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Sunday, July 31, 2011

'गोदान' से जुड़ा वह वाकया याद आता है






हानी की बात पूछी जाय तो पहला परिचय प्रेमचंद की कहानियों से होता है, और भी कहानियां देखने में आती हैं, लेकिन जो दिल और दिमाग में सीधे-सीधे उतरता है, वह पेमचंद का ही लिखा हुआ होता है। मैं जिस माहौल में पला-बढ़ा वहां साहित्य के नामपर रामचरित मानस ही था। और भी याद करूं तो ओझा बाबा के द्वारा सुनाई गई लोक कथाएं थीं। पढ़ने की तमीज विकसित होने के साथ प्रेमचंद से ही वह परिचय हुआ जो देर तक रहने वाला था। नमक का दारोगा, परीक्ष, पंच परमेश्वर, बूढ़ी काकी, बड़े घर की बेटी आदि कहानियां बार-बार लगातार पढ़ी गईं। और अधिक कहानियां थी नहीं तो उन्हें ही बार-बार पढ़कर संतोष करना पड़ा।


अगर कहूं कि मेरे कथाकार बनने में दो लेखकों की जबरदस्त भूमिका रही, तो सही ही कहूंगा। पहले तो प्रेमचंद और दूसरे अज्ञेय। लेकिन मेरे लिए यह दुर्भाग्य ही रहा कि माध्यमिक तक पाठ्य पुस्तकों में शामिल कहानियों को छोड़कर और कोई कहानी मुझे पढ़ने को नहीं मिली। गांव में जहां मैं पढ़ता था, वहां पुस्तकालय की कल्पना तो दूर अखबार तक नहीं आते थे। अभी पिछले दिनों जब मैं गांव में था तो मुझे एक दिन अखबार पढ़ने की इच्छा हुई, तो पता चला कि यहां तक कोई अखबार नहीं आता। उसे पढ़ने के लिए 5 किलोमिटर दूर ब्रह्मपुर जाना होगा। तो ऐसे में मुझे प्रेमचंद की कहानियां कहां से मिलती। स्कूल में भी कोई पुस्तकालय नहीं था, पुस्तकालय तो अब भी नहीं है।

कोलकाता आने के बाद नवम दर्जे में पता चला कि प्रेमचंद ने कहानियां ही नहीं उपन्यास भी लिखे हैं। उस समय तक उपन्यास का मतलब मेरे लिए गुलशन नंदा, प्रेम वाजपेयी और वेदप्रकाश आदि के उपन्यास थे। मुझे याद है कि मेरे विद्यालय के हिन्दी अध्यापक ने बूढ़ी काकी पढ़ाते समय गोदान का जिक्र किया था। तभी से मेरे उपर गोदान पढ़ने का भूत सवार हो गया। लेकिन उपन्यास मिलेगा कहां, सबसे पहले मैंने पिता से पूछा। किताब की दुकान पर मिलना चाहिए- उन्होंने उतना ही कहकर पीछा छुडा लिया। मैंने स्कूल के बाहर एक दो जो किताबों की दुकाने थी वहां पूछा तो उनका कहना था - किस क्लास की किताब है पहले यह बताओ, तब देखेंगे।

इस तरह समय गुजरता रहा। एक दिन मैं अपने पिता के साथ चित्तपुर रोड से गुजर रहा था तो मैंने किताबों की एक दुकान देखी। मैं दुकान के समीप चला गया। वहां गोदान शीशे के अंदर सजी हुई थी। यह किताब मुझे चाहिए – मैंने पिता की ओर देखा।
कितने की है, पूछो – पिता के हाथ अपनी जेब की ओर थे।
साठ रूपए की – दुकानदार ने कहा।
आज तो पैसे नहीं हैं, तुम किसी दिन आकर खरीद लेना। - मैं मायुस लौट आया।
फिर मैंने अपनी जेब खर्च से चालीस रूपए जुगाड़ किए और 20 रूपए मां से लेकर गोदान खरीद लाया।

गोदान खरीदकर जितनी खुशी मुझे उस समय मिली थी, कहानी की किताब पर ज्ञानपीठ नवलेखन मिलने की घोषणा पर नहीं मिली। रात में जब सब लोग सो जाते थे तब मैं गोदान पढ़ता था और अपने गांव को याद करता था, उस गाय को याद करता था जिसे बाबा ने बेच दिया था। उन बैलों को याद करता था जो एक दिन हमारे अपने न रहे थे। तब गोदान पढ़कर घंटो मैं रोया था, और उस रोने में भी एक खास तरह का सुख था, जो बाद के दिनों में मुझे कभी नसीब नहीं हुआ। तब लगता था कि मैं कहां किस जंगल में लाकर छोड़ दिया गया हूं। गोदान में होरी का संघर्ष उन दिनों मुझे नई ऊर्जा देता रहा। तब सचमुच मैं सोचता था कि एक दिन मैं भी गोदान की तरह ही एक उपन्यास लिखूंगा। बाद में प्रेमचंद के कई उपन्यास पढ़े। लगभग सारी कहानियां पढ़ीं। लेकिन गोदान और उससे जुड़ी यादें मुझे आज भी रोमांचित कर जाती हैं। आज प्रेमचंद की जयंती है, इस अवसर पर, ये बातें जो पता नहीं कितनी महत्वपूर्ण  हैं, आपसे कहने का मन किया। महान रचनाकार को मेरा नमन।।


हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Friday, July 22, 2011

विजय कुमार सिंह की पहिलौंठी कविताएं



विजय कुमार सिंह की कविताएं उनके अन्दर मौजूद इनोसेंसी से बनती हैं। यह काबिले गौर है कि इस बिल्कुल नए कवि में शब्द और कथ्य की मासूमियत बची हुई है। मेरा आज भी मानना है कि कविता के लिए उस मासूमियत का होना लाजमि है जिसे हालिया दिनों में हम खोते-भूलते जा रहे हैं। अनहद पर हम इस बार विजय की कविताओं से आपका परिचय करा रहे हैं। आशा है आपकी बेबाक राय से हम जरूर अवगत हो सकेंगे। - अनहद


विजय कुमार सिंह
पैदाइश  २३ अक्टूबर १९८५ को...और रहन-सहन कुदरा में ,जो बिहार के कैमूर जिला में पड़ता है | पढने के लिये बरास्ते पटना से दिल्ली आया...एवं दिल्ली विश्वविद्यालय से  हिंदी में एम.ए किया... अभी केवल और केवल पढता हूँ और हर मामले में नौशिखियाँ हूँ |
पहली बार कविता-लेखन को अपने घेरे से बाहर करने में एक अनजाना डर भी लग रहा है ..जैसे परीक्षा देने से पहले लगता  है| - विजय कुमार सिंह


माँ
.
माँ एक बसंत है
जो हर पतझर में बचा लेती है
ममता भरी हरी पतियाँ
खिरनी की तरह
कभी पूरे नही झरते उसके पत्ते
और नही ख़त्म होती छांह
उसकी कभी भी


आसमा में एक पेड़ होता 

आसमा में
कोई पेड़ नहीं उगता

वरना
वहां भी होती एक चिड़िया
दिनों बाद गिरी पत्तियों से
गढ़ती घोसला

दूर से आता कोई नागरिक
बना लेता फैली जड़ों को
अपना बिछावन
वहां भी होता एक बसंत 
और कोयल की कू
भले ही न होता
कोई फूल या फल कभी
अदद एक पेड़ होता

लेकिन नहीं होता
कुछ भी
उलट इस पृथ्वी की उर्वरता के

कि
आसमान में एक पेड़ होता |

बूंदें

टप-टप
बारिश की बूंदों ने 
भिंगो दिया 
और सज गयी महफ़िल 
आँखों के आगे 
जब उतर आई थी बूंदें 
एक अनजान शहर से 
गाते हुए राग मल्हार 

गिरती रही बूंदें 
और तुम्हारी याद का सितार 
बजता रहा अपनी ही धुन में 
फकत इतना की तुम  आई 

और बूंदें बारिश की 
टप-टप 
आती रही तुम्हारे ही दरिया से

चीटियाँ

चलते-चलते एक रात
जब चली जाएँगी चीटियाँ पृथ्वी से
तब ख़त्म होने लगेगी मिठास चीनी से
धीरे-धीरे
बढ़ता जायेगा बोझ छोटे-छोटे कणों का
पृथ्वी पर
लोग भूलने लगेंगे शऊर मिलने का
आपस में

सुनसान पड़े घर में छाती जाएगी वीरानी
और वह कहानीकार ढूंढेगा कोई पात्र
जो नाको चने चबवा सके हाथी को
फिर
वर्तमान सभ्यता की बहसों में गूंजेगा यह सवाल
कि अब कौन करेगा पृथ्वी की पहरेदारी
दिन-रत चीटियों की तरह


कलकत्ते वाली गाड़ी

कलकत्ते वाली गाड़ी 
बैठा लाती सूरज को
डेली
टांग जाती आसमान में
सुबह-सुबह

सरपट
पहली किरण की भांति
चली जाती बनारस
वही होता हाल-चाल
उलझते-सुलझते-सुलगते
दुनिया भर की बातों पर
फिर
चमकीली रेत को लगा माथे
कलकत्ते वाली गाड़ी

चल देती धीरे-धीरे
पैठ लेता सूरज भी
बगैर आवाज किये पानी की तरह
साथ-साथ
और जाते-जाते
ले जाती
एक हुगली
एक गंगा
एक भरा-पूरा दिन
कलकत्ते वाली गाड़ी ...   
 


हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Sunday, July 17, 2011

हिचकी



एक दिन रात के बारह बजे हिचकी उठी और रूकने का नाम नहीं ले रही थी। यह कविता लिखते-लिखते मैं हिचकी के बारे में भूल गया था और जब कविता खत्म हुई तो मैं विस्मित था। हिचकी भी रूक चुकी थी।



हिचकी

अमूमन वह उठती है तो कोई याद कर रहा होता है
बचपन में दादी कहती थीं

आज रात के बारह बजे कौन हो सकता है
जो याद करे इतना कि यह रूकने का नाम नहीं लेती
मन के पंख फड़फड़ाते हैं उड़ते सरपट
और थक कर लौट आते वहीं जहां वह उठ रही लागातार

कौन हो सकता है

साथ में बिस्तर पर पत्नी सो रही बेसुध
बच्चा उसकी छाती को पृथ्वी की तरह थामे हुए
साथ रहने वाले याद तो नहीं कर सकते

पिता ने माम लिया निकम्मा-नास्तिक
नहीं चल सका उनके पुरखों के पद चिन्हों पर
मां के सपने नहीं हुए पूरे
नहीं आई उनके पसन्द की कोई घरेलू बहू

उनकी पोथियों से अलग जब सुनाया मैंने अपना निर्णय
जार-जार रोयीं घर की दीवारें
लोग जिसकी ओट में सदियों से रहते आए थे
कि जिन्हें अपना होना कहते थे
उन्हीं के खिलाफ रचा मैंने इतिहास
जो मेरी नजर में मनुष्यता का इतिहास था
और मुझे बनाता था उनसे अधिक मनुष्य

इस निर्मम समय में बचा सका अपने हृदय का सच
वही किया जो दादी की कहानियों का नायक करता था
अंतर यही कि वह जीत जाता था अंततः
मैं हारता और अकेला होता जाता रहा

ऐसे में याद नहीं आता कोई चेहरा
जो शिद्दत से याद कर रहा हो
इतनी बेसब्री से कि रूक ही नहीं रही यह हिचकी

समय की आपा-धापी में मिला कितने-कितने लोगों से
छुटा साथ कितने-कितने लोगों का
लिए कितने शब्द उधार
कितने चेहरों की मुस्कान बंधी कलेवे की पोटली में
उन्हीं की बदौलत चल सका बीहड़ रास्तों
कंटीली पगडंडियों-तीखे पहाड़ों पर

हो सकता है याद कर रहा हो
किसी मोड़ पर बिछड़ गया कोई मुसाफिर
जिसको दिया था गीतों का उपहार
जिसमें एक बूढ़ी औरत की सिसकी शामिल थी
एक बूढ़े की आंखों का पथराया-सा इंतजार शामिल था

यह भी हो सकता है
आम मंजरा गए हों- फल गए हों टिकोले
और खलिहान में उठती चइता की कोई तान याद कर रही हो बेतरह
बारह बजे रात के एकांत में

या सुनो विमलेश त्रिपाठी
कहीं ऐसा तो नहीं कि दुःसमय के खिलाफ
बन रहा हो सुदूर कहीं आदमी के पक्ष में
कोई एक गुप्त संगठन
और वहां एक आदमी की सख्त जरूरत हो

नहीं तो क्या कारण है कि रात के बारह बजे
जब सो रही है पूरी कायनात
चिड़िया-चुरूंग तक
और यह हिचकी है कि रूकने का नाम नहीं लेती

कहीं- न- कहीं किसी को तो जरूरत है मेरी...

हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Saturday, July 9, 2011

प्रसन्न कुमार झा की पहिलौंठी कविताएं

प्रसन्न कुमार झा की कविताएं एक सर्वथा नवीन भाषा और नूतन अभिव्यक्ति की छटपटाहट से लैस हैं। यह स्वभाविक भी है क्योंकि प्रसन्न अपनी अभिव्यक्ति की पहली दहलीज पर हैं और उनके पास अनुभव का एक बहुत बड़ा संसार है। प्रसन्न महानगर कोलकाता में रहते हैं, और हर गतिविधि और बदलाव पर उनकी पैनी नजर है। आलवा इसके कवि के पास धड़कता हुआ एक मासूम दिल भी है जो एक संवेदनशील कवि का दिल है जिसकी मासूमियत से कविता जन्म लेती है।
प्रसन्न कुमार झा - 09331592283

अनहद पर कवि की ये कविताएं सुधि पाठकों से उनका परिचय कराने के लिए हैं, आप बताएं कि यह पहला परिचय कैसा रहा। हमें बेसब्री से प्रतीक्षा रहेगी।






मकड़े का जाल 

जैसे बसे हैं
धरती पर अनगिनत शहर नगर 
वैसे ही शहरों और नगरों 
की धरती पर बसते हैं
कई घर, मकान, इमारतें
जिनकी दीवारों पर लिखे होते हैं 
"
स्टिक नो बिल्स "
नौकरों के होते हुए भी 
प्रायः कबाड़ रूम में 
सामानों के बीच की ज़गहों
या औसत ऊँचाई के बाद कहीं भी
मिल जाते हैं
लटकते, झूलते मकड़े के जाले
वैसे ही शहरों और नगरों की धरती पर 
पुल के नीचे, रिक्शा स्टैंड के पीछे 
रेल की पटरियों के सामानांतर
या सडको के किनारे 
मिलती है परिचय और जीविका की अबूझ पहेली 
बस्तियां और उनके खंडित हिस्से 
या समरूप ढही अधढही ,
छोटी बड़ी दीवारें 
जिसपर रचती हैं
बस्तियों की औरतें
गोबर के उपले 
जैसे रचती हैं, हस्तछाप
अपनी नथ की गोलाई 
दांतों तले आँचल
मानो आत्मसंतुलन

बरसात में पिघलते उपले
जैसे नमकीन पानी में
पिघलता काज़ल

दीवारों पर दिखते उपले 
जैसे श्यामल चेहरे पर 
पड़ती भंवरें
औरतें गोबर से 
ठोकती उपले
जैसे आटे की लोई से 
गढ़ती रोटियां

कच्ची धूप में सूखते उपले 
धीमी आँच पर सकती रोटियां
प्रतिदिन अपनी अपनी 
स्थिति, गंध, रंग, और रस के साथ

कुहासे भरी सुबह 
गुदड़ी में ज़न्मे बच्चे की 
ख़ुशी में नाच गा आता 
रिक्शा वाला गूंगा, लंगड़ा
मुनिसिपल्टी के नल में नहा कर
घास पर 
हाफ पैंट सुखाता
पंचर वाला नन्हा आज़ाद
अल्ल्हड़ उम्र में, 
कामवाली में बदल चूकी 
प्रेमिका की शिकायत में 
दारू पी बवाली करता मवाली

जैसे ज़ुलूश में पसीने से तरबतर
थके हुए आम लोगों की
धीमी पड़ती आवाज़
सरकारी गोदामों के बाहर 
बरसात में सड़ने के लिए
पड़े हुए गेहूं के बोरे  
प्लास्टिक, फटा हुआ कार्टून 
सड़े हुए कपडे,
साइकल के पुराने पहिये
ईंख के सिट्ठे से
बनी छत्त के नीचे 
बर्तन में डभक लेता भात  
तेज़ रफ्तार रेल गाड़ी में 
फिल्मी गीत गाते 
कमीज़ से छिलके बुहारते 
अमर, अकबर, एंथनी
या अधखुली पोटली दबाए
दुबक कर 
बाथरूम से चिपकी हुई
नितांत अपरिचित,
परिचय विहीन 
गन्दी औरतें

लोहे लदे हाथ गाड़ी 
की तरह 
जीवन को नंगे पांव
दम के पखेरू उड़ने तक खींचते
थोड़ी सी संभावना सिरजते 
और मकड़े के जाल 
की तरह बस्तियां बसाते
सारे उपेक्षित लोग ।

महावृक्ष और मोटर गाड़ी

विधाता ने 
विशाल आकाश 
और तहों तक 
पनियाई धरती रची 
ज़लवायु और जीवन रचा, 
कोने, किनारे और दीवारों के 
नक़्शे नक्काशियाँ नहीं रचे
और ना ही
धर्म मज़हब, पूजा इबादत की
नियमावली और शारणि बनाई ,
उनके रूपों और नामों को तय किया

बहती आई है "नदियाँ"
गंगा या कुछ और नाम से 
दौडती दिशाओं में 
क्लांत श्यामल पांव 
निर्भेद पखारती 
और देवता बने इनसानों की 
चरण रजों का 
वहन करती हुई
मर्यादा में
अब तक !
उसी प्रकार
गावं के बदलते मिटटी में 
निडर पूर्वजों के समय से 
पूर्वजों और चाँद 
के साथ संपर्क में
सधा- सा, 
अब तक खड़ा है, 
यह दैवी महावृक्ष, 
जिसके नीचे
पत्थरों और घासों से आते हैं 
तितर बितर पद चिन्ह 
और चारण शब्दों में घुली 
सूखे पत्तियों के चरचराहट 
कंडों के टूटने की महीन 
आदम आवाज़, 
अब तक महावृछ में 
जीवन संशलेषण करती हुई
लालटेन की रौशनी में
तरबतर फ़क़ पड़ जाते है
इस गाँव से होकर 
गुजरने वाले इन्सानी चेहरे 
जिनपर खाखार कर 
थूक देता है,
वृद्ध महावृक्ष  

पर धराशाई होगा महावृक्ष !
अपने निडर पंछियों के घरोंदों के साथ 
और तप्त सूरज की रौशनी में
पूर्वजों और देवताओं को 
कूच करना होगा
किसी और वृक्ष पर तत्काल
नहीं पसेरेगी 
महावृक्ष की महाछाया
जड़ों की गहड़ाई ताड़ते 
अवाक् बच्चो की जिज्ञासाओं को 
दी जाएगी तत्काल 
उलटी कहानी, उल्टा विज्ञान
दुष्ट था यह 
दैत्याकार महावृक्ष
रात क्रोधित हुए थे 
महाबली भीम और हनुमान  
क्योंकि कल यहाँ 
बहुमंजिली स्वेत इमारतें होगी
महावृक्ष के स्थान 
पर चमचमाती मोटर गाड़ियाँ होगी  
इस नए शहर की हवा
मायूस उदास बहेगी
वातानुकूलित अनुशासन से
और अवकाश प्राप्ति के बाद भटकेगी 
हरित गंध के लिए बैचन होकर  
मैला पड़ चुका चाँद,
दाढ़ी बढाया 
अपनी पनीली धरती के
चारों ओर घूमेगा 
देखता हुआ 
धरती के आंगनों में 
स्वचछन्द हरि चुनरियाँ
इस बार भी 
निर्भेद छिटकता
अपने तप्त देह से
शीतल चांदनी
हर आंगन के लिए
जैसा पूर्वजों के समय से 
अब तक होता आया है

मन, प्रेम पाखी 

जब काम हो कम 
उदास हुए जाते हैं लम्हे 
भारी हुआ ज़ाता है मन 
बरे चट्टान सा
जिस पर बैठ कर 
लगता है
जैसे मैं तुम्हारे 
आँखों की कोर से 
नुने सपने के तरह 
बस फिसलने को हूँ 
इन हरी घाटियों में
मौन विलीन हो जाने के लिए 
ठंढी हवा के थप थप मे 
धक धक करता है मन 
फिर कभी कभी 
अकेलेपन का रूप बदल कर 
नव बधु सज़् कर 
पास आ कर 
पास ही खड़ी हो जाती हो तुम
जीवन के समक्ष
अटूट प्रेम बन कर

आँखों में कुछ........
आँसू, कुछ वादे, कुछ हठ लिए
लगता सब झूठ झूठ सब झूठ 
एक आवारा 
गीत गाता मुस्कुराता 
आगे लिकल जाता हूँ मैं.......... 

तुम्हारे झूठ से दुखी हो कर 
कहीं और 
प्रेम पाखी की तरह
उचाईयां बदलता
फूलों की वादियों में
आदतन 
इंतजार करने के लिए 
जहां तुम्हारे 
झुमके की धातु से 
टकरा जाता है 
मेरे छुट्टी के दिन का सूरज
या पूरा का पूरा नीला आकाश
तुम्हारे चेहरे पर छिटक कर 
पसर जाने के लिए 
और अपने आप में लौट आता हूँ मैं.

दो पल 

हर दिन 
सुबह तुम्हारे खनकते हाथ
से धुले कमीज़,
जिसकी फटी जेबें टांक कर 
वयस्ततों में रखती हो चन्द रूपये,
ऑफिस की चाभियाँ
हाथ में थमा देती हो
एक छतरी 
मैं, अंतहीन काले मंडराते अनिश्चिता की तरह 
या अपने घर के 
छप्पर से छिटककर 
जाने कहाँ बहता चला जाता हूँ तुम्हारे लिए

कल्पनाओं में दूर-दूर कहीं
दो पल तलाशता सा 
घर लौटकर
खड़ी करता हूँ , साईकल
देखता हूँ तुम्हें नूतन पलास के फूल की तरह
परन्तु मेरे इस वर्तमान में 
तुम्हें अनवरत फूंकना पड़ता है
हर दिन बुझे बुझे अंगारे से 
अर्धगर्म सच को 
दो चार रोटियां पकाते,
मेरी पागल कल्पनाओं की तरह 
मुझे पागल कवि समझ कर
दो पल रात के फुरसत में
मुस्कुराते हुए ...........


हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad