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Thursday, December 29, 2011

युवा साथी जय प्रकाश की एक पाठकीय प्रतिक्रिया


विमलेश रोज बन रही दुनिया के आदिवासी कवि हैं
                                                     हम बचे रहेंगे पर एक पाठकीय प्रतिक्रिया               
                    जयप्रकाश


“… the poetic work, in its resistant self-sufficient presence , is not reducible to wht a reader already understnads. It brings into existence something new that need to be undestood only in its own terms: the truth that discloses itsself in the work can never be proved or derived from what went before. Wht went before is refuted in its exclusive reality by work..”
 -        MARTIN HEIDEGGER
( Poetry, Language & Thought)


जर्मन दार्शनिक हाइडेगर ने कहा था कि अकादमिक आलोचना कविता का विध्वंस है। कविता का विश्लेषण नहीं किया जा सकता। विमलेश त्रिपाठी की कविताएं इसी कोटि में आती हैं। उन्हें आधुनिक आलोचना के औजारों द्वारा समझने की कोशिश उनके विनाश में होती है। अतः विमलेश की कविताओं पर यह चिंतन बस चिंतन की आवश्यकता से उपजा है, उनकी कविताओं को पहले से तय मुहावरों एवं विमर्शों से रिड्यूस करने के लिए नहीं।

विमलेश एक दुनिया रचते हैं अपनी कविताओं में। बल्कि कहना चाहिए कि उन्होंने कविता-दुनिया रची है। कविता से बाहर दुनिया नहीं है, दुनिया से बाहर कविता नहीं है। कविता ही पृथ्वी है, दुनिया है। हाइडेगर की दार्शनिकता का केन्द्रिय शब्द है पृथ्वी। विमलेश भी पृथ्वी का जिक्र बार-बार करते हैं। प्रार्थना कविता में में पृथ्वी के साबुत बचे रहने की संभावना है तो कठिन समय में प्रेम कविता में पृथ्वी सहेली है। स्त्री एवं पृथ्वी का यह ऐक्य उनकी कविताओं में बार-बार आता है जिसकी वजह से उन्हें इकोफेमिनिस्ट लेखक कहने का मन करता है, लेकिन यह अपर्याप्त है क्योंकि जैसा कि कहा जा चुका है कविता को पहले से तय विचार सरणियों में रिड्युस नहीं किया जा सकता है। विमलेश अपनी पृथ्वी रचते हैं यह उनका लोक है जो सामुदायिक जीवन ( Community living) की सहज आत्मिय उष्मा से बना है, जहां टूंआ, सूकर जादो, बकुली बाबा, मां, प्रेमिका, पत्नी, कोइरी डोमीन, अनगराहित सिंह (जो मंत्रों की तरह पहाड़ा बुदबुदाते हैं) का भरा-पूरा संसार है।

यह दुनिया रोज बनती है, इसलिए रोज बिगड़ती भी है। यह अधूरे अंत का प्रारंभ है। बाबूजी नहीं समझते, मगर समय बदल जाता है’, क्योंकि दुनिया बदल जाती है। मगर इस तरह बदलती हुई दुनिया बची रहती है। हम बचे रहेंगे का विश्वास इस तरह पुराने पर्यावरणवादी मुहावरे की परिणति नहीं है। यह बचे रहना बिल्कुल अलग है। यह यूटोपिया या बुर्जुवा जिजिविषा का महिमागान नहीं है। यह सामुदायिक जीवन के दुख से उत्पन्न दृष्टि है।
यह दुख ...
फरेब से बचाएगा
होंठो पर हंसी आने तक।

इस तरह विमलेश आस-पास रोज बन रही दुनिया के आदिवासी कवि हैं। गहन आत्मियता एवं दर्द भरे करूणा से भरे हुए, फैज की याद आती है। विमलेश फैज की तरह एक साथ गहन रोमांटिकता और धुर यथार्थवादी, क्रान्तिधर्मिता के कवि हैं। उनकी संवेदना इधर के कवियों से अलग, अछूती, शगुफ्ता एवं मौलिक है।

स्त्री के प्रति उनकी दृष्टि उन्हें विशिष्ट बनाती है। मां  शीर्षक कविता में ममता के चुकने के बाद मां में औरत का प्रकट होना कैट मिलेट के सेक्सुअल पॉलिटिक्स के दर्शन को चार पंक्तियों में उजागर कर देता है। विमलेश की भाषा बेहद सर्जनशील है। आदिम शब्दों की सहजता उनकी ठेंठ नॉस्टेल्जिक दुनिया रचती है।

प्यार का लौटा दिया जाना भी कठिन समय में प्रेम कविता में अद्भुद अर्थगर्भिता लिए हुए है।  पृथ्वी आज सबकुछ लौटा देना चाहती है, स्त्री भी। जंगल-जमीन के अबाध शोषण के बाद का यह सच उनकी रचनात्मकता को तीखे यथार्थ से जोड़ता है।

हां, जहां विमलेश आत्मविश्वास के अभाव में चालू भाषा के भीतर काम करते हैं, कुछ रच नहीं पाते। कवि होने का महिमामंडन ( कविता से लंबी उदासी) उनको खुद से दूर कर देता है। यह कविता का कविता के स्व से दुराव ( Distance from itself) है। विमलेश तब विमलेश नहीं होते( संदर्भः देरिदा), ईश्वर को भी उन्होंने जरूरत से ज्यादा महत्व दिया है। मगर जहां करीमन यादव, बकुली बाबा, ढील हेरती औरतें उनकी दुनिया में आती हैं, वे बहुत बड़े कवि होने लगते हैं। ग्रिक कवयित्री सैफो की तरह उद्दाम जीवन-वासना उनकी इन कविताओं में है।

कहां जाऊं  कविता में उनका यह विश्वास कि पृथ्वी पर पर्याप्त अन्न है पुस्तक के शीर्षक को सार्थकता देता है। पृथ्वी पर उन्न है क्योंकि अन्न की तरह विमलेश जैसे कवि हैं।  





हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Friday, December 23, 2011

समीक्षा-समीक्षा


लोक की जमीन से जुड़ी कविताएं

तारिका सिंह
शोध सहायिका, संस्कृत एवं प्राकृत भाषा विभाग,
लखनऊ विश्वविद्यालय
संपर्कः09451216430
                    धर की समकालीन कविता में कवियों का लोक से जुड़ाव और लोक से उनके रिश्ते में कमी आई है। कविता अनावश्यक रूप से वैश्विक-सी हो गई है जिससे किसी भी कवि की कविता को अलग से पहचान पाना बेहद कठिन हो गया है। कुछ आलोचकों ने इसी एक वजह से कविता के एक ही तरह से लिखे जाने की बात उठाई है। उनका कहना है कि आज की कविताओं में एक रसता या इकहरेपन के आने का मूल कारण उसका लोक से जुड़ाव कम होते जाना है। लेकिन इसी तरह के समकालीन कविता के माहौल में कुछ कवि ऐसे हैं जो अपनी मौलिकता के कारण आलग से पहचाने जा सकते हैं। उनके यहां लोक की अपनी एक समृद्ध जमीन तो है ही साथ ही समकालीन कविता का वह तेवर भी है जो उन्हे विशिष्ट और महत्वपूर्ण बनाता है। ये कवि शिल्प और अंतर्वस्तु दोनों के बीच संतुलन रखते हुए अद्भुद कविताओं से हमारा परिचय करा रहे हैं। विमलेश त्रिपाठी उनमें एक महत्वपूर्ण नाम है और यही कारण है कि आज उनकी कविताओं पर लोगों का ध्यान जा रहा है। गौर तलब है कि कविता के लिए हर वर्ष दिया जाने वाला महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित  सूत्र सम्मान ( 2011) उन्हें दिए जाने की घोषणा हुई है।

                   बहरहाल विमलेश त्रिपाठी का अभी पहला संग्रह ही छपकर आया है और अपनी मौलिकता और तेवर से कविता प्रेमियों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने में सफल होता दिख रहा है।  यह पहला काव्य संग्रह "हम बचे रहेंगे" पूरा यकीन दिला रहा है कि अगर ऐसी कवितायें हैं तो हम ज़रूर बचे रहेंगे | उनकी कविता की भाषा के साथ भावों की सादगी दो टूक है|  एक अविच्छिन्न  प्रवाह निरंतर बांधता है, कविताओं में अपरिचय की गंध नहीं बल्कि  पाठक हर पंक्ति  पर कवि के साथ परिचित होता जाता है  कवि बहुत अपना-सा निश्छल और रिश्तों की ऊष्मा में लबरेज नज़र आता है | कवि पाठक के मन के बेहद करीब होता जाता है और उसकी हिस्सेदारी रिश्तों से शुरू होकर यकीन के कैनवास तक फैली प्रतीत होने लगती है | 
                 कवि की सहजता आश्चर्यचकित करती है, मुझे अनायास ही यह उक्ति स्मरण हो आती है कि,'कविः क्रान्तदर्शिनो भवति ' , कवि भूत, भविष्य वं  वर्तमान की वस्तुओ का भी दर्शन अपने प्रातिभ चक्षु से करने क सामर्थ्य रखता है | यह उक्ति आज के कवि विमलेश पर  सटीक उतरती हैकविता से लम्बी उदासी  कविता में  'जितने समय में मैं लिखता हूँ एक शब्द/ उससे कम समय में मेरा भाई आत्महत्या कर लेता है/ उससे भी कम समय में बहन औरत से धर्मशाला में तब्दील हो जाती है ये सभी वर्तमान  के कडुवे होते जाते सच हैं |  कवि को घर की खोंड में बोये हुए शब्दों की स्मृति कचोटती है और पिता का कवच याद आता है तभी तो कवि को कभी यकीन नहीं होता कि  हमारे ह्रदय में संवेदना का एक भी बीज शेष नहीं रह गया है | कवि की आशावादिता इस संग्रह कि कविताओं में भरी हुई है  वह कहता है कोई  भी समय इतना गर्म नहीं होता कि करोड़ों मुठ्ठियों को एक साथ पिघला दे 
                             “हम बचे रहेंगे संग्रह में छोटी बड़ी कुल मिलाकर  लगभग 55 कवितायें अपने  बिम्बों के माध्यम से नया आस्वाद  लेकर उपस्थित हैं | भोजपुरी क्षेत्र से आने वाले  इस कवि की भाषा में भोजपुरी अंचल के शब्द अपनी ज़मीनी सच्चाई के साथ पाठ की सुगमता को अभिव्यंजित करने में तल्लीन लगते हैं |  रुखर हाथ , अमगछिया के रखवारे ,अनागराहित भाई, बैरन चिट्ठियां , माँ के अलाताये पैर और पिता की बुढ़ारी आँखें  आदि अनेक ऐसे शब्द हैं जो कविता में भावों की महक भरते हैं | इन कविताओं से गुजरते हुए पाठक के हृदय में ज़मीनी एहसास कायम होता है |  साथ ही यह कहना निराधार नहीं हैं कि कवि हर कविता में एक विश्वास जगाने में पूर्णतः सक्षम ठहरता है
                                      बेरोजगार  भाई  के  लिए, जीने  का  उत्सव , गनीमत  है  अनाग्राहित  भाई,  समय हैं    पिता,   स्त्रियाँ , पत्नी, तुम्हारे लिए,  पहली बार,  लौटना,  यकीन, शब्दों के स्थापत्य के पार ,  कहाँ जाऊं ,  लोहा और आदमी , कविता के बाहर, बारिश    आदि अनेक कवितायें कवि  के मन में फैले हुए रिश्तों क़ी संवेदना और ऊष्मा को शब्दों में उतार कर सार्वभौमिकता के वितान पर सजाने में समर्थ हैं |
                    वैसे ही आऊंगा कविता में बार बार जीवन में लौटने क़ी बात को कवि बहुत ही स्पष्टता और धज के साथ कहता है 'रात के चौथे पहर जैसे पंछियों की नींद को चेतना आती है/ वैसे ही आउंगा  नश्वरता के बीच अनश्वरता क़ी आह पैदा करता हुआ कवि अपने समय से बहुत आगे की बात करता हुआ लगता है | शब्दों का बेमानी हो जाना कवि को सालता है , वह कहता है कि नंगे हो रहे हैं शब्द हांफ रहे हैं शब्द और ऐसे समय में वह शब्दों को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है | उसे कवि होने पर शर्म भी आती है पर वहीँ उसे इस बात का गर्व भी है 'ऐसे खतरनाक समय में मैं कवि हूँ' |
                      अलिखित  आंसुओं में डूबता उतराता कवि बेहद मार्मिकता के साथ स्वयं को समय का सबसे कम जादुई कवि मानता है , आडम्बरों से दूर कवि का यह सादगीपूर्ण बयान किसी भी साक्ष्य का मुहताज नहीं है | कवि की  साफगोई देखिये कि प्यार में वह बेहद ईमानदार और भावुक है तभी तो कहता है 
'जब पहली बार मैंने प्यार किया/
तो सोचा इसे सच कर रख दूंगा/
जैसे दादी अपने नैहर वाली बट्लोयी  में
चोरिका संचती थी
जीवन भर निरखुंगा निर्मिमेष
आँखों में मोतिया  के धब्बे के बनने के बाद भी . 

                     कवि के जीवन में स्त्रियाँ बहुत महत्वपूर्ण हैं वे अधिकतर माँ  और पत्नी के रूप में हैं |  स्त्री के प्रति उसकी संवेदनाएं उसे स्त्री मन के बेहद नज़दीक पहुंचती हैं तभी वह कह सकता है 
'तब तक सीख लिया था स्त्रियों ने
किवाड़ों की ओट में
चाय की सुरकी के साथ
बूँद-बूँद नमकीन और गरम आंसू पीना | 

कवि को स्त्री सदियों मनुष्य से अलग एक भिन्न प्रजाति क तरह लगती है कि वह उसे चलती हुई हवा सी नज़र आती है या फिर चूल्हे में लावन की तरह जलती हुई। पत्नी कविता में कवि ने भारतीय स्त्री के एकांत दुख को बहुत बारीकी से रेखांकित किया है कवि  स्त्री को जानने तक ही सीमित नहीं बल्कि सदियों से उस   को महसूस करता हुआ, उसको जीता हुआ लगता है 
                     जीवन का उत्सव कविता में  धुरखेलुआ की राजा रानी की कथा सुनने का बिम्ब पाठक की आँखों में किरकिराहट घोलता है|  कवि को अफसोस है कि मनुष्य के मनुष्य बनने तक यह दुनिया मनुष्यता से खाली हो गयी है मगर फिर भी उसे यकीन है कि 'उठे हुए हाथ का सपना मरा नहीं है
                   अंततः यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि हम बचे रहेंगे कवि का पहला संग्रह होते हुए भी प्रौढ़ता का अहसास दिलाता हुआ संग्रह है जैसा कि केदारनाथ सिंह ने फ्लैप में रेखांकित भी किया है। यह संग्रह जरूर सुधि पाठकों तक पहुंचने में सफल होगा तथा समकालीन कविता में एक महत्वपूर्ण संग्रह के रूप में याद किया जाएगा।
                                  ----------------------------------------------------------
हम बचे रहेंगे विमलेश त्रिपाठी {कविता संग्रह}
'नयी किताब',  
एफ-3/78-79, सेक्टर-16, रोहिणी, दिल्ली - 110089.
दूरभाष ः 011-27891526
इ-मेल ः nayeekitab@gmail.com
मूल्य- 200 रू.




हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Wednesday, December 14, 2011

समीक्षा-समीक्षा


उम्मीद की कविता
  -आर.सी. पांडेय

हम बचे रहेंगे – विमलेश त्रिपाठी {कविता संग्रह}
'नयी किताब',
एफ-3/78-79, सेक्टर-16, रोहिणीदिल्ली - 110089.
दूरभाष ः 011-27891526
इ-मेल ः nayeekitab@gmail.com
ISBN 978-81-908197-5-6
'हम बचे रहेंगे युवा कवि विमलेश त्रिपाठी का पहला काव्य संग्रह है। उनकी कविता उदासी को तोड़ती हुइ उम्मीद की कविता है। महानगरी चमक-दमक के बरक्स ठेठ स्थानीयता का रंग विमलेश की कविता की विशेषता है। विमलेश की गिनती उन कवियों में नहीं की जा सकती जिन्हें ग्रामीण जीवन में उत्सव-ही-उत्सव नजर आता है। उनकी कविता में 'अहा ग्राम जीवन भी क्या है का विस्मृत सम्मोहन नहीं है बलिक ''कर्इ उदास दिनों के  फांके क्षणों के बाद  बासन की खड़खड़ाहट में 'अन्न की सोंधी भाप मिलेंगी। उनके यहाँ ''एक किसान पिता की भूखी आँत है  बहन की सूनी मांग है  छोटे भार्इ की कम्पनी से छूट गर्इ नौकरी है  राख की ढेर से कुछ गरमी उधेड़ती माँ की सूजी हुई आँखें हैं। इतना ही नहीं कवि जहाँ बैठकर कविता लिख रहा है 'वहां तक अन्न की सुरीधी गन्ध नहीं पहुँचती। ऐसे में आप किसी कवि से कैसे माँग कर सकते हैं कि कविता में उदासी की जगह हर्ष-उल्लास प्रकट होना चाहिए। इसके लिए चाहे उसे कलात्मक चमत्कार या जादुई यथार्थ को शिल्प में ढालना ही क्यों न पड़े। ऐसे लोगों से कवि कहता है
''क्या करूँ कि कविता से लम्बी है समय की उदासी 
और मैं हूँ समय का सबसे कम जादुई कवि 
क्या आप मुझे क्षमा कर सकेंगें?


'हम बचे रहेंगे काव्य संग्रह की पहली कविता 'वैसे ही आऊँगा को कवि का आत्मकथ्य माना जा सकता है। जिसमें कवि के नए भावबोध के प्रति सजगता और आत्मविश्वास ध्वनित होता है। कवि कहता है
''...पत्नी के झुराए होठों से छनकर 
हर सुबह  जीवन में जीवन आता है पुन: जैसे 
कई उदास दिनों के फाँके क्षणों के बाद 
बासन की खड़खड़ाहट के साथ 
जैसे अँतड़ी की घाटियों में 
अन्न की सोंधी भाप आती है।
कुछ ऐसे ही ताजगी एवं लहक के साथ विमलेश समकालीन कविता के परिदृश्य पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।


भारत में अमीरी-गरीबी की खाई तो हमेशा से रही है लेकिन नई आर्थिक नीति लागू होने से यह खाई दिन दूनी रात-चौगुनी बढ़ी है। उदारीकरण के पैराकारों की यह दलीलें अब व्यर्थ हो चुकी हैं कि भारत विकास कर रहा है। जबकि भारत विकास नहीं, वृद्धि कर रहा है। विकास तो बराबर होता है और वृद्धि एकतरफा। भारत में विकास के नाम पर एक तबका विकास कर रहा है तो दूसरा विकास के इन्तजार में खड़ा है। कवि विमलेश इसे अच्छी तरह देख रहे हैं-
''कुछ अधेड़ औरतें इन्तजार करते-करते 
भूल चुकी थीं इन्तजार का अर्थ 
... कुछ अपेक्षाकृत जवान औरतें 
इन्तजार करने के बाद बौखला रही थीं।

इसलिए भारत की आर्थिक विकास दर की बात करना उन करोड़ों लोगों के साथ एक छल है जिनके जीवन का लक्ष्य दो जून की रोटी तक सिमट कर रह गया है। ऐसे में 'यह समय की सबसे बड़ी उदासी नहीं तो और क्या है। लेकिन इस उदासी, नीरवता एवं निराशा के बीच भी कवि उम्मीद की तलाश करता है। यही एक कवि की सफलता और सार्थकता है। 'बेरोजगार भाई के लिए कविता में कवि कहता है ''उदास मत हो मेरे भाई 
तुम्हारी उदासी मेरी कविता की पराजय है 
मेरे फटे झोले में बचे हैं
आज भी कुछ शब्द 
जो इस निर्मम समय में 
तुम्हारे हाथ थामने को तैयार है
 ... बस मैं तुम्हें दे रहा हूँ एक शब्द 
एक आखिरी उम्मीद की तरह।
और यह उम्मीद कवि को जन-जीवन से गहरे जुड़ाव में मिलती है। विमलेश की कविता में 'एक उठे हाथ का सपना  मरा नहीं है  जिन्दा है आदमी  अब भी थोड़ा सा चिडि़यों के मन में। इसलिए कवि को पुख्ता 'यकीन है कि ''बस ये दो कारण  काफी हैं  परिवर्तन की कविता के लिए।


विमलेश त्रिपाठी की कविता में अक्सर खेतिहर किसान एवम मजदूर जीवन का बिम्ब देखने को मिल जाएगा। 'सपना कविता में वे कहते हैं
''गाँव से चिटठी आयी है 
और सपने में गिरवी पड़े खेतों की 
फिरौती लौटा रहा हूँ 
पथराए कन्धे पर हल लादे पिता 
खेतों की तरफ जा रहे हैं 
और मेरे सपने में बैलों के गले की घंटियाँ 
घुंघरू की तान की तरह लयबद्ध बज रही हैं।


यह किसानी-जीवन की सबसे जीवंत दृश्य है और यह सपना उन लाखों-करोड़ों किसान-बेटों का सपना है जो अपने घर की माली हालत ठीक करने के लिए शहरों में कमाने आते हैं और रह-रहके घर-गाँव की तस्वीरें याद आती रहती हैं। बाजारवाद उपभोक्तावाद ने आज के समय और समाज को निहायत क्रूर, अमानवीय तथा असंवेदनशील बना दिया है। विमलेश इन आतताइ शक्तियों को चुनौती भी देते हैं
''कोई भी समय इतना गर्म नहीं होता  
कि करोड़ों मुट्ठियों को एक साथ पिघला सके 
न कोई अकेली भयावह आँधी,
जिसमें बह जाए सभी 
और न सही कोई 
एक मुटठी तो बची ही रहती है।


विमलेश की कविता में चुनौती के साथ-साथ विकल्प का भी सृजन करती है। 'ऐसे भयावह समय में  जब उम्मीदें तक 'बाजार के हाथ गिरवी पड़ी हो तो 'पूरब से एक सूरज उगेगा और 'दुधिया हँसी धरती के इस छोर से उस छोर तक फैलने की कामना भी करते हैं। एक मायने में यह प्राच्यवादी षडयंत्र का विरोध भी है।
            लोकतंत्र के चौथे खम्भे मीडिया द्वारा किसानों के दुख-दर्द और उनसे सम्बन्धित सूचनाओं के प्रति किस प्रकार बेखबर रहता है। इसे 'खबर कविता में देखा जा सकता है। 'राजघाट पर घूमते हुए गांधीवाद पर लिखी गई युवा कवि की महत्वपूर्ण राजनीतिक कविता है। किसानों के जीवन में बारिस का क्या महत्व होता है इसे थोड़ा-बहुत भी गाँवों से लगाव रखने वाले जानते होंगे। 'बारिस कविता में जब आकाश में काली घटाओं के घिरने के बावजूद 'सूखे खेतों में सिर्फ 'धूल उड़ती रह जाती हो तो ''बाबा उस दिन एक रोटी कम खाते थे। विमलेश के यहां प्रेम परक कविताओं की भी प्रचुरता है जहाँ 'प्रेम एक पूरा ब्रह्माण्ड है।


लाख नाउम्मीदों, उदासियों, निराशाओं तथा ''सब कुछ के रीत जाने के बाद भी  माँ की आंखों में इन्तजार का दर्शन  पिता के मन में एक घर बना लेने का विश्वास बना रहेगा और इतना ही नहीं कवि को विश्वास है कि ''....हम बचे रहेंगे एक दूसरे के आसमान में  आसमानी सतरंगों की तरह। यही विश्वास और भरोसा हमारे समय और समाज तथा एक कवि की भी ताकत है।


विमलेश त्रिपाठी अपने कवि-कर्म के प्रति सजग दिखाई दे रहे हैं। वे कविता में ठेठ देशी बिम्बों का प्रयोग बड़ी सघनता के साथ करते हैं जो उष्मा एवं ताजगी प्रदान करती है। जब समकालीन कविता के फलक से देशी बिम्ब और स्थानीय भाषा लगभग गायब होने के कगार पर हो ऐसे में विमलेश एक बड़े अभाव की पूर्ति करते हुए जान पड़ते हैं। उनकी कविता से गुजरते हुए लगेगा जैसे आप गांव के खेतों-खलिहानों, बगीचों, चारागाहों की यात्रा कर रहे हैं जहां आपको 'दवनी करते बकुली बाबा मिलेंगे, 'गेहूँ की लहलहाती बाली, 'खलिहान में रबी की लाटें दिखलाई पड़ेगी, 'घास चराती बकरियों से बतियाती बंगटी बुढि़या, ढील हेरती औरतें तथा 'खईनी मलते चइता की तान में मगन दुलार चन काका मिलेंगे। विमलेश की अधिकतर कविताओं में 'माँ, 'पिता, पत्नी तथा भाई का बिम्ब किसी न किसी रूप में मौजूद है। वे इस विस्मृति के दौर में स्मृति तथा पारिवारिक जीवन के पक्षधर कवि हैं। जहां से उन्हें उर्जा मिलती है।


विमलेश जब 'सोंधी, 'पपड़ाया, 'गन्ध, 'पिपराया, किचड़ी आंखें तथा 'उदासी जैसे शब्दों का एक से अधिक कविताओं में प्रयोग करते हैं तो वहां एकरसता पैदा होने का खतरा बढ़ जाता है। आशा है विमलेश इस प्रवृत्ति से बचेंगें और 'इस निर्मम समय में अपने 'हृदय के सच को बचाए रखते हुए अपनी चेतना को 'खेतों की लम्बी पगडंडियों से जोड़े रखेंगे और कविता में यह उम्मीद भी ''...जिसकी बदौलत  पृथ्वी के साबुत बचे रहने की सम्भावना बनती है।      
                                                                     *********
                                                                                        
आर.सी.पाण्डेय
एम.ए., एम.फिल( दिल्ली विश्वविद्यालय)
युवा लेखक-समीक्षक
दिल्ली में रहनवारी






















हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Friday, December 2, 2011

संदीप प्रसाद की कविताएं

संदीप प्रसाद की कविताएं अनहद पर हम पहले भी प्रस्तुत कर चुके हैं। संदीप इस बार अपनी कुछ ताजा-तरीन कविताओं के साथ हमारे बीच फिर से उपस्थित हैं।  इन कविताओं में एक अलग तरह की कहन और मुहावरे को साफ समझा जा सकता है। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि कोलकता के संदीप प्रसाद और संजय राय ( अब ये दोनों नौकरी की खातीर जलपाईगुड़ी में रह रहे हैं) में कविता की असीम संभावनाएं हैं। संजय की कविताएं आप पढ़ चुके हैं, संदीप की ये कविताएं कैसी हैं, यह निर्णय आपके हाथों में हैं। आपकी बेबाक प्रतिक्रिया का इंतजार है..।

 इंतजार-1

कल रात अँधेरे में

संदीप प्रसाद
आदर्श विद्यामंदिर हाई स्कूल (एच.एस.),
बानरहाटजलपाईगुड़ी
मो.- 9333545942/ 9126002808
बरगद के पास वाली                          
ढह रही दीवाल पर बड़ी देर तक
बैठी रही बिल्ली
और आती रही बड़ी देर तक
उसकी अजीब सी आवाज़.....

उसकी आँखे चमकती रही
ठीक वैसे ही जैसे रोज रात को
चमकते हैं मेरे दीवाल घड़ी के अक्षर;

बड़ी देर तक बैठी रही बिल्ली
पर बड़ी देर तक खड़ी रही उसकी पूंछ-
क्या कुछ होने वाला है?

मालूम नहीं क्यों
आज सुबह से
हवा बड़ी तेज है मगर फिर भी
तडफड़ा रहा है- पूरा का पूरा माहौल
पत्ते हिल रहे हैं मगर कोई
शब्द नहीं है
लोग चीख रहे हैं मगर आवाज़ नहीं है

हाँ ज़रूर कुछ होने वाला है क्योंकि
आज की शाम
आकाश की आँखें लाल हैं
मेघों के बीच खुसफुसाहट  है
पक्षियों के पंखो में अजीब सी तड़प है

मैंने सुना दो गिलाहरियों को आपस में
फुसफुसाते हुए कि
चाणक्य का दिया हुआ मौर्य खड्ग
और खेत से आये हुए फावड़ा, खुरपी और हँसिया
एक ही झोपड़ी में सुस्ता रहे हैं

साथिओं !
तैयार रहो !...

इंतज़ार-2

इतना वक्त नहीं जो
बतिया सकूँ उस सपने पर जिसमें
खुशियाँ बराबर-बराबर हों सबकी अँजुली में।

सरकारी बसों के चक्कों से बचते-बचते
डायरी के पन्नों के बीच
कतरा भर वक्त
कि जिसमें कंस्ट्रक्शन लेबरों के घाम से
तर--तर बनियानों की महक हो,
बहुत मुश्किल है
दरख्वाश्तों के बीच एक ऐसा पन्ना खोजना
जिसमें कविता लिखे जाने की गुंजाइश
के लिए जगह हो।

सपनों को तकिये से दबाकर
वक्त है
फुटपाथ पर भुट्टा भुनती बुढ़िया
के कच्चे चूल्हे को
पक्की गुमती दिलाने का।
कम से कम इतनी देर तो
कविता भी इंतज़ार कर ही लेगी !

   वह और वे

तंग कर एक दिन उन्होंने
काट दी उसकी टाँग
वह खूब छटपटाया
फिर उसने सीख लिया जीना
टाँग के बगैर
मगर बंद नहीं हुई उसकी चीख।

वे फिर आए और
काट दिये उसके हाथ
वह खूब कलपा,
लेकिन फिर सिरजा ली अपने भीतर
हाथ के बगैर जीने की चाहत-
मगर बंद नहीं हुई उसकी चीख।

वे आए फिर एक बार
और काट दी उसकी ज़ुबान
वह खूब बलबलाया,
बढ़ती रही उसकी बेज़ुबान जिंदगी-
मगर बंद नहीं हुई उसकी चीख,
बेज़ुबान गलफड़ चीख

उन्होंने तय किया फिर एक बार
कि अबकी वे काट जाएंगे
उसका गला

   चूहे

चूहे अब चूहे नहीं रहें ;
वे बढ़ा रहे हैं अपनी देश की सरहद
जो भी था सुरक्षित और अछूता
वहाँ छेड़ दी है मुहिम
देश काल से परे
एक शाश्वत घुसपैठ की

वे घुसते रहे हैं
हमारे खेतों और अन्न भण्डारों में
और हमें कर दिया मजबूर
उनकी जूठन पर पालने को अपनी भूख

चूहे घुस रहे हैं अस्पताल में
और कुतर रहे हैं दवावों के खोल,
डाल रहे हैं उनमें ज़हर
और फैला रहे हैं अपनी गिरफ़्त
हमारी तंदरुस्ती और जिंदादिली पर

चूहे घुस रहे हैं
हमारे माध्यमों और सूचनाओं में
कर रहें हैं कतरब्योंत हमारी जानकारियों पर
ऐसा ही रहा तो
वे जगह-जगह लगा देंगे सेंध
हमारे इतिहास में
और उसमें घुस कर वे
दौड़-दौड़ खेलेंगे-
सदी के इस पार से उस पार तक।

मुझे डर है कि कहीं चूहे
हमारे विचारों में घुस जाएं
और कुतर दें हमारे सपने।


तुम्हारे संदर्भ में

तड़प’-
एक भूली पंक्ति को
याद करते हुए
खाने के निवाले का ग्रास

परिचय’-
कड़ियों पर लाद कर अपना बोझ
साइकिल के पिछले चक्के को खीचना और
अगले चक्के का डुगरना, यूँ-ही

चाहत’-
भरभूज की कड़ाही में पक रहे
मकई के दाने
और अनवरत लघु प्रस्फुटन
और फिर अनवरत प्रवर्तन
धवल-गुच्छल-सरल

नाराजगी’-
जेठ की दोपहर में
नींबू का शरबत पीते हुए
मड़ई में सुस्ताते खेतिहर के
मुख से निकली चुस्की

प्रेम’-
इमामबाड़े की मीनार पर चढ़ देखना
हुगली के ओसारे में उगे
गणित-रहित ताड़-गाछों के
पुलिनों की चादर

तुम’-
मेरे होने का मतलब




हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad