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Friday, September 30, 2011

देश भीतर देश - प्रदीप सौरभ (एक अंश)


प्रदीप सौरभ
अभी कुछ दिन पहले ही प्रदीप सौरभ का आने वाला उपन्यास देश भीतर देश पढ़कर खत्म किया है। मैं कुछ उन सौभाग्यशालियों में हूं जिन्हें यह उपन्यास एक दम टटका-टटका पढ़ने को मिला। उपन्यास की खास बात यह है कि यह आपको बोर नहीं करता। पदीप जी के इस उपन्यास में गजब की किस्सागोई है जो पाठक को जकड़े रखती है।  साथ ही उसमें असम के बहाने देश के भीतर पैदा हो रहे कई देशों की पड़ताल की गई है। यह उपन्यास विनय और मिल्की की प्रेम कथा की मार्फत एक ऐसे देश की कहानी कहता है, जो आजादी के छः दशकों के बाद भी मुख्य धारा में शामिल नहीं हो सका है। वहां के लोग दिल्ली को अपनी राजधानी नहीं मानते और पूरा भारत उनके लिए एक दूसरे देश की तरह है, एक पराया देश। उपन्यास की नायिका मिल्की असम के बारे में एक जगह कहती है – “यह देश भीतर देश है, जिस पर दिल्‍ली ने हमारी मर्जी के विपरीत कब्‍जा कर रखा है। विश्‍वास नहीं है तो इतिहास को जाकर खंगाल लो।“ उपन्यास बहुत जल्दी छपकर आने वाला है। इस बार प्रस्तुत है उपन्यास "देश भीतर देश" का एक अंश......


        देश भीतर देश ________________  
प्रदीप सौरभ के आने वाले उपन्यास का एक अंश
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...विनय दिन पर दिन चिडचिडा होता जा रहा था। उसे नहीं समझ आ रहा था कि उसका नर्म स्‍वभाव कैसे चिडचिडेपन में बदल रहा है। चिडचिडापन उसके काम पर असर डाल रहा था। एक आध बार कंपनी के एमडी ने उसे काम को लेकर टोका था। काल को लेकर पहले उसकी कोई शिकायत नहीं थी। वह अब भुलक्‍कड भी हो रहा था। वह चीजों को भूल जाता था। कई बार वह पैंट की चैन बंद करना और टाई की नाड कसना भी भूल जाता था। उम्र के साथ देश भीरत देश का दौरा और मिल्‍की की याद उसे अब कुछ ज्‍यादा ही सताने लगी थी। ऐसे में उसने फैसला किया कि थोडे दिन के लिए वह अपने माता पिता को दिल्‍ली बुला लेता है। खाना-पीने की रोज रोज की हाय हाय खत्‍म हो जायेगी। मां के हाथ का खाना मिलेगा तो गिर रहा स्‍वास्‍थ्‍य भी ठीक हो जायेगा। अकेलापन भी कम हो जायेगा। यही सोच कर उसने प्रयागराज एक्‍सप्रेस के दो टिकट उसने अपने पिता को कूरियर से भिजवा दिये।


रातभर फेसबुक में घुसे होने के चलते विनय सुबह आठ बजे के बाद ही उठता था। कई बार उसे और देर हो जाती थी। ऐसे में वह तैयार हो कर बिना ब्रेकफास्‍ट किए हुए ही आफिस में चला जाता था। सुबह टाइम पर न उठ पाने के डर से उसने उस दिन सोचा कि आज रात को वह नहीं सोयेगा और माता-पिता को स्‍टेशन से लाने के बाद सोयेगा। वैसे भी उस दिन रविवार था। छुट्टी का दिन। रात को अपनी प्रिय दलिया खाने के बाद पहले तो वह आफिस की कुछ मेल लिखने में लगा रहा। बाद में उसने अपनी आदत के अनुसार फेसबुक पर लाग आन कर लिया। वह फ्रेंडस लिस्‍ट इतनी बडी थी कि जब भी वह लागआन करता, ढेर सारे अनचाहे मेल बाक्‍स उसके स्‍क्रीन पर उभर आते। किसी में हैलो होता, किसी में हाय तो किसी में आप कैसे हैं जैसे औरचारिक सवाल। पहले तो विनय शिष्‍टाचारवश सबके बाक्‍स में जा कर लिख देता था 'बिजी'। इसके बाद एक एक करके गैर जरूरी चैट बाक्‍स बंद हो जाते थे। इसके बाद भी कुछ बिजी के सवाल पर भी सवाल कर देते थे कि लगता है आजकल आप नाराज हैं जो ठीक से बात नहीं करते हैं। इस तरह के सवालों का वह फिर जवाब नहीं देता था।


इन तमाम चैट बाक्‍सों के बीच में उसे अहमदाबाद में रहने वाली मिष्‍ठी बनर्जी का चैट बाक्‍स दिखा। उसमें गुजराती में लिखा था-'केम छो।'
विनय ने भी गुजराती में जवाब दे दिया-'मजा मा।'
यह थोडी अजीब लगने वाली बात हो सकती है कि एक बंगाली लडकी गुजराती लिख रही है। असल में मिष्‍ठी के पिता गुजरात में आईआईएम में प्रोफेसर हो कर अहमदाबाद आए थे। लंबे समय तक आईआईएम में रहने के कारण्‍ा मिष्‍ठी का जन्‍म अहमदाबाद में हुआ और पढाई लिखाई भी। बचपन से गुजरात में रहने के कारण उसे गुजराती आ गई थी। अच्‍छी गुजराती। वैसे वह बांग्‍ला भी धारा प्रवाह बोलती थी। वैसे तो अहदाबाद में बंगाली परिवार बहुत कम हैं। लेकिन जितने भी हैं उनमें एक खास तरह की नेटवर्किंग हैं। दुर्गा पूजा और अन्‍य बंगाली त्‍यौहारों में वे सामूहिक रूप से मिलते जुलते रहे हैं। अहमदाबाद में एक पूजा पंडाल बंगाली समुदाय का भी होता है। उसमें बांग्‍ला नाटक, बाउल संगीत के साथ रबीन्‍द्र संगीत के भी कार्यक्रम होते हैं। दुर्गा प्रतिमा बनाने वाले और ढोल बजाने वालों को विशेष रूप से कोलकत्‍ते से बुलाया जाता है। वैसे अहमदाबाद के बंगाली परिवार अपने बच्‍चों की शादी ब्‍याह के लिए कोलकत्‍ते का ही रास्‍ता पकडते हैं। गुजरातियों से शादी-ब्‍याह के बहुत कम उदाहरण मिलते हैं अहमदाबाद में।


मिष्‍ठी का परिवार अहमदाबाद के पाश से‍टेलाइट इलाके में रहता है। उसके पिता ने रिटायरमेंट से पहले ही सेटेलाइट में एक बडा फलैट ले लिया था। कमोबेश गुजरात को तरक्‍कीपसंद और शांत राज्‍य मानने के चलते ही उन्‍होंने अहमदाबाद में बाकी का जीवन बिताने का फेसला किया था। लेकिन गुजरात दंगों के दौरान अल्‍पसंख्‍यकको पर किये गए जुल्‍म से वह दुखी हो उठे थे। वह इस बात से कुछ ज्‍यादा दुखी थे कि इन दंगों में गुजरात सरकार पर्दे के पीछे से शामिल थी। दंगों के बाद से वह लगातार अहमदाबाद छोड कर कोलकत्‍ते में बसने की सोचने लगे थे। लेकिन इसी बीच उनकी एक लौती बेटी मिष्‍ठी की एक बडी फार्मा कंपनी में अच्‍छे पैकेज में नौकरी लग गई थी। मिष्‍ठी का करियर न खराब हो इसलिए उन्‍होंने कोलकत्‍ते में बसने के अपने फैसले को फिलहाल स्‍थगित कर रखा था। लेकिन यह तय कर लिया था कि जैसे ही मिष्‍ठी की शादी वह कर देंगे तो अपना बोरिया बिस्‍तर अहमदाबाद से लपेट लेंगे। वैसे मिष्‍ठी की उम्र तीस पार थी, लेकिन वह शादी के लिए तैयार नहीं थी। उसका कहना था कि अभी उसे यूएसए में और पढाई करनी है। उसके बाद ही वह शादी-ब्‍याह के बारे में सोचेगी।
'केम छो' और 'मजा मा' के बाद मिष्‍ठी और विनय के बीच बातचीत शुरू हो गई। विनय ने अपने चैट बाक्‍स में लिखा-'गुजरात के लोग भी क्‍या दिल्‍ली को अपने देश की राजधानी नहीं मानते है? वहां भी देश की भीतर एक देश है क्‍या?'
'मैं समझी नहीं।'-मिष्‍ठी ने सवाल के प्रति अनभिज्ञता जताते हुए लिखा।
'असम के लोग दिल्‍ली को अपने देश की राजधानी नहीं मानते हैं। वे ब्रम्‍हपुत्र के पार की दुनिया को विदेश कहते हैं और वहां के लोगों को विदेशी मानू।'
'आखिर ये सवाल क्‍यों?'
'ये सवाल इसलिए कि गुजरात में भी तो मुसलमानों को विदेशी की तरह समझा जाता है। उन्‍हें मारा जाता है। असम में भी चिकेन नेक के पार के लोगों के साथ ऐसा ही होता है। गुजरात के मुख्‍यमंत्री नरेन्‍द्र मोदी बात बात पर 'मेरे गुजरात' शब्‍द का प्रयोग करते हैं, जैसे वह उनकी निजी जागीर हो।'
'असम के बारे में तो मैं नहीं कुछ कह सकती। अलबत्‍ता गुजरात में इसके पीछे भगवा राजनीति है। और मोदी इसी भगवा राजनीति का एक खूंखार चेहरा है। सत्‍ता के लिए वह कुछ भी कर सकते हैं।'
' आप मोदी को खूंखार कह रही हैं। वे तो गुजरात के विकास पुरूष हैं।'
'सत्‍ता में काबिज होने के बाद का ये बदला हुआ उनका मुखौटा है। दंगों में जिस तरह से उन्‍होंने दंगाईयों की मदद की थी, वह कोई विकास पुरूष नहीं करता है। वैसे भी गुजरात आजादी के बाद से ही तरक्‍की पसंद राज्‍य रहा है। यहां के लोग इंटरपेनियोर होते हैं। शुरू से ही गुजरात की जीडीपी देश के अन्‍य राज्‍यों से ज्‍यादा रही है।'
'तो मोदी का विकास एक नाटक है या कुछ और।'
'विकास यहां ऐसा है कि बेरोजगारों की लंबी फौज है यहां। सौराष्‍ट्र के बहुत सारे हिस्‍से में लोग पीने के पानी के लिए तरसते हैं। महिलाओं के स्‍वास्‍थ्‍य के आंकडें भी चौंकाने वाले हैं। शिशु मृत्‍यु दर भी अन्‍य राज्‍यों की तुलना में यहां कम नहीं है। शिक्षा का स्‍वास्‍थ्‍य भी बहुत अच्‍छा नहीं है।'
'तो गुजरात के लोग देश के अंदर देश नहीं देखते हैं।'
'मुझे तो ऐसा नहीं लगता है। गुजराती मुसलमानों को छोडकर सब कुछ पसंद करते हैं। दिल्‍ली भी और कन्‍याकुमारी भी। वैसे बहुत से गुजराती ऐसे भी हैं, जो दंगा फसाद को अच्‍छा नहीं मानते हैं, जिनकी आवाज नक्‍कारखाने में तूती जैसी है।'
'फिर भी एक सवाल यह है कि गांधी के गुजरात में इतनी बडी हिंसा कैसे हुई।'
'ये तो गांधी ही जाने या फिर मोदी। वैसे तुम्‍हारे इस सवाल में दम है कि गुजरात में भी क्‍या देश की भीतर देश है। साबरमती नदी के गांधी आश्रम वाला हिस्‍सा मुझे दंगों के समय एक देश की तरह लगता है और उसके पार वाला दूसरे देश की तरह। हमारी तरफ दंगों में माल से लेकर थियेटर सब चलते हैं। सामान्‍य जिंदगी होती है। उस पार मातम और सन्‍नाटा पसरा होता है। तब लगता है कि अहमदाबाद दो देश में विभाजित है।'
'इतना बुरा माहौल होता है दंगों के दौरान वहां?'
'जी हां। उन दिनों वहां के बच्‍चे दूध के लिए भी तरस जाते हैं। साबरमती के पार धुआ ही धुंआ दिखता है। लोग अपने दडबों में बंद रहते हैं।'
'हमारी बातें बहुत गंभीर होती जा रही हैं। फिर कभी इस बात पर बात करेंगे। और सुनाइये आपके यूएएस जाने की योजना का क्‍या चल रहा है?'
'तैयारी चल रही है। वीजा के लिए एप्‍लाई कर दिया है। अगले महीने तक हो जाने की उम्‍मीद है।'
'अमेरिकी वीजा की बात आपने की है तो याद आया कि आपके राज्‍य के मुख्‍यमंत्री को वहां का वीजा क्‍यों नहीं मिला।'
'इसलिए नहीं मिला कि अमेरिकी सरकार गुजरात के दंगों में उनका हाथ मानती है। उसका मानना है कि वहां आ कर वह विषैली बातें कर अमेरिका का भी माहौल खराब करेंगे।'
'तो अमेरिका में क्‍या पढने की योजना है।'
'कंप्‍यूटर में एडवांस कोर्स करना है।'
'आपने तो एमएससी फार्मा से किया है। फिर कंप्‍यूटर की पढाई क्‍यों?'
'फार्मा फील्‍ड में एडवासं कंप्‍यूटर की स्‍टडी बहुत महत्‍वपूर्ण है। इस कोर्स को करने के बाद किसी भी फार्मा कंपनी में मुझे बहुत बडे पद में काम मिल जायेगा।'
'तो पढाई के बाद अमेरिका में ही बस जाने का इरादा है या फिर देश में लौटने का?'
'वहां क्‍यों बसूंगी। मैं इंडिया लौट कर आऊंगी। मैं अपने माता-पिता की अकेली संतान हूं। ऐसे में लडके का फर्ज भी तो मुझे निभाना होगा न।'
'ये अच्‍छी बात है कि आप अपने माता-पिता के बारे में इतना पाजिटिव सोचती हैं। वैसे तो आजकल लडकों के लिए माता-पिता भार की तरह हो गए हैं। शेटल हो जाने के बाद लडके अपने माता-पिता को ऐसे निकलाते हैं, जैसे दूध से मक्‍खी निकाली जाती है।'
'ऐसा भी नहीं है कि हर लडका ऐसा करता है। महानगरों में जरूर इस तरह का चलन बढा है। लेकिन गांवों और छोटे शहरों में माता-पिता का अभी भी वैसा ही सम्‍मान है, जैसा कि श्रवण कुमार के जमाने में था।'
चैट बाक्‍स में यह लिखने के बाद मिष्‍ठी ने यह भी लिखा-'काफी देर रात हो गई है। कल मुझे एक प्रजेंटेशन देना है आफिस में। फिलहाल आज इतना ही। गुड नाइट।'


विनय ने भी अपने चैट बाक्‍स में उसे गुड नाइट लिख कर विदा ले ली। सुबह होने में अभी वक्‍त था। विनय अभी अपने को मिष्‍ठी के साथ जोडे रहना चाहता था। लेकिन वह चली गई। वह गूगल इमेज खोल कर असम की तस्‍वीरें देखने लगा। सर्च स्‍पेस में मिल्‍की डेका नाम टाइप किया। सर्च रिजल्‍ट में मिल्‍की बस्‍आ दिखी। मिल्‍की बरूआ उल्‍फा के कमांडर इन चीफ परेश बरुआ की मां हैं। परेश बरुआ नामी आदमी हैं, तो उनकी मां भी नामी हो गई और सर्च रिजल्‍ट में उनकी तस्‍वीर आ गई। मिल्‍की डेका कोई नामी शख्सियत तो थी नहीं कि उसकी तस्‍वीर सर्च रिजल्‍ट में निकले। इसके बाद वह गूगल अर्थ में जा कर उसने पुबसरणिया पहाड को फोकस किया। इमेज को बडी कर वह अपने घर को देखने लगा। इसके बाद वह मिल्‍की के घर की इमेज को बडा कर देखने लगा। उसे उसका घर तो दिखा लेकिन वो खिडकी नहीं दिखी, जिससे वह मिल्‍की को अपने घर से देखता था। उसने फिर उस सडक पर फोकस किया, जिसमें मिल्‍की के साथ वह रोज आफिस जाता था। इसके बाद कामख्‍या मंदिर के आसपास का जंगल, पैराडाइज रेस्‍तरां, डिब्रूगढ के चाय बगान, काजीरंगा पार्क, शिलांग पीक आदि पर पर क्रशर ले जाकर मिल्‍की के साथ बिताये अपने दिनों को याद करता रहा।


असम की गूगल अर्थ में सैर करते करते सुबह के पांच बज गये थे। विनय की आंखों में नींद भर आई थी। वह सोना चाहता था लेकिन माता-पिता को लेने स्‍टेशन जाना था। इसलिये वह उठ गया और फ्रेश होने के लिए बाथरूम में चला गया। फ्रेश होने के बाद उसने घर से बाहर निकल कर टहलने का फैसला किया और वह सोसायटी के पार्क में चक्‍कर लगाने लगा। सुबह के छ: बजने पर उसने अपनी कार निकाली और स्‍टेशन की ओर चल पडा। उसके माता-पिता घर आ गए थे, लेकिन विनय के देश भीतर देश देखने की बीमारी जस की तस बनी हुई थी।



हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Sunday, September 18, 2011

राहुल सिंह एक अलग अंदाज में


बहुत पहले यहां  राहुल सिंह की कविताएं आप पढ़ चुके हैं..। राहुल एक अच्छे कथाकार भी हैं..। कई कहानियां चर्चित हो चुकी हैं। अभी-अभी उन्होंने एक नई कहानी लिखनी शुरू की है। यह कहानी का एक अंश है, लेकिन पढ़ने पर  पूर्णता का-सा आभास देता है। इस अलग तरह की अभिव्यक्ति को आपसे साझा करते हुए बहुत खुशी हो रही है।


                                               एक छोटी-सी प्रेम कथा_________________

उसके आने की कोई आहट, सुनी नहीं कभी, पर अक्सरहां कान उस आहट पर लगे रहे। आती तो उसके पास दुनिया जहां की बातें होती, जाती तो मेरी दुनिया का भी कुछ साथ होता उसके पास।

शायद हर बार थोड़ा उसके साथ मैं भी चला जाता। थोड़ा-थोड़ा जाने का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा। वह जाती तो मेरी दुनिया से कई जरुरी चीज गायब मिलते। लाख ढूंढता, नहीं मिलते और जब कभी वह फिर आती, चीजें वापस उसी जगह मौजूद मिलतीं। पूरी जादूगरनी थी। बात करते-करते बिस्तर पर ढलंग जाती और इससे पहले कि आप कुछ कहें वह सो चुकी होती। हाँ मन रखने के लिए उसके सोने के बाद भी उसकी मुस्कराहट थोड़ी देर के लिए जगी रहती और फिर वह भी सो जाती। वैसे उसके सोने के बाद उसका चेहरा भी सो जाता और जब वह जगती तो उसका चेहरा भी जग जाया करता। जब वह सो जाया करती तो मैं बस उसे देखा करता, निःशब्द। फिर मैं भी उसके साथ हो जाया करता, लेटे-लेटे मैं सोचता कि इस वक्त वह नींद की दुनिया में क्या कर रही होगी, जबकि मैं यहाँ हूँ। फिर इस खयाल से मैं डर जाया करता कि अगर वह नींद में सपने देख रही होगी तो मैं तो शर्तिया उसमें नहीं होंउगा क्योंकि मैं तो यहाँ हूँ। इसलिए उसके नींद में दाखिल होने के लिए मैं भी सो जाया करता, बिलकुल उसके पास, सटकर। नींद उसके आँखों के कोरों से उतर कर गालों के मैदानी इलाकों से होती हुई मेरे आँखों में आकर ठहर जाती और वहाँ थोड़ी देर सुस्ताने के बाद अचानक बड़ी तेजी से पूरे देह में पसर जाती। पेट से होते हुए वह तलुवों तक जाती और जब कभी मेरे तलुवे उसके तलुवों को छू जाते तो वह वापस उसके तलुवों के रास्ते उसके आँखों की पुतलियों तक लौट जाती। जब हम नींद में होते तो उसकी सोयी मुस्कराहट भी शरारत करती। मुस्कराहट उसके होंठों से उतर कर मेरे होठों में आ बसती। नींद खुलने पर जैसे ही उसकी निगाह मेरे होंठों में टिकी उसी की मुस्कराहट पर पड़ती, वह बेसाख्ता उसे चुन लिया करती। जब मैं जागता तो उसकी मुस्कराहट का स्वाद अपने होठों पर महसूस करता और हैरत होती।

अब जब वह आती तो उसके आने के साथ मैं चैकन्ना हो जाया करता, खिड़की-दरवाजे सब अच्छी तरह बंद किया करता कि नींद मेरे कमरे में दाखिल न हो, लेकिन ... नींद अगर पलकों में ही छिपकर आये तो कोई क्या कर सकता है। वैसे नींद की आहट अब मैं सुनने लगा था, नींद जब आती तो मेरे कमरे की चीजें एक-एक कर गायब होने लगतीं, उनके गायब होने को मैं महसूसता रहता और फिर उन्हें बचाये रखने का एक ही रास्ता था कि खुद भी उन चीजों में शामिल हो जाया जाये। ऐसा करने से जाते वक्त नींद जब चीजें वापस करतीं तो सबसे आखिर में मुझे लौटाती और इस तरह जब मैं जागता तो सभी चीजें वापस अपनी जगह पर होतीं, मैं भी।
उसके जाने के बाद भी उसका अक्स वहीं बिस्तर पर सोया रहता। ठीक वैसे ही बायीं ओर करवट लेकर, और केश अलसाये से उसके दाहिनी गाल पर पड़े रहते, आपस में सटी उसकी हथेलियाँ सोते हुए भी जीती-जागती इबादत सरीखीं लगतीं। उसे सोता हुआ देखकर अक्सरहाँ जी करता कि जाकर उसके गालों पर तर्जनी रख दूं और तोता उड़े-मैना उड़े की तर्ज पर कहूँ कि दुःख उड़े, दुश्चिंता उड़े, संशय उड़े, परेशानी उड़े। एक दिन यूं ही मन में आया कि कहूं प्यार उड़े, तभी उसकी नींद खुली गई और उसने मेरी तर्जनी पकड़ के कहा - नहीं प्यार नहीं उड़े। यह सुन कर मैं भर नींद सोया था, अगली सुबह सभी चीजें सही सलामत थीं, बस तकिये के नीचे एक चेहरा पड़ा था और जिसकी आरजू में रातों का करवट-करवट होना बदा था।



हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad