकाशित होकर आया है जिसकी खूब चर्चा भी हो रही है। नील कमल करीब दो दशकों से कविताएं लिख रहे हैं और बहुत ही महत्वपूर्ण ढंग से कविता की दुनिया में दखल दी है। लेकिन यह दुर्भाग्य की बात है कि इतने दिनों के बाद अब उनकी कविताओं की चर्चा हो रही है, जबकि यह बहुत पहले होना चाहिए था। अभी हाल ही में नामवर सिंह ने दूरदर्शन पर पर बोलते हुए और जनसत्ता में परमानंद श्रीवास्तव ने नील कमल की कविताओं पर मानीखेज टिप्पणियां दर्ज की हैं। कवि को ढेर सारी बधाईयां देते हुए अनहद पर हम इस बार उनकी ताजा कविता श्रृंखला प्रस्तुत कर रहे हैं। आपकी कीमती राय की प्रतीक्षा तो रहेगी ही।

इतना भी न हुआ..
(एक कविता श्रृंखला) 

१.
जीने की तरह जीना, मरने की तरह मरना
इतना भी न हुआ..
कि बोलूं तो सुना जाऊं दूर तक
चलूं तो पथ में न आएं बाधाएं
गाऊं अपनी पसन्द के गीत कभी भी
बनाऊं कहीं भी सपनों का नीड़
इतना भी न हुआ.. न हुआ इतना भी
कि विश्वास के बदले पाऊं विश्वास
श्रम के बदले रोटी-पानी ।
२.
गहराती रात जैसी नींद से निकल
पलकों की पीठ पर
सपनों की गठरी लिए
चल पड़ूं उछलता-कूदता
न हुआ इतना भी, इतना भी न हुआ..

बांझ कोख सी उदासी में
डूबी है दुनिया
जिसकी बेहतरी की उम्मीद में
जागती आंखें झुकी रहती हैं
क्षमा-प्रार्थना की मुद्रा में इन दिनों
होठों से धीमे- धीमे
निकलता है स्वर,
क्षमा ! क्षमा ! बस क्षमा !!
कहते हैं हम एक-दूसरे से ।
३.
क्षमा हे पितरों
तार नहीं सके हम तुम्हें
मुक्त न कर सके तुमको
आवागमन के दुश्चक्र से
कुन्द पड़ चुके हमारे इरादे
कौंधते और बुझते रहे अंधेरों में
हमारी स्मृतियों की गंगा में
आज भी तैरते हैं शव तुम्हारे
जिन्हें खींच कर तट पर लाएं
यह साहस हम जुटा ही नहीं पाए ।

क्षमा हे पृथ्वी
जल पावक गगन समीर
तुम्हारी विस्फोटक रोशनी में
चमक न सके हम कुन्दन बन
कात न सके चदरिया झीनी,
मिठास बिना ही ज़िन्दगी जीनी
नागवार हमें भी गुजरती थी,
४.
क्या करें,
कि एक शीर्षक-हीन कविता थे हम
पढ़े जा सकते थे बिना ओर-छोर
कहीं से भी, बीच में छोड़े जा सकते थे हम,
ज़िल्दों में बन्द, कुछ शब्द,
हमें पता नहीं था
आलोचकों की भूमिका के बारे में
जैसे पता नहीं था पितरों को
मुक्ति का खुफ़िया रास्ता ।

एक शब्द चमक सकता था
अंधेरे में जुगनू बन
एक शब्द कहीं धमाके के साथ
फट सकता था
सोई चेतना के ऊसर में
एक शब्द को लोहे में
बदल सकते थे हम
धारदार बना सकते थे उसे
हमसे नहीं हुआ इतना भी,
इतना भी न हुआ..
५.
क्षमा ! हे शब्द-ब्रह्म, क्षमा !!
बहुत पीछे छूट चुका बचपन
ठिठका खड़ा है
अन्धे कुंए की ओट पर
विस्फ़ारित मुंह उस कुंए के
एक अधर पर धरे पांव
अड़ा है,
कहां है सुरसा मुंह कुंए का
दूसरा अधर
शून्य में उठा दूसरा पांव
आकाश में लटका पड़ा है ।

समय की तेज रफ़्तार सड़क पर
कई प्रकाश वर्ष पीछे
ठिठका खड़ा बचपन
भींगता है अदद एक
बरसाती घोंघे के बिना
गल जाती हैं किताबें
स्कूल जाने के रास्ते में
खेत की डांड़ पर
भींग जाता है किताबों का बेठन,
किताबों से प्रिय थे जिसे
इमली बेर आम चिलबिल
और रेडियो पर बजता विविध-भारती
उस बचपन से क्षमा,
कि हम अपराधी उस बचपन के
कुंए की तरह खड़े रहे हम
उसके रास्ते में
बिछ सकें नर्म घास की तरह
उभर सकें पांवों तले
ज़मीन की तरह
न हुआ इतना भी, इतना भी न हुआ.. ।







हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Thursday, April 21, 2011

विपिन चौधरी की तीन कविताएं

विपिन चौधरी लंबे समय से कविताएं लिख रही हैं। अब तक उनके दो काव्य संग्रह 'अंधेरे के माध्यम से' और 'एक बार फिर' प्रकाशित हो चुके हैं। अभी हाल ही में विपिन जी की एक कहानी भी परिकथा में आई है। विपिन अपनी कविताओं में एक अलग तरह के संसार को रचने की दिशा में लागातार अग्रसर हैं। इस बार प्रस्तुत है अनहद में उनकी कविताएं।
आपकी प्रतिक्रियाएं आमंत्रित हैं।


महानगर
महानगरों में बने रहते हैं हम 
खुद को लगातार ढूँढते हुए
अभिमान से अभियान के लम्बे सफर में
बेतरतीब उलझते हुए 

महानगर की धमक  
हमें इतनी नज़दीक सुनाई देती है कि
हम इसके शोर में कहीं गुम हो जाते हैं

दूर तक बिखरी हुई उदासी से
खुशी के बारीक कणों को छानते हुऐ
महानगरों के सताये हुऐ हम
अपने गाँवों-कस्बों से बटोर कर 
लायी हुई खुशियों को बड़ी कँजूसी से
खर्च  करते हैं

महानगर के करीब आने पर हमें 
अपनें बरसों के गठरी किये हुऐ
सपनों को परे सरका कर उसकी कठोर ज़मीन पर
नंगे पाँवों चलने की आदत डालनी पड़ी है
तुम्हे लांघते हुए चलते चलना 
अपने आप को दिलासा देना है 

नगरों के नगर के ज़हरीलें मौसम में 
साफ खबरें भी दूषित हो जाती हैं
हमारे लिये पीड़ा का यही सबब  है
फ्लाईओवर के नीचे से गुज़रते हुऐ
एक रेडिमेड उदासी हमारे अगल-बगल में हो लेती है
लम्बी चौड़ी इमारतें और उसके  
ठीक बगल की टूटी  झोपडी हमारी दार्शनिकता को और अधिक पैना कर देती है

पर अब हम महानगर के शयनकक्ष में प्रविष्ट हो गए हैं 
यहीं से अपने आप को खोने का पूरा मुआवजा वसूल करेंगे 

तुम्हारी चाल बहुत तेज़ है महानगर 
शायद तुम खरगोश और कछुए की कहानी से वाबस्ता नहीं हो 
जिसमे एक समय के बाद खरगोश की चाल मंद पड़ जाती थी.

टीस 

मामला टीस का ना हो 
तो बेहतर
पर कम या ज्यादा  
मामला टीस का ही है

उखडती है टीस  
तो दर्द देती है
दबी रहती है 
तो कहीं ज्यादा दुख देती है

तमाम खुशगवारियाँ कहीं पीछे रह
जाती हैं
सदा से बियाबान धरती का क्या  क्हना  
तारों भरा आकाश  
भी इसके रहते सूना लगने लगता है

ना चाँद से काम निकलता है 
ना तारें  ही काम  आते हैं
कभी कम 
कभी ज्यादा 
टीस हाज़िर है भीतर हमेशा।

रंगों की तयशुदा परिभाषा के विरूद्ध

पीले रंग को खुशी की  प्रतिध्वनी के रूप में सुना था
पर कदमकदम पर जीवन का  अवसाद
पीले रंग का सहारा लेकर ही आँखों में उतारा
किसी के बारहा याद के  पीलेपन ने आत्मा तक को
स्याह कर दिया
हर पुरानी चीज़ जो खुशी का वायस बन गयी थी
वह ही जब समय के साथ कदमताल करती हुई पीली पडने लगी तो
यह फलसफा भी हाथ से छूट गया

तब लगा की हर चीज़ को  एक टैग लगा कर कोने में रख दिया जाता है
जो बिना किसी विशेषण के अधूरी मान ली जाती है
अपनी ही कालिमा से लिप्त  अधूरा इंसान भी
बिना विशेषण के सामने की किसी अधूरी वस्तु के सामने आकर पलट आता है

नीले रंग की कहानी ने भी इसी तरह
मुझे देर तक  खूब छला
मुझे अपने साथ लेकर
यह एक बार
पानी की ओर मुड़ा
दूसरी बार आकाश की ओर
और तीसरी बार मुझे अपने भीतर समटने की तैयारी में साँस लेता हुआ
दिखाई दिया


यह लाल रंग अपनी पवित्रता को साथ लेकर 
इतिहास की लालिमा  की ओर लपका फिर वापिस  लौटा  
लहुलुहान हो कर

कुछ ही दूरी पर खड़ा केसरी रंग प्रत्यंचा पर चढ़ा
काँपाकभी बेहिचक हो
माथे पर बिंदु- सा सिमट गया
यह ठीक है कि भूरे रंग से मुझे कभी शिकायत नहीं रही
यही मेरे सबसे नजदीक की
मिटटी में गुंधा हुआ है
अनुभव की रोशनाई में,
मैंने इसे धीमी आँच में  देर तक पकाया
यह भूरा रंग कुछकुछ मेरी भूख से वाबस्ता रखता है शायद
तभी जैसे ही मेरे भीतर की हाँठी रीतने लगती है उसी समय मैं
दुनियादारी से बंधन ढीले कर के इसे पकाने में जुट जाती हूँ।


हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad