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Friday, January 20, 2012

मिथिलेश कुमार राय की कविताएं


मिथिलेश कुमार राय

मिथिलेश कुमार राय की कविताएं इधर कई पत्रिकाओं में छपकर आई हैं। उनकी कविताओं में एक तरह की सहजता है जिसे कस्बाई और महानगरीय जीवन बोध ने लीलना शुरू कर दिया है। उनकी कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता वह सहजता ही है जो हमें एक ऐसी सभ्यता और भाषा की याद दिलाती है, जहां इस देश की सबसे बड़ी आबादी रहती है। विकास के सारे साधन उस आबादी तक पहुंचते-पहुंचते खत्म हो जाते हैं। मिथिलेश की कविताएं मुझे इसलिए भी अच्छी लगीं कि वे अपनी जमीन को पहचानते हैं, और उस जमीन से उनकी कविताएं गहरे जुड़ी हुई हैं। अपने रचाव और कहन दोनों में सधी हुई ये कविताएं एक महत्वपूर्ण कवि के कदमों की आहट की तरह हैं। 


मिथिलेश की कविताएं हम यहां पहली बार पढ़ रहे हैं।
आपके बहुमूल्य प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा।




सपनों की बातें

एक व्यकित जिसे सेब खाने के बाद नींद आई थी
उसने सपने में हवाई जहाज देखा
जिसमें इत्मीनान से बैठा हुआ वह
बादल के टुकडे को निहार रहा था
सवेरे वह जगा तो उसके चेहरे पर तेज था
होंठों पर मुसकुराहट थी

उसी नगर में उसी रात एक दूसरा आदमी
जिसे मच्छर अपना कर्ण समझता था
और जिसकी भूख
प्याज रोटी से नहीं मिटी थी तो उसने
भूख को दो लोटे पानी के नीचे दबा दिया था
उसकी बीवी चूडियां तोड रही थी उसके सपने में
उसके बच्चे कूडे के ढेर पर बांसुरी बजा रहे थे
और सवेरे जब उसके पास कोई भी नहीं था
उसने अपने आप से कहा
कि अब तो सपने भी मरने के ही आते हैं

इस बात की कोई प्रमाणिक जानकारी
उपलब्ध नहीं कर पाया है कोई
कि उस रात
उस नगर का राजा क्या खाकर सोया था
कि सपने में उसे आतिशबाजी करते हुए
लोग दिख रहे थे
जो नाच रहे थे
गा रहे थे
और बडे प्यार से एक दूसरे के मुंह में
मिठाइयां डाल रहे थे
और जब सवेरे उसने यह बात दरबार में बताई
तो नवरत्नों ने इतिहास देखकर बताया
कि लोग
अब से पहले इतने खुश कभी नहीं थे

सउदी अरब अमीरात

मन तो हमरा भी करता है कि यहीं रहूं
यहीं करूं मजूरी
काम मिले तो दाल-रोटी खाउं
न मिले तो पेट बांध सो जाउं

मगर अब हम कहां रहे अकेले
मैयो-बाउ हैं
आंगनवाली है
दुई गो बिटवा
तीन गो बिटिया हुई गवा है
अब तुम्हीं बताओ कि हम कैसे उतारें
अपने बाउ होने का करज
कैसे पूरा करें बाउ होने का फरज
और कैसे निभाये घरवाला होने का धरम

पंजाब गया
गाली सुना
तो वहां से भाग आया दिल्ली
यहां मैयो बीमार पड गई
बाउ को सर्दी लग गई
और आंगनवाली ने फोन पर कहा
कि पेट में रह-रह के मरोड उठता है

दौडता आया वहां से
दसटकिया ब्याज पर उठाया करजा
सबका कराया इलाज
अभी भी सिर पर है
साढे सात हजार
जो सुरसा की तरह बढता ही जा रहा है

उस दिन मिला था एक ठेकेदार
जो भेज रहा था हमारे जैसे लोगों को सउदी अरब अमीरात
कहा कि तुम भी जा सकते हो
बस कुछ पैसे का इंतजाम कर लो
चाहो तो मैं भी दे सकता हूं ब्याज पर
वहां पांच साल में इतना कमा लोगे
कि यहां बैठकर खाओगे सात पुश्त
तब भी खतम नहीं होगा


तो भैया
मैं तो चला
कागज बनाने को कह दिया है
जरा देखूं वहां जा कर भी
क्या पता
शायद वहीं मिल जाये
अपनी फूटी किसमत के टुकडे
              
जिनको पता नहीं होता

ललटुनमा के बाउ
ललटुनमा की मार्इ
आ खुददे ललटुनमा
तीनों जने की कमार्इ
एक अकेले गिरहथ की कमार्इ के
पासंग के बराबर भी नहीं ठहरता

आखिर क्यों
यह एक सवाल
ललटुनमा के दिमाग में
जाने कब से तैर रहा था
कि बाउ
आखिर क्यों

क्योंकि बिटवा
उनके पास अपनी जमीन है
और हम
उनकी जमीन में खटते हैं

और हमारी जमीन बाउ

बाउ को तो खुददे पता नहीं है
अपनी जमीन के इतिहास के बारे में
और आप तो जानते हैं
कि जिनको पता नहीं होता
उससे गर सवाल किये जाये तो
वे चुप्पी साध लेते हैं
 
हम ही हैं

हम ही तोडते हैं सांप के विष दंत
हम ही लडते हैं सांढ से
खदेडते हैं उसे खेत से बाहर

सूर्य के साथ साथ हम ही चलते हैं
खेत को अगोरते हुये
निहारते हैं चांद को रात भर हम ही
हम ही बैल के साथ पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं
नंगे पैर चलते हैं हम ही अंगारों पर
हम ही रस्सी पर नाचते हैं

देवताओं को पानी पिलाते हैं हम ही
हम ही खिलाते हैं उन्हें पुष्प, अक्षत
चंदन हम ही लगाते हैं उनके ललाट पर

हम कौन हैं कि करते रहते हैं
सबकुछ सबके लिये
और मारे जाते हैं
विजेता चाहे जो बना हो
लेकिन लडाई में जिन सिरों को काटा गया तरबूजे की तरह
वे हमारे ही सिर हैं

मालिक

मालिक यह कभी नहीं पूछता
कि कहो भैया क्या हाल है
तुम कहां रहते हो
क्या खाते हो
क्या घर भेजते हो
अपने परिजनों से दूर
इतने दिनों तक कैसे रह जाते हो

मालिक हमेशा यही पूछता है
कि कितना काम हुआ
और अब तक
इतना काम ही क्यों हुआ



हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

7 comments:

  1. well managed blog and well versed poems..badhaaii!

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  2. मुझे इन कविताओं से उम्मीद जग रही है...इन्हें और पढ़ना चाहूंगा. हाँ विमलेश का आभार इस नए कवि से परिचय कराने के लिए

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  3. maalik kabhee nahi poochtaa......ye kavitaa itnee laajwaab hai ki hamaare vartmaan samay ko poori tarah abhivyakt kr detee hai...baki kavitayein bhi dhaardaar hain.....badhaaai....

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  4. मिथिलेश जी आपने जो लिखा है, वह समाज की लावारिश ,... इसलिये कि उसकी सुध लेने वाला कोइ नही है हम सभी केवल अपने मे मगन है,.(.सिर्फ़ ,इश्वर को छोड कर) ,.... लोगो के फ़टेहाल हालात , गाँव की गरीबी ,मज़दूरी ,बेरोजगारी ,भूखमरी जैसे अन्तहीन कुन्ठित ,सम्वेदनाओ को शब्द देना कोइ सहज काम नही है ,यह केवल वही कर सकता है जिसने इसे नजदीक से महसुस किया हो और जिसके पास करुणा ,शब्दकोष, का भंडार हो ।आपने एक विलक्षण कार्य को कवि्ता मे अंकित किया है, कथ्य, अभिव्यक्ति,,प्रवाह ,समप्रेषण, प्रभावशाली है ।आप बधाइ के पात्र है ,इसी तरह और भी लिखते रहे ऎसी कामना है । धन्यवाद ।

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  5. mithilesh g ki kavitayen hamesha ki tarah sidhe dil me utar rahi hain aur ankhon k samane ek chitra bana rahi hain...badhai!

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  6. अपने भतीजे की कविताएँ पढकर मजा आ गया और लगा कि वो इधर काफी बड़ा हो गया है..........क्यों ठीक है ना अभि.तुम्हारा चाचू...............
    संदीप नाईक, देवास से

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  7. मिथिलेश को बधाई, क्योंकि वे त जिंदगी की उन सहज-सी लगने वाली बातों को बड़े सहज रूप से बयाँ करते हैं, जो असल में जिंदगी को सहज रहने नहीं देतीं। "...विजेता चाहे जो बना हो/लेकिन लडाई में जिन सिरों को काटा गया तरबूजे की तरह/वे हमारे ही सिर हैं"- ये पंक्तियाँ सच में हमारे सिरों को झिंझोरती हैं। इस स्वार्थ-पगे दुनिया की दुनियाँदारी की संवेदनाहीन लुटेरी मानसिकता को उभारती ये पंक्तियाँ भी जबरदस्त हैं-"...मालिक हमेशा यही पूछता है/कि कितना काम हुआ/और अब तक/इतना काम ही क्यों हुआ"
    मिथिलेश को एक बार फिर से बधाई!

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