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Monday, January 23, 2012

चर्चित कवि अशोक कुमार पाण्डेय के जन्मदिन पर उनकी एक कविता







    • महत्वपूर्ण कवि-कथाकार अशोक कुमार पाण्डेय का आज जन्मदिन है। उन्हें जन्मदिन की ढेर सारी बधाइयां-शुभकामनाएं... इस अवसर पर अनहद पर उनकी एक कविता पढ़ते हैं.....


      रोने की जगह मुस्करा रही थी वह लड़की....

      वह मुस्कराती थी
      बस मुस्कराए जाती थी लगातार
      और उसके होठ मेरी उँगलियों की तरह लगते थे
      उसके पास बहुत सीमित शब्द थे जिन्हें वह बहुत संभाल कर खर्च करती थी
      हम दोनों के बीच एक काउंटर था जो हम दोनों से अधिक ख़ूबसूरत था
      वह बार-बार उन शब्दों को अलग-अलग क्रमों में दोहरा रही थी
      जिनसे ठीक विपरीत थी उसकी मुसकराहट
      उस वक़्त मैं भी मुस्कुराना चाहता था लेकिन उसकी मुस्कराहट का आतंक तारी था मुझ पर.

      कोई था उसकी मुसकराहट की आड में
      हम दोनों ने नहीं देखा था उसे
      वह पक्ष में थी जिसके और मैं विपक्ष में
      एक पुराने बिल और वारंटी कार्ड के हथियार से मैं हमला करना चाहता था
      और उसकी मुसकराहट कह रही थी कि बेहद कमजोर हैं तुम्हारे हथियार
      मेरे हथियारों की कमजोरी में उस अदृश्य आदमी की ताकत छुपी हुई थी

      कहीं नहीं था वह आदमी उस पूरे दृश्य में
      हम ठीक से उसका नाम भी नहीं जानते थे
      हम जिसे जानते थे वह नहीं था वह आदमी
      पता नहीं उसके दो हाथ और दो पैर थे भी या नहीं
      पता नहीं उसका कोई नाम था भी या नहीं
      जो चिपका था उस दफ्तर के हर कोने में वह नाम नहीं हो सकता था किसी इंसान का

      वह जो कहीं नहीं था और हर कहीं था
      मुझे उससे पूछने थे कितने सारे सवाल
      मैं मोहल्ले के दुकानदार की तरह उस पर गला फाड़ कर चिल्लाना चाहता था
      मैं चाहता था उसके मुंह पर दे मारूं उसका सामान और कहूँ ‘पैसे वापस कर मेरे’
      मैं चाहता था वह झुके थोड़ा मेरे रिश्तों के लिहाज में
      फिर भले न वापस करे पैसे पर थोड़ा शर्मिन्दा होने का नाटक करे
      एक चाय ही मंगा ले कम शक्कर की
      हाल ही पूछ ले पिता जी का
      दो चार गालियाँ ही दे ले आढत वाले को...

      लेकिन वहाँ उस काउंटर पर बस एक ठन्डे पानी का गिलास था
      और उससे भी ठंढी उस लड़की की मुसकराहट
      जिससे खीझा चाहे जितना जाए रीझा नहीं जा सकता बिलकुल भी
      जिससे लड़ते हुए कुछ नहीं हासिल किया जा सकता सिवा थोड़ी और उदास मुसकराहट के
      मुझे हर क्षण लगता था कि बस अब रो देगी वह
      लेकिन हर अगले जवाब के बाद और चौडी हो जाती उसकी मुसकराहट

      क्या कोई जादू था उस काउंटर के पीछे कि बार-बार पैरों की टेक बदलती भी मुस्करा लेती थी वह
      या फिर जादू उस नाम में जो किसी इंसान का हो ही नहीं सकता था
      कि धोखा खाने के बावजूद जग रही थी मुझमें मुस्कराने की अदम्य इच्छा
      क्या जादू था उस माहौल में कि चीखने की जगह सोच रहा था मैं
      और रोने की जगह मुस्करा रही थी वह लड़की....

      क्या ऐसे ही मुस्कराती होगी वह जब देर से लौटने पर डांटते होंगे पिता?
      प्रेमी की प्रतीक्षा में क्या ऐसे ही बदलती होगी पैरों की टेक?
      क्या ऐसे ही बरतती होगी नपे-तुले शब्द दोस्तों के बीच भी?
      क्या वह कभी नहीं लडी होगी मोहल्ले के दुकानदार से?

      मान लीजिए मिल जाए किसी दिन किसी भीडभाड वाली बस में
      या कि किसी शादी-ब्याह में बाराती हूँ मैं और वह दिख जाय घराती की तरह
      या फिर किसी चाट की दूकान पर भकोसते हुए गोलगप्पे टकरा जाएँ नज़रें...
      तब?
      तब भी मुस्कराएगी क्या वह इसी तरह?

  • 8 minutes ago
    Ashok Kumar Pandey


हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Friday, January 20, 2012

मिथिलेश कुमार राय की कविताएं


मिथिलेश कुमार राय

मिथिलेश कुमार राय की कविताएं इधर कई पत्रिकाओं में छपकर आई हैं। उनकी कविताओं में एक तरह की सहजता है जिसे कस्बाई और महानगरीय जीवन बोध ने लीलना शुरू कर दिया है। उनकी कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता वह सहजता ही है जो हमें एक ऐसी सभ्यता और भाषा की याद दिलाती है, जहां इस देश की सबसे बड़ी आबादी रहती है। विकास के सारे साधन उस आबादी तक पहुंचते-पहुंचते खत्म हो जाते हैं। मिथिलेश की कविताएं मुझे इसलिए भी अच्छी लगीं कि वे अपनी जमीन को पहचानते हैं, और उस जमीन से उनकी कविताएं गहरे जुड़ी हुई हैं। अपने रचाव और कहन दोनों में सधी हुई ये कविताएं एक महत्वपूर्ण कवि के कदमों की आहट की तरह हैं। 


मिथिलेश की कविताएं हम यहां पहली बार पढ़ रहे हैं।
आपके बहुमूल्य प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा।




सपनों की बातें

एक व्यकित जिसे सेब खाने के बाद नींद आई थी
उसने सपने में हवाई जहाज देखा
जिसमें इत्मीनान से बैठा हुआ वह
बादल के टुकडे को निहार रहा था
सवेरे वह जगा तो उसके चेहरे पर तेज था
होंठों पर मुसकुराहट थी

उसी नगर में उसी रात एक दूसरा आदमी
जिसे मच्छर अपना कर्ण समझता था
और जिसकी भूख
प्याज रोटी से नहीं मिटी थी तो उसने
भूख को दो लोटे पानी के नीचे दबा दिया था
उसकी बीवी चूडियां तोड रही थी उसके सपने में
उसके बच्चे कूडे के ढेर पर बांसुरी बजा रहे थे
और सवेरे जब उसके पास कोई भी नहीं था
उसने अपने आप से कहा
कि अब तो सपने भी मरने के ही आते हैं

इस बात की कोई प्रमाणिक जानकारी
उपलब्ध नहीं कर पाया है कोई
कि उस रात
उस नगर का राजा क्या खाकर सोया था
कि सपने में उसे आतिशबाजी करते हुए
लोग दिख रहे थे
जो नाच रहे थे
गा रहे थे
और बडे प्यार से एक दूसरे के मुंह में
मिठाइयां डाल रहे थे
और जब सवेरे उसने यह बात दरबार में बताई
तो नवरत्नों ने इतिहास देखकर बताया
कि लोग
अब से पहले इतने खुश कभी नहीं थे

सउदी अरब अमीरात

मन तो हमरा भी करता है कि यहीं रहूं
यहीं करूं मजूरी
काम मिले तो दाल-रोटी खाउं
न मिले तो पेट बांध सो जाउं

मगर अब हम कहां रहे अकेले
मैयो-बाउ हैं
आंगनवाली है
दुई गो बिटवा
तीन गो बिटिया हुई गवा है
अब तुम्हीं बताओ कि हम कैसे उतारें
अपने बाउ होने का करज
कैसे पूरा करें बाउ होने का फरज
और कैसे निभाये घरवाला होने का धरम

पंजाब गया
गाली सुना
तो वहां से भाग आया दिल्ली
यहां मैयो बीमार पड गई
बाउ को सर्दी लग गई
और आंगनवाली ने फोन पर कहा
कि पेट में रह-रह के मरोड उठता है

दौडता आया वहां से
दसटकिया ब्याज पर उठाया करजा
सबका कराया इलाज
अभी भी सिर पर है
साढे सात हजार
जो सुरसा की तरह बढता ही जा रहा है

उस दिन मिला था एक ठेकेदार
जो भेज रहा था हमारे जैसे लोगों को सउदी अरब अमीरात
कहा कि तुम भी जा सकते हो
बस कुछ पैसे का इंतजाम कर लो
चाहो तो मैं भी दे सकता हूं ब्याज पर
वहां पांच साल में इतना कमा लोगे
कि यहां बैठकर खाओगे सात पुश्त
तब भी खतम नहीं होगा


तो भैया
मैं तो चला
कागज बनाने को कह दिया है
जरा देखूं वहां जा कर भी
क्या पता
शायद वहीं मिल जाये
अपनी फूटी किसमत के टुकडे
              
जिनको पता नहीं होता

ललटुनमा के बाउ
ललटुनमा की मार्इ
आ खुददे ललटुनमा
तीनों जने की कमार्इ
एक अकेले गिरहथ की कमार्इ के
पासंग के बराबर भी नहीं ठहरता

आखिर क्यों
यह एक सवाल
ललटुनमा के दिमाग में
जाने कब से तैर रहा था
कि बाउ
आखिर क्यों

क्योंकि बिटवा
उनके पास अपनी जमीन है
और हम
उनकी जमीन में खटते हैं

और हमारी जमीन बाउ

बाउ को तो खुददे पता नहीं है
अपनी जमीन के इतिहास के बारे में
और आप तो जानते हैं
कि जिनको पता नहीं होता
उससे गर सवाल किये जाये तो
वे चुप्पी साध लेते हैं
 
हम ही हैं

हम ही तोडते हैं सांप के विष दंत
हम ही लडते हैं सांढ से
खदेडते हैं उसे खेत से बाहर

सूर्य के साथ साथ हम ही चलते हैं
खेत को अगोरते हुये
निहारते हैं चांद को रात भर हम ही
हम ही बैल के साथ पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं
नंगे पैर चलते हैं हम ही अंगारों पर
हम ही रस्सी पर नाचते हैं

देवताओं को पानी पिलाते हैं हम ही
हम ही खिलाते हैं उन्हें पुष्प, अक्षत
चंदन हम ही लगाते हैं उनके ललाट पर

हम कौन हैं कि करते रहते हैं
सबकुछ सबके लिये
और मारे जाते हैं
विजेता चाहे जो बना हो
लेकिन लडाई में जिन सिरों को काटा गया तरबूजे की तरह
वे हमारे ही सिर हैं

मालिक

मालिक यह कभी नहीं पूछता
कि कहो भैया क्या हाल है
तुम कहां रहते हो
क्या खाते हो
क्या घर भेजते हो
अपने परिजनों से दूर
इतने दिनों तक कैसे रह जाते हो

मालिक हमेशा यही पूछता है
कि कितना काम हुआ
और अब तक
इतना काम ही क्यों हुआ



हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad