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Tuesday, November 27, 2012

कविता की कहानी



कविता

कविता जी की कहानियों में शिल्प की जहां सहजता है वहीं समय की जटिलता भी है। सहज शिल्प और बोधगम्य भाषा में अपनी बात को प्रभावी ढंग से कहना आज के किसी भी कथाकार की चुनौती है – कविता अपने कथा साहित्य में इस चुनौती को स्वीकार करती हुई दिखायी पड़ती हैं। कविता के पास आज तीन कहानी संग्रह और एक उपन्यास हैं। कविता जी की कहानियों का अंग्रेजी में अनुवाद हो चुका है। कविता की कहानियां अपनी विशिष्टता के कारण पाठकों ओं आलोचकों के बीच खासी चर्चित रही हैं। यह कविता के लेखनी की ताकत है कि वे कथा जगत में एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर के रूप में स्थापित हो चुकी हैं। अनहद पर पढ़े उनकी कहानी पत्थर, पानी और दूब। आपकी बेबाक प्रतिक्रियाओं का इंतजार है...


पत्थर, माटी, दूब....
कविता

मेरे हाथों में एक कागज है, कागज में आड़ी-तिरछी रेखाओं में छिपा कोई अक्स। ठीक उसकी ही तरह, होकर भी साफ-साफ नहीं दिखता। पिता से ही आई है यह आदत मुझ तक। पिता जब भी खाली होते यानी मूर्तियाँ न बनाते होते, चित्र बनाया करते थे। पिता कहा करते थे स्केल, परकार सब तो हमारी आँखो में है...
मेरी आँखों में कोई दृष्य है, 10 साल की एक बच्ची दुर्गा की प्रतिमा की आँखें सिरज रही है। पिता कहते हैं आँखें बनाना मतलब देवी को जागृत करना, उनकी प्राण प्रतिष्ठा। हाथ काँप रहे हैं उस छोटी-सी लड़की के मगर मन में एक अजीब- सी पुलक। पिता ने उसके काँपते हाथों को सहारा दिया है...
मेरी बेचैनी कुछ कमी है। मुझे उत्तर मिला है कहीं अपने इसी उहापोह से। मुझे बनाते-रचते पिता ने कब कान दिया था किसी की बात पर, मैं उसी पिता की संतति इतनी कमजोर कैसे हो गई...देखती हूँ मैं आड़ी-तिरछी रेखाएँ अब एक शक्ल में परिणत हो रही हैं- एक निर्बोध निश्पाप चेहरा...पर आँखें अब भी गायब है उस षक्ल से। अब इसकी आँखे खोलूँ कि न खोलूँ यह निर्णय मेरा। पिता द्वारा थमाई गई सुनहरी कूची जैसी उड़ती पड़ती मेरी हाथों में आ गिरी है...
चित्रा जी का पत्र कविता के नाम
अभी-अभी तो जि़ंदगी एक पड़ाव को आ लगी है। नाम, पैसा, वैभव सब अभी-अभी तो...'एक मुट्ठी आसमान की नींव अभी-अभी तो डाली है। मेरा सपना 'एक मुट्ठी आसमान। स्त्रियों के लिए उनके वजूद की स्वीकारोक्ति, पहचान। वैसी स्त्रियाँ जिनमें अपनी एक अलग पहचान बनाने की चाह हो। अपने पैरों पर खड़े होने का चाव। क्या होगा मेरे इस सपने का? बच्चियों से, माँ से क्या कहूँगी। यह व्यक्तिक्रम...
फिर पीछे की ओर लौटना होगा मुझे। उस अतीत तक जहाँ से भागती रही हूँ मैं निरंतर। जीवन में, सपनों में, नींद में। लौटना होगा मुझे उसी माटी तक। कोई विकल्प कहाँ है मेरे पास। पिता के जीवन की त्रासदी से स्मृतियाँ सींझ रही है दहक रहा है मेरा शरीर। पर...
मैं 'एक मुट्ठी आसमान के अपने क्लासरूम में हूँ- ''स्त्रियों से यह समाज अपनी कला छिपाता रहा है। स्त्रियों का मतलब यहाँ खास तौर पर बेटियों से लीजिए। कारण उनकी कला, उसके गोपन रहस्य कहीं और की थाती न हो जाये। आखिकार वे दूसरे घर ही तो ब्याही जायेंगी। वे उत्तराधिकारी नहीं होती अपने पिता के विरासत की। स्त्रियों के लिए ज्ञान के सारे स्त्रोत वर्जित है। मैं जिस समाज से आई हूं वहाँ बेटियों के सामने पिता अपना काम बंद कर देते रहे हैं...
निर्जीव बेजान मिट्टी जब कुम्हार के मन और पुन: उसके चाक पर षक्ल पाती है तभी हो पाता है किसी कलानिति का जन्म। सभी व्यवसाय सिर्फ व्यवसायिक कुशलता की बजह से नहीं चलते, कुछ के लिए सिर्फ हाथों की हुनर और अपने भीतर छिपे कलाकार को तलाशने-तराशने की ज़रूरत होती है। और इस सबसे बढ़कर है कहीं वह सुकून जो आप में कुछ होने, औरों से अलग होने की भावना से आती है। षोहरत अलग से पर इसके लिए ज़रूरी है यह कि निरंतर नये प्रयोग करने, नया कुछ गढ़ने का जज्बा हो आपके भीतर।
मैं अब बोल भी लेती हूँ और इस तरह धाराप्रवाह। सोचती हूँ तो खुद पे हैरत होती है। वक्त ने ठोंक पीटकर कई-कई शक्लें दी, कई-कई बाने दिए। पर मै न वही माटी की माटी। पुन: उसी माटी तक। 'पुनि जहाज को आवै यही तो कहा करते थे पिता। माटी, मेरा पहला प्यार। माटी, मेरी आँखों का देखा हुआ पहला ख्वाब...मैं सोचती हूँ इस कठिन क्षण में मुझे माटी की याद आई तो यूं ही नहीं...मुझे माटी को दिलवाना होगा उसका वही मुकाम, पिता को और उनके सपनों को भी।
नयोनिका की आँखों में कोई प्रश्न हैं। अपनी प्रिय सहेलियाँ की नयोनिका अर्थात नयनिका चटर्जी। सांवली सुंदर नयनिका चटर्जी...बच्चों सी षांत-निर्मल पारदर्शी। एक कलाकार को ऐसा ही होना चाहिए या कि ऐसा ही कोर्इ व्यकित षुद्ध-सातिवक कला रच सकता है बीच के कालखंड में मैं हँस पड़ती थी पिता की इस उक्ति को यादकर। गलत तो नहीं समझ रहें हैं आप... पिता पर बिल्कुल भी नहंी। टूटी-खंडित मूर्ति ही सही पर है तो देवता की ही।
मैं नयोनिका की तरफ देखती हूँ, षायद उसी प्रश्न की आशा में। उसने सवालों को कहीं भीतर ही समेट लिया है, मेरे व्याख्यान में कोई व्यवधान न हो। मैं सोचती हूँ, क्या पूछना चाह रही होगी वह? मैं कयास लगती हूँ...कमाई की यहाँ कोई निश्चित सीमा नहीं है। गणेष की एक मूर्ति 50रु. से लेकर पचास हजार तक में। वाजेज, म्यूरल्स आदि भी अपनी बारीकियों के अनुसार कम और अधिकतम मूल्य में बेची-खरीदी जाती हैं, केवल टेराकोटा में ही एक रु. के बीड से लेकर बीस हजार तक के होते हैं...पत्थरों में जिस तरह हटाने या छीलने की प्रक्रिया मुख्य है उसी तरह मिट्टी या टेराकोटा में जोड़ने की। पाटरी में डिजाइनिंग के लिए रंग-बिरंगी मिट्टी तथा पक्के रंगों की आवश्यता होती है। कच्चे रंगों से मूर्ति में वह चमक नहीं आ पाती। अचानक मन में कहीं बेतरतीब उजली दाढ़ी में रंगो को पकाते-घोलते पिता जाग उठते हैं, जोर-जोर से गुनगुनाते- ''मन ना रंगाये, रंगाये जोगी कपड़ा। आसन मार मंदिर में बैठे, दढि़या बढ़ाये जोगी बन गये बकरा। माँ चिढ़ती थी पिता के इस बेसुरेपन से पर मुझे हमेशा उनके स्वरों की सच्चाई भिगाती, मोहती, बहाती ले जाती अपने बहाव में...मैं खुद को समेटना चाहती हूँ। इसके अलावे पाटरी के लिए धागा, जाली, थपकी, छोटी-बड़ी कैंची और ओखल-मूसल की ज़रूरत होती है। नोट तो कर रही है न आप सब। आँखों-आँखों में बतियाती मेघा-आभा सहज हो आर्इ है, मैं कनखियों से देख ही लेती हूं बोलते-बोलते।
'मैम मिट्टी... मैं आभा की बात पूरी सुने बगैर ही व्याख्यान जारी रखती हूँ- ''हाँ मिट्टी आप आसपास के घड़ा बनानेवाले कुम्हारों से ले सकती है। माली से भी खरीद सकती हैं। फिलहाल यहाँ तो उपलब्ध है ही। और आज आप सब प्रैक्टिकल कक्षा में रंगो से, गुणों से मिटटी को पहचानना सीखेंगी। मिटटी का ज्ञान इस कला को साधने के लिए बहुत ज़रूरी है। 'मिट्टी की पहचान पिता के द्वारा बार-बार प्रयुक्त होनेवाला शब्द; जिसमें मैं कतराकर गुजरी थी इस वक्त। जिसे मैं बिसरी रही थी पिछले दिनों या कि जानबूझकर बिसरा दिया था। मेरे चाहते न चाहते जैसे मेरे स्वर में पिता ही बोलने लगे थे। मैं तो उतरती जा रही हूँ अपने भीतर गहरे-बहुत गहरे। बचपन की कंदराओं तक- ''काली मिट्टी, भूरी मिट्टी, दोमट मिटटी, कलकत्ते की मिटटी अर्थात कैलकटा क्ले, बहुत मुश्किल से मिलनेवाली पर मूर्तियों के लिए सबसे मुफीद। सानते ही जो रूर्इ के फाहों जैसे हल्की हो ले। मोड़ना, मोल्ड करना सबसे आसान, बच्चों के खेल जैसा। टेक्सचर भी अच्छा आता है इसका। मेरे भीतर पिता जाग रहे है पूरे के पूरे। मैं उनके आगे बैठी हूँ चुक्की-मुक्की। माटी को छूने, सहलाने, खाने की मेरी इच्छा। पिता शायद समझते है मेरा मन मेरे नाक के आगे है उनकी हथेली, मेरे नथुनों में भरी जा रही है एक सोंधीं गमक- ''सुन तो इसकी खूषबू क्या कह रही है...मुझे आकार दो, रंग दो...जीवन दो...। षुरू-षुरू में मैं खेल-खेल में ही मूर्तियों के लिए आभूषण बनाती। माला, मनका, कान की बालियाँ। फिर फूल और नाखून के अग्रभाग...फिर अधबनी मूर्ति में नक्स उभारने का काम। पूरे-पूरे पाँच वर्ष गुजर गये थे इन कामों के बीच। मेरे प्यारे बचपने के वर्ष। जिस दिन मैंने एक पूरी-की-पूरी मूर्ति खुद पूरी की थी, वह घनघोर जाड़े की एक रात थी। बगल में उपलों का अलाव था, अलाव में बार-बार उपले डालते पिता। मुझे सर्दी न लगे, मेरे काम में कोई व्यवधान न आये। अलाव की रोशनी में मैंने देखा था पिता की आँखे बिल्कुल लाल थीं। जागरण या धुएँ से धुंआई आँखों जैसी नहीं। बहुत हद तक वैसी जैसी मैंने देवी खेलाते वक्त पुजारियों की देखी थी। पिता बार-बार निहार रहे थे मेरी बनाई उस मूर्ति को। पिता खुश थे, पिता आक्रांत थे। क्षण भर बाद उन आँखों में निश्चय की एक गहरी चमक नजर आई थी। पिता ने मेरे हाथों को लौ की तरह खींचा था- ''शपथ ले तू कि तू मेरी कला को मेरे साथ मरने नहीं देगी, आगे बढ़ायेगी उसे। मैंने विवाहों में ऐसा होते देखा था। यह सब मेरे लिए एक खेल था, एक कौतूहल। पर शायद नहीं। मैंने पूरे भोलेपन पर उतनी ही दृढ़ता के साथ कहा था- 'मैं वचन देती हूँ।
मैं पिता के साथ सजधजकर नये पहनकर मंदिर गई हूं। मेरी बनाई मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा है आज। प्राण-प्रतिष्ठा के वक्त केवल कलाकार और पुजारी होते हैं, दूसरा कोई नहीं। उस पर एक लड़की...पुजारी को मेरी उपस्थिति से ऐतराज है। स्त्रियाँ तो स्वयं देवी की प्रतिमा होती हैं, यह मूर्ति भी एक स्त्री की है और इसे बनानेवाली भी एक औरत। पिता ने मेरी तरफ उंगलियों से ईशारा किया है। अब आप ही निर्णय लें, इस मूर्ति को मंदिर में प्रतिष्ठित करना है या नहीं। पुजारी भौचक है। वह मुझे, मूर्ति को और पिता को बारी-बारी देख रहा है...सुनहरी कूची पिता ने मेरे हाथों में थमा दी है। मैं रोमांचित हूँ, इतनी ज्यादा कि हाथ काँप रहे हैं मेरे। पिता ने मेरे काँपते हाथों को सहारा दिया है। मैं रच रही हूँ देवी के नेत्र। आँखे खोलने का उपक्रम पूरा हो चुका है। पुजारी हमें आईने में मूर्ति का अक्स दिखा रहा है...
जब भी नाना आते और मुझे पिता के साथ काम करते देखते तो कुड़बुड़ा कर रह जाते। हमेशा उनके पाँव छूने को बढ़े मेरे हाथों को उनकी वर्जना भरी दृष्टि वही थाम लेती- ''कितनी मैली है तेरी हथेलियाँ। मां से बात-बात में कहतें ''माटी-कादों में रह-रह और धूप में बैठकर और सांवली हो जायेगी। फिर ब्याह कैसे होगा इसका। बाप को तो बिल्कुल समझ नहीं, तू ही कुछ चिंता कर। रोक ले इसे, अब भी वक्त हैं। मां सुन लेती सब चुपचाप।
पिता से कहते हैं सब आस-पड़ोस के मूर्तिकार ''बेटी को सिखाना मतलब सूखे हुए पौधे में पानी डालना। कोई अच्छा-सा शिष्य ढूढों तुम्हारी विरासत को वही संभाल सकेगा, यह लड़की नहीं। पिता का चेहरा कड़ा हो जाता था यह सब सुनकर पर वे मुँह से कुछ भी नहीं कहते थे। पिता उल्टे मुझे सिखाने में ज्यादा वक्त लगाते, उनकी दृढ़ता जैसे इन प्रहारों से और बढ़ती जाती। वक्त का वह हिस्सा खूबसूरत यादों की तरह है, मस्तिष्क में। बाद में तो...। पिता की बनाई मूर्तियों, खिलौनों, सजावटी सामानों तब की धूम थी चारों तरफ। पिता के हाथों का हुनर तब लोगों के सिर चढ़कर बोलता था। दूर-दूर तक लोग जानते थे कलाकार गि़रीष प्रजापति का नाम। त्योहारों के वक़्त तो पिता को सांस लेने तक की फुर्सत नहीं होती। आम दिनों में भी ज़रूरत से अधिक काम। हमारा परिवार एक खुशहाल परिवार था। आस-पड़ोस के परिवारों से तो कहीं बहुत ज्यादा...
पर धीरे-धीरे वक्त अपना रूख बदलने लगा था। वह बीसवीं सदी के उत्तरार्ध का काल रहा होगा। मंहगाई गरीबी अपने डैने तेजी से पसारने लगी थी। पैसों की किल्लत हर तरफ। लोगों के मन से त्योहार का उछाह कमने लगा था। मिट्टी के खिलौनों की जगह प्लास्टिक और रबर के सस्ते टिकाऊ चाभी वाले आयातित खिलौनों से बाजार भरने लगे थे। मैं खुश थी, पहले कभी-कभार आनेवाले पिता के खिलौने मेरे हिस्से अब ज्यादा आ रहे थे। खूबसूरत मछलियाँ-तितलियाँ-तोते, दुर्गा-काली के मुखौटे किसी ड्राइंग रूप की शोभा बनने की बजाय घर के पिछवाड़े बने स्टोर रूम में भर रहे थें। और कुम्हारसब जब अपने पेशे को छोड़कर कोई दूसरा व्यवसाय अपना रहे थे या फिर कोई नया प्रयोग कर रहे थें। पिता अड़े-खड़े थे अपनी जिद पर। माटी के साथ कुछ और नहीं, माटी के बदले कुछ और नहीं। माटी सच है, जिंदगी का। छोड़ू माटी को, इससे पहले मैं ही माटी हो लूँ। माटी का मोह पिता को छोड़ नहीं रहा था, हाँ पिता पीछे घूटे चले जा रहे थे। पीछे छूटे हुए लोग हमेशा भागते हुए लोगों के कदमों तले रौंदे जाते हैं। पिता के साथ भी ऐसा ही हुआ था। और यदि अब वे चाहते भी तो बीमार, निषकाय पिता के वश में पुन: उठ खड़े होकर दौड़ लगाकर इस होड़ में शामिल हो पाना संभव नहीं था।...पिता कुचले गये थे, बच रह गये थे सिर्फ हम दो, मैं और माँ। मां जिन्हें गुजर चुके पिता से शिकायत थी, मुझसे शिकायत थी, इस जिंदगी से शिकायत थी। लोग अलग थे पर शिकायत एक- ''मैं ही लड़का हुई होती...
मुझे आश्चर्य है...मैं भीतर भी हूँ और बाहर भी। भीतर के दृष्य बाहर नहीं है...बाहर की दुनिया भीतर का दु:ख कम नहीं कर पा रही, वर्तमान अतीत के आँसू नहीं सुखाता।...मैं बोल रही हूँ अब भी लगातार। पर शायद मैं बोल नहीं रही- मैं एक छोटी-सी बच्ची माँ की हथेलियाँ थामें उन्हें मन-ही-मन सांत्वना दे रही हूँ- ''माँ मैं हूँ तुम्हारा बेटा, तुम्हारे भविष्य का सहारा। क्या मेरे मन की बातें माँ तक पहुँच नहीं रही, शायद इसीलिए माँ की हथेलियाँ मेरे स्नेह-संवेदना से अछूती है। मैं माँ के पास से हटकर पिता को सुन रही हूँ, अपने भीतर बसे पिता को- ''इसके अतिरिक्त यमुना मिट्टी और राजस्थान की मिट्टी मूर्तियों के लिए मुफीद हैं। गोवा मिट्टी आसानी से उपलब्ध होने वाली मिट्टी है...
मैंने ध्यान से देखा है, नयोनिका की आँखें बहुत सफेद है। काफी हद तक नीलेपन का आभास देती सी। जैसे पिता द्वारा बनाई गई बाल-गोपाल की आँखें। आँखे मुझे हमेशा से प्रभावित करती रही है। तरह-तरह के लोग और तरत-तरह की आँखें। मैं लोगों को पहचान सकती हूँ उनकी आँखों से। यह देन पिता से आई है मुझतक। पिता द्वारा बनाई गई मूर्तियों की आँखें बहुत सजीव होती थी। तरह-तरह के भावों और जिं़दगी से भरी। वे कहते- ''सोचो अगर मूर्तियों में आँखे ही न हो तो... और मूर्तियाँ ही क्या मनुष्य, पशु-पक्षी किसी के लिए भी ऐसी कल्पना करके देखो तो।
पहले नयोनिका और फिर नयोनिका के आते ही आभा, मेधा, त्रिवेणी। पिता कहते थें बच्चे और शिष्य बराबर होते हैं। पर क्या-क्या नहीं होता आजकल इस रिश्ते की आड़ में? गुरूओं की इज्जत अब कौन शिष्य करता है? मुझे शायद पिता को झुठलाने का नशा है ...या कि उन्हें स्वीकारने-अपनाने का। कहा करते थे पिता कलाकार होने का मतलब है 'माटी होना और माटी की सार्थकता उसके उर्वर-उपजाऊ होने में है। अपने भीतर उतनी जगह बनाना जहाँ दूसरे आये, फैले-पसरे और अंखुआ सके। बहुत दिनों बाद आज लग रहा है ठीक कहते थे पिता। मेधा, आभा, त्रिवेणी, नयोनिका जैसे कई-कई टुकड़ो में बंटी खुद मैं...त्रिवेणी तो जैसे खुद मेरी आत्मा का, वजूद का ही कोई अंश। डरी-सहमी यह लड़की जब घर से निकाले जाने के बाद यहाँ आर्इ थी तो कुछ भी करने को तैयार थी, चौका-बर्तन, सिलाई-बुनाई जो कुछ भी काम मिल जाये। दसवीं तक की पढ़ाई भी कर रखी थी उसने। इससे आगे का स्कूल नहीं था उसके मायके के गाँव में। ससुराल...? ''ससुराल जाकर कौन लड़की पढ़ सकी है दीदी? होता हो शायद ऐसा शहरों में। त्रिवेणी को अपना घर इसलिए छोड़ना पड़ा था कि षादी के तीन साल बाद तक भी वह एक बच्चे को जन्म नहीं दे सकी थी। और बाद में तो डाक्टरों ने भी कह दिया था...''त्रिवेणी कभी माँ नहीं बन सकती; उसे गर्भाषय की ऐसी बीमारी है जिसमेें उसका विकास उम्र के साथ-साथ नहीं हो पाता। 'तुम्हारा पति....? वो कुछ भी माँ के विपरीत जाकर कह-कर नहीं सकते। माँ ही सर्वेसर्वा है घर की। वे तो माँ पर ही आश्रित है, खाने-पीने, कपड़े-लत्ते तक के लिए...
सोचते-सोचते कब क्लास खत्म हो गर्इ, कब लंच-ब्रेक भी खत्म उसे पता ही नहीं चला। वैसे भी उसे आजकल भूख-प्यास नहीं लगती। सिर भारी, मन भारी। एक अजीब सा मितलाता हुआ गंध खाने की हर चीज से पहले उस तक पहुँच जाता है। चीजें फिर जुबान तक जा ही नहंी पाती।
लंच ब्रेक के बाद मैं फिर कक्षा में। विषय-''बनाने की विधि। पर बनाने की विधि कहीं बीच अधर ही लटकी रह जाती है। कारण मन बुरी तरह से उखड़ गया है, कक्षा से, बच्चियों से...नहीं अपने आप से। अपने विश्वास से। लड़कियाँ भी नहीं रूकी पलभर। त्रिवेणी चाय बनाने चली गई है। मैं सोचती हूँ यह थकती क्यों नहीं कभी? घर में पूरे घर की जिम्मेदारी और कक्षा में भी आगे-आगे बने रहना। शुरू में तो जि़द पर ही अड़ी थी- ''मुझसे कहाँ होगा यह सबकुछ। मुझे घर में ही रहने दे...पर जब करने लगी तो हाथ पहले दिन से ही इतना सधा और साफ कि मैं हैरत में पड़ गर्इ थी। थकान इन दिनों ज़्यादा ही लगने लगी है मुझे। रह रहकर, वक्त-बेवक्त। और आज तो...। नयोनिका जो कल से हिम्मत साधकर भी नहीं पूछ पा रही थी, मेघा ने आज एक झटके से उलीच दिया था। पैसे वाले परिवार की इकलौती, मुँहफट लड़की। उसे क्या पता था आहत भी हो सकत है कोई उसकी बातों से। और होता हो तो हो उसकी बला से।  उसने तो बस एक प्रश्न ही किया है, सीधा- सादा। ''हम पत्थरों पर ही अपना काम कन्टीन्यू रखना चाहते हैं। हमें नहीं सीखना यह पाटरी-वाटरी। वैसे भी इस कला का कौन-सा भविश्य देखती हैं आप। मिटटी न पत्थर जितनी टिकाऊ अैर न आवागमन या निर्यात के लिए सहज। मुझे तो मिटटी जितनी ही भंगुर लगती है यह कला। आउटडेटेड, आफबीट। आपने जब प्रस्तर कला को एक नर्इ दिषा, एक नया आयाम दिया फिर अचानक यह सिवचओवर क्यों? यह कला आपकी प्रसिद्धि को समेट सकेगी, हम क्या पायेंगे इस षिक्षा से? प्रसिद्धि? ठौंर? उतने पैसें जो हमें एक अच्छी जिंदगी दे सके।
'एक मुट्ठी आसमान में यह कोई पहला भूचाल नहीं था। मेघा थी तो छोटे-बड़े झटके लाजिमी थे। पर इस तरह का भयानक झटका शायद यह पहला ही था। मैं जो कुछ कहने-बाँटने आर्इ थी इनसे हिम्मत बटोरती-बटोरती, वह हिम्मत बिला गई थी कहीं। प्रत्युत्तर में तत्काल मेरे पास कोई तर्क नहीं था। सिर्फ छोटी-सी पर विचलित कर देने वाली एक सच्चाई थी। तर्क नहीं था तो झुंझलाहट ज्यादा थी, मेरे पैरों तले की धरती शायद डगमग-डगमग होने लगी थी। मैं तो खुद किसी नये रास्ते की तलाश में अपनी मजबूरी के तहत इस निर्णय पर आ टिकी थी। पर दूसरे क्यों ले यह निर्णय? उनपर कोई बाध्यता क्यों? ''...आप जब चाहे इस कोर्स को छोड़कर जा सकती हैं, जिस काम को करते हुए अपने आप पर, उस काम पर भरोसा न हो, उसे करना बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं है...हाँ मैंने यह तय किया कि हम अलग-अलग माध्यमों पर अलग-अलग तरीके से काम करेंगे। आज के समय में किसी भी व्यवसाय में टिके रहने के लिए प्रयोगधर्मिता और लचीलापन किसी भी व्यकित के लिए बहुत ज़रूरी है। वर्ना जिंदगी हमें पीछे छोड़ देगी हम कुचले जायेंगे उसके पैरों तले। पाषाणकला पर काम करना मैंने कुछ दिनों के लिए स्थगित कर रखा है। जिन्हें सिर्फ पाषाणकला पर काम करना हो वे कल से आना बंद कर सकते हैं- ''मैं बोल रही थी बोले जा रही थी षायद उसके उठकर चले जाने तक। भरोसा, 'खुद पर भरोसा ये तो पिता के षब्द थे जिन्हें मैंने दुहराया भर था और जिस पर मेरी बिल्कुल भी आस्था नहंी थी। बीच के वशोर्ं में तो और भी और आज भी कुछ हद तक। जिस काम में मेरा मन कभी उतना नहीं रमा, उसी में ख्यात हुई मैं और पिता की बनाई वे अनमोल मूर्तियां बेमोल भी नहीं बिकी। यह बिडंबना नहीं तो और क्या है?
त्रिवेणी ने सामने चाय की प्याली लाकर रख दी है पी लेने की हिदायत के साथ। मैं जानती हूँ अपनी चाय लेकर अब वह अपने कमने में कुछ देर आराम करेगी। अगर मैंने रोक न लिया हो उसे कुछ ज़रूरी काम से। मैं भी अधलेटी हुर्इ हूँ, स्मृतियों ने बढ़कर मेरी उंगली थाम ली है, मैंने स्मृतियाें की। गलियाँ बहुत संकरी है इनकी, चलो अब ये इनकी जिम्मेदारी मुझे बचती-बचाती जहाँ ले जाये।
मैं एक दृष्य के सामने ठहरकर खड़ी हो जाती हूँ। एक बच्ची भूस-माटी सान रही है, खपचिचयाँ बाँध रही है। उसपर थोप रही है, लपेट रही है माटी। छोटे-छोटे आकार बन रहे है। बच्ची खुश है, पिता भी, कोने-काने से झाँक लेती माँ भी। इस तरह दुनियावी लंद-फद से बची रहेगी, पिता को भी मदद मिल जायेगी कुछ-
स्मृतियाँ थमने ही नहीं देती, लेने ही नहीं देती कोई सुख...मुझे बचपन के हिंड़ोले से लाकर अतीत के कंकड़ीले पथ पर छोड़ दिया है। 13-14 साल की एक लड़की पत्थरों सेे खेल रही हैं, उसे लगता है पत्थर भी जीवंत होते है। एक तरलता होती है इनके भीतर भी। माटी जितनी नहीं, माटी से भी ज़्यादा। जैसे जीवन धड़क रहा हो पत्थरों की आड़ मेें। पत्थर मुझे षीतल-कोमल लगते। शायद मेरे मन का ताप ज़्यादा होता उनके ताप से। वे धीरे-धीरे बतियाने लगे थे मुझसे कुछ-कुछ ज्यादातर अपने भीतर छिपे आकार के बारे में। हाथ लहुलुहान होने लगे थे मेरे पर जिद जैसे थकती ही नहीं थी। छेनी का हर चोट जैसे एक हुंकार भरता- मुझे माटी की तरह, पिता की तरह मुलायम नहीं होना। हारना नहीं, पत्थर का करना है अपना मन। मुझे माँ की कल्पनाओं का बेटा बनना है। जिद जीतती है, अनभ्यस्तताए हार जाती है। लड़की खड़ी है दषहरे के मेले में नव-दुर्गा भी उस प्रतिमा के आगे लोग बाग जिसपर बलिहारी जा रहे हैें। कलाकार के उम्र और लिंग को जानकर तो और भी। भूख शायद उंगलियों में हुनर का जादू भर देता हो।
...नई राह मिल गई है जिंदगी को। दु:ख कहीं पीछे छूट गये है। माटी भी, पिता भी और वह कस्बा भी। मेरी बनाई किसी कलाकृति का किसी भी ड्राइंग रूम में होना उनके लिए बड़ी बात है- 'स्टेटस सिंबल जैसा कुछ। बेरूख समय से मैं अगला-पिछला सब बकाया वापस चाहती हूँ। अपने पिता के हुनर की कीमत, अपने बचपन की कीमत। पिता से यह सुनते-जानने के बावजूद कि जिंदगी में कुछ चीजें अनमोल होती है, बेशकीमती भी।
दृष्य फिर-फिर बदल रहे हैं मेरी आँखों में... महानगर में मैंने ढूढ़-ढूढ़कर मूर्तिकला से जुड़ी किताबें पढ़नी शुरू की है। शैलियों को छान मारा है। नया कुछ करने की हिलोर मन में उफान मारती रहती है हमेशा। मैंने अपनी अभूतपूर्व कल्पना से 'राग-रागिनी' श्रृंखला को आकार दिया। फिर 'मेघ-मल्हार पर काम- वर्षा के लिए प्रार्थना करते किसान, जल की आस में बैठे चातक, भागते बादल और हिरण और नाचते हुए मोर। सारे दृष्य गतिमान। पत्थरों में गति का आभास देना- यह सुनने-कहने में जितना आसान लगे करने में उतना आसान नहीं था। पर मेरी जिद के आगे कुछ मुश्किल भी कहाँ था।
छह:-छह: फुट की चार मूर्तियाँ पार्वती व गणेष, हनुमान और शिव के जिन्हें मैंने चालुक्य शैली में बनाने का निर्णय लिया था। आभूषणों और बाह्याडम्बरों से अधिक भावों पर ध्यान, उनकी प्रधानता। ...जे.पी होटल, ओबेराय, रेमारी, सिद्धार्थ होटल और रेडिसन जैसे बड़े-बड़े नाम अब मेरे क्लाइंट में शामिल थे। मिटटी छूट चली थी पीछे कहीं और पिता भी। पर शायद नहीं... मेरी जिंदगी का एक और नियम हो चला था... हर रात एकांत में मैं देर तक पिता का चेहरा तराशती...और हर बार तराश अधूरी की अधूरी। पिता उभर नही पाते थे ठीक-ठीक। जो सबसे करीब था वह चेहरा सबसे मुश्किल... यह कैसी विडंबना थी जब हर तरफ मेरे नाम की दुंदुभी बज रही थी, मैं अपूर्ण थी मेरा कलाकार अपूर्ण था। हर रात मैं पहले से ज्यादा निराश और उदास होकर पड़ जाती। विजयी दिखती मैं भीतर से हार रही थी...।
विचार पुन: दृष्य में परिवर्तित हो रहे हैं- पिता की अधूरी तस्वीरों की एक प्रदर्शनी है मेरी। कुछ पारखी समीक्षकों और कलागुरूओं की चाह थी यह। मैं जब उन कलाकृतियों से नहीं अपनी हार से घिरी बैठी थी चारों तरफ से। 'पिता नामक उस श्रृंखला के पिता और बच्चे की उस मूर्ति के आगे एक पुरूष खड़ा दिखता था कई-कई बार, कितनी-कितनी देर तक। धीरे-धीरे झिझक टूटी थी हमारी, दोस्ती जैसा कुछ पनपने लगा था हमारे भीतर। हमारे जि़ंदगी में बहुत कुछ सम जैसा था...अकेलापन, जिम्मेदारियाँ या कि पितृविहीनता?...फिर भी आसान नहीं था हमारा एक हो जाना। हम मिलते थे बार-बार। और भीतर पत्थरों तले दवी माटी में कोंपल जैसा कुछ अंखुआता था...पत्थर फिर-फिर तनकर खड़े हो जाते थे कोंपल को कुचलते हुए। प्यार के लिए कोई जगह नहीं है मेरी जिंदगी में। मुझे पिता को दिए हुए वायदे को निभाना है। मुझे अपनी माँ का लाडला बेटा बने रहना है। बेटे माँ को छोड़कर नहीं जाते। शशांक ने भी नहीं कहा था- ''माँ को साथ लेकर तो जाते है न? उनकी माँ थी उनके साथ और उन्हें पाइलारसिस भी था। उनकी बीबी अगर हुई तो उनकी माँ का बोझ उठायेगी न कि अपनी माँ का? उनकी माँ चल बसी थी, षंषाक ने आना चाहा था हमारे साथ। मैंने मना कर दिया था। ''जिं़दगी अब बहुत आगे निकल आर्इ है शशांक। मैं, मेरा काम, इंस्टीटयूट और लड़कियाँ अब वक़्त नहीं रहा इस पागलपन का...वैसे भी मैंने पिता को वचन दिया था... मैंने बगैर पीछे देखे पलट लिया था... हाँ एक भरा-भरा खालीपन तब से उसकुसाता रहता था मेरे भीतर रह-रहके। कोई भी कभी न होने के बावजूद मैं दिन रात मेहनत करती, जी तोड़ मेहनत शायद अब यह मेरी आदत हो चुकी थी... शायद मैं पिता के हश्र से डरी हुर्इ थी... शायद मुझे किसी कल की चिंता थी... शायद मुझे अपनी माँ का योग्य बेटा बने रहना था। बहुत देर तक लेटी रही हूँ मैं शायद। त्रिवेणी पूछने आई है- ''रात के खाने में क्या बनना है? मैं भी उसके साथ उठकर किचेन तक चली आती हूँ। वह आटा गूँथ रही है, मैं सब्जी काट रही हूँ, मैं सब्जी पका रही हूँ वह रोटियाँ बेल रही है। गैस की लौ के जद में रोटियाँ सेंकता उसका चेहरा मोनालिसा की तस्वीर की स्मृति दिला रहा है। वैसी ही एक रहस्यमयी अदभुत मुस्कान। क्या है इस मुस्कान में? मुस्कान आ कैसे पाती है इस चेहरे तक, मैं तो शायद टूट ही जाती...क्या मोनालिसा की मुस्कान भी दर्द, एकाकीपन और किसी छलावे की देन थी। या कि मैं ही तलाशती रहती हूँ उसके चेहरे पर अपना अक्स-नक्ष?
हम सब खाने बैठे हैं एक साथ। माँ का ही ध्यान जाता है, मेरी थाली अनछुई है। ''क्या हुआ? कुछ नहीं। मैं उठकर चली आरई हूँ। खाकर दूसरे भी अपने कमरे में चले गये होंगे। ...उबकाइयों की तेज आवाज उनका ध्यान खींच लेती है। भागती आती है दोनों मुझतक- ''क्या हुआ? सुबह से तो ठीक ही थी, अभी भी सब कामों में हाथ बटाया फिर अचानक? त्रिवेणी के स्वर में मेरे लिए चिंता है। माँ मुझे नींबू-पानी देती है। ''गैस-वैस बन गया होगा कुछ पेट में। मौसम बदल रहा है, दिन भर सिर्फ काम-कामं। अपना भी तो कुछ ख्याल रखना चाहिए। कल चल डाक्टर से दिखालती हूँ। मेरा मन कुछ हल्का हुआ है। ''मैं खुद चली जाऊँगी माँ। मैं आईने में अपना पीला-मुर्झाया चेहरा देख रही हूँ।
हल्का मन फिर सौ किलों का हुआ जा रहा है। कलेजा, शरीर सब भारी। जैसे कोई सिल रख दिया गया हो मुझपर। भय और आक्रोष की लकीरें कोरे स्लेट पर खींची गयी रेखाओं जैसी साफ और स्पष्ट। तो ठीक ही समझ रही थी मैं...शशांक के साथ गुजरे लम्हें जैसे स्मृतियों के गलियारे में चहलकदमी करने लगे हैं, मेरे बगैर इजाजत। मेरे भीतर बसी पुरातन माँ जैसे फब्तियाँ कस रही हो मुझपर- ''बस अभी से डोलने लगी हिम्मत? अभी से इरादे टूटने लगे। अगर इतनी ही कमजोर थी मैं तो शशांक जब लौट रहे थे हमारे पास, अपना लेना था उन्हें। ...कैसे बताऊँ मैं माँ को यह सबकुछ? ...बताना तो होगा ही। और लड़कियों को...? पहले माँ को...मैं रिपोर्ट माँ के आते रख देती हूँ। माँ के चेहरे पर पहले अचरज, फिर चिंता और अंतत: खुशी की रेखाएँ फैल आर्इ हंै। मैं हैरत में हूँ, माँ खुश है। मैं माँ को आज तक नहीं समझ सकी हूँ...माँ मुझे छाती में समेट लेती हैं- 'मत सोच कुछ ...कुछ भी नहीं। मैं संभाल लूँगी सब...। 'बच्चे को? '...बच्चे को भी। तुझे चिन्ता करने की कोई ज़रूरत नहीं है। ''...दुनिया की माँ? मैंने लाड से उनकी गोद में अपना सिर रख लिया है ''...दुनिया भी नहीं।ं ''...लड़किया? मैंने बार-बार हिम्मत बटोरा पर फिर भी नहीं कह सकी उनसे कुछ। ''...वे समझदार हैं। उन्हे बता दूंगी मैं। ...कितनी बदल गर्इ है माँ। ...समय के याथ षायद हर इन्सान बदलता है...मैं बेकार ही साथ बोझ अपने सीने पर रखे हुर्इ थी।
मैं दो दिनों तक ''एक मुट्ठी आसमान के अपने दफ्तर और क्लासरूम में नहीं गई हूँ। माँ ने कहा है मैं दो-तीन दिन आराम करूँ। मेरा मन है मैं कक्षा में जाऊँ, लड़कियों से बात करूँ। मेरी झिझक मेरे टाँगो के इर्द-गिर्द अपनी बाहें लपेट देती है, कैसे जाऊँ मैं, क्या कहूँ उनसे? पड़े-पड़े उकता रही हूँ मैं, जाना तो है ही, आज नहीं तो कल। मै उठकर चप्पल पाँव में डालती हूँ। माँ कुछ नहीं कहती।
मैं क्लास रूम के बाहर ठिठकी हूँ- 'एबार्षन मेधा का तीखी स्वर मेरे कानों से बेइजाजत आ टकराया है। मुकित का रास्ता यही है। अनचाही बोझ औरतें ही क्यों अपने सिर लिए फिरें। पुरूष तो...मेरे कदमों की गति धीमी हो आई है। चीटियों सी...रेंगती हुई।...यूँ दूसरों पर अपनी बातों का वजन डालने की आदत छोड़ोगी नहीं। निर्णय मैम करेंगी या तुम? त्रिवेणी के स्वर में चिढ़ है। 'हमें शशांक सर को फोन करना चाहिए...नयोनिका है शायद...मैम की इच्छा के बगैर बिल्कुल भी नहीं...मैंम को बताना होता तो खुद नहीं बता दिया होता।
मैं चेहरे को भावविहीन तटस्थता से भरे झटके से क्लासरूम में घुसी हूँ। सब सकते में... अचानक छाई निस्तब्धता बहुत बोझिल और दमघोंटू है। मैं बगैर किसी पूर्व भूमिका के सीधे विषय पर आ जाती हूँ, वहीं जहाँ पिछला क्लास खत्म किया था- ''पाटरी के लिए मिटटी को बहुत बारीक छाना जाता है फिर उसे तकरीबन 15 दिनों तक पानी में भिगो कर रखते हैं। मिट्टी में दरार न पड़े इसलिए इसे छायादार जगहों में रखा जाता है। इसके बाद इसे लेसदार बनाते हैं तब जाकर बनती है पाटरी लायक मिटटी।
मुझे लगता है ''एक मुटठी आसमान की फिजां बदली-बदली सी है। मैं देखती हूँ मेरी प्रिय शिष्याएँ कक्षा में कुछ उखड़ी-उखड़ी और बेदिल हैं। पता नहीं क्या कनफूसियाँ चलती रहती है उनमें लगातार। मैं हमेशा खुद को असहज पाती हूँ उनके बीच। फिर भी कक्षा लेती हूँ क्योंकि वह मेरा काम है। खुसफुस से मैं फिर सकते में हूँ। रूकती हूँ कि खुसफुस बन्द। दो मिनट इन्तजार करने के बाद मैं फिर शुरू हो जाती हूँ- पाटरी व्यवसाय को शुरू करने के लिए किसी बड़ी राशि की आवश्यकता नहीं है। सिर्फ 10 हजार की राशि से यह व्यवसाय शुरू हो सकता है। इसके लिए किसी लम्बी चौड़ी जगह की भी दरकार नहीं। तकनीक ने हमें कई नई सुविधाएं दी हैं। आजकल विद्युत आँवे भी चलन में आ गये हैं। इनकी सबसे खासियत यह है कि ये आपको मनोवांछित ताप देते हैं और बहुत सारे छोटे-बड़े पचड़ो से मुक्ति भी। इन आँवो की कीमत 10 से 30 हजार तक है। अगर आप इतनी पूँजी एकमुश्त नहीं लगाना चाहते तो पुराने आँवे तो है ही और बाहर पकवाने का चलन भी...
टेराकोटा की कलात्मक वस्तुओं म्युरल्स, वाजेज, बगैरह को बहुराष्ट्रीय-राष्ट्रीय कम्पनियों, पाँचसितारा होटलों, पर्यटन स्थलों, विदेशी दूतावास और क्राफ्ट बाजारों में बेचा जा सकता है। अपनी एकल प्रदर्शनी भी लगा सकते हैं हम। इसके अलावे उच्च वर्ग और उच्च मध्यवर्गीय लोग इसे आजकल अपनी घरेलू सज्जा में पर्याप्त महत्व दे रहे हैं... ''कक्षा खत्म हुई है। मेघा मेरे आगे खड़ी है चुपचाप। मैं पूछती हूँ क्या हुआ? सारी मैंम, मैं आपकी परेशानियों को नहीं समझ सकी थी। मैं अपने उस दिन के व्यवहार के लिए शर्मिदा हूँ, मैं समझ सकती हूँ मैम आपने यह निर्णय कितनी कठिनाई से लिया होगा। पत्थरों पर काम अब आपके लिए आसान नहीं होगा। कोई बात नहीं... आगे फिर कभी... और आप हमें इंसट्रक्शन तो दे ही सकती हैं, अगर हम अपने मन से कुछ बनाये-करें।
क्षमा माँगते वक्त उसकी आँखे नीची हैं, बहुत नीची। मैंने उसे पहले कभी ऐसे नहीं देखा और मुझे यह भी पता है उसके लिए यह करना-कहना कितना मुश्किल होगा। मैं उसके कंधे पर अपनी हथेलियां रख देती हूँ, कहती कुछ भी नहीं। बीते दिनों का तनाव हमारे बीच से छितर रहा है चुपचाप...
अब यह फिर कैसी नई खुसफुस? वक्त मिलते ही ये लड़कियाँ कौन-सी गूटर-गूँ शुरू कर देती हैं आपस में। अब कौन सा मुद्दा? कौन-सी बात? बीते दिनों उनके इसी बतियाने को मैं अपने विरूद्ध कोई साजिश या फिर खुद के ऊपर हँसने से जोड़ती रही हूँ। गुपचुप की टोह मुझे कुछ-कुछ लग रही है। वे अपनी कलाकृतियों की प्रदर्शनी लगाने की सोच रही हैं। मुझसे मशविरा किए बगैर? मैं पूछना चाहती हूँ इतनी हड़बड़ी उन्हें क्यों है? कारण जानकर जैसे बौनी हुई जा रही हूँ मैं। बे कहती हैं हास्पीटल और बेबी के वक्त के सारे खर्च इस एक्जीविशन से ही निकलने चाहिए। वे खूब मेहनत करेंगी। हमारा सिर नहीं झुकने देंगी, बस हम एक बार इजाजत दे दें। और वे इसके लिए मेरे सिर कोई अतिरिक्त दायित्व या बोझ भी नहीं डालेंगी। मैं सकते में हूँ, कहूँ भी तो क्या-
प्रदर्शनी के नाम पर उन्हें देर तक रूकने की इजाजत मिल गई है, वे सबकुछ संभाल रही हैं अपना काम और मेरा घर भी।...वे सिर्फ पाटरी ही नहीं नया बहुत कुछ बना-कर रही हैं। वाल हैंगिग, स्टैंड-ग्लास, मूढे, टेबल, पेनिटंग्स। यानी क्राफ्ट बाजार में बिक जाने वाले सारे सामान।...वे नित नये प्रयोग कर रही हैं, मिट्टी के साथ शीशे और स्टील का मेल। मैं बस देख रही हूँ इन्हें। मैं उन्हें सिखा रही थी। क्या सिखा रही थी? अभी तो मैं उनसे सीख सकती हूँ बहुत कुछ।
प्रदर्शनी सफल रही है। सबसे ज्यादा बिकी हैं गणेष की मूर्तियाँ-मुखौटे। सब के सब त्रिवेणी के बनाये हुए। आभा-मेधा आज त्रिवेणी के गणेष-प्रेम का मजाक नहीं बना पा रही। मैंने त्रिवेणी के पैसे त्रिवेणी को थमाये हैं। ''मैं क्या करूँगी इनका। कुछ नहीं बस रख ले पास में। त्रिवेणी के चेहरे पर एक क्षीण सी मुस्कान तैर आई है। लड़कियां उमंग में आय-व्यय का हिसाब लगा रही हैं, हिसाब लगाते ही उनका मुँह छोटा-सा हो आता है। त्रिवेणी के पैसे अलग कर दे तो सिर्फ सात हजार।...मैं उनकी आँखों में लिखा देखती हूँ- अभी बहुत काम करना है...बहुत ज्यादा और...।...मैं उनसे कहना चाहती हूँ, मेरे लिए वे परेशान न हो...मैंने तो सिर्फ मन रखने के लिए उनकी बात मान ली थी पर मुझे लगता है इससे आहत होंगी उनकी भावनाएँ-
मैं चुपके से एड देती हूँ अखबार में। लड़कियों से, माँ से सबसे छुपाकर। रोज डाक की राह तकती हूँ, निराश होती हूँ। कब दे पाऊँगी मैं लड़कियों को कोई खुशखबरी? दे भी पाऊँगी या नहीं?...मैं भूल चुकी हूँ यह घटना, दिन भी तो कितने बीत गये इस बीच। डाकिया मुझे एक लिफाफा थमा गया है, कनिष्का होटल के पूरे 24 मंजिलों की सजावट के लिए हमें विशाल वाजेज बनाने का आर्डर मिला है। एडवांस का चेक भी है 10 हजार का। मैं खुशी में पूरे क्लास में मिठाई बाँटती हूँ। लड़कियाँ इतराती हुई खुशी में रंगीन तितलियों सी दिख रही हैं-
मैं लागत का हिसाब लगा रही हूँ- त्रिवेणी अपने पैसे भी मुझे थमा देती है, यह उस अकेली के नहीं हैं। 'मैं कुछ मदद करूँ। मेधा पूछती है... 'नहीं। मैं पुरजोर शब्दों में इन्कारती हूँ।
घर ऐसा भरा-भरा लगता है जैसे शादी ब्याह का घर। पहले लड़कियों की खिलखिल से खींजकर अक्सर मुझे डाँट लगानेवाली माँ- ''यह 24 घंटे कचर-पचर क्या लगवाये रहती हो। भी धीरे-धीरे हमारे उत्साह के साथ बह ली हैं। वही माँ जिनकी चुप्पी हाल-हाल तक रह-रहकर उनपर आक्रमण करती रही है।...
वे तीनों मेरे कमरे में स्वस्थ सुंदर बच्चों के तस्वीर टाँग रही हैं। माँ कहती हैं- ''सिर्फ लड़कों की तस्वीर। मैं सन्न रह जाती हूँ। बदलते-बदलते भी माँ...
ये गाऊन आपको ठीक होंगे, काटन हैं, दीदी ने सिले हैं। आभा कहती है।...त्रिवेणी माँ के साथ मिलकर छोटे-छोटे बिछावन और नैपीज बनाती है नये-पुराने कपड़ो से। कभी नूडल्स, कभी खिचड़ी, कभी हलवा काम की ओट में हम कुछ भी खा लेते हैं। माँ कहती हैं कोई बाई ढूढ़ो। इसके लिए लापरवाही ठीक नहीं।...मैं सोचती हूँ कितनी चिंतित थी मैं, इतनी देखभाल और इतना प्यार कितनों को नसीब होता है, मुझे खुद से ही रश्क हो उठता है...
हम सब उदास हैं फंड की कमी के कारण कनिष्का होटल वालो ने काम को बीच में ही रूकवा दिया है। पैसे पाँच फ्लोर के हिसाब से मिले हैं। लागत के जितने भी नहीं...घर के पिछवाड़े पड़े वाजेज हमारा मुहँ चिढ़ाते रहते हैं- इतने बड़े सपने हमारे...
...मेघा कहती है कल कनिष्क होटल में पिता की मीटिंग थी। वहां उन्होंने हमारे बनाये वाजेज देखें, उनके विदेशी क्लाइंटो ने भी...। वे मुग्ध हुए जा रहे थे उस पर। पिता जि़न्दगी में पहली बार मेरे कलाकार होने पर इतने खुश हुए हैं। वे क्लाइंट कहकर गये है- उन्हें वाजेज चाहिए।
अब की आमदनी ठीक-ठाक है, अभी तो और एक्सपोर्ट होने को बचा ही है...खुशी-दु:ख धूप-छाँट का खेल-खेल रहे हैं हमारे 'एक मुट्ठी आसमान में...
...लडकियाँ पत्थरों पर काम करना चाह रही हैं। मैं ड्रा करके दे रही हूँ उन्हें आकृतियाँ। पत्थरों पर भी चिहन लगा देती हूँ। फिर देखती रहती हूँ उन्हें दूर से चुपचाप काम करते हुए... मेरी रचनाशीलता परकटे पक्षी की तरह छटपटाती रहती है हरपल...
सातवाँ माह... डाक्टर कहते हैं मैं रोज सुबह टहलने जाया करूँ। उस दिन भी टहलकर ही आ रही थी। एक मंझोला दुधिया पत्थर जैसी मेरी राह रोके खड़ा था। मैं उससे निगाहें चुरा लेती हूँ फिर भी वह है कि किसी ढीठ जिद्दी बच्चे की तरह मुझे तके ही जा रहा है। मैं जितना नजर चुराती हूँ उससे, वह उतना ही ज्यादा झलकता है- मुझे बीच राह यूँ ही छोड़ जओगी। नक्ष तक झलकने लगे हैं उसके साफ-साफ। मैं उसे काल्पनिक छेनी हथौड़े से आकार दे रही हूँ...कलाकार कैसे मुँह मोड़ ले अपनी कला से। अदभुत- अबकी मैं नजरें नहीं फेर पाती। कोई वैसा है भी तो नहीं जिसे घर जाकर इसे लेने भेजूँ।...कोई उतना बड़ा भी नहीं। कुछ भी नहीं होता इसे उठा लेने से। घर में भी तो न जाने कितनी बार भूले-भटके कितनी चीजें उठा लेती हूँ। कब होता है कुछ।
मैंने हौले से पत्थर उठाना चाहा है...क्या यह पत्थर जितना बाहर है उतना ही भीतर? देखकर तो ऐसा कुछ भी अनुमान नहीं हो रहा था। मैं थोड़ी और ताकत लगाती हूँ, थोड़ी...थोड़ी और। मैंने झटके से पत्थर को छोड़ दिया है...यह कलाकार ही हार है...कि औरत की जीत...चिलक उठ रही है बार-बार, रह-रहकर। मैंने घर जाने के लिए खुद को किसी तरह सहेजना चाहा है। रह-रहकर होती कोई चिलक, फिर सुसुआता सा कोई क्षीण बहाव...घर आते-आते बहाव तेज हो उठा है...
इंजेक्शन, दवाईयां, ग्लूकोज। लड़कियाँ, माँ सब मेरे साथ रह रही हैं बारी-बारी। डाक्टर कहती है शायद स्थिति काबू में आ जाये। प्रीमेच्योर बेबी हम नहीं चाहते...सौ परेशानियाँ होती है उनके साथ।...डाक्टर कहती है आपरेट करना पड़ेगा। बच्ची की साँस की गति धीमी हो रही है, शायद इंफेक्शन की वजह से...मैं शर्मिंदा हूँ, मेरी ही वजह से यह सब कुछ। मैं आपरेशन थियेटर में जाने से पहले सबसे माफी चाहती हूँ, इस तरह से सब को परेशान करने के लिए। माँ मेरी जुड़ी हथेलियों को अपनी हथेलियों के बीच कस लेती हैं, आँसू से धुंआई हुई हैं उनकी भी आँखे कि मेरी गीली आँखों का यह कोई भ्रम है?
 बच्ची माँ की गोद में है। लड़कियाँ उसे माँ से छीन रही है जबरन। माँ उन्हे झिड़क रही हैं।...माँ कह रही है मुझसे- ''आज से तू आजाद, जो चाहे सो कर... मैं अपने सब से बड़े बंधन को प्यार भरी नजरों से जी भर निहारती हूँ।...
...लान में मेरी सवा साल की बच्ची सभी लड़कियों के साथ मिलकर गढ़ रही है कुछ... ढेर सारी माटी उसके हाथ में है, कुछ चेहरे पर और कुछ मुँह में। मैं, माँ और त्रिवेणी यानी हम तीनों माएँ उसे देख-देख बलिहारी हैं...
...बच्ची के जन्म के बाद आज मैंने पहली मूर्ति बनाई है। मैं खुशी से चिल्लाना चाहती हूँ... रो पड़ना चाहती हूँ फूट-फूटफूटकर। पहली बार पिता की छवि ठीक-ठीक उभरी है मुझसे। ...हमारे 'एक मुट्ठी आसमान में हमारे आकांक्षाओं जितनी खुशियां हैं, जरूरत भी चाँदनी, धूप,रोशनी और हवा भी। तो क्या मैं माटी हो रही हूँ, पिता के शब्दों में उपजाऊ-उर्वर माटी? हरियाले दूब की धातृ? 
                         
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हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

3 comments:

  1. samakaaleen sandarbh me stree man ke gahare padatal ki kahani. Kavita ji ne moortikalaa kee baareekiyon ko jis tarah se kathanak aur usake paatro kee manahsthitiyon me piroya hai vah unake lekhakeey kaushal ka parichayak hai. yah kahani nihsandeh samakalin kahani kee ek uplabdhi hai. Kavita ji ki bahut badhai.

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 14 जनवरी 2016 को लिंक की जाएगी ....
    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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