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Thursday, June 23, 2011

नीरज चड्ढा की कविताएं


नीरज चड्ढा

नीरज चड्ढा एक ऐसे मित्र रहे हैं जिन्हें मैं एक गंभीर अध्येता और वैज्ञानिक के रूप में जानता था। कई बार मंच से जब वे बोलते थे तो ऐसी कविताएं उद्धृत करते थे जो मेरे लिए बिल्कुल नई होती थीं। बाद में पूछने पर उन्होंने बताया कि वे कविताए दरअसल उनकी ही होती थीं। बहरहाल आज 23 जून उनका जन्मदिन है। आज अनहद पर उनकी एकदम ताजी कविताएं प्रस्तुत हैं। आप अपनी प्रतिक्रियाओं से हमें जरूर अवगत कराएं।

(एक)

काला धन
सभी काले
भ्रष्टाचार के धुँए में
-----------------
मैं प्रधान
सब देखता हूँ
धृतराष्ट्र की तरह
-----------------
एक योगी
बहुत उठा
चने की झाड़ पर
-----------------
देश की लाज
लुट रही है
तमाशा अच्छा है 

(दो)

 कुछ पन्ने सम्हाले हैं बड़े जतन से
सुनहरे से, लाल, हरे, पीले,
जाने क्या-क्या लिखा, अनचाहे-अनजाने,
अब टटोलता हूँ हर एक हर्फ,
बचाकर, कहीं खो न जाय .....
सम्हाल कर रखी हैं छोटी-छोटी बातें,
कुनमुनाते-चुहचुहाते चूजों की तरह,
कभी आना, दिखाऊँगा,
कैसे सहेजते हैं यादें,
तिनका-तिनका कर बने घोंसले की तरह ..



(तीन)

एक बात पूछूँ ?.....

तुम हो क्या वहाँ ? बढ़ कर छू लूँ तुम्हें ?
नाराज हो ? आकर मना लूँ तुम्हें ?
याद करती हो मुझे, कभी पलकें बन्द करके ?
कुछ कहना था क्या ? आकर बता दूँ तुम्हें ?

(चार)

अब जन्मदिन, साल में एक दिन,
आ के मुझको डराने लगे हैं,

अठखेलियाँ छोड़, गम्भीरता ओढ़,
मुझको चिढ़ाने लगे हैं,

शुरू कीजिये जाप, सुनिये अजी आप,
अब तो बुढ़ाने लगे हैं ....


हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Friday, June 17, 2011

युवा कवि अरूण शीतांश की कविताएं


अरूण शीतांश का जन्म 1972 में अरवल जिले के विष्णुपुरा गांव में हुआ था। भूगोल से स्नातकोत्तर और फिर पी.एच.डी. की उपाधि अर्जित करने वाले अरूण शीतांश की कविताएं देश की सभी बड़ी पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। एक ऐसी दुनिया की तलाश में काव्य संग्रह वाणी प्रकाशन से छप चुका है। मगही इलाके में ( कविता संग्रह) और शब्द साक्षी हैं (आलोचना) शीघ्र प्रकाश्य हैं। इनकी कविताओं का अनुवाद बांग्ला, उड़िया तथा अन्य भारतीय भाषाओं के साथ स्पेनिश और अंग्रेजी में भी हुआ है। फिलहाल अरूण जी देशज पत्रिका के संपादन के साथ ही डी.ए.वी. में सेवारत हैं।

अरूण शीतांश - 09431685589
अरूण शीतांश की कविताएं लोक मानस की उपज हैं और लोक की संवेदना से संश्लिष्ट ये कविताएं पाठकों के कोमल तंतुओं को छूती हैं। अरूण एक ऐसे कवि हैं जिन्हें शब्दों के मायाजाल से सख्त ऐतराज है। जीवन और रचना दोनों ही जगह अरूण अपनी सहजता और साफगोई से सामने वाले को गहरे प्रभावित करते हैं। कविता से अरूण बनते हैं और फिर कविता भी संभव करते हैं एक ऐसी कविता जो गहरे मावीय बोध के साथ हमारे समक्ष खड़ी होती हैं और हमारे दिलों में विश्वास और सहभागिता का एक सेतु रचती है । अनहद पर इस बार प्रस्तुत है युवा कवि अरूण शीतांश की तीन कविताएं। आपकी प्रतिक्रियाएं आमंत्रित हैं।

सांवली रात


सुबह की पहली किरण
पपनी पर पड़ती गई
और मैं सुंदर होता गया

शाम की अंतिम किरण
अंतस पर गिरती गई
और मैं हरा होता रहा

रात की रौशनी
पूरे बदन पर लिपटती गई
और मैं सांवला होता गया

उदास रात

दादी की लोरी
सरसों के फूल की तरह होती थी
आज की रात
हां, आज की रात
कौन सुनाएगा लोरी
कि सो सकूं


यह रात
नगर की रात है
होटल की रात है
दादी की गोद नहीं
बरसात का मौसम है
पांव में पंक नहीं लगे हैं
इसलिए जूते में लगे
मिट्टी की सुगंध से
आधी रात
खुश रहा
और आधी रात उदास आंख खोल सोता रहा
याद आती रही
गांव के पूरब में
केवाल मिट्टी
पश्चिम में बलुआही
उत्तर में ललकी
और दक्षिण में सब की सब मिट्टियां
और हर मिट्टी के लोंदों से बनी
मेरी दादी....।


बाबूजी

किसी विज्ञापन के लिए नहीं आया था यहां
धकेल दिया गया था गले में हड्डी लटकाकर
विष्णुपुरा से आरा
महज संयोज नहीं था
भगा दिया गया था मैं

बाबूजी
आपकी याद बहुत आती है
जब एक कंधे पर मैं बैठता था
और दूसरे कंधे पर कुदाल
रखे हुए केश को सहलाते हुए चला जाता था
खेंतों की मेड़ पर गेहूं की बालियां लेती थीं हिलोरें
थके हारे चेहरे पर तनिक भी नहीं था तनाव

नरकी चाची चट पट खाना निकाल जमीन को पोतते हुए
आंचल से सहला देती थी गाल
आज आप पांच लड़कों पांच पोतों और दो पोतियों के बीच
अकेले हैं
पता नहीं आब आप क्यों नहीं जाते खेत
क्यों नहीं जाते बाबा की फुलवारी
फिर ढहे हुए मकान में रहना चाहते हैं
और गांव जाने पर काजू-किशमिश खिलाना चाहते हैं
आप अब नहीं खिलाते बिस्कुट
जुल्म बाबा की दुकानवाली
जो दस बार गोदाम में गोदाम में या बीस बार बोयाम में हाथ डालकर
एक दाना दालमोट निकालते जैसे जादू
सुना है उस जादूगर की जमीन बिक गई
अनके लड़के धनबाद में बस गए
वहां आटा चक्की चलाते हैं
बाबूजी आपकी याद बहुत आती है
मधुश्रवा मलमास मेला की मिठाई
और परासी बाजार का शोभा साव का कपड़ा
आपके झूलन भारती दोस्त
सब याद आते हैं

सिर्फ याद नहीं आती है
अपने बचपन की मुस्कान..... 

हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Friday, June 10, 2011

अशोक कुमार पाण्डे की एक ताजी कविता



अशोक कुमार पाण्डे
अशोक कुमार पाण्डेय आज के समय में एक विरल रचनाकार हैं। इस अर्थ में कि उनकी रचनाएं हर बार चलकर उस आदमी के पास पहुंचती है जो सदियों से शोषित और प्रताड़ित है। बाजार के दबाव से आहत इस समय में जब कविता और कहानी लिखना भी एक 'फैशन' की तरह हो गया है, आशोक हर बार कविता से एक सार्थक उम्मीद तक की यात्रा करते हैं, बिना थके और लागातार। आज जबकि रचना और जीवन के एक्य की बातें बिसरा दी गई हैं, वे निजी जीवन के साथ रचना में भी महत्वपूर्ण ढंग से प्रतिबद्ध हैं..। अनहद पर इस बार प्रस्तुत है भाई अशोक की एकदम टटकी कविता... । कविता पर आपकी बेबाक प्रतिक्रियाएं आमंत्रित हैं...।    - अनहद 





कुशीनगर में एक विशाल बुद्ध माल बन रहा है जिसे मैत्रेयी परियोजना का नाम दिया गया है. उसके लिए चार सौ गाँवों की ज़मीन का अधिग्रहण हो रहा है जिसके खिलाफ किसान लाम पर हैं.
यह कविता उनकी ही ओर से... - कवि



कितनी आश्वस्ति थी तुम्हारे होने ही से बुद्ध

दुखों की कब कमी रही इस कुशीनारा में
अविराम यात्राओं से थककर जब रुके तुम यहाँ
दुखों से हारकर ही तो नहीं सो गये चिरनिद्रा में?
कितना कम होता है एक जीवन दुख की दूरी नापने के लिये
और बस सरसों के पीलेपन जितनी होती है सुख की उम्र...

आख़िरी नहीं थी दुःख से मुक्ति के लिए तुम्हारी भटकन
हज़ार वर्षों से भटकते रहे हम देश-देशान्तरों में
कोसती रहीं कितनी ही यशोधरायें कलकतिया रेल को
पटरियाँ निहार-निहार गलते रहे हमारे शुद्धोधन

उस विशाल अर्द्धगोलीय मंदिर में लेटे हुए तुम
हमारे इतिहास से वर्तमान तक फैले हुए आक्षितिज
देखते रहे यह सब अपने अर्धमीलित नेत्रों से
और आते-जाते रहे कितने ही मौसम…

गेरुआ काशेय में लिपटे तुम्हारे सुकोमल शिष्य
अबूझ भाषाओं में लिखे तुम्हारे स्तुति गान
कितने दूर थे ये सब हमसे और फिर भी कितने समीप
उस मंदिर के चतुर्दिक फैली हरियाली में शामिल था हमारा रंग
उन भिक्षुओं के पैरों में लिपटी धूल में गंध थी हमारी
घूमते धर्मचक्रों और घंटों में हमारी भी आवाज़ गूंजती थी
और हमारे घरों की मद्धम रौशनियों में घुला हुआ था तुम्हारे अस्तित्व का उजाला

हमारे लिये तो बस तुम्हारा होना ही आश्वस्ति थी एक…

कब सोचा था कि एक दिन तुम्हारे कदमों से चलकर आयेगा दुःख
एक दिन तुम्हारे नाम पर ही नाप लिए जायेंगे ढाई कदमों से हमारे तीनों काल
यह कौन सी मैत्रेयी है बुद्ध जिसे सुख के लिये सारा संसार चाहिये?
और वे कौन से परिव्राजक तुम्हारी स्मृति के लिए चाहिए जिन्हें इतनी भव्यता?

तुम तो छोड़ आये थे न राज प्रासाद
फिर...
कौन है ये जो तुम्हें फिर से क़ैद कर देना चाहते है?
कौन हैं जो चाहते हैं चार सौ गाँवों की जागीर तुम्हारे लिए
यह कैसा स्मारक है बहुजन हिताय का जिसके कंगूरों पर खड़े इतराते हैं अभिजन?

कहो न बुद्ध
हमारा तो दुःख का रिश्ता था तुमसे
जो तुम ही जोड़ गए थे एक दिन
फिर कौन हैं ये लोग जिनसे सुख का रिश्ता है तुम्हारा?

कहाँ चले जाएँ हम दुखों की अपनी रामगठरिया लिए
किसके द्वारे फैलाएं अपनी झोली इस अंधे-बहरे समय में
जब किसी आर्त पुकार में नहीं दरवाजों के उस पार तक की यात्रा की शक्ति
कौन सा ज्ञान दिलाएगा हमें इस वंचना से मुक्ति
आसान नहीं अपने ही द्वारों के द्वारपाल हो जाने भर का संतोष
कहाँ से लाये वह असीम धैर्य जिसके नशे में डूब जाता है दर्द का एहसास
वह दृष्टि कि निर्विकार देख सकें सरसों के पौधों पर उगते पत्थरों के जंगल
निर्वासन का अर्थ निर्वाण तो नहीं होता न हर बार
और ऐसे में तो कोई स्वप्न भी अधम्म होगा न बुद्ध

कहो न बुद्ध दुःख ही क्यों हो सदा हमारे हिस्से में?
बामियान हो कि कुशीनगर हम ही क्यों हों बेदखल हर बार?
मुक्ति के तुम्हारे मन्त्र लिए हम ही क्यों हों हविष्य हर यज्ञ के ?

कहो न बुद्ध
क्या करें हम उस अट्टालिका में गूंजते
‘बुद्धं शरणम गच्छामि’ के आह्वान का











Saturday, June 4, 2011

श्रीकांत दुबे की कविताएं


श्रीकांत दुबे -09873964044

कवि-कथाकार श्रीकांत दुबे दिल्ली में नौकरी करते हैं और साथ-साथ लेखन भी।  इन्होंने ढेर सारी स्पैनिश कविताओं का बहुत ही बढ़िया अनुवाद किया है जिसकी खासी चर्चा होती रही है।

श्रीकांत अपनी कविताओं में एक ऐसी दुनिया से हमारा परिचय कराते हैं जो हमारे आस पास होते हुए भी हमारी आंखों से ओझल है। एक कवि के रूप में श्रीकांत का 'फ्रेशनेस' अलग तरह से आकर्षित करता है। और कई बार संवेदना के ऐसे धरातल पर हमें ले जाकर खड़ा करता है, जहां हम सोचने के लिए बाध्य होते हैं। इस बार प्रस्तुत है युवा कवि-कथाकार श्रीकांत दुबे की कविताएं आपकी बेबाक प्रतिक्रियाओं की उम्मीद के साथ..। 

बुखार

रात के एक बजकर पैंतीस मिनट पर आभास होता है सुबह से ठीक पहले वाले साढ़े चार या पांच का
हर क्षण में करता हूँ इंतजार.....
जो करना है पहले उसकी कल्पना करता हूँ कई बार
उतरता हूँ चारपाई से
न जाने कितना धीरे
एक गिलास पानी लेकर एक टैबलेट निगलने की कल्पना को
दिया जाना है कार्यरूप
मेज के पास से वापस बिस्तर पर आने तक कई बार टूटता है कल्पना का क्रम
टैबलेट मुह में करता रहता है पानी का इंतजार
शायद एक अजीब सी अभिव्यक्ति भी उभरी हुई है
चेहरे पर
गूंजती है किसी की आवाज,
जैसे आकाशगंगाओं के बीच से
राह खोजती भटकती हो
अकेली कोई ध्वनि
हाथ में थर्मामीटर के साथ खडा है कोई
और किसी याद की तरह सुनता हूं
कैसे हो तुम?


नींद

कभी उतरो मेरी आंखों में
रात के पहाड़ों से
जैसे उतरती ही जाती है नदी
मैदानों में

कभी यूं ले लो अपने पहलू में
कि मुझमें समाती जाओ
बहो मेरी धमनियों
मेरी शिराओं में सिर्फ तुम ही

कभी इस कदर भी आओ मेरे पास
कि लहरने लगो मुझ पर समुद्र सा
और मैं सदियों तक
सपनों का भी काम न करूं

या फिर सिर्फ इतना कर दो
कि मेरे रक्त और कोशिकाओं को ही
बदल डालो
नींद में!

जो चाहता हूं

साफ पानी की झील बन जाना चाहता हूं
जो कुछ भी हो मेरे पार
तुम्हें दिखे साफ साफ
तुम जब सामने हो तो बन जाना चाहता हूं आईना
कि जैसी दिखती हो मुझे
खुद को भी वैसी ही खूबसूरत दिखो।

जब घुस जाना ही विकल्प हो
कातिल समुद्र सी तरल
किन्हीं सघन रातों में
उनके पार होने पर देखना चाहता हूं
किनारे सरीखी तुम्हारी ही मुस्कान

तुमसे अपनी धड़कनों तक का रिश्ता चाहता हूं
चाहता हूं कि मेरी आंख की पुतली में उगे
हर बेजार खयाल की खबर हो तुम्हें

अपनी स्मृति के समूचे इतिहास में
सिर्फ तुम्हारा ही जिक्र भरना चाहता हूं

जबकि तुम्हें चाहता हूं
इन दिनों बस ऐसा ही करता हूं
और कहना चाहता हूं
कि तुम्हें हमेशा चाहना चाहता हूं


पृथ्वी

एक ही पांव पर नाचते हुए थक गई है वो
ठहरकर उसने देखा है चारो ओर
दृश्य के सीमांत तक
अपनी देह को घूरती अनगिन आंखें मिली हैं उसे
बारिश की एक चादर ने कर दिया है उसे गीला
झीने लग रहे आँचल से
झलकने लगे हैं उसके वक्ष,
और उन्हें ढांप सकने वाली हथेलियां
कहीं ग्रीष्म तो कहीं बसंत से बंधी हैं
पीठ पर एक सुरसुरी सा शरद

“‘घूरना’ देखने भर से कितना अलग है” को नीहारने की खातिर
फिर से घूमी है वो,
धीरे धीरे
ऐसा सोच कि घूरने वाले अब देख भर पा रहे होंगे
उसके घूमते वजूद को
घूमती ही जा रही है वो
अनगिन आंखों से निकल रही हैं अनगिन रौशनियां
अंधेरे भी अनगिन।

दिन और रात
उसकी देह पर
करवटें लिए जा रहे हैं।

हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad