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Friday, October 19, 2012

विमल के जन्मदिन पर उनकी टटकी कहानी



विमल चंद्र पाण्डेय -9820813904

विमल का मेरे लिए परिचय बस इतना है कि वे यारों के यार हैं। मुझे याद आता है 2004 का वह साल जब पहली बार मेरी और उनकी भी कहानी वागर्थ में छपी थी। वह मेरी पहली कहानी थी और विमल भी शायद पहली बार ही छप रहे थे। उस पहली कहानी से ही कई कथाकारों को कहानीकार की पहचान मिली थी। विमल जितने अच्छे कथाकार हैं उतने अच्छे कवि भी हैं, हाल के दिनों में आयी उनकी कविताएं यह साबित करती हैं। कुछ महीने पहले मैं मुंबई गया था, विमल मे कई फिल्मों के लिए स्क्रिप्ट भी लिखी है और बहुत जल्दी ही उनकी फिल्म भी शुरू होगी। मैंने विमल से पूछा – भाई, मेरी फिल्म कब शुरू होगी। 2014 में – विमल ने जवाब दिया।
विमल का आत्मविश्वास किसी को भी अपनी ओर खींच सकता है।
विमल का आज जन्मदिन है। उनके जन्मदिन पर उनकी एकदम ताजा कहानी पढ़ते हैं जिसे उन्होंने कल ही पूरी की है, और अनहद को भेजा है। अनहद की ओर से उन्हें जन्मदिन की ढेर सारी बधाई और उनके दीर्घ रचनात्मक जीवन के लिए अशेष शुभकामनाएं.....

खिड़की
विमल चंद्र पाण्डेय

जब वे दोनों बस अड्डे पर पहुंचे तो पता चला कि जिस बस की उम्मीद वे लोग पांच बजे करके आये हैं वह डेढ़ घंटे देरी से यानि साढ़े छह बजे निकलेगी। पिता जाकर सीमेंट की एक बेंच पर बैठ गये जिसके सामने एक सूचनापट्ट टंगा था जिसपर लिखा था कि रोडवेज आपकी सेवा में हमेशा तत्पर है और भिखारियों को पैसा देकर भिक्षावृत्ति को बढ़ावा न दें। उन्होंने छोटे बेटे को बैठने के लिये बुलाया लेकिन वह थोड़ा दूर जाकर बुक स्टाल पर पत्रिकाओं के पन्ने पलटने लगा।
 
वह बहुत दुखी थे। उनके बड़े और मंझले दोनों बेटों ने प्रेम विवाह कर लिया था और अब छोटा भी उसी राह पर था। आज उसे अपने साथ ले जाने का उनका मकसद यही था कि रास्ते में उससे इस मुद्दे पर बात करेंगे और उसे बताएंगे कि उनके पास इतनी सुंदर-सुंदर लड़कियों के रिश्ते हैं कि....। तभी छोटा बेटा आकर उनके सामने खड़ा हो गया। वह अपने लिये एक समसामयिकी पत्रिका और पिता के लिये एक जासूसी पॉकेट बुक्स वाला उपन्यास खरीद लाया था।
‘‘
हा हा हा, अरे ये क्या लेते आये ?’’ पिता हाथ में लेते अपनी हंसी नहीं रोक पाये।
‘‘
आप पढ़ते थे न बहुत यही सब ? बस में नींद तो आने से रही। इसीलिये कह रहा था दोपहर वाली बस पकड़ी जाये।’’ बेटे ने समसामयिकी पत्रिका के पन्ने पलटते हुये कहा।
‘‘
अरे अब कहां समय रहा ये सब पढ़ने का....।’’ पिता ने कहीं दूर देखते हुये कहा।
‘‘
अरे ऐसा भी क्या....समय तो निकालना पड़ता है।’’ बेटे की बात सुनकर उन्हें लगा जैसे उनके ऑफिस का कोई दोस्त बोल रहा हो।
‘‘
तुम्हारा काम कैसा चल रहा है ?’’ उन्होंने बात बदल दी।
‘‘
ठीक ही है। नया काम है इसलिये थोड़ी मुश्किल है, ठीक हो जायेगी। डिजाइनिंग की कई कंपनियां हैं शहर में इसलिये थोड़ा वक्त तो लगेगा ही....।’’ बेटे ने एक आलेख पर नज़र घुमाते हुये कहा जिसमें कहा गया था कि महंगाई बढ़ाने के लिये केंद्र सरकार जि़म्मेदार नहीं है।
‘‘
मेहनत और ईमानदारी से करोगे तो हर काम होगा।’’ बेटे को लगा जैसे उसका कोई दोस्त बोल रहा है। उसने पिता की ओर देखा तो पिता नज़रें हटा कर उपन्यास पलटने लगे।
 
उन्होंने खुद आज से सैंतीस साल पहले प्रेम विवाह किया था और कम अज़ कम इस लिहाज से अपने बेटों को प्रेम विवाह से रोकने का कोई हक नहीं था। उन्होंने अपने दोनों बेटों को यह भविष्यवाणी कर शादियां करने से रोका था कि उनकी शादियां बहुत सफल नहीं होंगीं।
लेकिन बड़े और मझले बेटे ने उनकी भविष्यवाणी को बहुत भाव न देते हुये अपनी मर्ज़ी से शादियां कर ली थीं। अब छोटे भाई का मामला देखकर उन्हें अपने-अपने प्रेम विवाहों के समय पिता का रुख याद आ रहा था। उन्हें लगा कि पिता कहीं न कहीं ठीक ही कह रहे थे। मां ज़्यादातर मामलों में पिता के ही रुख पर निर्भर रहती थीं और बेटों को लगता था कि पिता उनकी शादियों के खिलाफ थे इसलिये मां भी खिलाफ हुई थीं। पिता ने दोनों बेटों को समझाने के लिये साम, दाम, दण्ड और भेद नाम की चार युक्तियां प्रयोग की थीं जिनके बारे में उनके पूर्वजों ने उन्हें बताया था लेकिन कामयाबी नहीं मिली थी। वह प्रेम विवाहों के विरोध में क्यों थे, यह पूछने पर उन्होंने कभी किसी को कोई वाजि़ब कारण नहीं बताया था। अकेले होने पर वह कभी सोचते तो उन्हें कोई वाजिब कारण मिलता भी नहीं था लेकिन उन्हें खुद में अपमानित महसूस होता था कि उनकी नाके बाद भी उनके बेटे अपनी मर्ज़ी चलाना चाहते हैं। बड़े भाई के प्रेम विवाह के बाद मझले के फैसले में बड़ा साथ आ गया था और छोटे बेटे के वोट न देने के कारण मामला दो दो वोटों से बराबर छूटा था। पिता ने दोनों बेटों को उनकी प्रेमिकाओं के बारे में बहुत कुछ न जानने के बावजूद सिर्फ़ छठवीं इंद्रिय की सहायता से समझाया था कि उनकी इन लड़कियों से नहीं बनेगी। अब शादियों के शाश्वत नियमों के अनुसार जब-जब बेटों का अपनी पत्नियों से झगड़ा होता, वे उन्हें यह कह कर कोसते कि पिताजी ठीक ही कहते थे कि तुम्हारी मुझसे बनेगी नहीं, मैं ही तुम्हारे प्यार में पागल हो गया था जो उनकी बात न मानकर तुमसे शादी कर ली। पत्नियों को इस संवाद से इतना ही पता चलता था कि पिताजी बहुत अनुभवी इंसान हैं जिन्हें अपनी बहुओं से मिलने से पहले ही उनके बारे में पता चल गया था।
वह उपन्यास के पन्ने पलट रहे थे और सोच रहे थे कि बात कहां से शुरू की जाये।
‘‘
बाप रे, पचास रुपये हो गया इसका दाम। मैं पढ़ता था तो छह रुपये से बढ़ कर दस रुपये हुआ था।’’ बेटे ने एक बार उपन्यास की तरफ देखा और फिर पिता की तरफ।
‘‘
हर चीज़ बदल रही है, बदलनी ही चाहिये।’’ बेटे ने चाहियेपर ज़ोर देते हुये कहा और आलेख अधूरा छोड़ कर आगे बढ़ गया।
‘‘
बस तो हमारे घर के सामने से जाती है फिर आप यहां बस अड्डे तक क्यों आये ? वहीं पकड़ लेते।’’ बेटे ने थोड़ी देर बाद कहा तो उनके चेहरे पर हंसी खिल आयी।
‘‘
अरे तुम्हारे दोनों भाइयों में से कोई और होता तो घर के सामने से ही पकड़ लेते। यहां तो तुम्हारे लिये आये हैं ताकि तुम्हें खिड़की मिल जाये।’’ बात खत्म करते वह हंसने लगे। उसे बचपन से ही ट्रेन या बस कहीं भी बैठने के लिये खिड़की चाहिये होती थी। कई बार तो ऐसा होता था कि वह ट्रेन में खिड़की के लिये जि़द करता था और उनके पास उपर की या बीच की बर्थ हुआ करती थी। वह उसे डांटते, समझाते और जब वह नहीं मानता तो किसी भी तरह वह अपनी सीट मनुहार करके नीचे वाले यात्री से बदलते और उसे खिड़की पर बिठाते। एक बार एक भीड़ भरी बस में खिड़की के पास बैठने की जि़द करने पर उन्होंने उसे थप्पड़ भी मारा था।
छोटा भी मुस्करा रहा था। उसे याद आ रहा था कि उसे खिड़की दिलाने के लिये कितनी ही बार पिता ने खुद बस में खड़े-खड़े सौ-सौ किलोमीटर का सफ़र तय किया है। एक बार तो वह उसे खिड़की पर बिठाने के लिये उठे ही थे कि पास खड़ा एक आदमी किनारे वाली सीट पर बैठ गया था। जब उसे खिड़की पर बिठाने के बाद उन्होंने उसे उठने को कहा तो वह आदमी अनसुना कर इधर उधर देखने लगा था। उस आदमी से पिता का बीहड़ झगड़ा हुआ था और कंडक्टर को आकर बीच-बचाव करना पड़ा था।
 
दोनों बेटों का शादी के काफी समय बाद तक पिताजी से अबोला रहा था और आखिरकार एक ही छत के नीचे रहने की विवशता ने बाप बेटों के बीच कुछ औपचारिक संवादों की भूमिका बनायी थी जिसमें सबसे बड़ी बात थी कि बड़ा बेटा पिता को अपने स्कूटर से नगर निगम यानि उनके ऑफिस तक छोड़ सकता था। शादियों के बाद खुद को बेटों से काटने के कई नुकसानों में यह भी एक था कि पिता का रिक्शे का किराया बहुत खर्च हो जाता था। आखिरकार काफी दिनों के बाद जब एक दिन धूप बहुत ज़्यादा थी तो मां ने बड़े बेटे से कहा था कि वह क्यों नहीं अपने पिता को उनके दफ्तर तक छोड़ देता। पिता भीतर से तैयार होते उंची आवाज़ में बोले थे कि उन्हें किसी की ज़रूरत नहीं लेकिन जब वह बाहर आये तो बेटा स्कूटर पर बैठा बिना मतलब एक्सीलेटर घटा बढ़ा रहा था। पिता चुपचाप जाकर बैठ गये थे और रास्ते में सिर्फ़ दो-तीन बातें हुयी थीं। दो बार पिता ने बेटे को कम गति से स्कूटर चलाने की सलाह दी थी और एक बार बेटे ने पिता से समय पूछा था। दूसरे दिन छह सात बातें हुयीं, जैसे-
‘‘
दिन भर जाम रहती है ये सड़क।’’
‘‘
इस गली से निकाल लो शोर्ट कट है ये।’’
‘‘
नहीं एक बराबर ही समय लगता है।’’
‘‘
ये कौन सी गाड़ी है ?’’
‘‘
ये यामहा की एंटाइसर है, बहुत तेल पीती है।’’
‘‘
पेट्रोल का दाम सालों ने फिर बढ़ा दिया।’’
 
पिता पुत्र इन अतारतम्य संवादों से थोड़ा पास आये थे और पिता दूसरे बेटे के लिये भी नरम होने लगे थे। एक दिन उन्होंने दोनों बेटों को पास बिठा कर इशारों में चर्चा की कि यह मकान और दो ज़मीनें वह अपने तीनों बेटों में बांटकर चैन से मरना चाहते हैं। मरने वाली बात उन्होंने अपने बेटों से प्रेम भरी बातें सुनने के लिये कही थी और जब मंझले बेटे ने अपनी हथेली आगे बढ़ा कर उनका मुंह बंद कर फिल्मी स्टाइल में कहा, ‘‘ऐसा मत बोलिये, मरें आपके दुश्मन’’ तो उन्होंने उसी क्षण उसे पूरी तरह माफ़ कर दिया था। अब उनका परिवार सुखी परिवार दिखने लगा था और चीज़ें सुचारु रूप से चलने लगी थीं या चलती दिखने लगी थीं। अगले साल वह रिटायर होने वाले थे और मिलने वाले पैसों से खरीदी जाने वाली ज़मीन उन्होंने अभी से देखना शुरू कर दिया था। यह मकान और इसी शहर में एक ज़मीन उनके पास थी ही। उनका दुख सिर्फ़ और सिर्फ़ छोटा बेटा रह गया था और इसके बहुत वाजि़ब कारण भी थे। वैसे तो उनके तीनों बेटे बचपन में बहुत आज्ञाकारी हुआ करते थे पर छोटे वाले की तो बात ही निराली थी। जब वह छह साल का था तो एक बार वह उनसे और अपनी मां से बिना पूछे मुहल्ले में खेलने चला गया था। जब वह वापस लौटा था तो उसे अपने पास बुलाकर उन्होंने उसे समझाया था कि हर काम मां या पिता से पूछ कर किया जाना चाहिये। उसके बाद से उसका व्यवहार एकदम बदल गया था। उसका कोई दोस्त खिड़की पर आकर उसे खेलने के लिये बुलाता तो वह तुरंत आकर उनके सामने खड़ा हो जाता। हर बात वह उनसे ही पूछता और मां के कहने के बावजूद जब तक वह इजाज़त नहीं दे देते, वह कोई काम नहीं करता।
 
‘‘
पिताजी मैं खेलने जाउं ? नन्हें बुलाने आया है।’’ वह पूछता। पिता मुस्कराते और जल्दी लौट आने की हिदायत के साथ जाने की अनुमति दे देते। ऐसी प्रक्रियाओं को विभिन्न तरीकों से दोहराने के बाद अति तो तब हो गयी थी जब पेशाब लगने पर वह पैंट के उपर हाथ रख कर दबाये हुये दौड़ता आता और तेज़ आवाज़ में पूछता, ‘‘बहुत ज़ोर से पेशाब लगी है, कर लूं ?’’ वह और आसपास के लोग हंस पड़ते और वह जल्दी से कहते, ‘‘हां हां बेटे जाओ कर लो।’’ बाद में वह मेहमानों के सामने इस बात का प्रदर्शन भी करते थे जब वह कमरे में बैठा कुछ खेल रहा होता या स्कूल का होमवर्क कर रहा होता।
‘‘
देखियेगा अभी कहूंगा तो तुरंत लेट जायेगा। बेटा....।’’ वह उंची आवाज़ में उसे पुकारते। वह सिर उठाकर उनकी ओर देखता।
‘‘
बेटा, सो जाओ तो।’’ वह मेहमान की ओर गर्व भरी नज़रों से देखते हुये कहते।
वह किताब या सामने पड़े लूडो को उसी तरह छोड़ कर तुरंत लेट जाता और आंखें बंद कर लेता। मेहमान दिल खोल कर हंसते। उसके बड़े भाई भी मुस्कराते। बाद में उसके बड़े होने पर भी भाइयों ने इस बात पर उसकी चुटकी लेनी जारी रखी थी।
दोनों बड़े बेटे ज़मीन खरीदने की बातों में उत्साह से भाग लेते थे लेकिन छोटा बेटा ज़मीन और प्रोपर्टी जैसी बातें होते ही कोई न कोई बहाना बनाकर भाग निकलता था। पिता को उसकी शादी के लिये समझाने का मौका ही नहीं मिल पा रहा था। वह जानना चाहते थे कि उन्होंने पिछले महीने उसे जो समझाया था उस पर वह अमल कर रहा है या नहीं। पिता ने कठोर शब्दों में कहा था कि भले ही उसके दोनों भाइयों ने प्रेम विवाह किया है, उसमें कहीं न कहीं उनकी मर्ज़ी भी शामिल थी, अब ये शादी किसी भी कीमत पर नहीं हो सकती। अगर उसने अपने बड़े भाइयों को उदाहरण मानते हुये उनकी मर्ज़ी के खिलाफ़ शादी करने की कोशिश की तो वह अच्छी तरह समझ ले कि उसका इस घर और उनकी जायदाद से कोई मतलब नहीं रहेगा। छोटा बेटा उठकर चुपचाप वहां से चला गया था।
 
उन दिनों छोटा बेटा घर में किसी से कोई बात नहीं करता था और उन्हें भीतर ही भीतर डर लगा रहता था कि कहीं किसी दिन वह उस लड़की को दुल्हन बना कर उसे आशीर्वाद दिलाने न लेता आये। वह उससे बातें करके उसके मन की थाह लेना चाहते थे लेकिन उन्हें मौका ही नहीं मिल रहा था। एक दिन जब वह देर रात आया और अकेला हॉल में लाकर अपना ठंडा खाना खाने लगा तो पिता को उस पर तरस आया। मां और दोनों बहुएं बैठ कर कोई टीवी धारावाहिक देख रही थीं और उस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। पिता पास आकर बैठे तो बेटे ने सरक कर जगह बना दी। वह बात शुरू करने में कामयाब हुये तो उन्हें खुशी हुयी और थोड़ी देर बाद ही उन्होंने बातों को अपनी मनचाही दिशा में मोड़ दिया।
‘‘
एक लड़की है, एमसीए कर रही है पुणे से.....बहुत सुन्दर है...।’’
बेटे ने पिता की ओर अजीब नज़रों से देखा और थाली लेकर अपने कमरे में चला गया। उनका मूड खराब हो गया। अजीब लड़का है यह, अपनी मर्ज़ी के बारे में बात नहीं करेगा तो किसी नतीजे पर कैसे पहुंचेंगे वह ?
 
एक दिन उन्हें अपने शहर से चार सौ किलोमीटर दूर एक दूसरे शहर में एक अच्छी ज़मीन का पता चला। उनके एक मित्र ने उन्हें बताया कि यह ज़मीन रहने और निवेश दोनों हिसाब से बहुत बढि़या है। अभी प्लोटिंग हो रही है और इसके बाद जब पचीस फीट की सड़क दिखायी देने लगेगी तो इस ज़मीन के बहुत भाव बढ़ेंगे। ज़मीन थोड़ी महंगी ज़रूर है लेकिन वह कह-सुनकर कुछ कम करा देंगे। पिता ने अपने दोनों बड़े बेटों, जिनके वह काफी करीब आ गये थे, से वहां चलने की गुज़ारिश की लेकिन दोनों को अगले तीन दिनों तक बड़ा ज़रूरी काम था और उन्होंने शालीनता से इंकार कर दिया। दोनों ने राय दी कि छोटे बेटे को लेकर जाया जाये और वह ज़मीन उसे ही देनी है तो उससे पसंद करा लिया जाये।
छोटे बेटे ने पहले तो इंकार किया लेकिन पिता के कई बार कहने पर उसने उनके साथ जाना स्वीकार कर लिया था।
किसी दूसरे शहर जाने वाली बस उनके सामने आकर खड़ी हो गयी थी और उसमें सवारियां भरने लगीं थीं।
‘‘
कितना समय और बचा ?’’ पिता ने पूछा। बेटे ने घड़ी देखी।
‘‘
बीस मिनट में आयेगी।’’
पिता अब उस नाज़ुक मसले पर पहुंचने की हिम्मत कर रहे थे जिसपर बेटा काफी समय से उनसे बात नहीं कर रहा था। उन्होंने घुमाफिरा कर पूछा और बेटे की भंगिमाएं बदल गयीं।
‘‘
इसीलिए मैं आना नहीं चाहता था....।’’
‘‘
मैं अगर उससे ज़्यादा पढ़ी लिखी और सुंदर लड़की तुम्हारे लिये....।’’ उन्होंने अपनी बात को यथासंभव तार्किक बनाते हुये कहा लेकिन बेटे ने बात काट दी।
‘‘
वह ज़मीन नहीं है पिताजी.....।’’ दोनों फिर से चुप हो गये।
‘‘
तो तुम मेरी बात नहीं मानोगे ?’’ पिता ने थोड़ी देर बाद पूछा। बेटे ने कोई जवाब नहीं दिया।
‘‘
मैं साफ़-साफ़ सुनना चाहता हूं।’’ पिता की आवाज़ में तुर्शी थी।
‘‘
क्या ?’’
‘‘
तुम्हें पता है।’’
‘‘
पिताजी आप समझते क्यों नहीं ? मैं उससे प्रेम करता हूं और उससे शादी करना एक छोटी सी इच्छा है, इसमें आप को समस्या क्या है ? बड़ी भाभी तो दूसरी जाति की हैं, मैं तो अपनी जाति की लड़की से करना चाहता हूं।’’
‘‘
मुझे जाति से कोई समस्या नहीं है। लेकिन मैं जानता हूं कि उस लड़की से तुम्हारी बनेगी नहीं। देखो मैंने तुम्हारे भाइयों के बारे में जो कहा था वह सही निकला कि नहीं। उनके हर दो दिन पर झगड़े हो जाते हैं।’’
 
बेटा चुप रहा। पिता समझ गये कि बेटा इतना आराम से इसीलिये है कि उसने मन में निर्णय ले लिया है कि वह उसी लड़की से शादी करेगा। उनके भीतर कुछ उबलने सा लगा। इतना आज्ञाकारी बेटा ऐसा निकलेगा, उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था।
‘‘
बस आ गयी।’’ बेटा उठा तो साथ में वह भी उठ गये। उन्हें बहुत थकान सी महसूस हुयी। एक भीड़ का रेला बस अड्डे के कोनों अंतरों से निकला और बस में सवार होने लगा। उसने पिता को बस में चढ़ाया और खुद कोल्ड ड्रिंक लाने चला गया।
भीतर काफ़ी भीड़ थी। वह खड़े रहे और जगह बनाते रहे। आखि़रकार पीछे की तरफ़ वह जाकर एक सीट पर खिड़की वाली साइड में बैठे और छोटा सा बैग बगल वाली सीट पर रखकर उसे रिजर्व कर लिया। बेटा थोड़ी देर में आधे लीटर की कोल्ड ड्रिंक की बोतल लेकर आया और उनके पास खड़ा हो गया। उन्होंने एक नज़र बेटे की ओर देखा और फिर जल्दी से बाहर देखने लगे जैसे किसी युद्ध की तैयारी कर रहे हों। बेटे ने बैग को उठाकर उपर रखा और फिर से खड़ा हो गया। वह थोड़ी देर खड़ा रहा तो पिता ने एक नज़र घुमा कर इशारे से उसे बैठने को कहा।
‘‘
आप इधर आ जाइये....मैं खिड़की के पास...।’’
‘‘
नहीं तुम वहीं बैठो। खिड़की के पास मैं बैठूंगा।’’ उनकी आवाज़ में निश्चय था।
‘‘
आपने तो कहा था.....।’’ बेटा वहीं बैठने लगा लेकिन पता नहीं कैसे उसके मुंह से निकल गया।
‘‘
तो....? कहा था तो अपराध कर दिया क्या ? बैठो चुपचाप वहीं।’’ वह बोलकर बाहर देखने लगे। बेटा चुपचाप वहीं बैठ गया और पिता की हथेलियों की ओर देखने लगा।
 
उनकी हथेलियों पर नसें उभरी थीं और उनकी उम्र त्वचा से बाहर आना चाहती थी। उसका मन हुआ कि वह पिता के झुर्री पड़ते जा रहे हाथों को पकड़ कर कहे कि अच्छे बच्चे जिद नहीं करते लेकिन वह दूसरी तरफ देखने लगा. एक आदमी अपने बच्चे को गोद में लिये हुये था और उसकी पत्नी बच्चे के लिये दूध की बोतल तैयार कर रही थी।



हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

9 comments:

  1. Waah! Jordar Kahani Ke liye Dhanyawad... Sath Hi Kahanikar ke liye Janmdin Ki deron Badhaiyan... ve aise hi sarthak rachnaye karte rahen yahi duaa...

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  2. सुंदर सी कहानी... विमल और विमलेश दोनों को बधाई... विमल तो आजकल जलन का सबब बने हुए है...

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  3. वास्तविकता को छूती हुई , बहुत अच्छी बुनी गयी कहानी .

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  4. kahani der se padhne ke liye kshma chahta hu......

    per jo tana bana isme buna gaya hai....awesome... teen bete aur baap ki jo manodasha hoti hai usko behtreen kia hai....

    aakhiri 4 line ne jo mujhe sikh dia ,uske liye main apka aabhar vyakt karta hu,ye 4 line humhe sikh deti hain ,jo jitna sikh le....

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  5. theek kahani hai..lekin vimal ke paas issey achhi chhoi kahniyaa hain..

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  6. Kahani Bahut Acchi Hai...Aise hi likhte rahie Vimal Babu...Ekdam Real story lag rahi hai...

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  7. पिता-पुत्र का व्दन्द बखूबी उतरकर सामने आया है .

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