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Saturday, March 28, 2015

अंकिता पंवार की नई कविताएँ

अंकिता पंवार
प्रकाशन- द पब्लिक एजेंडा, वागर्थ, लमही, साक्षात्कार, अमर उजाला, नई धारा, लोक गंगा आकंठ आदि में रचनाएं प्रकाशित
जन्म -टिहरी गढवाल उत्तराखंड
संप्रति-पत्रकारिता
मोबाइल 8860258753
ई-मेल-  1990ankitapanwar@gmail.co

परिकथा के जनवरी-फरवरी नवलेखन अंक में प्रकाशित  कविताएँ। परिकथा से साभार।


तुमसे मिलना एक आखिरी बार


तीस की उम्र में मिलना
चालीस के हो चुके पहले प्रेमी से
बदल चुके हैं सारे समीकरण
सोलह और छब्बीस वाले रूमानी खयाल अब नहीं आते
आज यूं इतने वर्षों बाद मेरे सामने एक छब्बीस वर्षीय प्रेमी नहीं है
एक चालीस वर्षीय आदमी खड़ा है
कुछ पक चुके बालों से  झांक रहा है एक लंबा समय
जिसमें कि बहुत कुछ भुलाया जा चुका है
लकीरें कुछ और बढ़ चुकी हैं तुम्हारी हथेलियों की
शायद मेरी भी
ना तो अब तुम्हारे वो लकड़ी चीरते हाथ हैं
ना अब मेरे ओखल में धान कूटते हाथ हैं
ना ही इन हथेलियों से बुझती है प्यास
धारे के ठंडे पानी की जगह
बिसलेरी की बोतल है
ठेठ केमुंडाखाल से लेकर
इंडिया गेट की दूरी सिर्फ भौगोलिक दूरी नहीं रह गयी है
यहां तक पहुंचते पहुंचते हम तुम गंवा चुके हैं एक उम्र
एक वक्त प्रेम का जो कभी लौट ही नहीं सकता
एक सपना जो अब बहुत गहरी नींद सो चुका है
एक फासला जिसमें तुम्हारा एक घर है
एक फासला जिसमें
मैं मिटाती रही बने हुये घरों के नक्शों को
ओ मेरे चुके खो प्रेमी
तुम से मिलना आज मेरी देह की जरूरत नहीं
तुम से मिलना एक आखरी बार
एक धूमिल पड़ चुकी छवि से आश्वस्त हो जाना है
कि अब कोई नहीं है खड़ा मेरे इंतजार में
बांज के उस सूख चुके वृक्ष के पीछे

 

 

ना तुम, ना मैं, ना समंदर


लैम्प पोस्ट की लाइट पड़ती है आंखों पर
बीड़ी का एक कश
उतरता है गले से
बिखरा हुआ कमरा और बिखर जाता है
कहीं कुछ भी तो नहीं ना आंसू ना शब्द
बस एक कड़कड़ीती देह है
जो अकड़ती जा रही है
उफ कितनी बड़ी बेवकूफी है
न जाने के क्यों भगवान याद आता है अचानक
और उसी क्रम में एक गाली भी इस शब्द के लिए
उतनी ही गालियां इस लिजलिजे प्रेम के लिए
एक दो तीन
प्यार है या सर्कस का टिकट
मैंने प्रेम किया इसकी तमाम बेवकूफियों के साथ
मैंन सोचा क्या एक स्त्री वाकई में कर लेती है कुछ समझौते
एक चुप्पी जो टूट कर कह सकती थी बहुत कुछ
वह चुप्पी चुप्पी ही बनी रह जाती है
एक निर्मम खयाल आता है पूरी निर्ममता के साथ
दुनिया को कर दूं तब्दील एक पुरुष वैश्यालय में
एक ओर झनझनाता है हाथ
एक खयाल जो जूझता है खत्म हो जाने और फिर से बन जाने के बीच
एक खयाल जो जिंदगी को कह देना चाहता है अलविदा
है ही क्या रखा इन खाली हो चुकी हथेलियों में
ना चांदनी रात
ना खुला आसमान
खेत ना जंगल ना पहाड़
ना तुम ना मैं ना समंदर
ना जिंदगी
बस पीछे छूट चुके घर
के ठीक सामने वाले पहाड़
पर चढ़ने और उतरने की एक तीव्र इच्छा
एक ऐसी इच्छा जो खत्म हो जाएगी
अपनी पूरी क्रूरता के साथ

 

रेहाना के नाम


एक बोखौफ आवाज
एक मुस्कुराता चेहरा
सिर्फ मुस्कुराता ही नहीं
दर्ज कराता है मजबूती
यह सिर्फ स्थिर समय ही नहीं
जो सिर्फ इतिहास बनकर रह जाए
मैं सोचती हूं रेहाना तुम मेरी दोस्त तो हो ही
आने वाली हर नस्ल भी तुम्हारे साथ सीखेंगी
मुस्कुराना
और धीरे-धीरे उनमें भी प्रतिकार का बीज उगने लगेगा.
मेरे सामने तुम्हारा चेहरा है
और गूंजती हुई आवाज
तुम कहती हो कि अभी सुंदरता की कद्र नहीं है
ना सुंदर आंखों की ना विचारों की ना आवाज की चेहरे की
तुम सच कहती हो
पर एक सच और भी रेहाना
कुछ लोग हैं जो तुम्हारी सुंदरता का उत्सव नहीं मना रहे बल्कि उसे जी रहे हैं
या जीना शुरू कर रहे हैं.
वो ना तो तुम्हारे द्वारा की गई बलात्कारी की हत्या का उत्सव मना रहे हैं
ना ही तुम्हें दी गई फांसी के गम में
दुनिया को खत्म हो जाने की चिंता कर रहे हैं
वे लड़ रहे हैं जंग उन लोगों के खिलाफ
जो तुम्हें दुनिया से भेज देने को थे आतुर
दुनिया से भेज जाने के आतुर
तुम्हारे लिए कोई नहीं करेगा दुआ किसी जन्नत की
तुम रहोगी जिंदा
हमारी ही धरती पर
क्योंकि अनगिनत लड़ाइया हैं अब भी बाकी


(26 वर्षीय ईरानी महिला रेहाना जब्बारी को  समर्पित जिन्हें अपने बलात्कारी की की हत्या के जुर्म में फांसी दे दी गई)


हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Wednesday, March 18, 2015

धर्मेन्द्र राय की कविताएँ

1. उदासी  

राजू ! बहुत उदास है
इसलिए नहीं कि –
उसकी प्रेमिका ने छोड़ दिया है उसे !
दुत्कार दिया है उसके
दस सालों के प्यार को
यह कहते हुए कि ---
क्या है तुम्हारे पास ?

राजू ! उदास है इसलिए कि
नहीं है उसके पास एक रुपया भी
उस बच्चे को देने के लिए जो ,
हर रोज सुबह 10.25 की
डाउन कल्यानी – सियालदह लोकल के
तीन नंबर कम्पार्टमेंट के
पहली गेट के पहले सीट के सामने
हाथ फैलाये कहता है-----
भैया एक रुपया दे दो
सुबह से कुछ नहीं खाया है!

राजू देखता है उस बच्चे में
अपने छोटे भाई को
और चिंतित हो जाता है
उसके भविष्य को लेकर
उसे पूरे परिवार का भविष्य
अंधकारमय लगने लगता है !

बीमार माँ की दवाई
बहन की शादी
छोटे भाई की पढाई
और
साथ में बेरोजगारी .........
एक साथ इतनी सारी चिंताओं का बोझ
अन्दर ही अन्दर
तोड़ देता है उसे !

राजू !
अपनी उदासी और चिंताओं को
 बगल की सीट पर बैठे
व्यक्ति के हाथों में पड़े न्यूज़ पेपर के
शब्दों में उड़ेल देता है /

लेकिन ,
उसकी उदासी और चिंताओं का उफान
उस समय और बढ़ जाता है
जब वह पढता है कि -------
श्यामा की बहन की अस्मत लुट ली गई
बीच बाजार में !
और इस कुकर्म पर कोई कारवाई करने के बजाय  
तथाकथित सांसद संसद में उस लुटी हुई
अस्मत को और तार-तार करते नजर आये !
साथ ही ,
उड़ाकर गरीबी का मजाक ये लोग
पांच रूपये में भर देते हैं गरीब का पेट
अपने ही खेलते हैं  
करोड़ो में
और ‘करोड़ों’ के जोवन से !

इतना पढ़ते ही राजू की आँखों से
ढुलक आएँ आंसू
वह फ़ेंक देता है न्यूज़ पेपर को
ट्रेन की खिड़की से बाहर
और
एक गंभीर उदासी और चिंताओं की लकीरों के साथ
देखता रहता है उस बच्चे को
जो एक –एक करके सबके सामने
हाथ फैलाये मांगता है भीख
और
राजू की आँखों में घूमता रहता है
छोटे भाई का चेहरा !


2. बंद खिड़की से रौशनी नहीं आती

मेरे घर से महज़ कुछ दूरी पर
एक दो मंजिला मकान है
उस मकान में एक साँवली...पर
खुबसूरत , बहुत खुबसूरत लड़की रहती थी
जो,अक्सर अपनी खिड़की से बाहर
देखा करती थी आते – जाते लोगों को /

मैं जब भी गुजरता
कुछ देर ठहर जाता वहाँ  
और देखता रहता उसे !
खिड़की से टकटकी लगाये वह
देखती मुझे और
मुस्कुरा देती थोड़ा /

एक दिन यूँ ही
टकटकी लगाये देख रही थी वह
मुझे और मैं उसे /
पता नहीं कब मैं
खिड़की को लांघते हुए
उसकी आँखों में प्रवेश कर गया /
जहाँ एक विशाल समुद्र था
जिसमें अनगिनत छोटी – बड़ी मछलियाँ
गोते लगा रही थी इधर से उधर /
उन मछलियों में एक सबसे छोटी मछली थी जो ,
दुबककर बैठी थी एक कोने में /
शायद ! तबियत ख़राब थी उसकी
पूछने पर उसने बताया -----
मेरा नाम ‘ सपना ’ है
और अब मैं मर रही हूँ धीरे – धीरे
और तुम चले जाओ यहाँ से
वरना, मारे जाओगें बेवजह
क्यों कि,
इस समुद्र का पानी अब
बहुत खरा हो चुका है
इतना कि गलने लगी हैं हड्डियाँ !

मैं डरते और काँपते हुए  
ज्यों ही उसकी आँखों से बाहर निकला
तो पाया खिड़की बंद थी /

कई दिनों तक मैंने
खिड़की की तरफ नहीं देखा और
जब भी देखा
खिड़की को बंद पाया /

आज सुबह जब मैं  
वहाँ से गुजर रहा था
तो पाया कि
खिड़की अब भी बंद है  
पर,
लोगों की एक भीड़ इक्कठी थी
उस घर के सामने ,
साथ में पुलिस भी और
घर के अंदर से आती हुई दुर्गन्ध
मानों चीख चीख कर कह रही हो कि –
‘सपना अब मर चुकी है !
‘उसके’ और उसके ‘सपनो’ के मरने की खबर
फैल चुकी थी पूरे ब्रह्माण्ड में !’
पर ,
मैं अविश्वास के साथ  विस्मय से खड़ा था
पुलिस ने बताया-----
इस घर में जो लड़की थी उसका नाम सपना था
और अब वह मर चुकी है पर,
मृत्यु का कारण पता नहीं चला है ,
यह भी नहीं कि यह
हत्या है या आत्म – हत्या !
बस एक डायरी मिली है जिसमें लिखा है -----
‘बंद खिड़की से रोशनी नहीं आती’ !
और
आज समझ पाया उसके अक्सर
खिड़की से बाहर देखने
और मुस्कुराने का राज---
वह ढूढ रही थी..... ‘रोशनी’ को
तलाश रही थी.....’अपनों’ को
अन्दर से बाहर की ओर !
वह जीना चाहती थी ...
हाईटेक सिटी के बंद गली के
दो मंजिले मकान में नहीं
बल्कि.....
अपनों के साथ
खुले आकाश के नीचे......... !!

3. गाँव

बचपन में जब भी मैं बाबुजी के साथ
अपने गाँव जाता तो ,
मरैया चाचा हो,बंशी दादा , झगरुआ की माई हो या फिर बैल-गाड़ी वाले बाबा ......सब
बहुत दुलार करते थे !
कोई मकई का लावा खिलाता तो ,
कोई धान की खोई ...........
दूध-दही नहीं खाने पर डांटते भी थे सभी लोग !

याद है मुझे
पौष , माघ , फागुन में लहलहाते
गेंहू और सरसों के वे खेत
जिनकी क्यारियों के बीच छुपंछुपाई का खेल खेलता गाँव के बच्चो के साथ /
वैशाख और जेष्ठ की तेज दुपहरी में
गाँव के सभी बच्चे और बूढ़े इक्कठा होते
आम की गछवारी में !
बड़ा मज़ा आता हमें
आम की गछ्वारी में ...
कबड्डी और गुल्ली डंडा खेलते ,
खेल खेल में लड़ भी जाते हम एक दूसरे से!
याद है मुझे ---
एकबार खेल खेल में मार दिया था मैंने
गाँव के एक बच्चे को तब
बहुत मार पड़ी माँ के हाथों,
बहुत डांटा था बाबुजी ने मुझे /

आज कई बरस बाद गाँव जाना हुआ
वहाँ पहुँचने पर ऐसा लगा मानों
किसी अपरिचित जगह आ गया हूँ .......
गाँव अब गाँव नहीं था
न मरैया चाचा थे ,
न बंशी दादा और
न ही बैल-गाड़ी वाले बाबा ही!
कोई परिचित चेहरा नहीं था
सब लोग खो गये थे कहीं एक-एक करके
और जो थे ! नहीं पहचानते थे मुझे /
आम की गछ्वारी भी अब उजड़ चुकी थी
और खड़ा हो गया था वहाँ
कंक्रीट का मकान /

अब कुछ भी परिचित नहीं बचा
सब परिचित चेहरे तब्दील हो चुके थे
अपरिचित चेहरों में /

पूरे गाँव में बस बचा था तो सिर्फ
एक ही टुटा-फुटा परिचत मिट्टी का
वह पुराना घर
जिसकी चौखट पर बैठ
पंचानबे बरस की अर्द्धनंग बूढी ‘दुलरिया दादी’
अभी भी कर रही है इंतजार वर्षो से
अपने परदेशी बेटो के घर लौटने का !

गाँव ! गाँव नहीं रहा ,
गाँव के घर
अब
तब्दिल हो चुके है अपरिचित मकानों में !!!



4. समय-चक्र 

एक दिन
यूँ ही उदास बैठा
मन में कुछ जोड़-घटा रहा था कि
अचानक भूत,वर्तमान, और भविष्य
मेरे सामने आ कर बैठ गएँ  
और
घंटों लड़ते रहे एक-दुसरे से !

वर्तमान ने हुंकार भरते हुए कहा---
मैं ‘वर्तमान’ हूँ और
तुम दोनों
मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते!

वर्तमान की बात सुन, तंज कसते हुए
भविष्य ने कहा ---
उड़ लो तुम्हें जितना उड़ना है
मैं ‘भविष्य’ आनेवाला हूँ
किसी को नहीं छोडूंगा !

वर्तमान और भविष्य की बातों को
सुनते हुए अंत में
भूत ने कहा -----
क्यूँ झगड़ते हो आपस में तुम दोनों मेरी सुनो
मैं ‘भूत’----
अमर-शेष हूँ .......
कभी किसी का पीछा नहीं छोड़ता !


5. जीवन की कविता

एक लम्बे अन्तराल के बाद आज
मैंने कलम उठाई
और लिख डाला एक ‘शब्द’
पूरा किया एक ‘वाक्य’
फिर भी ,
अधूरी रह गई मेरी कविता !

कभी-कभी कितना मुश्किल
हो जाता है एक भी ‘शब्द’ लिखना
पूरा करना – एक वाक्य !
और ,
अधूरी रह जाती है कविता
समय की चक्की में पिसते
जिंदगी के जद्दो जहद के बीच /

जीवन और कविता के बीच
समय के ऊपर अपनी पैठ बना लेना
बड़ा ही साहसिक कार्य है ---
बशर्ते यह कि ---
कहीं कुछ छुट न जाये /
और
पूरी हो सके कविता और
कविता के साथ जीवन /

बहरहाल , अधूरी है ---
जीवन की कविता
और
बड़ा ही दुष्कर कार्य है
जीवन की अधूरी कविता को पूरा करना !!!!


6. याद तुम्हारी आई 
-------------------

जब - जब हुआ अकेला मै तो
याद तुम्हारी आई /

जीवन के हर कदम पर
साथ देना तुम्हारा
जब भी टुटा अन्दर से
तुमने दिया सहारा
हर पल मेरी सांसों में तुम ही तुम समाई /

जब -जब हुआ अकेला मैं तो
याद तुम्हारी आई /

आज हो दूर देश कहीं
घिरी ही सौन्दर्य परियों के बीच
आनंदमय है जीवन तुम्हारा /
होकर विकल विलखता मैं
तरस रहा तुम्हारी एक मुस्कान को
देखो कैसी काली घटा मेरे
जीवन को घेरने आई /

जब - जब हुआ अकेला मै तो
याद तुम्हारी आई /

याद है तुम्हें चांदनी रात में
हमने की थी चंद बातें
थमा था एक दूजे का हाथ
खाई थी कसमें /
फर्श से अर्श तक पहुँचाया तुमने मेरे नाम को
छोड़ अकेला मुझे तुम
चली गई दूर देश कहीं /
याद में तुम्हारी तड़प रहा मैं
दिल में विकल वेदना छाई
फिर से आ जाओ मेरे पास तुम
नहीं करता कोई तुम्हारी भरपाई /

जब - जब हुआ अकेला मै तो
याद तुम्हारी आई ////


7.  प्रेम और शतरंज


प्रेम जीवन है और
जीवन शतरंज का खेल ...,
हम - आप इसके मोहरे !

जो कुछ भी हो -
चलनी पड़ती है टेढ़ी ही चाल वरना ,
न तो जीत पायेंगें प्रेम
और
न ही खेल शतरंज का !
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जब उतरा जीवन के मैदान में
खेल शुरू था !

सबने चल दी थी अपनी अपनी चाल
और जब आई मेरी बारी
पहली ही चाल  में ..
मात दिया तुम्हारे वजीर को ,
दूसरी चाल में
 
मारा गया तुम्हारा दबंग सिपाही ...

कि मेरा जीतना लगभग तय था कि
तुमने चल दी प्रेम की चाल
और मै एक बार फिर हर गया
जीतने से पहले !
 
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धर्मेन्द्र राय
पता – रेलवे क्वाटर न.- 1075 / A
पांचवा रास्ता , फोरमैन कॉलोनी
पोस्ट – काँचरापाडा, उत्तर 24 परगना
पश्चिम बंगाल -743145
जन्मतिथि – 02/01/ 1988
शिक्षा – स्नातकोत्तर (हिंदी)
मोबाइल न० – 9433286875 / 9339441626





  





हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad