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Monday, August 29, 2011

समकालीन कविता पर नील कमल -2





अभी न होगा मेरा अंत -2
नील कमल


लोचक का ज़रूरी काम अच्छी कविताओं को सामने लाने के साथ-साथ कमज़ोर कविता को हतोत्साहित करना भी है("कवियों की पृथ्वी", अरविन्द त्रिपाठी)। बेशक, यह आलोचना का निजी क्षेत्र है। यहां ध्यान देने की बात यह भी है कि आलोचक को कविता के पास चिकित्सक के मनोभाव से जाना चाहिये। वह उसका रोग तो अवश्य बताए किन्तु उसका वास्तविक काम रोग का निदान और कविता की सेहत का ख़्याल रखना है। हिन्दी आलोचना में इस चिकित्सक मनोभाव की बड़ी कमी है। साहित्य के बाज़ार मे, रचनाकार के, ब्रान्ड में तब्दील होने का यह जादुई समय है, जिसकी तहक़ीकात हिन्दी आलोचना को अभी करनी है।

कविता में जनतांत्रिक मूल्यों की स्थापना के लिये पिछले दशक को याद किया जाएगा। कविता का जगत अब दो-चार या दस बड़े नामों या घरानों की किलेबन्द दुनिया नहीं है । कविता के जगत में "मोनोपोली"का टूटना संतोष का अनुभव देता है । यहां नित नवागतों की आवाजाही है । आलोचना यदि सभ्यता -समीक्षा है तो कविता समग्र रूप में जीवन की ही आलोचना है । यह संतोष की बात है कि विचार , शिल्प और रचना-विधान के घेरे से बाहर समकालीन हिन्दी कविता में जीवन की यह आलोचना विविध रूप में दिखाई देती है । हिन्दी कविता अब इस मुगालते से उबर चुकी है कि वह सामाजिक ढांचे में कोई व्यापक फ़ेरबदल कर सकती है । लेकिन समाज को बेहतर बनाने की लड़ाई में कविता पीछे नहीं है । कविता के केन्द्र का महनगरों से बाहर छोटे-छोटे कस्बों , शहरों और गांवों में प्रतिष्ठित होना कविता के जनतन्त्र को ज्यादा भरोसेमन्द बनाता है । समय के जादुई यथार्थ को समकलीन हिन्दी कविता बराबर तोड़ती है । इसमें उन थोड़े से कवियों की भूमिका कम नहीं है जिनके पास साहित्य में बतौर ताकत न तो जोड़-तोड़ का गणित होता है और न ही भरोसेमन्द कोई आलोचक । अभिव्यक्ति की ईमानदारी और भाषा का कौमार्य ऐसे कवियों को महत्वपूर्ण और विश्वसनीय बनाते हैं । ऐसे कवि ही भविष्य की कविता के धारक और वाहक बनेंगे । और भविष्य की कविता ? उसके बारे में हम वही सुनना पसन्द करेंगे जो ब्रेख्त अपनी कविता के बारे में सुनना चाहते थे - "तुम्हारे पंजे देख कर / डरते हैं बुरे आदमी / तुम्हारा सौष्ठव देख कर / खुश होते हैं अच्छे आदमी / यही मैं सुनना चाहता हूं / अपनी कविता के बारे में ।" (ब्रेख्त की कविता "एक चीनी शेर की नक्काशी देखकर" की पंक्तियां) ।

जीवन में कविता की जरूरत किसी मांग और आपूर्ति के अर्थशास्त्रीय सिद्धान्त से तय नहीं होती । एक कवि को कविता तब लिखनी चाहिए जब उसे लगे कि यह काम सांस लेने जितना जरूरी है । "समकालीन कविता कोई स्वायत्त घटना नहीं , उसे हमारे समय में उपस्थित सामाजिक और राजनीतिक दृश्य की सापेक्षता में ही देखा जा सकता है ।"(आलोचना - अप्रैल-जून २००३ , किसी भी समाज में आलोचना स्वायत्त घटना नहीं होती - कुमार अम्बुज) । कविता की समस्याएं जीवन जगत की समस्याओं से अलग नहीं । यह साहित्य के लिए सर्वथा नई स्थिति है कि कविता के क्षेत्र में ढेरों पुरस्कार सम्मान , ढेरों कवियों की उपस्थिति के बावजूद , कविता हाशिए पर पड़ी है ।

साहित्य के क्षेत्र में प्रदत्त पुरस्कारों तथा सम्मानों का एक आंकड़ा जुटाएं तो सम्भवत: इनमें सबसे बड़ा हिस्सा कविता का ही बनेगा । किताबें भी सम्भवत: सबसे ज्यादा कविता की ही छपती हैं । बिना कविताओं के उद्धरण के कोई बात पूरी नहीं होती । फ़िर भी रोना धोना चलता है कि कविता की किताबें तो बिकती ही नहीं । हिन्दी का कवि कितना दयनीय है इसका अन्दाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि पुस्तक की रॉयल्टी तो दूर , उल्टे (किताब छपवाने के लिए) प्रकाशक कवि से ही खर्च वहन करने की बात करता है । छोटे बड़े और मंझोले , सारे कवि इस हकीकत को जानते हैं पर बोलता कोई नहीं ।

किताबें छप भी जाएं तो थोक सरकारी खरीद के दलदल में डूब जाती हैं । कीमत इतनी ज्यादा कि साधारण आदमी चाहे भी तो खरीद नहीं सकता । पाठक तो दूर , खुद कवि को अपनी किताब प्रकाशक से मूल्य चुका कर खरीदनी पड़ती है । हिन्दी के किसी बड़े या छोटे लेखक संगठन ने इस बाबत कोई आवाज उठाई हो ऐसा कोई वाकया याद नहीं आता । लघु पत्रिकाओं में कविता के पन्ने भरती के लिए रखे जाने लगे । लघु पत्रिकाएं कलेवर में मोटी होने लगीं । इन्हें सरकारी विग्यापन और बड़े वित्तीय संस्थानों से सहायता मिलने लगी । सफ़ल कवि सोशल नेटवर्किंग के मकड़जाल में फ़ंसी मक्खी बन कर रह गए हैं । समकालीन कविता के लिए यह स्थिति सुखकर तो नहीं है । सचमुच यह चिन्ता का विषय है कि ऐसे समय में अपने कवि होने पर गर्वबोध होना चाहिए या शर्मसार होना चाहिए । ये काव्य पंक्तियां इस सन्दर्भ में देखी जा सकती हैं - "एक ऐसे समय में / शब्दों को बचाने की लड़ रहा हूं लड़ाई / यह शर्म की बात है कि मैं लिखता हूं कविताएं / यह गर्व की बात है कि ऐसे खतरनाक समय में कवि हूं" ( कविता से लम्बी उदासी - विमलेश त्रिपाठी ) । हिन्दी का कवि ज्यादा लम्बे समय तक इस लड़ाई में टिका नहीं रह पाता । यह अकारण नहीं कि हिन्दी के कई समर्थ कवि अब सफ़ल कथाकार बन चुके हैं । उदय प्रकाश से लेकर संजय कुन्दन तक इनकी लम्बी फ़ेहरिस्त है ।

इधर समकालीन हिन्दी कविता के दो कोटि के आलोचक मोटे तौर पर परिदृश्य में देखे जा सकते हैं । एक वे हैं जिन्हें सावन के अन्धे की तरह कविता का क्षेत्र सदा हरा भरा दिखता है । अन्धे के हाथी देखने की तरह ये कविता को अपनी तरह से देखते और समझते हैं । दूसरे वे जिन्हें कविता की मृत्यु की घोषणाएं करते ही सुख मिलता है । इन्हें लगता है कि निराला और मुक्तिबोध जैसे युगान्तकारी कवि हर दस पांच साल में एक-दो तो आना ही चाहिए । ये दोनों विचारक सम्यक दृष्टि के अभाव में कविता पर फ़तवे देते रहते हैं । इनके पास अपने प्रिय कवियों की सूची होती है जिसके बाहर के कविता संसार को ये खारिज ही कर देते हैं । हिन्दी के कुछ महत्वपूर्ण कवियों - आलोचकों से पूछा गया कि अपने दस प्रिय कवियों के नाम बताएं और यह भी कि किस समकालीन कवि के मूल्यांकन में अन्याय हुआ है , तो अधिकांश ने नाम लेने से ही मना कर दिया ( समकालीन सृजन - कविता इस समय अंक २००६) ।

एक को प्रिय कहेंगे तो तो दूसरे को अप्रिय बनाने का संकट है । इसी तरह यदि कहें कि अमुक के साथ अन्याय हुआ है , तो आरोप सीधे आलोचना - पीढ़ी पर जाता है । निरापद यही है कि चतुराई से सवाल की दिशा ही बदल दी जाए । इसे कायरता कहें या चतुराई , साहित्य के लिए यह एक भ्रामक स्थिति है जहां आप खुल कर अपनी पसन्द या नापसन्द भी जाहिर नहीं कर सकते । स्मरण रहे कि "जो आलोचक कविता में अर्थवान शब्द की समस्त सम्भावनाओं की खोज किए बिना ही एक सामान्य वक्तव्य या संदेश के आधार पर किसी कविता पर मूल्य- निर्णय देने का दावा करता है , वह कविता का आलोचक नहीं है , न होगा । इसके मूल में कविता के स्वकीयता , स्वायत्तता और सापेक्ष -स्वतन्त्रता तथा इंटिग्रिटी से जुड़े मूल्य हैं । यह मान्यता कविता के तथाकथित सभी नए प्रतिमानों की आधारशिला है "(कविता के नए प्रतिमान - नामवर सिंह) । हिन्दी में दर असल आलोचना का मूल चरित्र ही नकारात्मक है । आलोचना को बृहत्तर अर्थों में रचना से संवाद करना चाहिए , तभी रचना का सही मूल्यांकन हो सकेगा ।

अच्छी कविताएं कई बार जीवन के लिए "ऑक्सीजन" का काम भी करती हैं । जीवन के भीतरी दबावों के लिए कविता एक "सेफ़्टी वाल्व" भी है । हरिवंश राय "बच्चन" की "नीड़ का निर्माण फ़िर फ़िर नेह का आह्वान फ़िर फ़िर.." कविता आज भी जीवन में हार की कगार पर खड़े आदमी को पुन: जीवन की ओर मोड़ देती है । ग़ालिब का शेरो-सुखन "होता है शबो रोज तमाशा मेरे आगे.." हाले-वक्त की तस्वीर आज भी पूरी सिद्दत के साथ पेश करता है । मुक्तिबोध की काव्य पंक्तियां " हमारी हार का बदला चुकाने आएगा / संकल्प धर्मा चेतना का रक्त प्लावित स्वर / हमारे ही हृदय का गुप्त स्वर्णाक्षर / प्रकट हो कर विकट हो जाएगा.." आज भी परिवर्तनकामी आंखों में सपने की तरह जगमगाती हैं । "सारा लोहा उन लोगों का अपनी केवल धार.." कहते हुए अरुण कमल अपने लोगों के बीच भरोसे के कवि बनते हैं । ऐसे टुकड़ों की लम्बी सूची बनाई जा सकती है ।

कहते हैं "राग रसोइया पागरी कभी कभी बन जाय." - अच्छी कविताएं भी बन जाया करती हैं । कभी -कभी अच्छी कविताएं बनाने की कोशिश में कवि अतिरंजित बातें करते हुए अविश्वसनीय और हास्यास्पद लगने लगता है । अरुण कमल की स्थूल पैरोडी करते हुए अष्टभुजा शुक्ल जब कहते हैं , "सारा लोहा अष्टभुजा का अष्टभुजा की धार" , तो वे असहज ही दिखते हैं । भरोसे का कवि अपने "लोक" के प्रति कृतग्यता बोध से भरा हो यह उसके लिए विश्वसनीयता की पहली शर्त है । निरन्तर काव्याभ्यास , लोक-सम्पृक्ति , गहन जुवनानुभव (मुक्तिबोध के "ग्यानत्मक संवेदन" और "संवेदनात्मक ग्यान" का स्मरण कर लें) के द्वारा अच्छी अर्थात बड़ी कविताओं तक पहुंचने का एक रास्ता बनता है । काव्याभ्यास केदारनाथ सिंह से लेकर कविता की नवीनतम पीड़ी तक देखा जा सकता है । भक्ति के किस क्षण में भक्त अपने आराध्य को पा लेगा , कहना कठिन है । वैसे ही , काव्याभ्यास के किस मुहूर्त में बड़ी कविता लिखी जाएगी , बताना बहुत कठिन है ।.... 

("
सेतु" के कविता विशेषांक , जनवरी- जून २०११ अंक में प्रकाशित आलेख "अभी न होगा मेरा अन्त" का दूसरा भाग)
नील कमल समकालीन कविता के सशक्त हस्ताक्षर हैं। 
                                                                                                                                    (.... जारी )

हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Wednesday, August 24, 2011

समकालीन कविता पर कुछ बेतरतीब बातें



भाई महेश वर्मा ने परस्पर के लिए जो प्रश्नों की श्रृंखला तैयार की थी, उसके उत्तर में ये कुछ बेतरतीब बातें....
                                   


विता मूल विधा है – अन्य विधाएं बाद की उपजी हुई हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो कविता ने  बहुत लंबा सफर तय किया है। कई परिवर्तनों से गुजरते हुए आज की कविता का जो स्वरूप खड़ा हुआ है उनमें उन पड़ावों के निशान के साथ आज के समय की नुतनता भी है। एक विधा के रूप में कविता में जो परिवर्तन घटित हुए हैं, उससे अधिक परिवर्तन हमारे समय में है – समय लागातार जटिल से जटिलतर हुआ है। आज की कविता की सबसे बड़ी चुनौती समय की इस जटिलता को अपनी पूर्ण कलात्मकता और संजीदगी-सच्चाई से उकेरने की है। कविता की संरचना की सबसे बड़ी चुनौती वर्तमान जटिल सामयिक परिप्रेक्ष्य में स्वयं को उतनी ही ताकत के साथ खड़ा करना है। जाहिर है कि रूप और अंतर्वस्तु में एक व्यापक परिवर्तन की जरूरत है – यह वह जरूरत है जो आगे बढ़कर अपठनीयता के संकट से भी जुड़ती है।

शुरू दौर में जब लेखन की शुरूआत हुई तब हमारे सामने पाठ्य पुस्तकों की कविताएं थीं। उस समय केदारनाथ अग्रवाल, आरसी प्रसाद सिंह, रामधारी सिंह दिनकर, निराला, प्रसाद आदि कवियों की रचनाएं पढ़ने को मिली थीं. वह भी भारी मात्रा में नहीं, एक-आध कविताएं ही। बाद में निराला और मुक्तिबोध ने बहुत प्रभावित किया। निराला, मुक्तिबोध के साथ एक और नाम सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का लेना चाहिए जो पसंद सूची में चुपके से शामिल हो गया था। निराला और मुक्तिबोध के अलावा जिस कवि की कविताएं कंठस्थ हुईं, उनमें सर्वेश्वर दयाल सक्सेना भी थे। केदार नाथ सिंह से होते हुए उदय प्रकाश आदि कवियों की एक लंबी सूची है जो अब काफी बड़ी हो चुकी है। जो कल प्रिय थे वे आज भी हैं। हां, बच्चन, नीरज और दिनकर अब उतने प्रिय नहीं रहे।

शुरूआती लेखन में पाठ्य पुस्तकों के कवियों का प्रभाव था। शुरू की लिखी हुई देश भक्ति की कविताएं आज बहुत ही बचकानी लगती हैं। उस समय कविता का मतलब तुक और लय हुआ करता था मेरे लिए। लेकिन मुझे यह स्वीकार करना चाहिए कि मेरे लेखन में भोजपुरी लोक गीत और लोक संस्कृति का गहरा प्रभाव रहा। गंभीर लेखन जब शुरू हुआ तो मेरे जेहन में मेरा गांव था, एक ऐसा गांव जो आजादी के लंबे वर्षों बाद भी जरूरी सुख-सुविधाओं से बहुत पीछे छुटा हुआ था। जब कविताएं लिखनी शुरू की तो एक कवि ने अप्रत्यक्ष तौर पर हमेशा साथ दिया, वह कवि थे केदारनाथ सिंह जिनके यहां लोक की एक लंबी परम्परा दृष्टिगत होती है। लेकिन मुझे यह स्वीकार करना चाहिए कि उन्ही से सीख लेते हुए ही उनसे अलग मैंने अपने समय के गांव को एक अतिरिक्त सजग निगाह से देखने की कोशिश की।

लिखने की प्रक्रिया या रचना प्रक्रिया का कोई खास ढर्रा मेरी समझ में नहीं आता। मुझे आस-पास की चीजें हमेशा प्रभावित करती हैं। कई बार मैं चुप-चाप लोगों की नजर बचाकर किसी खास चीज या किसी खास व्यक्ति को निहार सकता हूं। यदि मैं रेल में सफर कर रहा हूं और दो लोग आपस में बात कर रहे हों तो उनकी बातें बहुत ध्यान से सुनने से खुद को रोक नहीं पाता। उनकी बातों में उनका अपना दुख हो सकता है, अपने अनुभव हो सकते हैं। मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बात करने वाले समाज के किस श्रेणी से आते हैं। लेकिन इस तरह बहुत धीमें मैं उनके दुख या खुशी में शामिल हो जाता हूं। इस तरह मेरे अपने जीवन के सरोकार और बाहर की दुनिया में घटित परिवर्तन मिलकर मेरे अंदर कविता का एक संसार रचते हैं। जिसे मैंने झेला नहीं, जिस अनुभव से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष मैं गुजरा नहीं, उन अनुभवों को मैं अपनी कविता का विषय बना ही नहीं सकता। किसी राह में मिल गया कोई मुसाफिर, आपस में अपने सुख-दुख बांटते कुछ लोग, मेरे गांव के निठाली हरिजन या और ऐसे ही कई लोग मेरे साथ बैठकर मेरी कविता पूरी करने में मदद करते हैं। और समय का दबाव अपना काम करता ही है।


विता में विचार होना तो बेहद जरूरी है। विचार कविता में मेरूदण्ड की तरह है। विचारों के अलग-अलग खाने हो सकते हैं या कई बार कई विचारों की एक जटिल श्रृंखला भी कविता में व्यक्त हो सकती है। लेकिन कविता में आए विचार कई बार बेहद सुक्ष्म या अदृश्य रूप में आने चाहिए, यह कविता को कविता बने रहे देने की पहली शर्त है। विचारों का स्थूल प्रयोग काव्यात्मकता को नष्ट कर सकता है। विचार या विचारधाराओं के आधार पर कवि और कविताओं को विभिन्न वर्गों में बांटकर देखने की प्रवृति का मैं कभी कायल नहीं रहा। कविता का एक ही वर्ग कविता हो सकता है। लेकिन इसको वर्ग में बांटना ही पड़े तो कविता के दो वर्ग खराब और अच्छी कविताओं के हो सकते हैं। यह खराब और अच्छा कहने की कसौटी भी इमानदारी, मानवीय प्रेम और ऐसे अच्छे व्यवहार और कृत्य होने चाहिए जिनसे यह दुनिया अच्छी और सुंदर बनती है। मेरा हमेशा मानना है कि साहित्य की ( कला की भी) सभी विधाएं इस दुनिया को सुंदर बनाए रखने के उद्देश्य से ही बनी हैं। यह जिम्मदारी कविता पर मैं कुछ अधिक महसूस करता हूं।


विता की समकालीन समस्याओं के बारे में कई लोगों ने इशारा किया है। मेरे अग्रज तुल्य प्रफुल्ल कोलख्यान ने मुझसे कई बार यह बात कही है कि कविता से नीजपन गायब होता जा रहा है। आजकल कविताएं ट्रिक से लिखी जा रही हैं। कई बार उनकी बातें सच लगती हैं। हम कविता लिखते समय अपने अनुभव संसार का इस्तेमाल करने की बजाय कविता को वैश्विक बनाने की फिराक में लग जाते हैं। कविता की जनपदीयता और व्यापक सरोकारों से संश्लिष्ट नीजपन आज की कविता से गायब होता जा रहा है। यह मेरी नजर में कविता की एक बड़ी समस्या है। आज कविता पढ़कर कविताएं लिखी जा रही हैं। जाहिर है कि कविताएं छप तो बहुत रही हैं लेकिन अच्छी कविताओं की संख्या बहुत ही कम है। एक संकट कविता की अपठनीयता का भी है।

सा नहीं है कि यह समस्या सिर्फ हिन्दी की है। अन्य भारतीय भाषाओं में भी यह संकट है। कविता अपने फॉर्मेट और कथ्य के स्तर पर निरंतर संघर्ष कर रही है। बांग्ला की कविताओं के पाठक बहुत रहे हैं। लेकिन बाजार के दबाव ने बांग्ला में भी यह संकट पैदा की है। बांग्ला में जय गोश्वामी मेरे प्रिय कवियों में रहे हैं।

मकालीन कविता के मूल्यांकन के उपकरण आज भी वही हैं जो कल थे। लेकिन मेरे खयाल से आज जो कविताएं लिखी जा रही हैं उनके मूल्यांकन के लिए अन्य नए उपकरणों की दरकार तो है ही। कविताएं समय की जटिलता के साथ और जटिलतर हुई हैं। आज तेजी से परिवर्तित हो रहे समय के प्रभाव कविताओं में भी संश्लिष्ट हैं। उन प्रभावों को खोलना और उनका साकारात्मक विवेचन भी बेहद जरूरी है। यह अलग तरह के उपकरण की मांग करता है।


विता के पाठक कम हैं, यह सच है। आज की कविता की एक बड़ी समस्या यह भी है कि वह निरंतर पाठकों से दूर हुई है। कवियों के दो वर्ग यहां देखने में आते हैं। एक वह कवि जो अकादमिक हैं दूसरे वह जो मंचीय कवि हैं। अकादमिक कविता इतनी अधिक बौद्धिक हो गई है कि आम पाठक उससे डरकर कोशों दूर भागता है और मंचीय कवियों ने लोगों को चुटकुले सुनाने शुरू कर दिए हैं। एक रास्ता बाबा नागार्जुन ने दिखाया था, वे समान रूप से आम और बौद्धिक दोनों पाठकों के पसंदीदा कवि थे। बांग्ला में यह समस्या नहीं रही है। इसका कारण यह रहा है कि यहां नवजागरण हो चुका है और साहित्य के विकास के साथ यहां के लोगों का बौद्धिक विकास भी समान रूप में हुआ। हिन्दी का विकास तो बहुत हुआ। साहित्य में नए परिवर्तन और आंदोलन हुए लेकिन उसी अनुपात में आम लोगों की साहित्यिक-बौद्धिक समझदारी नहीं बढ़ी। बांग्ला या अन्य भाषाओं की तरह पढ़ने की संस्कृति का भी हिन्दी क्षेत्र में सदा से घोर अभाव रहा है। इस तरह आज यह गैप और बढ़ा है।

मकालीन पत्रिकाएं कविता के लिए स्पेस तो रखती हैं लेकिन जिस तरह कहानी केन्द्रित पत्रिकाएं हैं उस तरह कविता केन्द्रित कोई उल्लेखनीय पत्रिका नहीं है। कई पत्रिकाओं में कविताएं एक कोरम की तरह छाप दी जाती हैं। कविता के छापने-छपने का कोई समाजिक सांस्कृतिक आधार भी कम ही देखने में आता है। कुछ पत्रिकाएं बीच-बीच में कविता विशेषांक निकालती हैं, तो कविता के लिए एक जगह-सी बनती दिखती है, वरना आजकल प्रकाशक भी कविता को घास डालते नजर नहीं आते। कुछ लोगों ने आजकल यह कहना भी शुरू किया है कि यह गद्य का दौर है, लेकिन मेरा मानना है कि कविता हर दौर में सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है। उसे आज अधिक स्पेस देने के साथ ही कविता को खुद भी बदलना होगा। यह बदलाव कैसा होगा यह तो अभी कह पाना बिल्कुल कठिन है, लेकिन अकादमिक और मंचीय कविता के बीच से कोई रास्ता निकल सकता है। साथ ही कविता के प्रति लोगों के रूझान में भी वृद्धि करने के साथ ही एक विवेकवान पाठक वर्ग को निर्मित करना भी एक बड़ी चुनौती है।

जिन कवियों को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है वे तथाकथित बड़े और स्थापित कवि हैं। कविता की समृद्ध परंपरा की समझ के लिए तुलसी, कबीर से होते हुए प्रसाद निराला, अज्ञेय नागार्जुन, मुक्तिबोध और केदारनाथ सिंह आदि को शामिल करना जरूरी भी है लेकिन मेरा मानना है कि समकालीन कवियों को भी पाठ्यक्रम में शामिल करना एक सार्थक कदम होगा। यह इसलिए भी कि केदारनाथ सिंह के बाद भी हिन्दी कविता ने एक लंबी, सार्थक और समृद्ध दूरी तय की है। उदय प्रकाश, अरूण कमल, राजेश जोशी से लेकर आज के कवि मनोज कुमार झा, नील कमल, निशांत, गीत चतुर्वेदी, अशोक कुमार पाण्डे, महेश पुनेठा, व्योमेश शुक्ल ( यह सूची काफी लंबी है) तक की कविताओं को पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए। मैं अपने अनुभव से कह सकता हूं कि महाविद्यालय और विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले अधिसंख्य विद्यार्थियों के पास समकालीन कविता की कोई सही जानकारी नहीं है। वे केदारनाथ सिंह को तो जानते हैं लेकिन बोधिसत्व, बद्री नरायण, एकांत श्रीवास्तव और अरूण शीतांश को नहीं जानते। समकालीन कविता को पाठ्यक्रम में शामिल कर समकालीन कविता के प्रति एक तरह की अजनबीयत को दूर किया जा सकता है।

न्द की विदाई तब भी नहीं हुई थी जब निराला मुक्त छंद की वकालत कर रहे थे। मुक्त छंद भी एक तरह का छंद ही था, हां, उसने शास्त्रिय रूढ़ियो से कविता को मुक्ति दिलाई। यह सही है कि यह दौर गद्य कविताओं का है, लेकिन मैं उसमें भी एक तरह के लय और छंद की उपस्थिति को स्वीकार करता हूं। बहुत सारे कवियों ने छन्द ( हालांकि वह भी एक तरह का मुक्त छंद ही है) में भी कविताएं लिखी हैं। अब भी लिखी जा रही हैं, हां यह जरूर है कि ऐसी स्तरीय कविताएं बहुत कम हैं।

मकालीन कविता की कोई प्रतिनिधि दार्शनिक प्रवृति आज देखने में नहीं आती। हम इतिहास से जानते हैं कि कविता से जुड़े कई आन्दोलन हुए और उन आन्दोलनों के मूल में कोई न कोई दार्शनिक प्रवृति या सोच जरूर थी। मेरा मानना है कि बड़ी कविताएं बड़े जनआन्दोलनों के समय लिखी जाती हैं। सामाजिक आन्दोलन का कविता पर और कविता का समाजिक आंदोलन पर प्रभाव मेरी समझ में एक निर्विवाद तथ्य है। समकालीन मनुष्य जिस तरह आत्मकेंद्रण का शिकार हुआ है और लोगों की जनसहभागिता घटी है, ऐसे में कविता के कमजोर हो जाने की आशंका तो उठ खड़ी होती ही है। लेकिन अगर मुझसे कोई पूछे तो मैं अपनी कविता की दार्शनिक प्रवृति भले बता दूं लेकिन वह समकालीन कविता की भी दार्शनिक प्रवृति होगी, यह जोर देकर नहीं कह पाऊंगा। बहरहाल, इस सवाल को मैं अपने अग्रज कवियों के लिए छोड़ देता हूं।



हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Sunday, August 14, 2011

समकालीन कविता पर नील कमल का लेख -1

नील कमल का आज जन्म दिन है। उन्हें ढेरों बधाईयां व शुभकामनाएं । उनका  लेख आज अनहद पर




अभी न होगा मेरा अंत 

 
 नील कमल
नील कमल - 9433123379
भ्यता के विकास के साथ कविता की ज़रूरत के बढ़ते जाने और कवि-कर्म के कठिन होते जाने की बात आचार्य रामच्न्द्र शुक्ल ने बहुत पहले ही उठाई थी।सम्भवत: आज हम सभ्यता के उसी बिन्दु पर हैं जहां कविता जरूरी भी है और दुखद ढंग से अप्रासंगिक भी।


हिन्दी आलोचना ने तो कविता का मर्सिया बहुत पहले ही पढ़ना शुरू कर दिया था।हमारे समकालीन हिन्दी कवि कविता के तट पर चलने से अधिक कहानी और उपन्यास की फेनिल लहरों पर तैरना जरूरी समझने लगे हैं।फिर भी कविता है कि साहित्य के मैदान में दूब की तरह उगी है और बार-बार झुलस कर भी हरी है।कुछ तो बात है कि कविता की जरूरत अभी भी बची है।जैसे मन्दिर-मस्जिद-गिरजा-गुरुद्वारे जाकर मनुष्य मन से थोड़ा अधिक निर्मल और उदार हो जाता है; जैसे नदी के तट पर,पहाड़ों की गोद में या हरे-भरे खेतों के पास जाकर मनुष्य का मन थोड़ा अधिक उन्मुक्त हो जाया करता है, कविता के पास आकर मनुष्य पहले से थोड़ा बेहतर मनुष्य जरूर बनता है।इसका यह अर्थ बिलकुल न लगाया जाए कि कविता सभी दुखों की दवा है। आधुनिक हिन्दी कविता के सबसे भरोसेमन्द कवि "मुक्तिबोध" ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि कविता पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करना मूर्खता होगी।
जीवन के जटिल यथार्थ और संश्लिष्ट अनुभवों की अभिव्यक्ति के लिये कविता से बेहतर औजार भला क्या हो सकता है।अभिव्यक्ति के लिये उठाया गया औजार ही रचना की शक्ति और सीमा को तय करता है।देखा जाए तो साहित्य की सभी विधाएं कविता का ही विस्तार हैं।हिन्दी में कवियों की कमी नहीं। अच्छे और सच्चे कवि फिर भी कम ही देखने में आते हैं।कविता न तो बन्दूक है, न ही बुलेट।वह तो बस रास्ता बताती है, चलना खुद को ही होता है।अपना काम कविता के जिम्मे सौंप कर हम सो नहीं सकते।हिन्दी में अच्छी कविताएं भी लिखी जा रही हैं। फिर भी ये उन तक नहीं पहुंच रही हैं जिनको ये सम्बोधित होती हैं।कविता का दायरा पढ़े-लिखे लोगों तक सिमटा हुआ है।क्या कविता में जीवन का ताप भी है?या फिर वह संवेदनशील हृदय का काव्याभ्यास भर ही है?क्या कविता का सच कवि का भोगा-जिया सच भी है?दृश्यगत यथार्थ और अनुभूत यथार्थ के बीच की फांक क्या हिन्दी कविता में नहीं दिखती?इधर हिन्दी कविता में छ्न्दों की वापसी की सुगबुगाहट भी चल निकली है।छन्द में लौटने का अर्थ दोहा,चौपाई, रोला, सोरठा और छ्प्पय के जाल बुनना नहीं हो सकता।छन्द की वापसी दर असल कविता में जीवन की वापसी होगी।यह काम कविता की नई पीढ़ी को ही करना होगा।कविता को कृत्रिम-यथार्थ के दलदल से निकालना होगा।यह काम विचार के प्रति गहरी ईमानदारी से ही सम्भव है।अगर भूख के नाम पर आपके पास एक या दो व्रत-उपवास की ही अनुभव-जन्य पूंजी है तो भूख पर कविता लिखने का नैतिक हक़ आपका नहीं बनता।कबीर-तुलसी यदि खेत-खलिहान और चौपाल से लेकर बड़े अकादमिक संस्थाओं तक समान रूप से समादृत हैं तो इनकी जड़ों को पहचानना, कारणों को जानना बेहद जरूरी है।अब जरूरी है कि कविता की दुनिया कागजी नहीं, जमीनी हो।लगभग कदमताल करती हिन्दी कविता के सामने आगे बढ़ने की चुनौती है।आलोचनाइस काम में कविता की मदद कर सकती है।आलोचना और रचना के बीच का रिश्ता लोहा और लोहार का है।उसका काम सिर्फ़ लोहे पर चोट करना नहीं बल्कि इस तरह चोट करना है कि लोहे में धार पैदा हो।यही धार लोहे को हथियार में बदलती है।हिन्दी कविता को शिल्प के अपर्याप्त होने के मिथकों को भी तोड़ने की जरूरत है।उससे भी बड़ी चुनौती है जन-जन तक पहुंचने की,उनकी खैर-खबर लेने की।
इन दिनों हिन्दी कविता में सत्रह से लेकर सत्तर-पार तक की पीढियां एक साथ सक्रिय हैं।कविता के लिये कोई समय आसान नहीं होता,पर कठिन और चुनौतीपूर्ण समय में किसी दौर की कविता अपने पूर्ववर्ती समय से अलग और व्यतिक्रमी हो यह तो जरूरी है।कठिन समय के दुख अनेक हैं।आने वाले समय में कविता की चुनौती होगी जनतन्त्रिक मूल्यों की स्थापना के साथ इन दुखों को कम करना।ऐसे में प्रतिबद्धता और पक्षधरता द्वारा ही कवि की अपनी समकालीनता तय होगी।समकालीन कविता को लेकर शिकायतें तो हो सकती हैं किन्तु दुर्भाग्य से इसे उस अबला की तरह मान लिया गया है जिसके बगल से कोई भी छुटभैया आलोचक राह चलते टिटकारी मार कर गुजर सकता है।
विजय कुमार हिन्दी के चर्चित आलोचक हैं।हिन्दी कविता से इनकी शिकायतें गम्भीर किस्म की हैं("अनुभव के मानकीकरण के खिलाफ़"-वागर्थ,अक्तूबर २००४)- शिकायत यह कि:.हिन्दी की युवा कविता इधर पिछले अनेक वर्षों से आख्यानात्मक एकरसता का शिकार हो गई है।
.कविता में लम्बे-लम्बे ब्यौरों और तथ्यपरकताओं का अम्बार लगा है।
.यह एक शिथिल और मोनोलिथिक संसार भी है।
.लगता है जैसे ज्यादातर कवि अपने प्रामाणिक होने को लेकर जरूरत से ज्यादा सतर्क हैं।
.भाषा में अर्थ की व्यापक अनुगूंजों की तलाश का मसला फ़िर भी बाकी रहता है।
यह हिन्दी कविता से शिकायत कम उसपर आरोप ज्यादा है।इसके लिये वे कवि भी जिम्मेदार हैं जो कविता के नाम पर अल्लम-गल्लम कुछ भी लिख मारते है।अखबार की रिपोर्ट की तरह ये कविताएं दूसरे ही दिन अपनी प्रासंगिकता खो देती हैं।दुर्भाग्यजनक होते हुए भी सच है कि हमारे समय की अधिकांश कविताएं सतही हैं।इसका खामियाजा उन"जेनुइन" कविताओं को देना पड़ता है जो समय से गहरे में जाकर संघर्ष कर रही होती हैं।समकालीन कविता को सही परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की जरूरत बहुत ही मुनासिब जान पड़ती है।
पंकज चतुर्वेदी ने कविता पर कई हल्की-फ़ुल्की टिप्प्णियां की हैं("पड़ताल"-वागर्थ,जनवरी-जून २००५)-वे प्रमाणित करना चाहते हैं कि:.यह स्पर्श-कातर कवियों का समय है।
.हिन्दी कविता की एक पूरी पीढ़ी लम्बे अरसे से बिना किसी विश्वसनीय आलोचना के अपनी उत्कृष्टता का दावा कर रही है।
.अन्यथा सफ़ल, सन्तुष्ट सी दिखती इन कविताओं का ऋण-पक्ष यह है कि यह महत्वाकांक्षी लेखन नहीं है।
ध्यान देने की बात यह है कि हिन्दी कविता का आलोचक बड़ी हड़बड़ी में है।वह बहुत जल्द कविता की बनावट और बुनावट में व्यापक तोड़-फ़ोड़ देखना चाहता है, हालांकि जानता वह भी है कि यह काम कितना आसान है।तभी तो मैनेजर पाण्डेय लिख पाते हैं कि,"समकालीन कवियों पर लिखने के लिये कोई इसलिए भी तैयार नहीं है कि जरा सा सच बोल देने पर ये लोग बुरा मान जाते हैं"
समकालीन हिन्दी कविता का दुर्भाग्य है कि उसके पास समर्थ और विश्वसनीय आलोचक नहीं हैं।जो आलोचक हैं वे भी "ज़रा सा सच"ही बोल पाते हैं।नतीज़ा यह होता है कि घूरे पर फ़ेंके जाने लायक साहित्य को तो पुरस्कारों-सम्मानों से लाद दिया जाता है लेकिन मूल्यवान-साहित्य नेपथ्य में उपेक्षित पड़ा रह जाता है।वरना क्या कारण है कि वीरेन डंगवाल जैसे ज़रूरी और महत्वपूर्ण कवि को यह कहना पड़ता है कि,"कवि का सौभाग्य है पढ़ लिया जाना"("वीरेन डंगवाल की कविता"-समकालीन कविता,अंक-)। सचमुच, कवि का सौभाग्य उसको पढ़ लिया जाना ही है।यह पढ़ने वाला अर्थात पाठक कौन है?क्या कविता के आलोचक कविताएं पढ़ते भी हैं?........... { ..जारी...} 



हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Thursday, August 4, 2011

निशांत की एक कविता


निशांत - 9239612662

निशांत की यह कविता परिकथा मई-जून, 2010 में छपी थी। निशांत बहुत समय से कविता लेखन में सक्रिय हैं और कविता के लिए उन्हें प्रतिष्टित भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, 2008, शब्द साधना युवा सम्मान, 2010 और प्रथम नागार्जुन कृति सम्मान, 2009 मिला है। कविता की एक किताब जवान होते हुए लड़के का कबूलनामा ज्ञानपीठ से प्रकाशित हो चुकी है। निशांत फिलहाल जेएनयू में पीएचडी कर रहे हैं।
 यह कविता प्रेमचंद की जयंती (31 जुलाई) पर विशेष। बहुत जल्दी निशांत की और कविताएं आप पढ़ सकेंगे।




 प्रेमचंद को पढ़ते हुए

हमारे नाम के भीतर
बैठे होते हैं हमारे पुरखे
उनकी स्मृतियां
हमारी सभ्यताएं संस्कृतियां  इतिहास
और कभा-कभी उनका भूगोल भी

क्यों किसी का नाम
गोबर धनिया फेंकना मिठइया होता है
जबकि वह सीधा-सादा सरल-सा होता है
दिखता भी है एकदम वैसा ही

ये सारे नाम वहीं से आते हैं
जहां मिट्टी पानी से सना रहता है हाथ
धूप से भीगा रहता है सर

नामों के पीछे काम करती है
एक गहरी-काली साजिश
बहुत-बहुत समय पहले की साजिश

आज भी बचे हुए हैं ढेर-ढेर नाम

किसी वैदिक मंत्रों की खोज में
उद्धाटित किया होगा उन्होंने यह सूत्र वाक्य
कि उनकी आत्मा पर चिपका दो यह नाम
और कहते रहो नाम में क्या रखा है

नाम से खोलते हैं वे एक ताला
एक तिलिस्म
एक सभ्यता
एक संस्कृति
एक इतिहास
और दाखिल हो जाते हैं
आत्मा के गह्वर में टपके ताऊत की तरह

एक नाम लेते हैं वे
सबकुछ स्पष्ट दिखने लगता है उन्हें
नाम नहीं एक मंत्र बुदबुदाते हैं वे
खड़ी कर लेते हैं अपनी अयोध्या

हमारा सारा रहस्य
हमारे उजबक से नामों में छुपा है
धर्मांतरम करने से ज्यादा जरूरी है नामांतरण करना

वे कहते हैं नाम में क्या रखा है

नाम बदलना
एक पूरी सभ्यता  पूरी संस्कृति
और कभी-कभी एक पूरा इतिहास बदलना है..

हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad