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Tuesday, February 26, 2013

पंकज पराशर की कविताएं



पंकज पराशर की ये कविताएं उनके पाकिस्तान प्रवास के दौरान लिखी गई हैं – इन कविताओं एक खास विशेषता यह है कि पंकज ने हर कविता उस खास शहर में रहते हुए ही लिखी है। उनकी कविताओं में पाकिस्तान के ये शहर सिर्फ शहर नहीं रह जाते वरंच कुछ और भी हो जाते हैं। यह कुछ और हो जाना ही वास्तव में कविता है जो इन कविताओं का भी प्राण है।
अनहद पर हम इसबार पढ़ रहे हैं युवा कवि आलोचक पंकज पराशर को। हमेशा की तरह आपकी बंबाक प्रतिक्रियाओं का इंतजार तो रहेगा ही...।

लाहौर
(सुंदर दास रोड, लक्ष्मी चौक और लाला छतरमल रोड पर घूमते हुए)
यहां किसी ध्वनि तरंग को अनुमति नहीं भारत से आने की
पासपोर्ट पर लगी वीजा की मुहर अभयदान की मुद्रा में
हाथ थामते हुए कहती है-
कभी जो वर्तमान था अब इतिहास है
जहां से निकले अनेक ध्वनि तरंग
आज भी इतिहास पर उंगलियां उठाता है

जिस लाहौर नइं वेख्या ओ जम्या ही नइं-
कौन कहता था?
कौन जन्म लेने की सार्थकता को लाहौर देखने से जोड़ता था?
आज भी सुनाई देती है फजिर की अजान अमृतसर तक
उस लाहौर को अब महज महसूस किया जा सकता है

बाजार अनारकली में एक अस्सी साला बूढ़ा
आज भी सुनाता है असंख्य जन्मों के अकारथ चले जाने की कथा
रात के तीसरे पहर में जब जागने की गुहार लगाता है इतिहास

जब-जब इस्लमाबाद से निकली हुई तेज हवा
तूफान बनकर छा जाती है तारों भरे आसमान में
लहोर लहोर कहकर आर्तनाद करने लगता है
भग्न-विस्थापित हृदयों का हाहाकार

दरबारों में गिरफ्तार इतिहास का स्वर-पहाड़
पंजाबी में पश्तो में सिंधी में उर्दू में
अभिव्यक्ति की राह ढूंढ़ता बुल्ला की जानां
लहोर लहोर के उच्च स्वर में

कितने पैमानों से मापा गया पानी
पानी-पानी हो चुकी पृथ्वी की छाती के टुकडों-टुकड़ों में
खून-खून हो चुके आत्मा के किनारे गिद्धों का झुंड उड़ता रहा
चोंच में भर-भर कर असंख्य स्त्रियों-शिशुओं का नरमुंड

मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना की रेखा रेड क्लिफ की गवाही में
लाहौर के पागलों को टोबा टेक सिंह* में रूपांतरित करता
वधस्थल पर चीत्कारोल्लसित टैंक के मुंह पर
अमृतसर के अमृतविहीन होने की पुष्टि करता
आज भी पड़ा है मेरी जेब में पासपोर्ट –वीजा बना हुआ
***
*सआदत हसन मंटो की एक कहानी.




रावलपिंडी
1.
रावलपिंडी से आज भी बहुत दूर है लाहौर
जहां स्वतंत्रता का समवेत स्वर
प्रचंड नरमेध के इतिहास में बदल गया था

दूर-दूर होते समय में शोर करती अनंत स्वर-श्रृंखला-
...जो भी था निकट अब दूर हो रहा है
दूर-दूर होकर विलीन हो रहा है

चारों दिशाओं में घूमते इंसाफ के अलंबरदार और चौधरीगण
इंसाफ करने के लिए परेशान हैं वर्तमान से इतिहास तक
वे आतुर हैं इतिहास तक पहुंचकर इंसाफ करने के लिए
2.
जैसे ही मैं फोन पर होता हूं खांटी मातृभाषी
भारत से आए फोन पर मां से करता हूं बातचीत
कि अचानक मेरी ओर मुड़-मुड़कर देखता है मेरा टैक्सी ड्राइवर करीम खान
अविश्वास और आश्चर्यमिश्रित स्वर में पूछता मेरी मातृभाषा में-
भाईजान, क्या आप हिंदुस्तानी हैं?
मेरे अब्बा से मिलेंगे आप?
वे बोलते हैं यही बोली जो अभी बोल रहे थे आप
और धीरे-धीरे फैल जाता है मेरी टैक्सी में
अविभाजित हिंदुस्तान का भागलपुर रावलपिंडी की राह में
3.
मेरे डाकघर की मुहर में आज भी कायम है मुंगेर
और यहां कतरनी धान का चूड़ा याद करते हुए करीम खान के बुजुर्ग पिता
मौत से पहले एक बार जरूर देखना चाहते हैं
अपना देश
एक पूरा देश मिलने के बाद भी वह ढूंढ़ते हैं आज भी
अपना-सा एक देश

अपने देश से नगर-नगर घूमते हुए मैं पहुंचा हूं रावलपिंडी
जहां आज भी मेरे पीछे आ गया मेरा देश

कोस-कोस पर परिवर्तित होता हुआ पानी
इतनी दूर आकर भी वैसा ही लगता है जैसे अपने गांव के कुएं का
और दस कोस पर बदलती बानी पैंसठ बरस बाद भी
लगी वैसी ही जैसी आज के भागलपुर की

मैं देखता हूं इतिहास की ओर और इतिहास मेरी ओर
सामूहिक स्मृति से विलीन
जो मिलता है कई कोस दूर रावलपिंडी में
4.
यहां एक साथ घट रहा है अनेक घटनाचक्र
गेहूं के लिए तनते ए.के. सैंतालिस
सैंतालिस से सैंतालिस के चक्रवृद्धि को देखते
रावलपिंडी के कोने-कोने से आए बुजुर्ग
मंत्र की तरह बुदबुदाते हैं-
इस्लाम-आबाद
आह...बाद...आह...बाद...
आबाद लोगों के बीच सब बरबाद!
5.
बाघा की बाधा दुनिया की तमाम बाधाओं से ज्यादा मुश्किल है जनाब
आप आए मुझसे मिले...
मिले विलीन होकर अस्सी वर्ष के संचित आंसू में
मुझे मात्र लहो...लहो...लहो...सुनाई पड़ा
सृष्टि का सबसे आदिम स्वर पंचम तक उठते हुए

भागलपुर की सामूहिक स्मृति से विलीन
इतिहास की जीवंत कथा फैल रही थी रावलपिंडी में
वर्तमान के कैनवस पर.
***

पेशावर
फजिर के अजान के स्वर-पंथ पर आगे बढ़ता
ढूंढ़ता हूं इस भूगोल में इतिहास का पुष्पपुर
जहां किशमिशी लहू में लिथड़े हैं मेरे पांव
और मैं सीमांत गांधी के आकुल पुकार धंसने लगता हूं

अनंत पतझड़ में झरते हैं यहां पत्तों के संग-संग
रंग-बिरंगे कारतूसों के खोखे
खोखे में छिपे शिया और सुन्नियों के बंदूकों से
नफरत की अंतहीन कड़ी शबो-रोज
अपने-अपने आग्रहों के प्रतिष्ठार्थ

स्थापना और शिलान्यास की राजनीति में राम
सियाराम मय सब जग जानी से सर्वथा पृथक
महज जय श्रीराम होकर रह गए हैं
और न जाने क्यों लोकतांत्रिक देश की अयोध्या में भी सीता
राम के संग  स्वीकार्य  नहीं हो पा रही है?

पेशावर में बार-बार याद आती है
अश्रु-विगलित सीता की क्रंदित छवि
व्यथित स्वर में पृथ्वी से प्रार्थना करती हुई
शुक्लपक्ष की रात के अंतिम पहर में

पंक्तिबद्ध सीताओं की छाती पर आज भी गरजता है बंदूक
पिता-भ्राता की मर्यादा के रक्षार्थ
रत्नगर्भा पृथ्वी रक्तगर्भा बनी कांपती है
तलातल से रसातल तक

न जाने क्यों अहर्निश आती रहती है
पृथ्वी में विलीन होती सीताओं की आकुल पुकार
शुक्लपक्ष की रात के इस अंतिम पहर में
फजिर के अजान में मिलती हुई
अयोध्या से लेकर पेशावर तक आज भी उसी तरह.
***

कराची

पिछले कई दशकों से उठती है हूक
और समुद्र की गर्जना में विलीन हो जाती है

यहां मौजूद है बनारस
सहारनपुर मेरठ गया और बुलंदशहर
अपने निर्णय से बेबस और उदास
मैं अपने बत्तीसवें साल में करता हूं
साठ सालों से मुलाकात

समय पूछता है समय से
कैसा है अब मेरठ कैसा है बुलंदशहर
कैसा है गया और कैसा है सहारनपुर
प्रश्नाकुल जनसमूहों के बीच खड़ा समय
बांट पाता है समय को सिर्फ कुछ बूंद आंसू

अब उन दिनों में लौटना नामुमकिन है
उन यादों में लौट पाना नामुमकिन है
और मुमकिन से असंतुष्ट कराची
नामुमकिन में लौटने के जिद पर अड़ा था!
***

ननकाना साहिब

चिड़िया डरती है
डरती-डरती चीख़ती है
और उड़ जाती है निस्सीम गगन में

इस भूगोल में इतिहास का ऑक्टोपसी जकड़
और वह भी नहीं तो क्या
कि तोप की आवाज सहज लगती है
और चिड़िया की भयाक्रांत!

लाउडस्पीकर से ग्रुरुवाणी का लयात्मक स्वर
फैलता है अंतरिक्ष में
और सड़क उसी तरह पसरा रहता है
निस्तब्धता का साम्राज्य

सफरी झोला उठाता बढ़ाता हूं कदम
किसी और नगर की ओर देखता हूं
देखता हूं चहुंओर आकुलता से
मगर दिखाई नहीं देता कहीं
चिड़ियों का कलरव करता झुंड!
***
सभी कविताओं का अनुवादः स्वयं कवि


पंकज पराशर

संपर्कः सहायक प्रोफेसर, हिंदी विभाग,

ए.एम.यू., अलीगढ़-202002 (उत्तर प्रदेश)

फोन- 0-9634282886.


हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Saturday, February 9, 2013

रामजी यादव की कविताएं



रामजी यादव

रामजी यादव कहानी और कथा दोनों ही विधाओं में समान रूप से सक्रिय हैं। उनकी कहानियों में गांव और कस्बे की विद्रुपताएं अपने यथार्थ एवं मार्मिक रूप में प्रस्तुत हुई हैं। कवि के रूप में रामजी यादव अपनी कथन की भंगिमा और बिंबों की सरल और संवेदनात्मक गहराइयों की बदौलत अलग से पहचाने जा सकते हैं। वे बहुत ही मद्धिम स्वर में अपनी बात जोरदार ढंग से कहने में सक्षम हैं – यही कारण है कि उनकी यहां प्रस्तुत कविताएं अपने कई पाठ के बाद भी हमारे जेहन में बची रहती हैं – हमें कुरेदती-उद्वेलित करती। रामजी यादव की ये कविताएं यह अहसास दिलाती हैं कि वे एक संजीदा कवि हैं और उनकी कविताएं पाठकों तक संजीदगी से पहुंचनी चाहिए। इस बार प्रस्तुत है अनहद पर रामजी यादव की ताजातरीन कविताएं..। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार तो रहेगा ही..।
                 
               
दिल्ली
एक दिन चले जायेंगे वे सभी जो कभी आये थे
दिल्ली में इस सपने के साथ कि यहीं रहेंगे
रचेंगे कवितायेँ और सुने जायेंगे देशभर में
क्योंकि यहीं से जाती है आवाज हर कहीं
और यहीं पर है जंतर-मंतर

एक दिन भूल जायेंगे अपने जन्म-जनपद को
करेंगे कभी-कभी याद और तरस खायेंगे उसके सुविधाहीन पर्यावरण पर

इमारतों के इस बियाबान में जिन्होंने तलाशे थे कुछ पते
और पहुँचते हुए यदा-कदा शामिल हो जाते छंटी हुई भीड़ में
इस तरह वे समझते कि वे एक सांस्कृतिक पर्यावरण में हैं

बहुत देर बाद उन्हें भान हुआ कि दलालों की इस बस्ती में
एक दिन वही बचेगा जो अफसर होगा
या दो-चार अफसरों से कर सकता है यारबाशी
वही पायेगा कोई पुरस्कार और माना जायेगा वही कुछ
जो लिख देगा उनकी किताब की एक समीक्षा


जो बात करेगा इसके विरुद्ध
जो बात करेगा जनता के बारे में
जो बात करेगा सांस्कृतिक एडल्ट्रेशन के खिलाफ
जो बात करेगा कि रुलाई और रुलाई में फर्क होता है
जो बात करेगा कि मुस्कान और मुस्कान में फर्क होता है
जो करेगा इंगित कि कुछ लोग जोर से रोते हैं इसलिए की पीढ़ियों से जानते हैं रोने की कला
बिना मुद्दे को व्यक्त करते हैं कुछ अदृश्य दुःख 
मुस्कराते हैं कुछ लोग कि निर्मम तंत्र के खिलाफ अपना वजूद बचा सकें
भूख से लड़ने और कातरता से बचने के लिए साथ-साथ चलनेवाली कार्रवाई
के दोहरे दायित्व से जो संपन्न करेंगे कविता को

वे बेरोजगार मार दिए जायेंगे बेमुरौव्वत
हंस लिया जायेगा सरेआम उनकी बेबसी पर
बाहर कर दिया जायेगा शब्दों की दुनिया से
फिर भी सत्ताएं रखेंगी उन्हीं से सहानुभूति की उम्मीद

हर जगह से लोग जासूसी करेंगे कि कब उठाते हैं वे दया के लिए अपने हाथ

जिन्होंने इस शहर को महसूस किया होगा अपनी धमनियों में
और एक मोहल्ले की तरह जिया होगा उसे हर साँस में
और उसके सौन्दर्य को देखा होगा मनुष्यता की लाज की तरह
वे खदेड़ दिए जायेंगे एक दिन वहां से बेरहमी से

भारत के न जाने किन कोने-अंतरों से आये वे लोग
जो विचारों से संपन्न होंगे और भाषा को ले जायेंगे एक दिन जिंदगी के दरवाजे तक
फिर से बिखर जायेंगे न जाने कहाँ-कहाँ
आगरा , मथुरा , बनारस और कानपुर
मुंबई , बडौदा , लातूर और किशनगंज
और रह जायेंगे एक नाम की तरह पानी पर लिखे गए

क्यों चले जायेंगे वे आखिर इस शहर से ?
क्या डंकल से ओबामा के दौर तक
मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह अहलुवालिया के निजाम तक
उससे भी आगे और आगे ढेरों बरस

ज़रुरत है दिल्ली को बस ऐसे लोगों की जो नफ़ीस हों दिखने में
लेकिन सपने मर गए हों उनके या बिक गए हो सत्ता के हाथ
क्लर्क हों ,अफसर हों , कातिल हों , जाहिल हों
बस जनता की बात न करें

और सोचें न कविता यात्रा निकालने के बारे में !!

        
एक दिन हो जाऊंगा मैं एकदम असली इंसान


 
किसी स्त्री ने इस कदर नहीं छुआ मन को
कि सारी आकांक्षाएं लगी हों तुच्छ

ह्रिदय में कभी नहीं भरा इतना आवेग
कि मुझे लगा हो कि नितांत मेरा समय है यह

कभी मैंने किसी ठूंठे पेड़ को भी न देखा ऐसे
कि उसे मान लूं एक इतिहास

मैं हर पक्षी के लिए चितित हूँ
-- और उन घासों के लिए भी
जो हमारी दुधारू गाय-भैंसों 
और खटेल बैलों को देती हैं जीवन

जिन्हें बड़े आराम से चरती हैं बकरियां पहाड़ों पर चढ़कर 
गदहे और घोड़े भी साथ-साथ लेते हैं लुत्फ़

मैं सभ्यता के उन आदिम समाजों के लिए चिंतित हूँ
जो आज भी नहीं यकीन रखते सिक्कों की खनक में
जो आज भी लेते हैं धरती से उतना ही जितने में चल सके जीवन
और उतना ही लेकर रहते हैं इस कदर अहसानमंद
कि आजतक न किसी क्रीम को छूते हैं और न डिस्परीन ही लिया
जो आज भी बंधे हैं प्रकृति से इतने गहरे
कि हजारों हिंस्र , लालची हत्यारों से लगातार घिरने के बावजूद
पलायन करने से बेहतर समझा है लड़ना
और रोज ही अर्पित कर देते हैं अपना इतना खून
कि बंदूकों और डायनामाइट से थरथराते जंगलों ने भी
हरे रहने की हिम्मत बचा रखी है अपने भीतर अभी

उन जंगलों के भविष्य को लेकर इतना चिंतित होने लगा हूँ
जो तुम्हारे शहर के लिए जाते हुए मिलेंगे
मैं चाहता हूँ बने रहें वे
और हाथ हिलाते हुए कहें गाते हुए कि ठीक है तुम्हारा हालचाल !

तुम उतनी ही नम आँखों से जीती हो जीवन
जितनी नमी चाहिए धरती की उर्वरता के लिए

मैं चाहता हूँ रहें वे हरे भरे इतने कि मेरे दिल को भांप कर हंस पड़े
कि एक पागल ने देखो एक नदी का रुख  किया है
एक नदी भी देखो कितनी बेसुध और उजली

न जाने किस भाषा में भेजती है सन्देश
कि दो नहीं हज़ार दिल साथ ही धडकते हैं !!


अमरफल किसी की किस्मत में नहीं 

भर्तृहरी ने सोचा कि केवल रानी है सुपात्र
और केवल वही खाएगी अमरफल और देखूंगा उसे चिरसुंदर
रानी ने सोचा कि अगर चिरयुवा रहेगा सेनापति
तो मुदित रहूँगी मैं भी जियूँगी एक अमरप्रेम का सुख
सेनापति निबहुरा फंसा हुआ सोचता था अपने को
गिन्नियों के बदले सौंपता था शरीर
बेवफा ने रानी को ही माना बेवफा और दे आया गणिका को
गणिका ने सोचा सेनापति का क्या ! मारा जाएगा कभी भी
या हो सकता है उसके सीने पर सूंघा हो रानी के इत्र की खुशबू
या हो सकता है सोचा हो उसने कि प्रेम ही करूँ तो क्यों न राजा से करूँ
बीच में क्यों रहूँ टंगकर और एक खरे सौदे की तरह उसने भी सौंप दिया राजा को
और चाहा कि राजा उसे दिल न दे न सही एक सच्ची मुस्कान तो दे 
ताकि भरी रहें स्मृतियाँ और सार्थकता का मिले एक बहाना

पता नहीं राजा को ज्ञान मिला या वैराग
लेकिन अमरफल किसी की किस्मत में न था

हे प्रेमिकाओ ! निषेध करो , निषेध करो , निषेध करो सत्ता का
बांटो अमरफल और चुनो सुपात्र
हे प्रेमियो ! झुकना सीखो और उतरना सीखो स्त्री के मन के आँगन
तानाशाह की तरह उतरे तो नहीं पाओगे अमरफल
और थूकेंगी पीढ़ियाँ तुम्हारे दुर्भाग्य पर !


कितना विपर्यय है और कितनी देर बाद में समझ आया

जो खोजते हैं जीवन का सौंदर्य वे केवल पागलपन ही बचा पाते हैं अपना
बहुत कुछ खो देते हैं दुनिया का और बहुत कुछ बेकार हो जाता है उनके लिए
बहुत कुछ को कूड़ा समझते हुये दूर चले जाते हैं बहुत कुछ से
एक-एक सांस को लगा देते हैं विद्रूपता के नुकसान में
अपने सारे आविष्कारों को सौंप कर चले जाते हैं ऐसे
जैसे इतने ही अपराध हो पाये हों सम्पूर्ण सामर्थ्य से
बस एक विनम्र सी चुपचाप अनुपस्थिति में उपस्थित रहते हुये
एक आकर्षक और दुर्निवार पागलपन छोड़ जाते हैं वे

कितना विपर्यय है और कितनी देर बाद में समझ आया
कि कितनी चतुराई से खड़ी हैं सारी सत्तायेँ पागलपन के विरुद्ध
कितनी मुस्तैदी से अकड़ा है जज अपनी कुर्सी पर
कितनी निर्ममता से सूंघ रहा है सिपाही अपना आसपास
कितनी बेशर्मी से संचालित है संसद उनके इशारे पर
जो एक ही दिन में पी जाना चाहते हैं सारे समुंदर
खा जाना चाहते हैं एक ही निवाले में समूची धरती
चबा जाना चाहते हैं एक साथ सारे के सारे जंगल
बाक्साइट और लोहे और कोयले और अबरख की खदानों के लिए
गाँव के गाँव तबाह करना बहुत मामूली है जिनके लिए
वे सबसे अधिक विचलित हैं पागलपन से भरे उन लोगों से
जो जीवन सौन्दर्य ढूंढते हुये उठा रहे हैं उनकी तरफ उंगली

कितने षडयंत्रों से मारा जाता है उसे जिसमें जरा सा भी दिखता ही पागलपन
जो कह पाता है कि असंख्य जोंकों और परजीवियों से ग्रस्त जीवन नहीं है विकास


जीवन के सौंदर्य की खोज में निकले और
अपने पागलपन को बचाते हुये जो हो गए अनुपस्थित
उनके एक वंशज की तरह देख रहा हूँ मैं सौंदर्य
और कोई भीतर से कह रहा है अनवरत
कि अगर बचाए रखे अपना पागलपन
तो बचेंगी सारी संभावनाएं और सौंदर्य भी अवश्य !

तुम्हारा होना बिना शब्दों के संदेश में भी वैसे ही है जैसे तुम सचमुच हो

पता नहीं इसे तुमने भेजा है कि यह चला आया है जबरन
हो सकता है तुमने सोचा हो और इसे कहने वाली ही थी कुछ
कि तुम्हारी उँगलियों ने कर दी हो फर्माबरदारी
और इसने भी रास्ता नाप लिया हो ऐसे
जैसे किसी ऊंट को खोला हो ऊंटहारे ने लदनी के लिए
और वह बेसबरा बढ़ चला हो एकदम खाली पीठ
 अपनी कूबड़ को ही समझते हुये पीठ पर लदा असबाब

कभी-कभी हो उठता है ऐसा लोग कहते हैं
कि दिल वफादार हो तो हो जाती है सारी की सारी कायनात ही वफादार
और अक्सर होने लगता है ऐसा जैसा कभी नहीं चाहा किसी ने

यूं कभी चुप तो नहीं रहती तुम इतनी की शब्दों को कर दो उपेक्षित
भले ही सुनते हुये मुझे तुम कान हो जाती हो
लेकिन शब्दों से नाता तो रखती हो अटूट
तो क्या किसी और ने भेजा है इसे एकदम खाली
क्या कोई खलनायक है हमारे बीच सक्रिय
और कह रहा तुम्हारे बहाने कि तुम शब्दरहित हो मेरे लिए !

लेकिन पता है समूची सृष्टि को अब
तुम्हारा होना बिना शब्दों के संदेश में भी वैसे ही है जैसे तुम सचमुच हो
तुम्हारा होना वैसे ही बिना आकार भी है जैसे कि तुम सचमुच हो
तुम्हारा होना बिना आवाज के भी वैसे ही है जैसे सन्नाटे में मौजूद हो लय
और बिना कुछ लिखे इस संदेश में तुम उतनी हो जितनी शब्दों में सुनता हूँ तुम्हें
तुम्हारा होना सदियों की उदासी के बीच उल्लास की एक उपस्थिति है

क्या तुम भी हो रही हो उतनी ही बेखबर
कि तुम्हारी आँख में उभरती है एक तस्वीर और सक्रिय हो उठता है वातावरण
क्या तुम भी उतनी ही निकल चुकी हो अपने आपे से
कि तुम्हारी उँगलियों ने भी भुला दी है दीन दुनिया
क्या तुम उतनी ही घिर गई हो खुशियों से
कि तुम्हारा मोबाइल भी हो गया है खब्तुलहवाश
क्या तुम इस कदर हो इंतज़ार में लीन
कि लोग जिसे सच कहते हैं वह लगता है एकदम सफ़ेद झूठ

अगर शब्द होते तो पढ़ चुका होता अब तक
और आकर जा चुकी होती वापस खुशी की लहर
बिना शब्दों का यह संदेश जी रहा हूँ न जाने कब से
एक तर्क देता हूँ तो हजारों सवाल और भी सिर उठाते हैं !


किस्सा पुराना है

लाखों जंगलों की राख़ के कणों की संख्या से भी ज्यादा वर्षों पहले
तपते हुये अग्निपिंडों से पिघलते लावों के ठंडा होने से भी पहले
उससे भी पहले जब बूंदें बनना शुरू हुई होंगी पहली
पृथ्वी ने आकार लेना शुरू किया होगा उससे भी पहले
मैंने चाहा होगा तुम्हें इतनी ही शिद्दत से
और तुम न मिली होगी तो बदल गया होऊँगा कोयले में

सहस्राब्दियों तक दबा रहा होऊंगा धरती की गर्भ में
और बाहर निकाला गया होऊँगा फिर से धधकने के लिए

एक मनुष्य एक मनुष्य के लिए कोयले से भी तेज धधकता है !



 


हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad