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Sunday, November 27, 2011

कविता संग्रह 'हम बचे रहेंगे' का विमोचन, एक रिपोर्ट


विमलेश की कविताएं समकालीन कविता में सार्थक हस्तक्षेप करती हैं केदारनाथ सिंह

 विमलेश त्रिपाठी का काव्य संग्रह 'हम बचे रहेंगे' का लोकार्पण

कोलकाता की महत्वपूर्ण संस्था सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन की ओर से 27 नवंबर, 2011 को समकालीन कविता के युवा हस्ताक्षऱ एवं महत्वपूर्ण कथाकर विमलेश त्रिपाठी की कविता की किताब हम बचे रहेंगे का लोकार्पण, कोलकाता के यूनिवर्सिटि इंस्टिट्यूट हॉल में वरिष्ठ एवं समय के सबसे महत्वपूर्ण कवि केदारनाथ सिंह के हाथों संपन्न हुआ। विमलेश त्रिपाठी का यह पहला काव्य संग्रह है और यह रेखांकनीय है कि 2011 का सूत्र सम्मान भी उन्हें प्रदान किए जाने की घोषणा हुई है। केदारनाथ सिंह ने उक्त समारोह में विमलेश की कविताओं की कुछ महत्वपूर्ण विन्दुओं की ओर संकेत करते हुए उनकी कविता को अलहदेपन से युक्त तथा समकालीन कविता में एक सार्थक हस्तेक्ष बताया। उन्होंने कहा कि विमलेश की कविताओं में एक सामुदायिकबोध है जो हाल की कविताओं में बहुत कम होता गया है। एक संकलन में और वह भी पहले संकलन में एक साथ इतनी अच्छी कविताओं का होना हमें आश्वस्त करता है। उन्होंने कहा कि विमलेश की कुछ कविताएं प्रचलित मुहावरों की याद तो दिलाती हैं लेकिन उन मुहावरों का इस्तेमाल करते हुए विमलेश बहुत कुछ नया और अलहदा कह पाते हैं, और यह कवि की क्षमता प्रमाणित करता है। उनका कहनाम था कि कवि के इस संकलन में उसका संपादन कौशल तो झलकता ही है, साथ ही कविताओं में आंचलिक शब्द इस तरह से आए हैं कि वे हिन्दी में घुलमिल कर एक अलग तरह के अहसासों से हमें भर जाते हैं। केदार जी ने विमलेश की कविताओं में आए कई आंचलिक शब्दों को उद्धरित करते हुए कहा कि लोक के शब्दों का इस्तेमाल विमलेश की कविताओं में बेहद प्रासंगिक और अर्थगर्भित हैं।

हम बचे रहेंगे – विमलेश त्रिपाठी (कविता )
'नयी किताब',  
एफ-3/78-79, सेक्टर-16, रोहिणी
दिल्ली - 110089.
दूरभाष ः 011-27891526
इ-मेल ः nayeekitab@gmail.com
उक्त समारोह में महत्वपूर्ण युवा आलोचक प्रफुल्ल कोलख्यान, वरिष्ठ आलोचक डॉ. शंभुनाथ, महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कोलाकाता शाखा के प्रभारी डॉ. कृपाशंकर चौबे, महत्वपूर्ण युवा कवि नीलकमल सहित कोलकाता के तमाम लोग मौजूद थे। डॉ. शंभुनाथ ने विमलेश को एक महत्वपूर्ण कवि ही नहीं वरन् एक महत्वपूर्ण कथाकार के रूप में रेखाकित किया। उन्होंने कहा की विमलेश का अपने परिवेश और गांव से गहरा जुड़ाव है, उनकी कविताएं इसकी साक्षी हैं।
प्रफुल्ल कोलख्यान ने कविता की विधा को अबौधिक क्रिया कहते हुए रेखांकित किया कि विमलेश की कविताएं इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती हैं कि वे कविता और जीवन दोनों में ही बुद्धि की जगह भावना को अत्यधिक महत्व देते हैं।
युवा कवि नीलकमल ने विमलेश की कविताओं पर बोलते हुए कहा कि प्रेम और विश्वास विमलेश की कविताओं के केन्द्र में हैं, विमलेश कविता लिखने के लिए किसी ट्रिक का इस्तेमाल नहीं करते, उनकी कविताएं उनके परिवेश की उपज हैं। उन्होंने कहा कि उनकी कविताएं उस युवा की कविताएं जो कक्षा के सबसे पिछले बेंच पर बैठा रहने वाला एक मासुम है जिसे एक लड़की अपनी मुट्ठी में करीने से रक्खा हुआ बसंत सैंपती है
कृपाशंकर चौबे ने उक्त अवसर पर विमलेश की एक कविता यकीन का पाठ किया और बांग्ला के महत्वपूर्ण कवि नवारूण भट्टाचार्य़ा की एक सद्प्रकाशित कविता के साथ तुलना करते हुए कहा कि विमलेश का यह संकलन बहुत महत्वपूर्ण है और बहुत जल्दी महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय की कोलकाता शाखा में इसपर एक गहन परिचर्चा का आयोजन किया जाएगा। उन्होंने विमलेश को बधाई देते हुए कहा कि विमलेश प्रेम और विश्वास के साथ उम्मीद के भी कवि हैं।
युवा आलोचक जय प्रकाश ने विमलेश की कविताओं की सहजता की तुलना गोरख पांडेय से की और उन्हें समकालीन कविता के एक महत्वपूर्ण कवि के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि विमलेश की कविताएं इतनी महत्वपूर्ण इसलिए हैं कि विमलेश कविता में जो दिखायी पड़ते हैं ठीक उसी तरह अपने जीवन में भी हैं। उनके यहां व्यक्तित्व और कृतित्व का वह साम्य मिलता है जो समकालीन परिदृश्य से गायब होता जा रहा है।.

विमलेश त्रिपाठी
उक्त अवसर पर सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन के रितेश पांडेय, मुकेश मंडल आदि लोगों द्वारा केदारनाथ सिंह और विमलेश की कविताओं की आवृति प्रस्तुत की गई। संचालन संस्था के सचिव डॉ. राजेश मिश्र ने और धन्यवाद ज्ञापन डॉ. संजय जयसवाल ने किया।

                                                      प्रस्तुतीः  मनोज झा


हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Sunday, November 20, 2011

प्रेमचंद गांधी की लंबी कविता भाषा की बारादरी



प्रेमचंद गांधी


भाई प्रेमचंद की यह कविता जितनी सहजता और साफगई से कई रहस्यों पर से पर्दा उठाती है, वह काबिले तारीफ है। दरअसल प्रेमचंद गांधी तमाम जोडतोड़ से अलग एक इमानदार और संवेदनशील कवि हैं। यह पूरी कविता उनके काव्य विवेक, उनकी समझ और वर्तमान परिदृश्य के सच की गहरी झलक प्रस्तुत करती है। अनहद पर प्रस्तुत है प्रेमचंद गांधी की लंबी कविता भाषा की बारादरी। आपकी बेबाक प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा।




 लंबी कविता
भाषा की बारादरी
प्रेमचंद गांधी

एक
संज्ञाओं को
सर्वनाम होने से बचाओ कवियो
तुम भाषा के अभियंता हो
बचाओ भाषा की इमारत को
व्‍याकरण के पुल को
जर्जर होने से बचाओ

ये जो मीडिया में बैठे हैं
शब्‍दों के अप्रशिक्षित कामगार
एक जीते-जागते इंसान को
व्‍यक्ति और जन में बदल रहे हैं
कहो उनसे कि
एक व्‍यक्ति ने नहीं
गोपाल ने फांसी लगाई
एक विवाहिता ने नहीं
दमयंती ने ज़हर खाया

वे हमारी भाषा की इमारत से
निकाल देते हैं बरसों पुरानी खिड़की
और ठोक देते हैं एक विण्‍डो
वे तोड़कर गिरा देते हैं
एक मेहराबदार छज्‍जा
और बना देते हैं सपाट

उनसे जाकर कहो
क्‍यों हमारी भाषा की
मां-बहन कर रहे हो
कहो कि एक दिन इसी मलबे में
दफ्न हो जाएगी हिंदी पत्रकारिता
लड़ो कि वरना खत्‍म हो जाएगी
हिंदी कविता और भाषा की सरिता।

दो
विशेषणों की भरमार थी
एक ऐसा युग था
निंदा और प्रशंसा के चरम पर पतनशील
उस कालखण्‍ड में
कवि जितने निरीह थे
कविता उससे कहीं ज्‍यादा लाचार।

तीन
दंभी, आत्‍मरतिग्रस्‍त और कुंजीछाप
समाचार संपादकों के हाथों में था
शब्‍दों का भविष्‍य उस युग में

उनके पास थी एक पूरी फौज
शब्‍दों के कसाइयों की
जो हलाल और झटके में
फर्क ना करते हुए
जिबह कर डालते कोई भी शब्‍द
लहूलुहान शब्‍दों के लोथड़ों को
फिर वे कंप्‍यूटरीकृत कसाईबाड़े में छीलते-काटते
धो-पोंछ कर बेजान शब्‍दों को
वे रंगों से सजाते
समाचार और विचारों में पिरोते
और एक रंगीन दर्शनीय लेकिन निष्‍प्राण
संसार पेश कर देते

पांच मिनट का काम था
पाठकों के लिए
उस रंगीन संसार से गुजरना
इतना सुंदर कब्रिस्‍तान था
उस युग में शब्‍दों का।

चार
जब कवि-लेखक बचा रहे थे
लोक के आलोक को
समूची संवेदना के साथ
कुछ लोग और आ गए बचाव में
उन्‍होंने कहा, यह हमारी जाति का है
यह कविता, यह संगीत
किसी को नहीं दिया जा सकता

इस तरह लोक का आलोक
जाति के नाम पर
बाकी के लिए निषिद्ध कर दिया गया।

पांच
कुछ कवि थे उस युग में
जो आजीवन अलापते रहे
लोक का राग
एक मृतप्राय: भाषा में खोजते रहे प्रेरणा
जबकि जीवन था इतना संश्लिष्‍ट कि
सदियों पुरानी भाषा में संभव नहीं था
उसकी मुश्किलों का हल ढूंढ़ना

वाल्‍मीकि से लेकर कालिदास-भवभूति तक
चुप थे उस युग में
और कवि थे कि पूछे जा रहे थे उनसे
साम्राज्‍यवाद से लड़ने की युक्तियां

महाकवियों की दुर्दशा का युग था वह
फिर भी कुछ आलोचक थे
जो बांट रहे थे
महाकवि की पदवियां।

छह
सरहदें बेमानी हो गई थीं
शब्‍दों की आवाजाही इतनी सुगम
जैसे परिंदों की उड़ान

अनुवाद में सब कुछ संभव था
वह अनुवाद का पूरा युग था

अनुवाद पढ़ने के लिए
इतने अधीर नहीं थे लेखक
जितना अनूदित होने के लिए
कुछ तो ऐसे भी थे जिनका
अपनी ही भाषा में होना था अनुवाद

अनूदित होने की ललक इतनी थी कि
लेखक खुद ही सीखने लगे थे भाषाएं
मशीनी अनुवाद को भी गर्व से
कहते थे दूसरी भाषा में जाना

दूसरी भाषाओं में
कुछ इस तरह जा रहे थे लेखक
जैसे सब कुछ तहस-नहस करने के बाद
अमेरिकी सेनाएं लौट रही हो
युद्ध के मैदान से

अपनी ही भाषा को
अनुवाद का युद्धस्‍थल बना देने का
एक युग था वह असमाप्‍त।

सात
आलोचक निष्क्रिय थे
रचनाकार ही थे व्‍यस्‍त
व्‍याख्‍यान और भाषणों में ही
महदूद रह गई थी आलोचना

रचना को कई कोणों से खोजने वाली
एक अद्भुत विधा को बचाने में
जुटे थे उस युग के रचनाकार
जैसे दंगे-फसाद के दिनों में
मोहल्‍ले वाले ही लगाते हैं गश्‍त।

आठ
बेधड़क और निर्द्वंद्व भाव से
लिखने का महायुग था वह
गृहस्‍थी से फुरसत मिलते ही
हो जाती थीं लेखिकाएं तैयार

उनके पास था
एक अपूर्व-अव्‍यक्‍त संसार
आभासी दुनिया ने दिया उन्‍हें
एक भरा-पूरा पाठक संसार

बावजूद तमाम कानूनों और नैतिक बंधनों के
लेखिकाओं के पीछे ही पड़े रहते थे पाठक
वाहवाही का प्रशंसनीय दरबार था
स्त्रियों की सामान्‍य तुकबंदियां भी
गहरी और मर्मस्‍पर्शी होती थीं उस काल में

ऐसा स्‍त्रीलोभी संसार था वह
जहां रचना का स्‍तर
लिंग से तय होता था
जबकि लिंग परीक्षण निषिद्ध था।

नौ
कुछ लोग थे
जो अपनी मातृभाषा के लिए लड़ रहे थे
जिनसे छूट चुकी थी मातृभाषा
वे उनका उपहास उड़ाते हुए
विरोध कर रहे थे

भाषाई झगड़ों में
खो रही थी सांस्‍कृतिक अस्मिता
और संस्‍कृति के प्रहरी
निक्‍कर-टोपी में
डण्‍डा लिए चहलकदमी कर रहे थे

दस
एक भाषा को धर्म के आधार पर
सरहद पार भेज दिया गया था
और उसे पढ़ने-बोलने वालों को
हिकारत से देखा जाता था

एक मीठी जुबान को लेकर
इतनी कड़वी-कसैली अफवाहें थीं कि
लोग उसकी लिपि बदलने पर उतारू थे

कब का ढह चुका था रोमन साम्राज्‍य
पर कुछ लोग थे
सरहद के आर और पार
जिन्‍हें सब कुछ रोमन में ही चाहिए था।

ग्‍यारह
अर्थ-विछिन्‍न और अनुपयोगी
घोषित कर दिए गए शब्‍दों का मलबा है
भाषा की बारादरी के पास
इस सूखे हुए जलाशय में
जैसे हड़प्‍पा और मोहन्‍जोदड़ो में
ठीकरी और ईंटों का मलबा

कुछ लोग अभी भी आते हैं यहां
बेशकीमती शब्‍दों के अवशेष बीनने
यह रहा टूटा हुआ चषक
एक कोने में उपेक्षित पड़े हैं प्राणनाथ

गौर से देखो
यह प्राचीन शब्‍दकोशों का
जीर्णशीर्ण पुस्‍तकागार है

बारह
कब का बीत चुका था मध्‍यकाल
यह था महा-गद्यकाल
जिसमें समाप्‍त हो चुकी थी
प्रतीक और संकेतों को
संक्षेप में समझने की प्रज्ञा

कुछ लेखक थे इस काल में
जो महाकाव्‍यों को उपन्‍यास में बदल रहे थे
तो कुछ उपन्‍यासों को धारावाहिकों में
कालिदास न जाने कैसे बच गए थे
इस युग के गद्यकारों से।

तेरह
बिल्‍कुल अभागा देश था वह
जहां कविता सिर्फ धर्मग्रंथों में बची रह गई थी
कविता के नाम पर
धर्मग्रंथ ही बिकते थे वहां
क्‍योंकि वहीं थी शायद
छंद की थोड़ी-सी गंध

इस तरह बजबजाती थी
छंद की गंध कि
कविता-पाठ से पहले
जलानी पड़ती थीं अगरबत्तियां

कितना विकट काल था उस देश का
जहां कविता का काम
वहां की महान भाषा में
मृत्‍यु के बाद
सिर्फ शांतिपाठ का रह गया था

कविता के ऐसे दुर्दिन थे कि
निर्द्वंद्व भाव से हर शोक सभा में
होता था कविता-पाठ
और कविगण थे कि
खुदी से पूछते रहते थे
क्‍या कविता का भी होगा
एक दिन शांतिपाठ ?

चौदह
जो जिस भाषा में लिखता था
उसी में कमतर था
प्रसिद्धि उसे उसी भाषा में मिली
जिसे घृणा से देखता था वह

घृणा और सफलता का
ऐसा समन्‍वय था उस युग में कि
लोग बेलगाम जुबान को ही समझने लगे थे
सफलता का अंतिम उपाय।

पंद्रह
जब संबंधों में ही समाप्‍त हो चुका था माधुर्य
ऐसा एक युग था वह
फिर भी कुछ लोग खोज रहे थे
छंदों में माधुर्य

छंद का फंद इतना जटिल कि
कवि होने की पहली शर्त था
गवैया होना
यूं स्‍वामी हरिदास के बाद
नहीं पाया गया कोई गायक कवि

छंदों में रचने वाले
गवैये भी खोजते थे
एक अच्‍छा गायक
और गायक
अच्‍छा लिखने वाला।

सोलह
अपने ही समय को
कहना पड़ता था भूतकाल
अपने ही देश को बताना होता था मगध
कैसी लाचारी थी कवि की
या कि भाषा और समय की

भविष्‍य हमेशा की तरह
अकल्‍पनीय था उस युग में
लोगों के पास जीवन में
भले ही कम रही हों उम्‍मीदें
साहित्‍य के बारे में वे पूरे आश्‍वस्‍त थे।

सत्रह
विश्‍वविद्यालयों की संख्‍या की तरह
बढ रही थी अध्‍यापकों की तनख्‍वाहें
भरा-पूरा था भाषा का कारोबार
मातृभाषा के सिवा
दूसरी भाषाएं पढने-पढाने का युग था वह

जनता इसी में खुश थी कि
दुनिया भर में पढी जा रही थी
उनकी अपनी मातृभाषा
जिसे खुद दोयम समझते थे

भाषा की देवी के
घोर अपमान का युग था वह
जिसमें विदेशियों की दिलचस्‍पी
महज कारोबार तक सीमित थी
और जो एक समूची जाति थी भाषा की
उसने गैर जरूरी बना दिया था
अपनी ही भाषा को

उस भाषा में रोजगार
सिर्फ अध्‍यापन में बचा रह गया था
जिसमें पढाने के अलावा सब कुछ होता था

अठारह
सिनेमा में ही बचे रह गए थे
छंद और तुक
इतना बेतुका था समय

कुछ ब्राण्‍डेड किस्‍म के कवि थे
जो बनाते थे रेडीमेड गीत हर मौके के लिए
और कुछ खोजते थे सिनेमा में अवसर

उन्‍नीस
कुछ कवि हमेशा ही रहते थे
अनंत की खोज में

अन्‍नदाताओं की खुदकुशी के दिनों में भी
अनंतवादी तलाश रहे थे
देह, संबंध और आत्‍मा के रहस्‍य
उनकी अनंत की यात्रा में
शामिल थे बस निजी दुख
पराये दुख नहीं सालते थे उन्‍हें।

बीस
कविता के नाम पर
एक तरफ था कारोबार
सैंकडों करोड का मंच पर
जहां कविता पनाह मांगती थी

जनता कविता मांगती थी
और चुटकुलों से पेट भरती थी

एक महान भाषा का
हास्‍य युग था वह
जहां मंच पर कुछ का कब्‍जा था
कविता की खाली जमीन थी
आयोजकों के पास नकली पट्टे थे
कवियों के नाम पर भाण्‍ड थे
चुटकुलों के लट्ठ लिए
निर्द्वंद्व भाव से वे
विमानों में उडते थे और
जमीन पर कराहती थी काव्‍य संवेदना।




***
प्रेमचन्द गांधी
220, रामा हैरिटेज, सेंट्रल स्‍पाइन,
विद्याधर नगर, जयपुर- 302 023
फोन- 09829190626









हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Sunday, November 6, 2011

दिनेश त्रिपाठी 'शम्स' की चार गजलें


दिनेश त्रिपाठी 'शम्स'  हिन्दी ग़ज़ल लेखन की दुनिया में एक जाना पहचाना नाम है। अनहद पर प्रस्तुत है इस बार दिनेश जी की चार ताजा ग़ज़लें। आपकी बेबाक प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।

(एक)                                                             
आईने पर यक़ीन रखते हैं ,
वो जो चेहरा हसीन रखते हैं .

आंख में अर्श की बुलन्दी है ,
दिल में लेकिन ज़मीन रखते हैं .

दीन-दुखियों का है खुदा तब तो ,
आओ हम खुद को दीन रखते हैं .

जिनके दम पर है आपकी रौनक  ,
उनको फिर क्यों मलीन रखते हैं .  

विषधरों के नगर में रहना है ,   
हम विवश होके बीन रखते है .    

ये सियासत की फ़िल्म है जिसमें ,
सिर्फ़ वादों के सीन रखतें हैं

(दो)

एक झूठी मुस्कुराह्ट को खुशी कहते रहे ,
सिर्फ़ जीने भर को हम क्यों ज़िन्दगी कहते रहे .

लोग प्यासे कल भी थे हैं आज भी प्यासे बहुत ,
फिर भी सब सहरा को जाने क्यों नदी कहते रहे .

हम तो अपने आप को ही ढूंढते थे दर-ब-दर ,
लोग जाने क्या समझ आवारगी कहते रहे .

अब हमारे लब खुले तो आप यूं बेचैन हैं ,
जबकि सदियों चुप थे हम बस आप ही कहते रहे .

रहनुमाओं में तिज़ारत का हुनर क्या खूब है ,    
तीरगी  दे करके हमको रोशनी कहते रहे .

(तीन)

एक लम्हा गुजार कर आये ,
या कि सदियों को पार कर आये .

जीत के सब थे दावेदार मगर ,
एक हम थे कि हारकर आये .

आईने सब खिलाफ़ थे लेकिन ,
पत्थरों से क़रार कर आये .

ज़िन्दगी एक तुझसे निभ जाये ,
खुद से धोखे हज़ार कर आये .

आज़ ही हम बज़ार में पहुंचे ,     
आज ही हम उधार कर आये .

अपने दामन को खुद रफ़ू करके ,
खुद की फिर तार-तार कर आये .  

तेरी महफ़िल में ‘शम्स’ जो आये
ग़म की चादर उतार कर आये .

(चार)

ख़्वाहिश-ए-दिल हज़ार बार मरे ,
पर न इक बार भी किरदार मरे .

प्यार गुलशन करे है दोनो से ,
न तो गुल और न ही ख़ार मरे .

चल पड़े तो किसी की जान मरे ,
न चले तो छुरी की धार मरे .

ताप तन का उतर भी जाये मगर ,
कैसे मन पर चढा बुखार मरे .

ज़िन्दगी तू है अब तलक ज़िन्दा ,
मौत के दांव बेशुमार मरे . 
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दिनेश त्रिपाठी 'शम्स'

परिचय
नाम – डा. दिनेश त्रिपाठी `शम्स’
उपनाम - `शम्स’
जन्मतिथि -०३ जुलाई १९७५
जन्मस्थान – मंसूरगंज , बहराइच , उत्तर प्रदेश    
शिक्षा – एम . ए.(हिन्दी), बी. एड., पीएचडी.(हिन्दी)
सम्प्रति – वरिष्ठ प्रवक्ता (हिन्दी)
         जवाहर नवोदय विद्यालय , बलरामपुर , उत्तर प्रदेश  
पुस्तकें(१) जनकवि बंशीधर शुक्ल का खडी बोली काव्य (शोध प्रबंध ),मीनाक्षी प्रकाशन,नयी दिल्ली
        (२) आखों में आब रहने दे (गजल संग्रह ) मीनाक्षी प्रकाशन , नयी दिल्ली
सम्मान(१) –साहित्यिक संस्था काव्य धारा , रामपुर , उत्तर प्रदेश द्वारा सारस्वत सम्मान
        (२) –अखिल भारतीय हिन्दी विधि प्रतिष्ठान द्वारा द्वारा सारस्वत सम्मान
        (३) –अखिल भारतीय अगीत परिषद , लखनऊ द्वारा दान बहादुर सिंह  सम्मान
        (४)- बाल प्रहरी , द्वाराहाट , अल्मोड़ा , उत्तराखन्ड द्वारा राष्ट्रीय बाल साहित्य सम्मान
        (५) – गुंजन साहित्यिक मंच रामपुर , उत्तरप्रदेश द्वारा प्रशस्ति –पत्र
        (६) –शिक्षा साहित्य कला विकास समिति,बहराइच,उत्तर प्रदेश द्वारा गजल श्री सम्मान     
        (७) – नवोदय विद्यालय समिति , नयी दिल्ली द्वारा गुरु श्रेष्ठ सम्मान
        (८) – जनकवि बंशीधर शुक्ल स्मारक समिति , लखीमपुर , उत्तरप्रदेश द्वारा जनकवि   बंशीधर शुक्ल सम्मान
        (९) – प्रोग्राम सपोर्ट यूनिट फाउंडेशन द्वारा ग्रामीण विकास के क्षेत्र में सृजनात्मक योगदान हेतु प्रशस्ति –पत्
       (१०)- अंजुमन फरोगे अदब , बहराइच उत्तर प्रदेश द्वारा स्व. श्याम प्रकाश अग्रवाल सम्मान
       (११)- नगर पालिका परिषद , बहराइच द्वारा अभिनन्दन एवं प्रशस्तिपत्र प्रदत्त

पता - जवाहर नवोदय विद्यालय
      ग्राम – घुघुलपुर , पोस्ट – देवरिया -२७१२०१
      जिला – बलरामपुर , उत्तर प्रदेश       
संपर्क – मोबाइल – ०९५५९३०४१३१
       इमेल – yogishams@yahoo.com
ब्लॉग – dinesh-tripathi.blogspot.com
              


हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad