Search This Blog

Thursday, May 10, 2012

विजय सिंह की कविताएं


विजय सिंह

विजय सिंह की कुछ कविताएं हम अनहद पर पहले भी पढ़ चुके हैं। उनकी कविता में आपको नवान्न की महक मिलेगी। सबसे खास बात यह कि विजय में नया कुछ करने-कहने की छटपटाहट को आप साफ-साफ महसूस कर सकते हैं। यह छटपटाहट ही कवि के लिए एक नए जगत तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त करेगी, ऐसा विश्वास है। यहां प्रस्तुत इस युवतर कवि की कविताएं पढ़कर उसके भविष्य के प्रति आश्वस्त हुआ जा सकता है।
आपकी बेबाक प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा।



तुम्हारी याद में

तुम्हारी याद में
आसमान
अब भी जग रहा है

जग रहे हैं
आसमान के साथ पेड़
पेड़ की पतियाँ हरेपन के साथ
और चीटियाँ तुम्हारी यादों की
गठरी लिये
ढूंढ़ रही हैं अपना वाल्मीक

पता नही क्यों
उनके लिये सबसे महत्वपूर्ण हो गया है
तुम्हारी याद को बचाए रखना
किसी कहानी की तरह
जैसे समंदर का पानी बचाकर रखता है
नमक को
और बचा रह जाता है दुनिया में
स्वाद का हिस्सा

वैसे ही चीटियाँ बचाएंगी
तुम्हारी कहानी
ज़र्द पड़ी उम्मीदों के खिलाफ !

भागती हुई लडकियां

भागती हुई लडकियां
नदी की तरह नहीं होती
वह होती है
एक पुराने पड़ गए साल की तरह
जो दीवार  से उतरकर दिमाग में
टंग जाता है
एक किस्से की तरह

और लडकियां
क़स्बे के बेस्वाद खाने में
चटनी की तरह

सच कहता हूँ
भागती हुई लडकियां
नदी की तरह नहीं होती
न ही रेलगाड़ी की तरह
न सूरज-चाँद की तरह


अगर कुछ होना जरूरी ही हो
तो हो सकती हैं
भागती हुई लडकियां
नदी के इक रास्ते की तरह
रेलगाड़ी की पटरी की तरह
आजादी के लिये देखे गए
पहले स्वप्न की तरह

भागती हुई लडकियां
अब भी भाग रही हैं
और
नए साल में भी भागेंगी
खूब भागेंगी
कहीं वह पानी की तरह
किसी को भिगोते हुए भागेंगी
तो कहीं हवा की तरह


लेकिन यह तय है
लडकियां जब भी भागेंगी

धरती की एक नयी आजादी के लिये
भागेंगी !!!!

बल्कि इसलिए

जब सच
समंदर के पानी-सा ठहर जाए
तब सबसे जरूरी होता है
गलत को गलत कह देना

इस दुनियादारी में
उम्मीद को जिन्दा रखने का अर्थ
अपनी गलतियों को आदिम भाव से
स्वीकार कर लेना
कविता में इन बातों को देना पनाह
कि तलाश किसी संजीवनी की

ज्यादा कुछ नहीं
बल्कि इसलिए
कि बना रहे धरती का आसमान से संवाद
और जीवन जीने की कवायद में
बची रहे नीव की तरफ लौटने की
स्मृति !!!!

एक कविता कामरेडों के लिये


कागज पर ही सही
मै एक रास्ता बनाता हूँ
अपनी ही भूख से लड़कर
प्रतिरोध को रास्ता बनाता हूँ

तुम ठीक कहते हो कामरेड
विकल्प था मेरे पास
कि इस मुफलिसी की दुनिया में
मै भूखा ना रहूँ

लेकिन मै क्या बताउं
कि भूखा रहकर मैं
एक भूखे इंसान का
नक्शा बनाता हूँ

ताकि बचा रहे दमन के दिनों में
लड़ने का सबसे आसान रास्ता...


 मनुहार

अँधेरे कमरे में
उदास पन्नो के सामने
सुख चुकी नदी से आए
कुछ बेनाम शब्दों के बीच
घुटनों के बल बैठा था
तुम्हारे नाम का
गुलदस्ता लिये....


----------------------------------------------------------------------------------- 
संपर्कः विजय सिंह
पता-माही-मांडवी छात्रावास ,
भारतीय भाषा केंद्र
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय
फ़ोन-09968434475



हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

4 comments:

  1. ताकि बचा रहे दमन के दिनों में
    लड़ने का सबसे आसान रास्ता

    सभी कविताओं में एक ताजगी है....पर इसमें विमलेश त्रिपाठी की कविताओं की महक भी शामिल है .... बधाई !

    ReplyDelete
  2. विजय के लिए जब विमलेश जी ने कहा कि इनकी कविताओं में आपको नवान्न की महक मिलेगी तो बिल्कुल सही कहा....बहुत ताजगी लिए मासूम इच्छाओं, अवरोधों और प्रतिरोधों को कवि ने बिना किसी अतिरिक्त बौद्धिकता के रख दिया है.....कविताओं की लय और प्रवाह तो देखने लायक है......सचमुच कवि के उज्ज्वल भविष्य के प्रति आशान्वित होना चाहिए......बधाई विजय.....

    ReplyDelete
  3. सच में विजय सिंह की कविताओं में बहुत ताजगी है। वे बहुत उम्‍मीद जगाने वाले कवि हैं। बधाई विजय, शुभकामनाएं।

    ReplyDelete
  4. keep it up, vijay ji maja aa gaya. aage bhi naye andaje byaan ko aur aur aur aur sun na chahungi. really wonderful.

    ReplyDelete