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Thursday, April 17, 2014

'एक देश और मरे हुए लोग' पर प्रदीप कान्त

सामाजिक सरोकारों को पूरी करती कविताएँ
-    प्रदीप कान्त

महज लिखनी नहीं होती हैं कविताएँ/शब्दों की महीन लीक पर तय करनी होती है एक पूरी उम्र...



कविता के लिये शब्दों की महीन लीक पर एक पूरी उम्र तय करने की बात करने वाले युवा कवि विमलेश त्रिपाठी का नाम साहित्य जगत के लिये किसी भी परिचय का मोहताज नहीं है। एक छोटे से गाँव से आकर रोजी रोटी के लिये कोलकाता में बसे विमलेश अपनी कविताओं में समकालीन यथार्थ रचते हैं। हाल ही में बोधि प्रकाशन से प्रकाशित उनका कविता संकलन एक देश और मरे हुए लोग इस बात का सबूत है। संग्रह का शीर्षक ही सोचने समझने को मजबूर कर देता है कि यह हमारे ही देश के मुफलिसों की कविताएँ हैं। इस संग्रह की कवितायेँ पांच खण्डों में हैं- इस तरह मैं, बिना नाम की नदियाँ, दुख सुख का संगीत, कविता नहीं तथा एक देश और मरे हुए लोग|

पहले खण्ड इस तरह मैं की ज़्यादातर कविताएँ आम आदमी को समर्पित है तो बिना नाम की नदियाँ स्त्रियों को। दुख़-सुख का संगीत की कविताएँ स्मृतियों के बहाने आत्मालोचन की कविताएँ हैं तो कविता नहीं की कविताएँ कवि और कविताओं की बात करती है। एक देश और मरे हुए लोग इस संकलन का सबसे प्रभावशाली खण्ड है जहाँ इस देश बेबस आदमी नज़र आता है। इस खण्ड की लगभग सारी कविताएँ लम्बी कविता श्रंखलाएँ हैं। यहाँ लगता है कि विमलेश छोटी कविताओं में जितनी सहजता से बात करते हैं उतनी ही सरलता से लम्बी कविताओं का निर्वाह  करने में भी बहुत हद तक सफल हैं।

विमलेश के कवि की पहली ही अभिव्यक्ति - इस कठिन समय में/बोलना और लिखना/सबसे अधिक दुश्कर होता जाता मेरे लिये... (इस तरह मैं)| कितना भी दुश्कर हो किंतु कवि तो लिखेगा ही और विमलेश का कवि भी इससे पीछे नहीं हटता। सुख सुविधाओं से चमचमाता और सम्भावनाओं से भरा दीखता शहर गाँव से एक आदमी को आकर्षित करता है। सामान्यत: आदमी शहर में रम भी जाता है किंतु कुछ लोग होते हैं जिन्हे शहर की रोज़ रोज की भागम भाग और अनात्मीयता रह रह कर गाँव का आत्मीय वातावरण याद दिलाती है। कोलकाता महानगर में रहता विमलेश का कवि आज भी गाँव की आत्मीयता नहीं भूलता। विमलेश का कवि कविता के माध्यम से ख़ुद को खोजता है। जो शायद इसी शहर में कहीं खो गया है| कवि की कविता यह वही शहर पढ़ते हुए यह साफ़ पता चलता है कि कवि भले ही शहर में बस गया हो मगर उसका मन इस शहर को कभी अपना नहीं सका। यहाँ तक कि उसे अपने आस-पास कविता के अलावा कोई भी ऐसा नहीं दिखता जिससे वह अपने मन की व्यथा खुलकर कह सके। एक गाँव हूँ शीर्षक से कविता इसी बात की अभिव्यक्ति है। विमलेश का कवि कहता है – एक पाठशाला हूँ जो पेड़ के नीचे लगती थी जो कट गया पिछले दिनो (एक गाँव)। ये पाठशाला हम हैं और ये ख़त्म होते पेड़ हमारी संवेदनाएँ। और इसी लिये विमलेश का कवि कहीं जाऊंगा नहीं में उस चिड़िया को को याद करता है जो रोज आकर उसके घर की मुंडेर पर बैठती थी, अब नहीं आती|

विमलेश की कविता मनुष्य की कविता है जो आदमी में आदमीपन की तलाश करती है| आज हम जिस समाज में जी रहे हैं वह एक ऐसा समाज होता जा रहा है जिसमें एक आदमी दूसरे आदमी से या तो बात करता ही नहीं और करता है तो एक दूसरे की भाषा को समझने में असमर्थ है। विमलेश का कवि इसे नोटिस में लेता है और परेशान होता है और एक कविता लिखी जाती है – पेड़ से कहता हूँ।  चहुँ ओर बिखरे झूठ से परेशान विमलेश का कवि आगे कहता हैं – सच को सच की तरह/ कहने/ और सहने की शक्ति दो (यदि दे सको तो)। हालांकि कवि होना एक बेहतर मनुष्य होना है किंतु वर्तमान समाज में कवि का स्तर क्या माना जाता है – मूर्ख या पागल? विमलेश का कवि इसे सोचता है और हँसी-ख़ुशी मूर्खता का वरण करने को तैयार होता है – कहता है – आज के समय में/ बुद्धिमान होना/ बेईमान और बेशरम होना है (स्वीकार)।  

इस धरती पर कई ऐसी नदियाँ भी पाई जाती है जिनके नामों का अता पता नहीं मिलता। नामी नदियाँ अगर सूखने लगे तो चिन्ता होती है किंतु बिना नाम की नदियाँ सूख कर ग़ायब भी हो जाएँ तो उनकी चिंता कोई करने वाला नहीं। संकलन का दूसरा खण्ड है – बिना नाम की नदियाँयह खण्ड भी ऐसी ही स्त्रियों को समर्पित है जो हमारे घर, मुहल्ले, गाँव, देश में जन्म लेती हैं, जीती हैं किंतु उनके दर्द की चिंता उनके घर वाले भी नहीं करते।

कवि की दृष्टि की व्यापकता यह है कि वह किसी एक चीज़ के कई रूपों को देखने में समर्थ हो और यहाँ विमलेश के कवि की भी दृष्टि की व्यापकता नज़र आती है– चाहे होस्टल की लड़कियाँ हो या बहने, माँ या पत्नी, विमलेश की कविता में आती हैं और अपनी अपनी व्यथाएँ बता कर चली जाती हैं और पाठक के मन में टीस छोड़ जाती हैं। उस लड़की की हँसी का कर्ज़दार बनकर विमलेश का कवि कहता है – फिर कहता हूँ/ कर्ज़दार हुआ मैं तुम्हारा/ कि कैसे चुकाऊंगा यह कर्ज/ नहीं जानता/ हाँ, फिलहाल यही करूंगा/ कि कल तड़के घर से निकलूंगा/ जाऊंगा उस औरत के घर/ जो मेरे दो बच्चों की माँ है/ और पहली बार/ निरखूंगा उसे एक बच्चे की नज़र से/ कहूंगा कि हे तुम औरत/ तुम मेरी माँ हो/ और अपने छूटे हुए घर को/ ले आऊंगा साथ अपने घर ...(उस लड़की की हँसी)।       

स्त्री विमर्श के बड़े बड़े दावे करने वालों को विमलेश की कविता माँ के लिये की भाषा समझनी चाहिये – तुम तो यह भी नहीं जानती/ कि ‘क’ के ठीक बाद लिखना होता है ‘ख’/ म में एक अकार देने के बाद लिखा जा सकता है ‘माँ’/ तुम्हारे पास थी एक दूसरी भाषा/ जिसे घर का कोई नहीं समझता था (माँ के लिये)। विमलेश का कवि एक तरफ़ माँ के दर्द को परत दर परत खोलता है तो दूसरी तरफ बेटी की उस बात को भी बयान करता है जिसमें वह अपने सदियों के दर्द को दूर करने वाले के पास जाना चाहती है – भेजना मुझे तो भेजना बाबुल/ उस लोहार के पास भेजना/ जो मेरी सदियों की बेड़ियों को/ पिघला सके (अगर भेजना)

दुख-सुख का संगीत स्मृतियों के बहाने आत्मलोचन की कविताओं के खण्ड है। यहाँ विमलेश का कवि अपने और औरों के दुखो सुखों की पड़ताल करता नज़र आता है और अपने अस्तित्व के लिये भी दुख का शुक्रगुज़ार पाया जाता है। दुख को एक सकारात्मक चीज़ की तरह परखते हुए यह कवि कहता है – दुख ने ही मुझे/ अपने कवि के साथ/ साबुत रहने दिया (दुख)। तो दूसरी और यही कवि सपनों के दूसरे पहलू पर बात करता है जिसके बारे में सामान्यत: सोचना मुश्किल होता है- बहुत ज़माने पहले बारिश के पानी से भीगते/ जेब में नौकरी की आर्ज़ियाँ थे/ दफ्तर के सीढियों पर बेमन/ दौड़ते एक जोड़ी जूते/ सामान्य अध्य्यन की मोटी किताब के पन्नों में छुपे/ एक लड़की के लिखे/ आख़री ख़त के काँपते शब्द थे/ धुधलाए से (सपने)
इसी आत्मालोचन के बहाने विमलेश का कवि साम्प्रादायिकता से आँख मिला कर सम्वाद करता है और तुम्हे ईद मुबारक हो सैफुद्दीन जैसी कविता लिखता है – मेरे पिता ने कभी सिवैयाँ नहीं खाई/ तुम्हारे घर/ माँ ने हमेशा तुम्हे दूसरे कप में चाय दिया/ तुम घर के भीतर कभी नहीं गए मेरे/ तुम तो जानते भी नहीं कि/ मेरे पिता से तुम लोगों के लिये/ कितनी बार हुआ मेरा बिगाड़/ तुम मेरे घर में नहीं/ मेरे दिल में रहे हमेशा। यह कवि ही है जो कहीं जीवन को शोकगीत की तरह गाता है तो कहीं घर पर छोटी छोटी कविताओं बड़ी अर्थवत्ता की बात करता है – घर दरअसल हमारे मन के भीतर रहता है कहीं/मन के बाहर सिर्फ़ दीवारें होती है (घर)। और यह भी कवि की सम्वेदनाओं का विस्तार ही है कि शोकगीत गाता कवि भी बचे रहने की बात करता है – ख़ुद को ख़ुद के सामने खड़ा करना/ ख़ौफ से नहीं/ विश्वास से/ शर्म से नहीं/ गौरव से/ और कहना समेकित स्वर में/ कि हम बचे रहेंगे/ बचे रहेंगे हम (बचे रहेंगे हम)।

कविता और कवि के बारे में बहुत से कवियों ने बहुत सी कविताएँ लिखीं हैं पर विमलेश का अन्दाज़ ही अलग है। संकलन का खण्ड कविता नहीं की सशक्त कविताएँ कविता और कवियों को ही समर्पित है। इस खण्ड को रेखांकित किया जाना इसलिये ज़रूरी हो जाता है कि यहाँ एक कवि कविता और कवि समाज के द्व्न्द और उहापोह को उजागर करता है। पहली ही कविता क से कवि मैं एक अलग शैली में लिखी गई कविता है जहाँ का बड़ी खूबसूरती से उपयोग हुआ है। यहाँ विमलेश का कवि से आम आदमीं का कंधा भी बना जाता है तो से कबूतर भी, और फिर अंत तक जाते से कवि के कद और क्रोध की बात करने लगता है – बहुत सोच समझ कर क से कवि का कद/ मैँ नहीं बढ़ा पाता/ क्यों कि क से कमबख़्त मैं नहीं कर पाता जोड़ तोड़ - / जानते बूझते नहीं कमा पाता पुरुस्कार-उरस्कार/ क से कर मोड़े/ नहीं खड़ा हो पाता कविता की पृथ्वी पर/ क से कब से/ क से इस कठिन समय में/ खड़ा हूँ चुपचाप देख रहा तमाशा/ क से अपने क्रोध के बाहर आने की कर रहा प्रतीक्षा (क से कवि मैं)। एक और कविता है नकार और/ सबसे/ अंत में/ लिखूंगा सरकार/ लिख कर/ उस पर कालिख पोत दूंगा/ फिर/ शांति नहीं/ युद्ध लिखूंगा/ और/ अपनी कलम की नोख तोड़ दूंगा। शांति नहीं, युद्ध की बात, ये विमलेश का कवि नहीं लिखता, ये उससे जनमानस का परेशान होना लिखवाता है। और यही कवि का कार्य भी है। इसी तरह एक और कविता तीसरा में विमलेश का कवि साहित्य की राजनीति को पकड़ता है।

एक देश और मरे हुए लोग इस संकलन का अंतिम खण्ड है जहाँ इस महादेश की बदतर स्थितियों में रोता-जूझता समाज नज़र आता है। इस खण्ड की कविताएँ लम्बी हैं। यहाँ लगता है कि विमलेश छोटी कविताओं में जितनी सहजता से बात करते हैं उतनी ही सहजता से लम्बी कविताओं में भी विषय वस्तु का निर्वाह करने में काफी हद तक सफल हैं। एक पुरानी कहावत है – बच्चा जब तक रोता नहीं तब तक माँ भी दूध नहीं पिलाती। और इस निष्क्रिय जनता के लिये क्या कहेंगे, ये चीख चीख कर रोए भी तो धूर्त सत्ता अपने विदुरों और भीष्म पितामहों के बीच धृष्टराष्ट्र बनी बैठी है। इसीलिये विमलेश इस महादेश की निष्क्रिय जनता और तथाकथित सत्ता के लिये एक लम्बी कविता रचते हैं –क्या चाहिए इन बच्चों को/ मोबाइल/लैपटॉप/ पॉर्न किताबें/ कम्प्यूटर/ या हवा और पानी/ और रोटी/ जो/ अब तक नहीं पहुँच पाई है साबुत/ और हमें गर्व/है कि हमने पिछले साल ही/ आजादी का छठवां दशक/ मनाया है (एक देश और मरे हुए लोग)। आजादी के साठ साल पूरे हो जाने पर भी हवा, पानी और रोटी की समस्या हल नहीं होना, उस भ्रष्ट तंत्र का चेहरा प्रस्तुत करता है, जिसका प्रभाव इस दशक तक जारी है। कवि का आक्रोश देर तक संयमित नहीं रह पाता। मनुष्य के राक्षस बनने की प्रक्रिया पर कवि उस विचारहीन, बेढाल, निर्द्वन्द्व अथवा मरे हुए लोगों की भाँति पीढ़ी पर व्यंग्य करता है - मैं इंतजार में था/ कि शब्द किस तरह बारूद और बंदूक में ढलेंगे/ कब उन शक्लों में ढलेंगे/ जिनका सदियों से/ कर रहा मैं इंतजार- (वही)यहाँ रोटी से खेलते तीसरे कौन पर धूमिल का प्रश्न याद आता है जिसके जवाब में संसद मौन है।

प्रदीप कांत
पढ़े जाने के बाद यह कविताएँ कहीं न कहीं मस्तिष्क की पृष्ठभूमि में गूंजती रह जाती हैं| कथ्य, शिल्प और भाषाई तौर पर सारी कवितायेँ ऐसी हैं कि साधारण व सामान्य पाठक भी इन्हें आसानी से आत्मसात कर सकता है। जहाँ तक भाषा का सवाल है विमलेश की भाषा उसी आंचलिक परिवेश से आती है जहाँ से वे हैं और ये अच्छी बात है कि वे कविता में भी अपनी आंचलिकता को सहेज लेते हैं। यह तय सी बात है कि कविताएँ पृथ्वी की है और उसमें भी इस महादेश की, कथ्य भी इस महादेश के परिवेश से ही आऐंगे, अंतरिक्ष से नहीं। और रचनाकार का दायित्व भी अपने समय और सामाजिक परिवेश को व्यक्त करने का है और इन्ही सामाजिक सरोकारों को पूरा करती विमलेश की कविता भी आश्वस्त करती है कि कवि की आँखें बन्द नहीं है, वह देख रहा है।  

एक देश और मरे हुए लोग’ (कविता संग्रह)
- विमलेश त्रिपाठी
- बोधि प्रकाशन, जयपुर।
- प्रथम संस्करण, 2013
- मूल्य 99/-
संग्रह के शीर्षक को सार्थक करता हुआ कुंवर रवीन्द्र का आवरण चित्र अर्थपूर्ण व कलात्मक है| इस बेहद विचारणीय, पठनीय और संग्रहणीय कविता-संग्रह को जनोपयोगी संस्करण के रूप में प्रस्तुत करने के लिए बोधि प्रकाशन को सलाम किया जाना चाहिये।




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हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Wednesday, April 9, 2014

'एक देश और मरे हुए लोग' पर डॉ. ऋषिकेश राय की समीक्षा

कविता का जनपद
डॉ.ऋषिकेश राय

1.     संग्रह की कविताएं विषयों के अनुसार उपशीर्षकों में विभाजित हैं। आत्माभिव्यक्ति की कविताएं इस तरह मैं, स्त्री जीवन की कविताएं बिना नाम की नदियां शीर्षक के तहत संकलित हैं। समकालीन कविता दो पाटों के बीच बहने वाली कविता है। एक निजता और उत्सवधर्मिता तथा दूसरी संघर्ष और प्रतिवाद की कविता। यह आश्वस्तिजनक है कि विमलेश का कवि इन दोनों छोरों का स्पर्श नैसर्गिक संवेदनात्मकता के साथ करता है।

2.     आज के इस आक्रांत और संकुल समय में शब्द की ताकत पर भी पहरा बिठा दिया गया है। अभिव्यक्ति का खतरा मुक्तिबोध के समय से भी अधिक भयावह हुआ है। इस पर भी विमलेश बोलने, बतियाने और संवाद की ताकत पर भरोसा रखते हैं, भले ही उसके लिए सदियों की यात्रा ही क्यों न करनी पड़े। शब्दों में अटूट आस्था विमलेश की काव्यचिंता के मूल में है। वे केदार जी के शब्दों में कहें तो शब्दों से मनुष्य की टकराहट के धमाके को सुनने वाले कवि हैं। वे अपनी प्रतिबद्धता की घोषणा खुले तौर पर करते हैं। नगरीय जीवन में रचने-बसने वाले इस कवि के अंदर हांफता हुआ गांव है, जिसमें हंकासल-पियासल लोग हैं, कुंआ पाठशाला और पेड़ हैं, जिनपर उजड़ने और बिला जाने का खतरा है। कवि अपने गांव की स्मृतियों को सपने में सहेज रहा है। वह इन्हें विस्थापित नहीं होने देना चाहता।  उसे विश्वास है  कि दुनिया के रहने लायक न होने पर भी वह हरी और डापुट दूब की शक्ल में नया रूपाकार ग्रहण करेगा।  विनाश और विलोप के बीच उसकी उत्तरजीविता सृजन और निर्माण की संभावनाओं के द्वार पर दस्तक देती है। कवि की संवेदना की असली जमीन गांव की देशज जमीन है, जो मूर्ख कहलाकर भी कलाओं का संरक्षण करती है। आधुनिकता प्रेरित नागर बोध ने हमें बेईमान और निर्लज्ज बना दिया है। कवि खीझकर और सायास बुद्धि के इस तमगे को अस्वीकृत कर देता है –
     इसलिए हे भंते मैं पूरे होशो-हवास में
     और खुशी-खुशी
     मूर्खता का वरण कर रहा हूं।

यह मूर्खता ऐसी शक्ति है जो कवि से कहलवाती है –

    बहुत हो गया
    यह रही कलम और ये छंद
    मैं जा रहा हूं
    सदियों से राह तकते
    पथरायी आंखों वाले
    उस आदमी के पास ।

बौद्धिकता और उसके नाम पर तमाम प्रवंचनाओं में डूबे आत्मकेन्द्रित वर्ग के छद्म के तिलस्म को तोड़ती ये पंक्तियां समकालीन कविता के सरोकार का पता देती हैं। आज सच को भी झूठ की तरह लिया जाने लगा है, बावजूद इसके कवि सच कहने और सहने की शक्ति की आकांक्षा करता है। इस आशा में कि एक दिन उसे सच समझा जाएगा। सच के प्रति इस अदम्य आकर्षण से भरकर कवि धरती को बचाने के लिए एक राग रचना चाहता है। यह राग, जीवन राग है, जिससे भरकर विमलेश का कवि दूब के साथ उगना और मछलियों के साथ अतल गहराइयों में तैरना चाहता है।

संग्रह में संकलित स्त्री जीवन की कविताओं में बहनें एक मार्मिक कविता है जो अत्यन्त सहानुभूति से मानवीय संबंधों की उष्मा को मध्यवर्गीय परिवेश में उकेरती है। स्त्री जीवन की निस्संगता की ओर भी कवि का ध्यान बखूबी गया है।

     इस तरह किसी दूसरे से नहीं जुड़ा था उनका भाग्य
सबका होकर भी रहना था पूरी उम्र अकेले ही
उन्हे अपने हिस्से के भाग्य के साथ।

आधुनिक जीवन के दबावों ने संबंधों को भी प्रभावित किया है। संबंधों में उपभोक्तावाद इसका सबसे प्रत्यक्ष प्रमाण है। अकारण नहीं कि विमलेश इन संबंधों में बची उष्णता को सहेज लेना चाहते हैं। मां के लिए  और आजी की खोई हुई तस्वीर मिलने पर ऐसी ही कविताएं हैं। परंतु ये कविताएं समकालीन कविता में लिखी जाने वाली रोमानी कविताओं से अलग हैं, जहां संबंधों को एक बंधी और घिरी हुई दृष्टि से देखने की प्रवृति है।
संग्रह में एक पागल आदमी की चिट्ठी और आम आदमी की कविता जैसी लंबी कविताएं भी शामिल हैं, जो विमलेश की काव्य-यात्रा की भावी दिशा की ओर संकेत करती हैं। लंबी कविताओं में प्रायः तनाव को बरकरार रख पाना कठिन होता है। विमलेश ने इस कार्य को बखूबी किया है।
प्रस्तुत संग्रह में स्मृतियों का दबाव साफ झलकता है। कहीं-कहीं कवि की काव्यात्मकता समकालीन आलोचना के जार्गन्स के अनुसार ढलती चली जाती है। जमपदीय चेतना से प्रभावित कवि की भाषा में  नोहपालिश, सरेह, सोझबक जैसे भोजपूरी शब्द उसकी जातीय पृष्ठभूमि की ओर संकेत करते हैं। मिछिल जैसे बांग्ला शब्दों का प्रयोग भी यथास्थान किया गया है।

विमलेश की कविता में बिम्बात्मकता है और लोकजीवन से जुड़े कुछ टटके बिम्ब भी हैं। पर कहीं-कहीं अतिरिक्त बिम्बात्मकता के आग्रह के कारण इसका स्वाभाविक प्रवाह और संप्रेषणीयता बाधित भी हुई है। ऐसी समस्या उन सभी कवियों के साथ कमोबेश है जिनका काव्य संस्कार नब्बे के दशक में आशोक वाजपेयी, विनोद कुमार शुक्ल और केदारनाथ सिंह की कविताओं को पढ़कर परवान चढ़ा है।  अमूर्तन और अबूझ बिम्बों ने कविता के समक्ष पठनीयता का संकट उत्पन्न किया है।  अभिधात्मक काव्य का भी एक सौन्दर्य होता है, जो जनसंघर्षों और सरोकारों से धार पाता है। प्रस्तुत संग्रह में इसके कई नमूने मौजूद हैं।  कुल मिलाकार हम बचे रहेंगे में विमलेश ने जिस बीज को रोपा था उसे हम पनपते और जड़ पकड़ते देख रहे हैं।
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एक देश और मरे हुए लोग, /कविता संग्रह/विमलेश त्रिपाठी/प्रथम संस्करण सितंबर 2013/पेपरबैक, /पृष्ठ 144/मूल्य : 99.00 रुपये मात्र, / आवरण चित्र : कुंअर रवीन्द्र/बोधि प्रकाशन, जयपुर, /, संपर्क : 077928 47473
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डॉ. ऋषिकेश राय
डॉ.ऋषिकेश राय
उप निदेशक ( रा.भा.)
डी बोर्ड, इंडिया, 14, बी.टी.एम., सरणी
( ब्रेबोर्न रोड), कोलकाता – 700001

मो. - 09903700542


हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad