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Saturday, July 28, 2012

शैलजा पाठक की कविताएं


शैलजा पाठक
शैलजा की कविताएं फेसबुक पर लागातार पढ़ने को मिल रही हैं, और अपने अलग अंदाज और कहन के अलहदेपन से लोगों को बहुत प्रभावित भी कर रही हैं। इनकी कविताओं में एक तरह की मौलिकता है जो इन्हें भीड़ से अलग करती है। यह विशेषता ही उनके उपर पाठकों के ध्यानकर्षण का मुख्य कारण है।
शैलजा की कविताओं में आस-पास की चीजें अचल न होकर चहलकदमी-सी करती दिखती हैं। कोई भी शब्द ऐसा नहीं जो सजीव और बोलता-चालता हुआ न हो। साथ ही इनकी कविता में संवेदना की एक जादुई गहराई है।
कविता का काम निर्जीव चीजों में भी सांस फूंकना होता है, और शैलजा के यहां यह बात बखूबी देखने को मिलती है।
हां, यह भी जरूर कहना चाहिए कि इनकी कविता में एक तरह की 'इनोसेंसी' है जो अच्छी लगती है। जैसे कोई बच्चा प्यार से मुस्कुराता हुआ लगता है या कोई इंसान छल-छद्म से रहित आपसे बात करता है कुछ देर, और उसके चले जाने के बाद उसकी मासूम हंसी आपके हृदय के किसी कोने में ठहर जाती है।
शैलजा की कविताएं पाठ के बाद भी बची रहती हैं, और यह कविता की एक अप्रतिम विशेषता है।
आज शैलजा का जन्म दिन भी है। उनके जन्मदिन पर अनहद की ओर से ढेर सारी बधाइयां-शुभकामनाएं। आशा है शैलजा यूं ही अच्छी कविताएं लिखती रहेंगी। आइए, अनहद पर पढ़ते हैं उनकी कविताएं... आपकी प्रतिक्रियाओं का तो इंतजार रहेगा ही....।

तुम्हारी याद का रंग हरा है

अपने अतीत के
उस बंजर जमीन से
जब भी बतियाता हूं
मैं बेखुदी में ..

कुछ हरा हरा
आँखों में उतरने
लगता है

ओह ..ये तुम थी
जरा सी देर को
बिलकुल मनमौजी
अपने होने को सहज
जताती ..जैसे
पेड जताता है
अपनी छाँव को

मेरी खंडहर सी
वीरान जिंदगी में
तुम हों सावन सी बसी

आज भी मेरी
आँखों के डोरों पर
तेज पेंग मारती
धरा के इस उस पार तक
मैं बस मध्य में खड़ा
तुम्हारे झूले को
गति देता

तुम्हारी खिलखिलाहट
मेरे समूचे शरीर पर
अबीर मल जाती है

और मैं वर्तमान की
सुनी डालियों पे
अतीत के उस
मखमली हरे को
सहलाता रहता हूं .....


तुम्हारी याद

तुम्हारी यादों की
रौशनी में
अँधेरे पर्वतों
पर चिपके
तमाम
ख्वाबों के
बरफ चमक रहें हैं

पिघलने लगा
है इंतजार

नदियाँ
बेसब्र हों रहीं है ....


तुम

मैंने जब भी तुम्हें जैसा
कहा तुम वैसी हों गई

जब मैंने बादल कहा तुम छा गई
मेरे तनमन पर

जब कहा कविता हों तुम
तुम वो मिसरी सी मिठास
रख जाती होठों पे

जब कहा बयार हों
सरसराती सी मुझे सहला जाती

कितने रंग थे तुम्हारे प्यार में

एक दिन मैंने तुम्हें औरत कहा
तुम घर की सारी जिम्मेवारियां
अपने कमर में खोंस
खो गई ..और तमाम
लोगों की भीड़ का
हिस्सा हों गई .........


पीले रंग वाली तितली

बचपन में एक तितली पकड़ी थी
चटक पीले रंग वाली
उड़ ना जाये के डर से
मसल सा दिया हथेलियों में

मेरी हथेलियों में एक
रेशमी रंग है आज भी

बस उभरती है
उदास आखें कभी
कभी फडफडाती है
वो पीले रंग वाली तितली
और मैं अपने उस
बिसरे अतीत की
अनजानी गलती पर
सुबकती हूं ...सहलाती हूं
अपनी हथेलियाँ
जो अब पिली पड
गई हैं ......


है चाँद बड़ा सहमा सहमा

कल रात की टहनी
भींगी थी
फिसला था चाँद अचानक से
गीली दरिया के लहरों पर
वो तैर रहा था
घंटो तक

वो चाँद कभी
जलता बुझता कभी डूब
डूब कर बचता सा
अंधियारे की
कम्बल ओढे
पेड़ों की टहनी से उलझा
कभी बचा बचा
कभी लुटा लुटा
किरणों की घुटी घुटी
चीखें ..टकराती वहीं किनारों से

फिर आवारा बादल आये
दरिया से चाँद को बचाने
जैस तैसे उस सुबह ने
उसको घर तक पहुचाया था

है चाँद बड़ा सहमा सहमा


संबंध
खोने और पाने के
खेल में
तुम पा लेना मुझे
और मैं तुम्हें
खोने का नाटक
करुँगी ........

बांसुरी की तान

बांसुरी की तान
नही ले जाती मुझे
राधा के गांव
कदम्ब की छाँव
कान्हां के बाहों में

बासुरी की आवाज
आती है मेरे घर
के सामने वाले
रास्ते से हर रोज
जब वो तीस साल का
बुढा सा दिखने वाला
आदमी
अपने जीवन की
सबसे कीमती सांस
फूकता है और
बजाता है एक गीत

हम बने तुम बने एक दूजे के लिए ...

कितने समय वो
बांसुरी बजाता घुमता
गली गली

घर लौटने पर
उन सारी बांसुरी को
बारी बारी से फूंकता
उसका छह साल का
नौजवान बेटा
एक धुन निकालने
की तैयारी में थक जाता

खांसी से बेहाल पिता के सीने पर
सर धरे सो जाता और
सपने में इकट्ठा करता
तमाम पांच रूपये
जिनसे उसने खूब धुनें
बेचीं थी

सुबह होते ही पिता
फिर उसी क्रम में
शुरू करता अपना दिन

बासुरी की नाँव को
अपनी सांसों के
नदी में डुबो देता
और उबरने के
रास्ते पर चल पडता .........

फिर वही गीत ...हम बने तुम बने .........Top of Form
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हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

7 comments:

  1. itani achchhi kavitayen ek saath,ek jagah uplabddh karane ke liye ANHAD ko badhayee!Shailaja ji,janma-din ki bahut-bahut badhayiyan!

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  2. आपकी कवितायें इधर सबका ध्यान खींच रही हैं ...यहाँ अनहद पर छपी कवितायें भी अच्छी हैं ..बधाई आपको

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  3. जन्‍मदिन पर इतनी सुंदर कविताओं के साथ आना बहुत सई शैलजा जी को... वे निरंतर अच्‍छा लिख रही हैं, मेरी शुभकामनाएं।

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  4. शैलजा जी की कवितायें लगातार फेस्बूक से ही पढ़ने को मिलती है ऊर्जा है इनमे पर थोड़ी जल्दबाज़ी भी ।त्वरा है और व्ही इनको जीवंत बनाएगी पर इनकी कविताओं के केंद्र मे प्रेम है , यादें हैं ,एक विशेष तुम है भाषा एकदम सरल है जो विशेष आकर्षित करती है।बानगी और कहन मे साफ़गोई अच्छी लगती है।थोड़ी ठहरकर और गंभीरता के साथ ये रचना संसार मे सक्रियता बनाती रहेंगी इसकी उम्मीद पाठकों को है संवाद करने का अंदाज कविता मे बहुत कोमलता लेकर आता है।शैलजा जी को शुभकामनायें .....

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