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Sunday, October 30, 2011

महेश पुनेठा की कविताएं


महेश पुनेठा हिन्दी कविता में सक्रिय एक महत्वपूर्ण नाम है। महेश जी की कविताएं जीवन संघर्षों से प्राप्त ऊर्जा को प्रतीकित करती हैं। उनकी कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सहजता है, एक ऐसी सहजता जो पाठक के हृदय को कहीं गहरे झंकझोरती है। शिल्प के भारीपन से दूर महेश पुनेठा की कविताओं में लोक की सादगी और इमानदारी मौजूद है। दूर की कौड़ी के फेरे में नहीं पड़कर यह कवि अपने आस-पास की चीजों को अपनी कविता का विषय बनाता है और अपने कवित्व से हमें मोहित करता है।






















महेश पुनेठा
बहुत आग्रह के बाद महेश भाई ने ये कविताएं उपलब्ध कराई हैं। अनहद पर पहली बार उन्हें आप पढ़ेंगे। और यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा।














साहस है तुम्हारे भीतर

तुम मुझे अच्छी लगती हो
इसलिए नहीं -
कि तुम्हारी मुस्कान में
है दिशाओं के खुलने की सी उजास।
कि तुम्हारी नजरों में
है गुनगुनी धूप की सी चमक
कि तुम्हारी चाल में
है लहराती हुई खड़ी फसल सी लोच
कि तुम्हारी सुंदरता में
है षड्ऋतुओं के विविध रंग ।
बल्कि इसलिए
कि साहस है तुम्हारे भीतर
गलत को गलत कहने का ।
सड़ी -गली और पक्षपाती
रूढि़यों एवं परम्पराओं को
तोड़ने का ।
अत्याचार -अन्याय के खिलाफ
खड़े होने का ।
विसंगति एवं विद्रूपताओं पर
प्रश्न खड़े करने का ।
                              
हिमालय का एक दृश्य

सूर्योदय की
ललाई किरणों में नहायी पर्वत चोटियां
लग रही हैं ऐसी
जैसे पहली -पहली बार छुआ हो
किसी प्रेमी ने
अपनी कमसिन प्रेमिका को
अंगुलियों के पोरों से
और उसके गालों में छा गयी हो लाली।

प्रशंसा में


धीरे-धीरे भूलने लगता है आदमी
साफ-साफ बोलना
रिरियाने-मिमियाने लगता है आदमी
जब पड़ जाता है प्रशंसा के फेर में
लत सी लग जाती है प्रशंसा पाने की
नहीं मिलती प्रशंसा बहुत दिनों तक जब
बुरा सा लगने लगता है तब
छीजता सा महसूस करता है खुद को ।
इसलिए कुछ लोग
हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं इसे


प्रशंसा में
कौन है ऐसा जो बहने न लगे ।

बहते हुए खुद को संभालना
बहुत कम हैं जानते
खुद को बचा ले बहने से जो
वही दुनिया में कुछ कर पाते हैं
प्रशंसा से निर्विकार रह पाने वाले ही
        अनंत काल तक याद

तसल्ली


तसल्ली होती है कुछ
देखता हूं जब
बस्ते
और माता -पिता की
लैण्टानाई महत्वाकांक्षाओं के
बोझ से दबे बच्चे
निकाल ही लेते हैं खेलने का समय
ढॅूढ लेते हैं एक नया खेल
समय और परिस्थिति के अनुकूल

पतली गली में हो
या छोटे से  कमरे के भीतर
या फिर  कुर्सियों के बीच
मेज के नीचे
चाहे स्थान हो कितना भी कम
बना ही  लेते हैं वे
अपने लिए खेलने की जगह
जैसे अबाबील
ढॅूढ ही लेती है घर का कोई कोना
अपना घौंसला बनाने को
तमाम चिकनाई के बावजूद ।

और भी हैं यहां

रोज-रोज करती हो साफ
घर का एक-एक कोना
रगड़-रगड़ कर पोछ डालती हो
हर-एक दाग-धब्बा

मंसूबे बनाती होगी मकड़ी
कहीं कोई जाल बनाने का
तुम उससे पहले पहॅुच जाती हो वहाॅ
हल्का धूसरपन भी
नहीं है तुम्हें पसंद
हर चीज को
देखना चाहती हो तुम हमेशा चमकते हुए
तुम्हारे रहते हुए धूल तो
कहीं बैठ तक नहीं सकती
जमने की बात तो दूर रही

इस सब के बीच फुरसत ही कहाँ
देख सको जो तुम 
और भी हैं यहां
घर के भीतर-बाहर
अनेकानेक दाग-धब्बे-जाले
धूसरपन ही धूसरपन
धूल की परतें ही परतें
सदियों से जमी
जरूरत है इन्हें साफ करने की अधिक।
    
बाजार-समय


बहुत सारी हैं चमकीली चीजें
इस बाजार-समय में
खींचती हैं जो अपनी ओर
पूरी ताकत से
मगर
कितनी  हैं
जो बांधती हों कुछ देर भी।


स्कूल चलो अभियान

नाम सुनते ही स्कूल का
फूट पड़ा मन का सोता
बहने लगा गुबार
चातुरमासी स्रोतों-सा
कह देना चाहती थी वह
सब कुछ एक ही श्वास में-
क्या होगा स्कूल जाकर
पढ़-लिखकर
तोड़ रहा है पत्थर
मेरा बेटा
कंधे छिल चुके हैं उसके
पत्थर सारते-सारते
मजूरी ही करनी थी अगर
अनपढ़ ही रहता तो क्या बुरा था
सरम तो नहीं लगती
पत्थर तोड़ते हुए।

पत्थर तोड़-तोड़कर
स्कूल पढ़ाया
बाप ने उसके 
आखिर क्या पाया ।

समझाने चाहे मैंने
पढ़ने-लिखने के फायदे
लेकिन व्यर्थ गए सारे तर्क मेरे
रूक नहीं पाए
जैसे बरसाती नदी में बड़े-बड़े शिलाखंड

बोली जा रही थी वह -
कैसी छुरी चलती है दिल पर
देखती हूँ जब पत्थर ढोते
अपने पढ़े-लिखे बेटे को
सेठों के बेटों के लिए ही है क्या नौकरी
हम गरीबों के बेटों के लिए
नहीं चपरासीगिरी भी ।

किंकत्र्तव्यविमूढ़ देखता रहा मैं
तमतमाया चेहरा उसका
काँपती श्वासें
निरूत्तर खड़ा रहा उसके प्रश्नों को सुन।

चारों ओर गूँजने लगे स्वर
स्कूल चलो
आखिर किस स्कूल
जहाँ मास्टर एक
उसके भी काम अनेक
हाँकता रहता बच्चों को दिनभर
मजमा लगाए मदारी सा
नाचता रहता खुद जोकर सा ।
स्कूल चलो
आखिर किस स्कूल ?

मैं दबे पाँव लौट आया वहाँ से ।

किताबों के बीच पड़ा फूल

सूख चुकी हो भले
इसके भीतर की नमी
कड़कड़ी हो चुकी हों
इसकी पत्तियाँ
उड़ चुकी हो भले
इसमें बसी खुशबू
फीका पड़ चुका हो भले
इसका रंग
पर इतने वर्षों बाद अभी भी
बचा हुआ है इसमें
बहुत कुछ
बहुत कुछ
बहुत कुछ ऐसा
खोना नहीं चाहते हम
जिसे कभी ।





हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Friday, October 21, 2011

संजय राय की कविताएं

संजय राय की कविताएं अनहद पर हम पहले भी पढ़ चुके हैं। संजय की कविताएं अपने कहन की अलहदापन के कारण आश्वस्त करती हैं। इस बार प्रस्तुत है उनकी कुछ ताजी कविताएं....



संजय राय
चिड़िया, घोंसला और 'आइला'

उस दिन
धूप बरस रही थी
और सूरज सिर के ठीक ऊपर
चढ़कर ठहरा ही था
की डूबने लगा
काले बादलों में

आँगन में एक पेड़नुमा पौधा
पौधे पर घोंसला
और घोंसले से आती
तीन  बच्चों समेत
उस चिड़िया की चहचहाहट
मेरी नींद में घुलती रही

चिड़िया का संसार
लबालब भरा था
मेरी नींद में सेंध की तरह थी
उससे छलकती आवाज़

नहीं,
कोई आतंकी हमला नहीं था
उसके संसार पर
और न ही
कोई सरकारी अधिग्रहण था
उसके घोंसले का

कहते हैं
उस दिन 170 कि० मि० प्रति घंटा की
रफ़्तार से चली थी हवा
किसी को पता नहीं उसे कहाँ पहुँचाना था
शायद खुद उसे भी नहीं

टी० वी० में देखा
पढ़ा अखबार में
विद्वानों ने 'आइला' कहा था उस तूफान को

सुना है
बड़ी तबाही हुई थी बंगाल में
आज तक उसकी क्षतिपूर्ति को तरस रहे हैं
बंगाल के गाँव

मैंने लेटे-लेटे देखा
उजड़ गया था
उस चिड़िया का संसार भी
तीनों बच्चे मरे पड़े थे नीचे
सच कहता हूँ-
कोई राजनीति नहीं थी इसके पीछे
सरकार ने किसी मुआवजे की घोषणा नहीं की

चिड़िया आती
पौधे के चारों ओर चकराती
देखती अपना उजड़ा संसार, मरे हुए बच्चे

उस दिन
पिघल रही थी चिड़िया मेरे अन्दर
बहुत पहले सुना था बुजुर्गों से-
'रोते हैं पशु-पक्षी भी'

चिड़िया
नोचने लगी अपना घोंसला
वह अपने बर्बाद संसार को
मिटा देना चाहती थी शायद

आती
और एक-एक तिनका नोच ले जाती
उसके तीनों बच्चे वहीँ पड़े रहे
उसने आखरी बार उन्हें देखा
और उड़ गयी
उसने अपने उजड़े संसार को
खुद उजाड़ दिया

दूसरे दिन देखा
घर के ठीक सामने वाले बड़े-से पेड़ पर
एक चिड़िया ने
नया घोंसला बनाया था


स्कूल जाते बच्चे (एक)

बच्चे स्कूल के लिए
घर से निकलते
और रास्ते के साथ हो लेते
रास्ता उन्हें अपने साथ ले जाता
चिड़ियों के देश में

चिड़ियाँ उन्हें बुलातीं
चिड़ियाँ उड़ते-उड़ते आतीं
कभी उनके कन्धों पर
कभी उनके सिर पर
बैठ जातीं
कभी-कभी वे भी
चिड़ियों के साथ उड़ लेते
इस पेड़ से उस पेड़
इस डाल से उस डाल

बादल
जैसे उनके बिल्कुल करीब आ जाता
वे बादलों को छू लेते
वे बादलों पर पैर का टेक ले
थोडा-सा उछल लेते
उनके बाल लहराते
उनके हाथ हवा में फैल जाते
जैसे आसमान
उनकी बाहों में सिमट आया हो

कोई पतंग उड़ाता
तो सभी एक-एक कर
पतंग की डोर से लटक जाते
पतंग फिर भी उड़ती रहती आसमान में
वे पतंग की डोर से लटके झूलते रहते

अपनी इस हल्की और मुलायम
दुनिया से निकलकर जब वे स्कूल पहुँचते
ग्यारह बजने में पांच मिनट कम होता
और
पृथ्वी उनके कन्धों पर हाँफ रही होती


स्कूल जाते बच्चे (दो)

स्कूल जाते बच्चे
इितहास की गलियों में नहीं
समय के भूगोल में फैल जाते

अतीत उन्हें छू नहीं पाता
वर्तमान बस्ते में उनकी पीठ पर लदा होता
भविष्य को
वे गुब्बारे में भर के उड़ा देते

स्कूल जाते बच्चे
समाय की लीक पर नहीं चलते
वे चलते तो लीक बनती


इन्तजार

भूखा चाँद
भटकता रहा सरे आसमान

माँ रोटी पकाते-पकाते
जमुहाई लेती रही

दूर कहीं
पेड़ की टहनी पर बैठी रात
सुबह होने का इन्तजार करती रही


 उसकी डायरी में मरता गुलाब

उसने जब-जब लिखा - 'प्रेम'
मेरी छाती पर खरोंच के निशान मिले

उसने जब-जब कहा - 'प्रेम'
प्रेम की हर इबारत धरी की धरी रह गयी

प्रेम उसकी आँखों से
फूल की तरह बोलता
छुपी हुई चिड़िया की तरह
प्रेम आता
और चुपके से दुबक जाता
उसकी जुल्फों में

आज वह कहती है-
'समझ लो!
मैंने जब-जब जो-जो लिखा
पानी पर लिखा'

उसकी डायरी में मरते गुलाब की तरह
मर रहा है प्रेम उसके भीतर
और
मेरी छाती के खरोंच
कुछ और लाल हो चले हैं 








हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Friday, October 14, 2011

नील कमल की एक गज़ल



उसका नाम सरस्वती था । यह बात उसे भी ठीक से पता नहीं थी । वह अपना नाम सुरसतिया या सुरसती ही बताती । नालन्दा के आस पास की रहने वाली । मैथिली बोलती थी । वह ब्याह कर कलकत्ते आई और पति के साथ मेहनत मजदूरी करते हुए जिन्दगी गुजार दी । पति का नाम महावीर । कलकत्ता शहर ने न जाने कितने ऐसों को अपने पाश में जकड़ रखा है । मजदूरी या मजबूरी कौन जाने । बहरहाल इन्हें हम पारबती की माई के नाम से ही जानते थे । हम क्या, जानने वाले सभी इन्हें इसी नाम से पुकारते थे । पारबती यानि पार्वती, इनकी बेटी का नाम ।


ये हमारे घर सहित और भी कई घरों में घरेलू नौकरानी का काम करती थीं । मेरी माँ की स्नेहभाजन थीं ये । इन पर भरोसा किया जा सकता था । इतना कि सोने का कलश भी उलटा पड़ा हो तो ये उधर देखेंगी भी नहीं । परिवार इनका बड़ा था , जैसा कि होता है । गरीबी भी अजीब है । परिवार की चिन्ता में ये बराबर घुलती रहतीं । कमाई से मुश्किल से घर का राशन जुटा पाती होंगी । इनके इस त्याग भाव को इनके घर वाले कभी समझने को तैयार न थे । यहाँ तक कि जिनके लिए ये दिन रात हाड़ तोड़ मेहनत करतीं उन्हें लगता कि घर-घर काम करती है खाना तो इसे मिल ही जाया करता होगा । लिहाजा अपने घर में इन्हें भोजन भी मुश्किल से ही नसीब होता था । संसार माया का जाल है , यह इनका जीवन दर्शन था ।
मेरी माँ से इनका रिश्ता कुछ इस तरह का था कि वे एक दूसरे से अपने दुख -सुख बाँट सकती थीं । हमारे घर खाना इस हिसाब से बनता कि कुछ अतिरिक्त बचा रहे । माँ इस बात का विशेष खयाल रखतीं । माँ की रसोई में कभी कुछ खास व्यंजन पकता तो क्या मजाल कि पारबती की माई बिना खाए चली जाए । अक्सर हम बच्चों से भी पहले उन्हें माँ खिला देतीं । हम इसके लिए नाराज़ भी होते । होश सँभालने की उम्र से लेकर मेरी पढ़ाई , नौकरी और शादी तक ये हमारे घर से जुड़ी रहीं ।)
 यह एक ऐसा चरित्र था जो बारहाँ कविता में आने के लिए मासूम बच्चे की तरह जब-तब हाथ ऊपर करता रहता । इस स्त्री का समूचा जीवन संघर्ष का पर्याय है । जीवन की लड़ाइयाँ और कैसी होती होंगी । देखा जाए तो एक कर्मयोगी का जीवन । आज देर से ही सही यह कविता पारबती की माई के लिए।
लेकिन यह मानना ही चाहिए कि कविता में हम एक विषय अथवा चरित्र को कितनी भी सावधानी के साथ समाने की कोशिश क्यों न कर लें , वह थोड़ा सा हमारे हाथ से फ़िसल ही जाता है । कोई बात अब भी अनकही रह जाती है । यहीं से दूसरी कविता के लिए जमीन तैयार होती है । जो बात एक कवि से छूट जाती है कई बार उसे कोई दूसरा कवि पूरा करता है । और उस तरह कविता की अनन्त यात्रा चलती है ।

                                                                                                                          -- नील कमल


नील कमल


कोलकाता के चर्चित युवा कवि नील कमल की एक गज़ल

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    पारबती की माई 

पौ फटते ही काम पे जाती पारबती की माई 
सुरसतिया था नाम बताती पारबती की माई 

इनके घर झाड़ू-पोछा तो बरतन-बासन उनके
हाड़ तोड़ कर करे कमाई पारबती की माई 

पेट काट कर पाले बुतरू सिल कर रक्खे होंठ 
दुनिया माया जाल बताती पारबती की माई 

अति उदार मन हृदय विशाला कठिन करेजे वाली 
महाबीर की एक लुगाई पारबती की माई 

हाथ और मुँह के बीच तनी रस्सी पर चलती जाये 
अजब नटी है गजब हठी है पारबती की माई 



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हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad