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Sunday, September 18, 2011

राहुल सिंह एक अलग अंदाज में


बहुत पहले यहां  राहुल सिंह की कविताएं आप पढ़ चुके हैं..। राहुल एक अच्छे कथाकार भी हैं..। कई कहानियां चर्चित हो चुकी हैं। अभी-अभी उन्होंने एक नई कहानी लिखनी शुरू की है। यह कहानी का एक अंश है, लेकिन पढ़ने पर  पूर्णता का-सा आभास देता है। इस अलग तरह की अभिव्यक्ति को आपसे साझा करते हुए बहुत खुशी हो रही है।


                                               एक छोटी-सी प्रेम कथा_________________

उसके आने की कोई आहट, सुनी नहीं कभी, पर अक्सरहां कान उस आहट पर लगे रहे। आती तो उसके पास दुनिया जहां की बातें होती, जाती तो मेरी दुनिया का भी कुछ साथ होता उसके पास।

शायद हर बार थोड़ा उसके साथ मैं भी चला जाता। थोड़ा-थोड़ा जाने का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा। वह जाती तो मेरी दुनिया से कई जरुरी चीज गायब मिलते। लाख ढूंढता, नहीं मिलते और जब कभी वह फिर आती, चीजें वापस उसी जगह मौजूद मिलतीं। पूरी जादूगरनी थी। बात करते-करते बिस्तर पर ढलंग जाती और इससे पहले कि आप कुछ कहें वह सो चुकी होती। हाँ मन रखने के लिए उसके सोने के बाद भी उसकी मुस्कराहट थोड़ी देर के लिए जगी रहती और फिर वह भी सो जाती। वैसे उसके सोने के बाद उसका चेहरा भी सो जाता और जब वह जगती तो उसका चेहरा भी जग जाया करता। जब वह सो जाया करती तो मैं बस उसे देखा करता, निःशब्द। फिर मैं भी उसके साथ हो जाया करता, लेटे-लेटे मैं सोचता कि इस वक्त वह नींद की दुनिया में क्या कर रही होगी, जबकि मैं यहाँ हूँ। फिर इस खयाल से मैं डर जाया करता कि अगर वह नींद में सपने देख रही होगी तो मैं तो शर्तिया उसमें नहीं होंउगा क्योंकि मैं तो यहाँ हूँ। इसलिए उसके नींद में दाखिल होने के लिए मैं भी सो जाया करता, बिलकुल उसके पास, सटकर। नींद उसके आँखों के कोरों से उतर कर गालों के मैदानी इलाकों से होती हुई मेरे आँखों में आकर ठहर जाती और वहाँ थोड़ी देर सुस्ताने के बाद अचानक बड़ी तेजी से पूरे देह में पसर जाती। पेट से होते हुए वह तलुवों तक जाती और जब कभी मेरे तलुवे उसके तलुवों को छू जाते तो वह वापस उसके तलुवों के रास्ते उसके आँखों की पुतलियों तक लौट जाती। जब हम नींद में होते तो उसकी सोयी मुस्कराहट भी शरारत करती। मुस्कराहट उसके होंठों से उतर कर मेरे होठों में आ बसती। नींद खुलने पर जैसे ही उसकी निगाह मेरे होंठों में टिकी उसी की मुस्कराहट पर पड़ती, वह बेसाख्ता उसे चुन लिया करती। जब मैं जागता तो उसकी मुस्कराहट का स्वाद अपने होठों पर महसूस करता और हैरत होती।

अब जब वह आती तो उसके आने के साथ मैं चैकन्ना हो जाया करता, खिड़की-दरवाजे सब अच्छी तरह बंद किया करता कि नींद मेरे कमरे में दाखिल न हो, लेकिन ... नींद अगर पलकों में ही छिपकर आये तो कोई क्या कर सकता है। वैसे नींद की आहट अब मैं सुनने लगा था, नींद जब आती तो मेरे कमरे की चीजें एक-एक कर गायब होने लगतीं, उनके गायब होने को मैं महसूसता रहता और फिर उन्हें बचाये रखने का एक ही रास्ता था कि खुद भी उन चीजों में शामिल हो जाया जाये। ऐसा करने से जाते वक्त नींद जब चीजें वापस करतीं तो सबसे आखिर में मुझे लौटाती और इस तरह जब मैं जागता तो सभी चीजें वापस अपनी जगह पर होतीं, मैं भी।
उसके जाने के बाद भी उसका अक्स वहीं बिस्तर पर सोया रहता। ठीक वैसे ही बायीं ओर करवट लेकर, और केश अलसाये से उसके दाहिनी गाल पर पड़े रहते, आपस में सटी उसकी हथेलियाँ सोते हुए भी जीती-जागती इबादत सरीखीं लगतीं। उसे सोता हुआ देखकर अक्सरहाँ जी करता कि जाकर उसके गालों पर तर्जनी रख दूं और तोता उड़े-मैना उड़े की तर्ज पर कहूँ कि दुःख उड़े, दुश्चिंता उड़े, संशय उड़े, परेशानी उड़े। एक दिन यूं ही मन में आया कि कहूं प्यार उड़े, तभी उसकी नींद खुली गई और उसने मेरी तर्जनी पकड़ के कहा - नहीं प्यार नहीं उड़े। यह सुन कर मैं भर नींद सोया था, अगली सुबह सभी चीजें सही सलामत थीं, बस तकिये के नीचे एक चेहरा पड़ा था और जिसकी आरजू में रातों का करवट-करवट होना बदा था।



हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

4 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ||
    पढ़कर आनंदित हुआ ||
    बधाई ||

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  2. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

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  3. Atyant jivant prastuti ! Dhanyavaad padhvaane hetu !!

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  4. राहुल सिंह का नया रूप अच्छा लगा..... कहानी सारगर्भित और दिल को छु जाने वाली है..... आपकी प्रस्तुति बेहतरीन है.

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