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Monday, May 19, 2014

एक देश और मरे हुए लोग पर पूनम शुक्ला






समाज के दर्द को दर्शाती कविताएँ
 

एक देश और मरे हुए लोग विमलेश त्रिपाठी का दूसरा कविता संग्रह है जो शीघ्र ही बोधि प्रकाशन की ओर से आया है । यह संग्रह पाँच भागों में विभाजित है - इस तरह मैं , बिना नाम की नदियाँ , सुख- दुख का संगीत , कविता नहीं और एक देश और मरे हुए लोग । पुस्तक के शरुआत में ही गजानन माधव मुक्तिबोध जी द्वारा लिखित पंक्तियाँ विमलेश त्रिपाठी पर अपना प्रभाव प्रदर्शित करती हैं -

अब तक क्या किया
जीवन क्या जिया
ज्यादा लिया और दिया बहुत- बहुत कम
मर गया देश,अरे, जीवित रह गए तुम

कवि द्वारा इन पंक्तियों का चुनाव स्वत: ही उनकी आंतरिक इच्छा को उजागर कर देता है । आज हम सभी छीना झपटी में लगे हुए हैं । सभी को बस चाहिए देना सभी भूल चुके हैं जिसका परिणाम एक मरा हुआ देश हम सभी के सम्मुख है । विमलेश त्रिपाठी की प्रारंभिक शिक्षा एक गाँव में हुई है । इन दिनों वो कोलकाता में हैं । ये बात वे अपनी कविता " इस तरह मैं " में स्वयं ही कहते हैं -

बहुत पहले जब आया था गाँव छोड़कर इस शहर कोलकाता में
छूट गया आम का बगीचा
पानी से भरी नहर
खेत खूब लहलहाते

उनकी कविताओं में अपने गाँव से प्रेम झलकता है पर वहीं कहीं मुझे ये पंक्तियाँ भी दिखीं । जरूर गाँव में मार्गदर्शन की कमी रही जिसके कारण उन्हें कोलकाता का रुख पकड़ना पड़ा ।

किसी ने नहीं कहा कि गाते रहना अच्छा गाते हो
किसी ने नहीं कहा कि लिखते रहना अच्छा लिखते हो

अब जबकि वह काफी समय से कोलकाता में हैं अपने गाँव में आए बदलाव को देखकर बहुत दुखी नज़र आए -

गाँव में अब बस रह गए हैं सिरफ पागल और बूढ़े
स्त्रियाँ गाँव के चौखट पर परदेसियों के आने का अंदेशा लिए
जवान सब चले गए दिल्ली सूरत मुंबई कोलकाता
जंतसार की जगह गूँजता है मोबाइल का रिंगटोन

पर अपनी अगली ही कविता  -" धरती को बचाने के लिए " में वो सभी का आह्वाहन करते दिखते हैं जिसे इन पंक्तियों में देखा जा सकता है -

आओ कि
मिल कर निर्मित करें एक राग
जो जरूरी है
बहुत जरूरी है
इस धरती को बचाने के लिए


संग्रह के दूसरे भाग - बिना नाम की नदियाँ में कवि ने स्त्रियों की दशा का बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया है । कविता "बहनें " में वे कहते हैं -

उनके पास अपना कुछ नहीं था
सिवाय लड़की जात के उलाहने के

रसोई में धुँए व आग के बीच तपती थीं वे
क्या उन्हें स्कूल जाने का मन नहीं करता था

गाँवों में लड़कियों को कम ही पढ़ाया जाता है और जल्दी ही उनका विवाह कर दिया जाता है । इसका चित्रण उन्होंने बड़ी कुशलता के साथ किया है पर ये पंक्तियाँ पढ़ते - पढ़ते मेरी भी आँखें नम हो गईं -

साल के एक दिन
उनकी भेजी हुई राखियाँ आती थीं
या अगर कभी आ गईं वे खुद
तो जैसे उल्टे पाँव लौट जाने के लिए ही आती थीं

सचमुच एक लड़की  का जहाँ जन्म होता है ़, जहाँ वो पली बढ़ी होती है वही जमीन उसके लिए कितनी पराई हो जाती है । ससुराल से लौटी एक लड़की किस तरह अपने दुखों को छुपाती है और झूठी हँसी हँसती है कवि ने इस कविता में बड़े ही सहज ढंग से दर्शाया है । विवाह के बाद एक लड़की की व्यथा को कुछ कम करने के लिए कवि अपनी कविता "मत भेजना बाबुल" में कहते हैं -

मुझे मत भेजना वहाँ बाबुल
धन ही धन हो जहाँ
मुझे व्यापार करने वाले के पास मत भेजना

भेजना मुझे तो भेजना मेरे बाबुल
उस लोहार के पास भेजना
जो मेरी सदियों की बेड़ियों को पिघला सके

वो लड़कियाँ जिन्हें होस्टल में पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हो चुका है उनके लिए वे कहते हैं -

वे जीना चाहती हैं तय समय में
अपनी तरह की जिन्दगी
जो उन्हें भविष्य में कभी नसीब नहीं होना

कविता होस्टल की लड़कियाँ में वे कहते हैं -

उन्हें जरूरत खूब चमकीले धूप की
जिसपर जता सकें वे अपना हक किसी भी मनुष्य से अधिक

विमलेश त्रिपाठी की कविताएँ बहुत संवेदनशील हैं और उनकी पारखी नज़र मुझे बहुत आश्चर्यचकित कर रही है । कवि का जरूर अपनी माँ और बहनों से बहुत ज्यादा लगाव रहा है जिसके कारण वो स्त्रियों की दशा को इतनी बारीकी से समझ सकें हैं ।

तुम्हें ईद मुबारक हो सैफूदीन ,अंकुर के लिए ,महज लिखनी नहीं होती हैं कविताएँ ,तीसरा,पानी और एक पागल आदमी की चिट्ठी कविताएँ उल्लेखनीय हैं । पागल आदमी की चिट्ठी एक लंबी कविता है जिसके जरिए कवि देश और समाज के हालात बड़ी ही कुशलता के साथ उजागर करते हैं । इन पंक्तियों से कविता की तीक्ष्णता का अंदाजा लगाया जा सकता है -

पागल आदमी की चिट्ठी में
नींद नहीं होती
असंभव सपने होते हैं

कविता का मतलब सन्नाटा
देश का मतलब चुप्पी
सरकार का मतलब महाजन
जनता का मतलब गाय

एक देश और मरे हुए लोग संग्रह की अंतिम पर लंबी कविता है जिसके द्वारा कवि ने देश की जनता को झझकोर कर जगाने का पूरा प्रयास किया है । विमलेश त्रिपाठी की कविताओं की खासियत ये है कि कविताएँ तीक्ष्ण व दर्द से लपटी हुई है पर साथ ही पठनीय भी हैं ।  संग्रह का आवरण चित्र कुँवर रवीन्द्र द्वारा चित्रित है जो शीर्षक को और भी अर्थपूर्ण बना देता है ।




समीक्षक - पूनम शुक्ला (कवयित्री )
50- डी , अपना इन्कलेव , रेलवे रोड,गुड़गाँव, 122001
9818423425


एक देश और मरे हुए लोग ( काव्य संग्रह ) : कवि : विमलेश त्रिपाठी , प्रकाशक : बोधि प्रकाशन , एफ - 77 , सेक्टर - 9 ,रोड नंबर - 11,करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाइस गोदाम,जयपुर - 302006 , मूल्य : 99 रुपए ।

 पूनम शुक्ला



हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

1 comment:

  1. सन्क्षिप्त और बढिया समीक्षा

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