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Saturday, May 19, 2012

नील कमल की कविताएं




 
नील कमल - 09433123379
युवा कवि नील कमल लगभग दो दशकों से कविता लेखन में सक्रिय हैं। कविता लेखन के अलावा उन्होंने कवि और कविता पर भी बहुत कुछ लिखा है, जो किसी भी लिहाज से कम महत्वपूर्ण नहीं है। नीलकमल की कविताओं में एक संजीदा कवि की परिपक्वता तो दिखती ही है, शब्दों की मितव्ययिता और भाषा के प्रति सिरियस अप्रोच भी दृष्टिगत होता है। कहने की जरूरत नहीं कि जिन लोगों ने भी उनका काव्य संग्रह हाथ सुंदर लगते हैं पढ़ी हैं, वे उनकी कविताओं के कायल हुए हैं। नील कमल एक अच्छे कवि के साथ ही अच्छे मित्र और अच्छे इंसान भी हैं। बांग्ला भाषा बंगालियों की तरह बोलते हैं और ढेरों बांग्ला कविताओं का हिन्दी में अनुवाद किया है। फिलहाल वे पश्चिम बंग सरकार के एक प्रशासनिक पद पर कार्यरत हैं। अनहद पर हम एक लंबे अंतराल के बाद उनकी कविताएं पढ़ रहे हैं। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार तो रहेगा ही....।
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जलकुम्भी के फूल

चैत के चढ़ते दिनों में
चिलचिलाती धूप में
ये खिलखिलाते फूल

पोखर के सतह पर
तैरते पुलकित मुदित
ये देव शिशु

पूजा घरों से बहिष्कृत
प्रेमी जनों से तिरस्कृत
लेकिन उठाए माथ
दीन अनाथ

ये नीलाभ-वर्णी आग की लपटें
पानी के महल में !

पार्थेनियम सिर्फ़ एक घास
का नाम नहीं है..

दुर्वा-दल , बेल-पत्र ,
आम्र-पल्लव , आदि-आदि
जबकि एक प्रायोजित समय में
निष्प्रयोजन सिद्ध हो चुके थे
पोखर पर झुके आम ने
नीम की गिरती हुई परछाईं से
धीमे-धीमे कहा अपना दुख

इस धीमे-धीमे कहे गए दुख में
एक घास का ठण्डा आतंक था
जिसमें देर तक कांपती रही
उजाड़ बगीचे से अनुपस्थित
गूलर की अत्मा

जामुन की एक डाल टूट कर
जा गिरी विकराल एक कुंए
के भीतर , और हाहाकार का मौन
पसर गया पूरे सिवान की छाती पर !

कितनी खतरनाक हो सकती है
एक मासूम सी दिखती घास
पता है आपको ?
अपने खिलते हुए समय में
बिलकुल सफ़ेदपोश
दुबली-पतली घास
चुपचाप दाखिल होती है
हरे-भरे खेतों की मेंड पर
जैसे हड्डियों में उतरता है ज्वर
जैसे रक्त में उतरता है कर्कट
और उखड़ने लगती हैं ग्रामदेवता की सांसें

इन्हें सूंघने की गलती कभी न करना
इनके छोटे क़द पर भी न जाना भूले से
तुम्हारे मवेशियों के चारा के लिए भी
नहीं काम की यह घास

वनस्पति-शास्त्री बताते हैं
संयुक्त-राष्ट्र से उड़ कर
किसी आंधी के साथ आए थे
इसके पराग कण
वाशिंगटन डी सी तक फ़ैली हैं इसकी जड़ें
पार्थेनियम , सिर्फ़ एक घास का नाम नहीं है ।


इस नए भूखण्ड में..

जहाँ कंधों पर उग आया करते थे पंख
और उड़ा जा सकता था इस छोर से उस छोर
बेखटके-बेरोकटोक
जहाँ कुँआ बावड़ी पोखर बाग-बगीचे और
खेत खलिहान मापे जा सकते थे तीन पग में
वह भूखण्ड मेरा था....मेरा था

जिसके सिरहाने विराजते गोइँड़ के खेत
विचरते चरवाहे और हरवाहे
जिसकी कमर से सट कर बहती एक नहर
बत्तखों की क्वाक-क्वाक से मुखरित गुंजार
छप छपाक करते श्याम वर्णी खटिक शिशु
वह भूखण्ड मेरा था....मेरा था

जहाँ खेतों में निराई गोड़ाई करते तज़ुर्बेकार किसान
और मेंड़ों पर खुरपी से घास को गुदगुदाते घसकरे
जहाँ सूर्यास्त में रँभाती गौओं के साथ ऊँघते सिवान
वह भूखण्ड मेरा था....मेरा था

उस भूखण्ड में एक बीज गाड़ आया था मैं
जब चला था आखिरी बार वहाँ से ,
आदमी बनने एक दूसरे भूखण्ड में
यहाँ हवा में उड़ते पुल थे
पाताल में दौड़ती रेलें थीं
गाड़ियाँ थीं, हवाई जहाज थे

यहाँ झड़ गए मेरे कंधों पर उग आये पंख
बहुत मँहगी पड़ी उड़ान एक भूखण्ड से दूसरे तक
कि ८/१० फ़ुट की एक कोठरी का किराया चुकाना
हुआ कुछ उस तरह
कि किसान का बेटा बना सरकार का नौकर
आदमी बन कर बहुत पछताया मन
इस नए भूखण्ड में ।


यूं उनकी आंख में हम ..
 
कसकते हैं जिगर में
टीस बन कर दिल में रहते हैं
यूं उनकी आंख में हम
किरकिरी बन करके रहते हैं ।

कि जैसे नर्मो नाज़ुक
पांव के नीचे कोई पत्थर
हम उनकी राह में चुभते
हुए मंज़र से रहते हैं ।

वो होंगे और जो
कानों में जाकर फुसफुसाते हैं
हम अपनी बात डंका
पीट कर महफ़िल में कहते हैं ।

कि ऊंची है बड़ी परवाज
सुनते थे परिन्दों की
तभी से ज़िन्दगी में हम
समन्दर बनके रहते हैं ।

ये कैसे रिंद जो
झुकते ही जाते हैं इबादत में
ख़ुदा ये कौन सा बन्दे
जिसे जेबों में रखते हैं ।


खेतों में जो उगती हैं
हरे रंग की चिट्ठियाँ..

जितनी हमारे घर में हो उतनी तुम्हारे घर |
अब रोशनी का इक जहाँ आबाद चाहिए   ||

बारिश में   टूट कर   न बिखर जायें   घरौंदे  |
इतनी      हमारे गाँव में     बरसात चाहिए  ||

ऊधो की न लेनी हो न माधो की हो देनी |
अपनी बही में   ऐसा कुछ    हिसाब चाहिए  ||

यमुना से   जहाँ आके गले मिलती है गंगा |
अपने     दिलों में    वह    इलाहाबाद चाहिए  ||

खेतों में जो उगती हैं हरे रंग की चिट्ठियाँ |
उनपर   किसी  किसान का भी   नाम चाहिए   ||

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हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Tuesday, May 15, 2012

अग्निशेखर की कविताएं

 
अग्निशेखर के अब तक चार संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। विस्थापन का दर्द उनकी कविता में तो है ही, साथ ही उनकी कविताएं अपने आस-पास की चीजों से भी बनती हैं। इस कवि के शब्दों में सहजता के साथ इमानदारी भी है जो उसे एक महत्वपूर्ण कवि के रूप में हमारे सामने उपस्थित करती है। अग्निशेखर लगभग दो दशक से लेखन में सक्रिय हैं और हिन्दी कविता को उन्होंने महत्वपूर्ण रूप से समृद्ध किया है। आज हम अनहद पर उनकी कुछ कविताओं के साथ उपस्थित है...। आशा है आपकी बेबाक प्रतिक्रियाएं हमें पहले की तरह ही मिलेंगी....

अग्निशेखर

कश्मीर मे जन्म ,1955
पर्वतारोहण,यायावरी तथा लोकवार्ता मे दिलचस्पी .कश्मीरी कहावतों,मुहावरों, कसमों, गालियों पर लेख चर्चित। हिंदी की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं मे कविताएँ, लेख,  कहानियां प्रकाशित।
चार कविता -संग्रह ' किसी भी समय', 'मुझ से छीन ली गयी मेरी नदी ',काल -वृक्ष की छाया मे', 'जवाहर टनल तथा 'मिथक नंदिकेश्वर '(अध्ययन ), 'दोज़ख' (सम्पादित कहानियां) प्रकाशित।
हिंदी लेखक पुरस्कार ,गिरिजा कुमार माथुर स्मृति पुरस्कार, सूत्र -सम्मान से सम्मानित(जवाहर टनल पर)
वर्ष 2010 का जम्मू -कश्मीर अकादमी का इक्यावन हज़ार रुपये की राशि का पुरस्कार मुख्य-मंत्री के हाथों लेने से लेखकीय प्रतिरोध के रूप मे अस्वीकार किया। रचनाएँ कई भारतीय भाषाओँ मे अनूदित।
'पहल-' 36 और'वसुधा-74' के कश्मीर केन्द्रित अंकों का संपादन।
सन 1990 से मातृभूमि कश्मीर से निर्वासित'
संपर्क: .e-mail :agnishekharinexile@gmail.com  मोबाइल : 09419100035
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हंसूंगा
 

मेरी मृत्यु पर रखोगे दो मिनट का मौन
हंसूंगा मैं

कहोगे भरा था भावों से, जड़ों से
भविष्य के सपनों से,
अपनों से
हंसूंगा मैं

कहोगे प्रेमी था, कवि था, निडर था
महान था
हंसूंगा मैं

क्या वक्ता था, लड़ता था,
पिटता था,
हँसता और हँसाता था
हंसूंगा मैं

क्या पति था ,पिता था,भाई था,
बेटा था ,दोस्त था
योगी था
भोगी था
लम्पट था ,
हंसूंगा मैं

पूछो मत हंसूंगा क्यों इन बातों पर
हंसूंगा मैं

(
जवाहर -टनल से )



मेरी खाल से बने दस्ताने

दस्तानो मे छिपे हैं
हत्यारों के हाथ
एक दिवंगत आदमी कह रहा है
हर किसी के सामने जाकर

ये दस्ताने
मेरी खाल से बने हुए हैं

खुश हैं हत्यारे
कि सभ्य लोग नहीं करते हैं
आत्माओं पर विश्वास

क्या आप ऐसी कोई जगह जानते हैं

हम लौटते हैं स्मृतियों मे
और कभी स्मृतियों की स्मृतियों मे
और क्या बचा है हमारे समय मे
कोई विचार ..
कोई शब्द..
कोई अक्षर .
कोई कवि..
कहाँ जाया जाये

क्या आप कोई ऐसी जगह जानते हैं
जहां पहुँचता हो
कोई रास्ता
कोई गली
कोई पगडण्डी
फिलहाल हम लौटते हैं स्मृतियों मे
इसे आप कह सकते हैं
मेरा प्रतिरोध
या विरोध उनका
जो लूट रहे हैं
या लुटने दे रहे हैं
हमारी स्मृतियाँ
हमारा दिक् और काल
हमारा होना
घर का एक एक कोना
गनीमत है
जब तक हैं बची हुई स्मृतियाँ
हम हैं...

श्वेतवराह

(एक)

उफनते समुद्र में तुम
छिपने को आतुर स्वयं में
कभी हिचकोले
कभी लहर सी लौट आती वापस

क्षुब्ध इतनी तुम
समय से
दिक् से अपने
या कि युगों से ..

मैं ले आया
तुम्हे तुम्हारे मायामय अतल से
बाहर
अज्ञात विस्मय के इस पहर में
ओ पृथ्वी मेरी
बरसों से बंद देवालय की
सीढ़ियों पर
की खुल गए कपाट गर्भ-गृह के
गूढ़ से गूढ़तर पहेली जैसे

फिर भी अनमनी तुम
विश्वास और संशय के बीच
खड़ी अकेली
वंहा दिखी सीढ़ियों पर
बैठी एक बूढी स्त्री जैसे अनंतकाल से
तुम्हे दिए उसने
पूजा के फूल
मुझे वत्सल मुस्कान

मैंने तुम्हारे अभिभूत नेत्रों से
देखा खुद को
अपने श्वेतवराह मन को
फिर तुम को ..

(
दो)
ओ श्वेतवराह, मेरे मन
मै विषमय अंधेरों को फाड़ते
खींच लाया
अपने उज्जास में
पृथ्वी प्रियतमा को

नहीं भूलता
सिमटना बांहों में
रूप, रस, शब्द ,गंध का
बदलना तुम्हारा
बल खाती हुई सी लहरों मे
उतरना अदभुत कविता श्रृंखला का
जैसे कागज़ पर

ओ श्वेतवराह ,मेरे मन !
तुम्ही जानते हो
आकाश के पालने मे
यह चन्द्रमा
हमने जना है ..



बूढों पर कुछ कवितायेँ

(१)
दूर दूर हैं बच्चे
सूने घरों मे यदा कदा
बजाते हैं फोन
जैसे बूढों की खांसी
किसी वृद्ध -आश्रम मे ..

(
२)
बच्चे फ़ोन पर रोज़
पूछते हाल चाल
टलती आशंकाएं
बूढ़े जिंदा हैं फिलहाल...

(
३)
बरामदे पर धूप मे
ऊंघ रहे हैं बूढ़े
फर्श पर पड़ी हुई
जैसे पुरानी चिट्ठियां ...

वर्षा

छलनी छलनी मेरे आकाश के ऊपर से
बह रही है
स्मृतियों की नदी

ओ मातृभूमि !
क्या इस समय हो रही है
मेरे गाँव में वर्षा



हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Thursday, May 10, 2012

विजय सिंह की कविताएं


विजय सिंह

विजय सिंह की कुछ कविताएं हम अनहद पर पहले भी पढ़ चुके हैं। उनकी कविता में आपको नवान्न की महक मिलेगी। सबसे खास बात यह कि विजय में नया कुछ करने-कहने की छटपटाहट को आप साफ-साफ महसूस कर सकते हैं। यह छटपटाहट ही कवि के लिए एक नए जगत तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त करेगी, ऐसा विश्वास है। यहां प्रस्तुत इस युवतर कवि की कविताएं पढ़कर उसके भविष्य के प्रति आश्वस्त हुआ जा सकता है।
आपकी बेबाक प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा।



तुम्हारी याद में

तुम्हारी याद में
आसमान
अब भी जग रहा है

जग रहे हैं
आसमान के साथ पेड़
पेड़ की पतियाँ हरेपन के साथ
और चीटियाँ तुम्हारी यादों की
गठरी लिये
ढूंढ़ रही हैं अपना वाल्मीक

पता नही क्यों
उनके लिये सबसे महत्वपूर्ण हो गया है
तुम्हारी याद को बचाए रखना
किसी कहानी की तरह
जैसे समंदर का पानी बचाकर रखता है
नमक को
और बचा रह जाता है दुनिया में
स्वाद का हिस्सा

वैसे ही चीटियाँ बचाएंगी
तुम्हारी कहानी
ज़र्द पड़ी उम्मीदों के खिलाफ !

भागती हुई लडकियां

भागती हुई लडकियां
नदी की तरह नहीं होती
वह होती है
एक पुराने पड़ गए साल की तरह
जो दीवार  से उतरकर दिमाग में
टंग जाता है
एक किस्से की तरह

और लडकियां
क़स्बे के बेस्वाद खाने में
चटनी की तरह

सच कहता हूँ
भागती हुई लडकियां
नदी की तरह नहीं होती
न ही रेलगाड़ी की तरह
न सूरज-चाँद की तरह


अगर कुछ होना जरूरी ही हो
तो हो सकती हैं
भागती हुई लडकियां
नदी के इक रास्ते की तरह
रेलगाड़ी की पटरी की तरह
आजादी के लिये देखे गए
पहले स्वप्न की तरह

भागती हुई लडकियां
अब भी भाग रही हैं
और
नए साल में भी भागेंगी
खूब भागेंगी
कहीं वह पानी की तरह
किसी को भिगोते हुए भागेंगी
तो कहीं हवा की तरह


लेकिन यह तय है
लडकियां जब भी भागेंगी

धरती की एक नयी आजादी के लिये
भागेंगी !!!!

बल्कि इसलिए

जब सच
समंदर के पानी-सा ठहर जाए
तब सबसे जरूरी होता है
गलत को गलत कह देना

इस दुनियादारी में
उम्मीद को जिन्दा रखने का अर्थ
अपनी गलतियों को आदिम भाव से
स्वीकार कर लेना
कविता में इन बातों को देना पनाह
कि तलाश किसी संजीवनी की

ज्यादा कुछ नहीं
बल्कि इसलिए
कि बना रहे धरती का आसमान से संवाद
और जीवन जीने की कवायद में
बची रहे नीव की तरफ लौटने की
स्मृति !!!!

एक कविता कामरेडों के लिये


कागज पर ही सही
मै एक रास्ता बनाता हूँ
अपनी ही भूख से लड़कर
प्रतिरोध को रास्ता बनाता हूँ

तुम ठीक कहते हो कामरेड
विकल्प था मेरे पास
कि इस मुफलिसी की दुनिया में
मै भूखा ना रहूँ

लेकिन मै क्या बताउं
कि भूखा रहकर मैं
एक भूखे इंसान का
नक्शा बनाता हूँ

ताकि बचा रहे दमन के दिनों में
लड़ने का सबसे आसान रास्ता...


 मनुहार

अँधेरे कमरे में
उदास पन्नो के सामने
सुख चुकी नदी से आए
कुछ बेनाम शब्दों के बीच
घुटनों के बल बैठा था
तुम्हारे नाम का
गुलदस्ता लिये....


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संपर्कः विजय सिंह
पता-माही-मांडवी छात्रावास ,
भारतीय भाषा केंद्र
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय
फ़ोन-09968434475



हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad