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Monday, September 24, 2012

संतोष अलेक्स की कविताएं

संतोष अलेक्स

संतोष अलेक्‍स की हिंदी कविताएं यत्र-तत्र पत्रिकाओं में छपती रहती हैं। उनका कविताओं के क्षेत्र में किया गया अनुवाद का काम उल्लेखनीय है। यहां प्रस्तुत कविताएं अपने तरह की बिल्कुल अलग कविताएं हैं। नाश्ता पर ये कविताएं संभवतः हिन्दी साहित्य में अपनी तरह की अकेली कविताएं हैं। अनहद पर प्रस्तुत है इस बार संतोष अलेक्स की कविताएं। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा।




नाश्‍ता -  कुछ  कविताएं

1.     अखबार

यह भोर को
नींद से न उठे शहर के उपर
चादर सा आ गिरता है
नसों को कसती खबरें
करती है परेशान
खो जाती है उर्जा सारी
मोडकर रख देता हूँ तो
मंदिर के तालाब में
सपनों को चुंबन कर लेटी
पड़ोस की लड़की की आंखें
घूरती है मुझे
मैं चुप रहता हूँ
यह मौनयात्रा है
सड़े हुए कल की

2.  स्‍नान

शावर के नीचे खडे होकर
स्‍नान करने पर
रात का पसीना , मैल बू
साफ हो जाता है
माथे पर पानी गिरते ही
उड जाती है चिडिया थकावट की
हल्‍का हो जाता है मन
स्‍वच्‍छ हो जाता है तन
स्‍नान माने
एक देह को त्‍याग कर
दूसरे को प्राप्‍त करना है


3.  नाश्‍ता

सुना कि नाश्‍ते में
राजाओं सा खाना चाहिए
दोपहर को मंत्री सा
रात को भिखारी सा
हमारे चौकीदार का नाश्‍ता
रात का चावल और अचार
से बनता है
सामने के फ्लैट के
थामस अंकल की मेज पर
टोस्‍ट ,अंडा और दूध होता है
नाश्‍ते में

बगल के फ्लैट की शोभा आंटी
हफ्ते में तीन बार उपवास रखती हैं
वह नाश्‍ते के वक्‍त लौटती हैं
पूजा पाठ कर
आटो की आवाज सुन
चटनी में डुबोए आधी इडली को
मुंह में रखती हुई
पत्‍नी निकल जाती है
बच्‍चों के संग
डाईनिंग टेबुल पर सब कुछ है
कमी है तो परिवार के सदस्‍यों की
पूरा होता है नाश्‍ता जिनसे



संतोष अलेक्स


जन्मः 1971 को केरल के तिरूवल्ला में । 'केंदारनाथ सिंह एवं के सच्चिदानंदन की कविताओं में मानववाद - एक तुलनात्मक अध्ययन' विषय पर वी आई टी यूनिवर्सिटी से पी एच डी ।

मलयालम और हिंदी में कविता लिखते हैं एवं तीन भाषाओं में परस्पर अनुवाद करते हैं । मलयालम में दूरम (2008) नामक काव्य संग्रह प्रकाशित। इनकी कविताओं का अंग्रेजी हिंदी तेलुगू एवं उडिया भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हुए हैं। हडसन व्यू एवं सनराईस फ्राम द ब्लू थंडर - अंर्तराष्ट्रीय अंग्रेजी काव्य संकलनों में कविताएं प्रकाशित। 18 सालों से मलयालम, हिंदी एवं अंग्रेजी में साहित्य का परस्पर अनुवाद कर भारतीय भाषाओं एवं संस्कृतियों के बीच सेतू का काम कर रहें हैं। अनुवाद की 10 किताबें प्रकाशित हैं जिसमें सच्चिदानंदन की कविता -शुरूआतें,  पुनत्तिल कुंजअब्दुल्ला का उपन्यास - अलीगढ का कैदी,   ए. अयप्पन की कविता - खामोश मुहूर्त में,  जयंत महापात्र की कविता - कविता के पक्ष में नहीं का हिंदी अनुवाद एवं एकांत श्रीवास्तव की का अंग्रेजी अनुवाद महत्वपूर्ण हैं।
     
देश की चर्चित अंग्रेजी हिंदी एवं मलयालम पत्र पत्रिकओं में इनके अनुवाद एवं कविताएं प्रकाशित हैं । 2009 में भारतीय अनुवाद परिषद का द्विवागीश पुरस्कार (राष्ट्रीय अनुवाद पुरस्कार) से सम्मानित।
     
संप्रतिः विशाखपटणम में मात्स्यिकी विभाग में हिंदी अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं

Dr Santosh Alex
Technical Officer ( Hindi )
CIFT
Pandurangapuram
Andhra University P.O.
Visakhapatnam -530003



हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Tuesday, September 11, 2012

अमित आनंद की कविताएं

अमित आनंद

अमित आनंद का परिचय इसलिए भी देना जरूरी है क्योंकि वे पहली बार किसी ब्लॉग पर अपनी कविताओं के साथ उपस्थित हैं। उनकी कविताएं पढ़ते हुए हम एक ऐसी दुनिया में जाते हैं, जो आज के शोर भरे समय में हमारी आंखों से ओझल है। 
उनकी कविताओं में एक तरह की पीड़ा और एक तरह का शोक है जिसे हम आज के समय की पीड़ा और शोक कह सकते हैं। बावजूद इसके इनकी कविताएं उम्मीद की लौ की तरह हैं जो एक कवि और कविता दोनों के लिए आश्वस्ति की बात है।

अमित की कविताओं पर आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।



उम्मीद

नुक्कड़ की
उजाड़ सी टंकी के नीचे
भूरी कुतिया ने
आज जने हैं -
नन्हे नन्हे से गोल मटोल
छै पिल्लै

कोई चितकबरा कोई झक्क सफ़ेद
एक भूरा
कुछ काले से

"भूरी"
बेहतर जानती है
बेरहम सडकों का दर्द

कई सालों से
वो खोती आई है
यूँ ही
मासूम नन्ही जानें
सड़क के किनारे

कभी ट्रक /कभी बस
साइकिल /रिक्सा
कभी कभी तो किसी नसेड़ी की लात,

हर बार
"भूरी" की ममता सड़क पर मसल उठती है,

पर
"भूरी" हर बार की तरह
पालती है-
एक भरम
और
टूटी हुयी टंकी के नीचे
पसर जाती है -
अपनी ममता
और
छै मासूम पिल्लों के साथ!

इस बार शायद दो से ज्यादा बच जाएँ!


मेरा आखिरी मंचन करो

तुम्हारा -रंगमंच
तुम्हारे पात्र
तुम्हारा कथानक
तुम्हारी ध्वनियाँ
प्रकाश तुम्हारा,

तुम्हारा निर्देशन
तुम्हारा अनावरण
पटाक्षेप तुम्हारा,

सुनो-
बहुत त्रासद है
तुम्हारी एकांकी

झरती आँखें
भीड़ की सिसकियाँ
मैं नहीं सह सकता अब

मेरा आखिरी मंचन करो
या फिर
अब मुझे
नेपत्थ्य दे दो!


मासूम

शहर के पिछवाड़े...
बीराने से
आया वो

मोटरों पर
ईंट फेंकता
अपने घावों की मक्खियाँ उडाता
ख़ुशी के गीत रोता

अधनंगा पागल

बन जाता है
मासूम बच्चा
रोटियां देखकर!



मैं आदमी

मैं दंगाई नहीं
मैं आज तक
नहीं गया
किसी मस्जिद तक
किसी मंदिर के अन्दर क्या है
मैंने नहीं देखा

सुनो
रुको
मुझे गोली न मारो
भाई
तुम्हे तुम्हारे मजहब का वास्ता
मत तराशो अपने चाक़ू
मेरे सीने पर

जाने दो मुझे
मुझे
तरकारियाँ ले जानी हैं

माँ
रोटिया बेल रही होंगी!



आखिर में प्यार
उफनते दूध सी
तुम्हारी नेह...
ढलकती ही रही बार बार

और
सारे गिले शिकवे
प्यार मनुहार

बहते रहे...

बहती रहीं सुधियाँ
स्नेह
आलिंगन
स्पर्श ....

सब कुछ

और

आखिर मे
परिस्थिति के चूल्हे पर
देह का खाली बर्तन
सूना पड़ा था!!


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नाम- अमित आनंद पाण्डेय 
जन्म- २७ नवम्बर १९७७
शिक्षा- स्नातकोत्तर 

सम्प्रति- कंप्यूटर व्यवसाय 

संपर्क- 
ई-वर्ल्ड 
पीली कोठी, रोडवेज तिराहा 
गांधीनगर , बस्ती
उत्तर प्रदेश -२७२००१  




हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad