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Friday, October 14, 2011

नील कमल की एक गज़ल



उसका नाम सरस्वती था । यह बात उसे भी ठीक से पता नहीं थी । वह अपना नाम सुरसतिया या सुरसती ही बताती । नालन्दा के आस पास की रहने वाली । मैथिली बोलती थी । वह ब्याह कर कलकत्ते आई और पति के साथ मेहनत मजदूरी करते हुए जिन्दगी गुजार दी । पति का नाम महावीर । कलकत्ता शहर ने न जाने कितने ऐसों को अपने पाश में जकड़ रखा है । मजदूरी या मजबूरी कौन जाने । बहरहाल इन्हें हम पारबती की माई के नाम से ही जानते थे । हम क्या, जानने वाले सभी इन्हें इसी नाम से पुकारते थे । पारबती यानि पार्वती, इनकी बेटी का नाम ।


ये हमारे घर सहित और भी कई घरों में घरेलू नौकरानी का काम करती थीं । मेरी माँ की स्नेहभाजन थीं ये । इन पर भरोसा किया जा सकता था । इतना कि सोने का कलश भी उलटा पड़ा हो तो ये उधर देखेंगी भी नहीं । परिवार इनका बड़ा था , जैसा कि होता है । गरीबी भी अजीब है । परिवार की चिन्ता में ये बराबर घुलती रहतीं । कमाई से मुश्किल से घर का राशन जुटा पाती होंगी । इनके इस त्याग भाव को इनके घर वाले कभी समझने को तैयार न थे । यहाँ तक कि जिनके लिए ये दिन रात हाड़ तोड़ मेहनत करतीं उन्हें लगता कि घर-घर काम करती है खाना तो इसे मिल ही जाया करता होगा । लिहाजा अपने घर में इन्हें भोजन भी मुश्किल से ही नसीब होता था । संसार माया का जाल है , यह इनका जीवन दर्शन था ।
मेरी माँ से इनका रिश्ता कुछ इस तरह का था कि वे एक दूसरे से अपने दुख -सुख बाँट सकती थीं । हमारे घर खाना इस हिसाब से बनता कि कुछ अतिरिक्त बचा रहे । माँ इस बात का विशेष खयाल रखतीं । माँ की रसोई में कभी कुछ खास व्यंजन पकता तो क्या मजाल कि पारबती की माई बिना खाए चली जाए । अक्सर हम बच्चों से भी पहले उन्हें माँ खिला देतीं । हम इसके लिए नाराज़ भी होते । होश सँभालने की उम्र से लेकर मेरी पढ़ाई , नौकरी और शादी तक ये हमारे घर से जुड़ी रहीं ।)
 यह एक ऐसा चरित्र था जो बारहाँ कविता में आने के लिए मासूम बच्चे की तरह जब-तब हाथ ऊपर करता रहता । इस स्त्री का समूचा जीवन संघर्ष का पर्याय है । जीवन की लड़ाइयाँ और कैसी होती होंगी । देखा जाए तो एक कर्मयोगी का जीवन । आज देर से ही सही यह कविता पारबती की माई के लिए।
लेकिन यह मानना ही चाहिए कि कविता में हम एक विषय अथवा चरित्र को कितनी भी सावधानी के साथ समाने की कोशिश क्यों न कर लें , वह थोड़ा सा हमारे हाथ से फ़िसल ही जाता है । कोई बात अब भी अनकही रह जाती है । यहीं से दूसरी कविता के लिए जमीन तैयार होती है । जो बात एक कवि से छूट जाती है कई बार उसे कोई दूसरा कवि पूरा करता है । और उस तरह कविता की अनन्त यात्रा चलती है ।

                                                                                                                          -- नील कमल


नील कमल


कोलकाता के चर्चित युवा कवि नील कमल की एक गज़ल

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    पारबती की माई 

पौ फटते ही काम पे जाती पारबती की माई 
सुरसतिया था नाम बताती पारबती की माई 

इनके घर झाड़ू-पोछा तो बरतन-बासन उनके
हाड़ तोड़ कर करे कमाई पारबती की माई 

पेट काट कर पाले बुतरू सिल कर रक्खे होंठ 
दुनिया माया जाल बताती पारबती की माई 

अति उदार मन हृदय विशाला कठिन करेजे वाली 
महाबीर की एक लुगाई पारबती की माई 

हाथ और मुँह के बीच तनी रस्सी पर चलती जाये 
अजब नटी है गजब हठी है पारबती की माई 



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हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

6 comments:

  1. सरल शब्दों में सहज अभिव्यक्ति...
    बहुत ही सुन्दर...
    अपनी मिट्टी अपने गाँव की याद दिलाती रचना...

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  2. badhiya ghajal ,prastuti hetu badhai vimlesh bhai !

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  3. बहुत अच्छी रचना है...पर इसे ग़ज़ल कहने की कोई विवशता नहीं है।

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  4. बहुत सुन्दर सार्थक प्रस्तुति| धन्यवाद|

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  5. भावपूर्ण आभिव्यक्ति !

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  6. बहुत सुन्दर!!!

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