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Saturday, June 4, 2011

श्रीकांत दुबे की कविताएं


श्रीकांत दुबे -09873964044

कवि-कथाकार श्रीकांत दुबे दिल्ली में नौकरी करते हैं और साथ-साथ लेखन भी।  इन्होंने ढेर सारी स्पैनिश कविताओं का बहुत ही बढ़िया अनुवाद किया है जिसकी खासी चर्चा होती रही है।

श्रीकांत अपनी कविताओं में एक ऐसी दुनिया से हमारा परिचय कराते हैं जो हमारे आस पास होते हुए भी हमारी आंखों से ओझल है। एक कवि के रूप में श्रीकांत का 'फ्रेशनेस' अलग तरह से आकर्षित करता है। और कई बार संवेदना के ऐसे धरातल पर हमें ले जाकर खड़ा करता है, जहां हम सोचने के लिए बाध्य होते हैं। इस बार प्रस्तुत है युवा कवि-कथाकार श्रीकांत दुबे की कविताएं आपकी बेबाक प्रतिक्रियाओं की उम्मीद के साथ..। 

बुखार

रात के एक बजकर पैंतीस मिनट पर आभास होता है सुबह से ठीक पहले वाले साढ़े चार या पांच का
हर क्षण में करता हूँ इंतजार.....
जो करना है पहले उसकी कल्पना करता हूँ कई बार
उतरता हूँ चारपाई से
न जाने कितना धीरे
एक गिलास पानी लेकर एक टैबलेट निगलने की कल्पना को
दिया जाना है कार्यरूप
मेज के पास से वापस बिस्तर पर आने तक कई बार टूटता है कल्पना का क्रम
टैबलेट मुह में करता रहता है पानी का इंतजार
शायद एक अजीब सी अभिव्यक्ति भी उभरी हुई है
चेहरे पर
गूंजती है किसी की आवाज,
जैसे आकाशगंगाओं के बीच से
राह खोजती भटकती हो
अकेली कोई ध्वनि
हाथ में थर्मामीटर के साथ खडा है कोई
और किसी याद की तरह सुनता हूं
कैसे हो तुम?


नींद

कभी उतरो मेरी आंखों में
रात के पहाड़ों से
जैसे उतरती ही जाती है नदी
मैदानों में

कभी यूं ले लो अपने पहलू में
कि मुझमें समाती जाओ
बहो मेरी धमनियों
मेरी शिराओं में सिर्फ तुम ही

कभी इस कदर भी आओ मेरे पास
कि लहरने लगो मुझ पर समुद्र सा
और मैं सदियों तक
सपनों का भी काम न करूं

या फिर सिर्फ इतना कर दो
कि मेरे रक्त और कोशिकाओं को ही
बदल डालो
नींद में!

जो चाहता हूं

साफ पानी की झील बन जाना चाहता हूं
जो कुछ भी हो मेरे पार
तुम्हें दिखे साफ साफ
तुम जब सामने हो तो बन जाना चाहता हूं आईना
कि जैसी दिखती हो मुझे
खुद को भी वैसी ही खूबसूरत दिखो।

जब घुस जाना ही विकल्प हो
कातिल समुद्र सी तरल
किन्हीं सघन रातों में
उनके पार होने पर देखना चाहता हूं
किनारे सरीखी तुम्हारी ही मुस्कान

तुमसे अपनी धड़कनों तक का रिश्ता चाहता हूं
चाहता हूं कि मेरी आंख की पुतली में उगे
हर बेजार खयाल की खबर हो तुम्हें

अपनी स्मृति के समूचे इतिहास में
सिर्फ तुम्हारा ही जिक्र भरना चाहता हूं

जबकि तुम्हें चाहता हूं
इन दिनों बस ऐसा ही करता हूं
और कहना चाहता हूं
कि तुम्हें हमेशा चाहना चाहता हूं


पृथ्वी

एक ही पांव पर नाचते हुए थक गई है वो
ठहरकर उसने देखा है चारो ओर
दृश्य के सीमांत तक
अपनी देह को घूरती अनगिन आंखें मिली हैं उसे
बारिश की एक चादर ने कर दिया है उसे गीला
झीने लग रहे आँचल से
झलकने लगे हैं उसके वक्ष,
और उन्हें ढांप सकने वाली हथेलियां
कहीं ग्रीष्म तो कहीं बसंत से बंधी हैं
पीठ पर एक सुरसुरी सा शरद

“‘घूरना’ देखने भर से कितना अलग है” को नीहारने की खातिर
फिर से घूमी है वो,
धीरे धीरे
ऐसा सोच कि घूरने वाले अब देख भर पा रहे होंगे
उसके घूमते वजूद को
घूमती ही जा रही है वो
अनगिन आंखों से निकल रही हैं अनगिन रौशनियां
अंधेरे भी अनगिन।

दिन और रात
उसकी देह पर
करवटें लिए जा रहे हैं।

हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

6 comments:

  1. बहुत अच्छी कविताएं... बधाई

    अरूण अभिषेक

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  2. प्यार में आदमी अभी तक जो नहीं हो पाया उसी को चिन्हित करती कितनी ताजादम कविताएं ...वधाई !

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  3. एक अलग तरह का अहसास ,
    बिलकुल हमारे अपने पास
    कोई है जो बोल रहा है
    हमें हमारी ही तरह से महसूस रहा है !

    बहुत उम्दा,सरल शब्दों में सम्पूर्ण अभिव्यक्ति !

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  4. सरल शब्द,निखरी अभिव्यक्ति और सामान्य कथ्य शैली अपने आप में लेखन की नई आगज़ है |

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  5. भाई श्रीकांत की कविताओं में उनकी कहानियों सा 'गुरूत्वाकर्षण' है
    बधाई
    प्रदीप जिलवाने

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