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Tuesday, May 30, 2017

राष्ट्रवाद की लूट है... - अजय तिवारी



                           राष्ट्रवाद की लूट है...
                        अजय तिवारी  
   
अजय तिवारी
राष्ट्र की सत्ता प्राचीन है, राष्ट्रवाद की अवधारणा आधुनिक. राष्ट्र का अस्तित्व भूभाग-आबादी-भाषा-संस्कृति-इतिहास की साझेदारी पर निर्भर है, राष्ट्रवाद का इस विश्वास पर कि हम आपस में उद्देश्य, भावना या संस्कृति की साझेदारी रखते हैं. इसलिए राष्ट्र का जीवन विविधताओं के बीच एकसूत्रता से विकसित होता है, राष्ट्रवाद का विचार विविधताओं की अपेक्षा एकरूपता पर आधारित होता है. स्वभावतः राष्ट्र का धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं होता लेकिन राष्ट्रवाद धर्म से जुड़ सकता है. ‘अहम् राष्ट्री संगमनी जनानाम’ से लेकर ‘भलि भारत भूमि भले कुल जन्म...’ तक जिस राष्ट्र का स्मरण है, वह कल्पना में नहीं, वास्तव में मौजूद है. ‘राष्ट्रवाद’ का विचार यूरोप से आया जहाँ उसका विकास पुनार्जगरण काल में मध्ययुगीन इसाई प्रभुत्व को चुनौती देने के साथ हुआ था. इसलिए धर्म से संवाद अथवा धर्म के स्वीकार-अस्वीकार का प्रश्न यूरोपीय राष्ट्रवाद की समस्या थी, भारत राष्ट्र की नहीं. आज जो लोग राष्ट्रवाद के विचार से धर्म को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, वे यूरोपीय साँचों को आरोपित कर रहे हैं.

     यूरोप ने राष्ट्रवाद के उत्थान के दिनों में ईसाई महामंडल के विरुद्ध जातीय संस्कृतियों का परचम लहराया; ‘एक यूरोप’ की जगह फ़्रांस, जर्मनी, इटली, इंग्लैण्ड, स्पेन आदि ‘राष्ट्रों’ (आधुनिक जातियों) का और उनकी भाषाओँ का आधार अपनाया. लेकिन साम्राज्य-विस्तार के साथ यूरोपीय राष्ट्रवाद अन्य जातियों और राष्ट्रों के उत्पीड़न का साधन बन गया. भारत ने अंग्रेजी शासन में राष्ट्रवाद के उत्पीडनकारी रूप का भरपूर अनुभव किया है. अंग्रेजों से लड़ते समय भारतीय देशप्रेमियों ने भी जिस विचारधारा का सहारा लिया, वह राष्ट्रवाद ही था. उत्पीड़नकारी देश का राष्ट्रवाद एक तरफ उत्पीड़ित समुदाय को विश्वास दिलाता है कि गुलामी उसके फायदे में है, दूसरी तरफ अपने समाज में उपनिवेशों की लूट से प्राप्त साधनों को राष्ट्रवाद के औचित्य के रूप में इस्तेमाल करता है.  उसी तरह उत्पीड़ित समाज का राष्ट्रवाद विदेशी शत्रु को सामने रखकर एकजुट होने का प्रयास करता है. इस एकजुटता के लिए वर्तमान वंचना के अलावा अतीत के गौरव का सहारा भी लेता है. इसलिए उत्पीड़क राष्ट्रवाद में लक्ष्य और अवधारणा की एकरूपता मिलती है लेकिन उत्पीड़ित राष्ट्रवाद में अनेक धाराएँ और प्रवृत्तियाँ रहती हैं. उनमें सामंजस्य ही हो, यह आवश्यक नहीं है. खुद भारतीय राष्ट्रवाद में क्रन्तिकारी सुधारवाद से लेकर रूढ़िवादी पुनरुत्थानवाद तक अनेक अन्तर्धाराएँ विद्यमान रही हैं. बीसवीं सदी में आने के बाद भी एक तरफ नेहरु थे जो मानते थे कि राष्ट्रवाद ‘एक प्रति-अनुभूति’ है, वह ‘अन्य जातीय समुदायों के प्रति, विशेषतः सम्बंधित राष्ट्र के विदेशी हुक्मरानों प्रति घृणा या आवेश से’ जीवनी-शक्ति लेता है; दूसरी तरफ गोलवलकर थे जो कहते थे कि ‘हिन्दू-मुस्लिम एकता’ की बात करना ‘हमारे समाज के प्रति सबसे बड़े द्रोह का अपराध’ है, इसीलिए १८५७ के महासंग्राम में दिल्ली की गद्दी पर मुग़ल बादशाह बहादुरशाह की ‘प्रतीकात्मक प्रतिष्ठा’ को वे ‘अंग्रेजी राज से भी बहुत बड़ी दुखद घटना’ कहते थे.

   इससे इतना तो प्रमाणित है कि राष्ट्रवाद के लिए एक वास्तविक या काल्पनिक, आतंरिक या बाह्य शत्रु अनिवार्य है जबकि राष्ट्र ऐसे शत्रु के बिना ही अधिक शांति और सौहार्द से विकसित होता है. नेहरु और गोलवलकर के परस्पर-विरोधी विचारों से यह साफ है कि स्वाधीनता आन्दोलन के समय से ही भारतीय ‘राष्ट्रवाद’ में अनेक अन्तार्धराएँ मौजूद रही हैं. विदेशी शासन के हट जाने के बाद राष्ट्रवाद का कोई वास्तविक आधार नहीं बचा. विकास के जिस रस्ते पर भारत चला, उसके संकट भूमंडलीकरण के दौरान अधिक तेज़ी से बढे. तब यह आवश्यक हुआ कि विषमतापूर्ण पूँजीवादी विकास को जारी रखने के लिए समाज में आतंरिक शत्रुओं का निर्माण किया जाय. इस बारे में सभी ‘राष्ट्रीय’ दल एकराय हैं. राजीव गाँधी की काँग्रेस ने शाहबानो मामले में मुस्लिम रूढ़िवाद को और रामजन्मभूमि मामले में हिन्दू रूढ़िवाद को प्रोत्साहन दिया. फिर क्या था, हिन्दू-मुस्लिम एकता को राष्ट्रद्रोह मानने वाली शक्तियाँ अचानक रंगमंच पर प्रभावशाली होने लगीं. आज की परिस्थितियाँ पिछले तीन दशक के इसी विकास का नतीजा हैं.
    इस परिस्थिति की विडम्बना यह है कि मुस्लिम ‘राष्ट्रवादी’ यह नहीं देखते कि खुद पाकिस्तान का निर्माण भले ‘द्विराष्ट्र’ सिद्धांत से हुआ हो, जिसके जनक सावरकर थे और जिसका उपयोग जिन्ना ने किया, लेकिन पाकिस्तान का गठन इस्लाम के आधार पर नहीं हुआ था. उसे इस्लामी राष्ट्र बनाने का काम किया जिया-उल हक ने, जो अमरीका की मदद से सैन्य तख्ता-पलट द्वारा पदासीन हुए थे. लेकिन यह ‘इस्लामी’ राष्ट्रवाद अगर किसी के खिलाफ सिद्ध हुआ तो वह स्वयं पाकिस्तान है. इस्लाम के आधार पर वह बांग्लादेश को भी एक साथ नहीं रख सका, सिंध-बलोचिस्तान आदि को भी संतुष्ट नहीं रख पा रहा है. उसी तरह ‘हिन्दू’ राष्ट्रवादी यह नहीं देखते कि तमिलनाडु से असाम तक भारत की कोई आधुनिक संस्कृति नहीं है जिसमें अनेक धर्मावलम्बियों की मूल्यवान भूमिका न हो. खुद हिंदी में पहले कवि अमीर खुसरो हैं और पहले कहानीकार रेवरेंड जे. न्यूटन. तुलसी-मीराँ-प्रेमचंद-निराला का महत्व इन दोनों के बिना नहीं समझा जा सकता. इसलिए हमारी राष्ट्रीयता का वास्तविक स्वरुप हिन्दू और मुस्लिम राष्ट्रवाद के काल्पनिक सिद्धांत से टकराता रहता है. विडम्बना यह है कि सत्ता में आने के बाद सांप्रदायिक राष्ट्रवाद विचारों की भिन्नता को ही राष्ट्रद्रोह बताकर दबाने लगता है. आज हम इसी बात का सामना कर रहे हैं.
   यह मज़ेदार बात है कि धर्म से राष्ट्रवाद को जोड़ने का काम अमरीका, पाकिस्तान और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, तीनों ही करते हैं. जिस तरह भारत के ‘हिंदुत्व’ को उसके वास्तविक-उदार स्वरुप में विवेकानंद, मदनमोहन मालवीय और राधाकृष्णन ने समझा था, उसी तरह भारत की राष्ट्रीयता के धर्मेतर स्वरुप को गाँधी ने समझा था. उन्होंने उसे धर्मनिरपेक्ष, समावेशी और जातीय (सांस्कृतिक) अंतर्वस्तु दी. यह अकारण नहीं है कि वे ‘सनातनी हिन्दू’ थे लेकिन उनकी हत्या एक ‘हिन्दुत्ववादी’ ने की! गाँधी का ‘हिन्दू’ भारतीय समाज का वास्तविक मनुष्य था, सावरकर का ‘हिन्दू’ एक काल्पनिक निर्माण. धर्म पर आधारित राष्ट्रवाद इसी काल्पनिक निर्माण पर खड़ा होता है और उसे वास्तविकता पर आरोपित करता है. इसलिए वह उत्तेजना और अविवेक से परिचालित होता है. संकटकाल के क्षुब्ध मनोविज्ञान में इस ‘कल्पना’ को भी स्वीकार करने की सामाजिक प्रवृत्ति दिखाई देती है. कल्पना को वास्तविकता पर हावी करने के लिए मिथकीकरण का सहारा लिया जाता है. ज़ाहिर है, ऐसे में इतिहास को मिथक और मिथक को इतिहास में बदला जाता है. बैकुंठ को धरती पर अवस्थित करना या ऑपरेशन से गणेश के सर का प्रत्यर्पण मानना मिथक को इतिहास बनाने का उदहारण है, राणाप्रताप को विजयी दिखाना या पृथ्वीराज एवं शिवाजी को चक्रवर्ती मानना इतिहास को मिथक बनाने का. वर्तमान प्रधानमंत्री ने तो तक्षशिला को ही उठाकर बिहार में स्थित कर दिया था! इस प्रक्रिया में इतिहास को अँधेरे में ठेलना अनिवार्य हो जाता है. बाबर के नामपर ‘राष्ट्रवादी’ राजनीति करते समय यह बात कब बताई जाती है कि बाबर भारत आना ही नहीं चाहता था, उसे अग्रहपूर्वक बुलाया था राणा साँगा ने, राजपूत सामंतों से त्रस्त होकर? 

    क्या यह पूछना अनुचित है कि दुनिया जब आपस में अधिक नजदीक हुई है, तब संकीर्णता और रूढ़िवाद पर आधारित राष्ट्रवाद क्यों आवश्यक है? क्या यह संयोग है कि कल तक अपनी पूँजी भेजने और प्रशिक्षित श्रम आमंत्रित करने के लिए ‘भूमंडलीकरण’ का दबाव डालने वाले देश आज खुद अपने समाज के संकट के चलते राष्ट्रवाद का आश्रय लेने लगे हैं? क्या यह स्मरण करना वाजिब है कि स्वाधीनता आन्दोलन के समय जो ‘भारतमाता ग्रामवासिनी’ थीं, वे कॉर्पोरेट पूँजी के समय ‘सेठसेविनी-दीनमर्दिनी’ हो गयी हैं तो इसका कोई आर्थिक पक्ष है? सास्कृतिक ‘राष्ट्रवाद’ की विडम्बना यह है कि जनता के आर्थिक प्रश्नों को पृष्ठभूमि में ठेलकर वह काल्पनिक उत्तेजना से समाज को भर देता है. तब ‘गोरक्षा’ से लेकर ‘मंदिर’ तक सभी कार्रवाइयाँ गिरोहों के हाथ में आ जाती हैं, सत्ता इन गिरोहों को राष्ट्रवाद के नामपर औचित्य प्रदान करते हुए जनता का दमन करती है और देशी-विदेशी कॉर्पोरेट की रक्षा में पलक-पाँवड़े बिछाती है. आज के राष्ट्रवादी विमर्श की यह सबसे प्रमुख विशेषता है.

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संपर्कः बी-३०, श्रीराम अपार्टमेंट्स, ३२/४, द्वारका. नयी दिल्ली.११००७८
मो. ९७१७१७०६९३


हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Monday, May 29, 2017

आजादी के बाद हिन्दी को लेकर हुए मजाक पर बनी उम्दा फिल्म – ‘हिन्दी मिडियम’ - शिवानी गुप्ता



शिवानी गुप्ता

शिवानी गुप्ता युवा प्राध्यापक और आलोचक हैं, समकालीन महिला उपन्यासकारों पर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से शोध किया है और समकालीन मुद्दों के साथ अन्य विषयों पर लागातार लिखती रही हैं। इसके पहले निर्मल वर्मा के उपन्यास अंतिम अरण्य पर उनका शानदार लेख हम अनहद पर पहले पढ़ चुके हैं। इस बार शिवानी ने एक मुद्दा आधारित फिल्म  हिन्दी मिडियम के बहाने भारतीय शिक्षा पद्धति के फाँकों की सूक्ष्म पड़ताल की है।





आजादी के बाद हिन्दी को लेकर हुए मजाक पर बनी उम्दा फिल्म – हिन्दी मिडियम
शिवानी गुप्ता

'हिन्दी मीडियम' इरफान खान और शबा कमर (पाकिस्तानी अदाकारा) की अदायगी के साथ बड़े हल्के फुल्के अंदाज में लेकिन एक संवेदनशील विषय पर बात करती फिल्म है। भारतीय शिक्षा पद्धति में प्राइवेट स्कूलों के पीछे छिपे बाजारवाद को बड़े कमर्शियल अंदाज में पेश करते हुए निर्देशक साकेत चौधरी ने भारतीय मानसिकता और भाषायी दोहरेपन को बखूबी उभारा है।

स्वतंत्रता के बाद शिक्षा और शिक्षा के माध्यम 'भाषा' का सवाल लगातार भारतीय संविधान का कमजोर और नकारात्मक पक्ष रहा है, उसपर आधुनिकता के भीतर घुसे ' बाजारवाद' ने इस भाषायी समस्या को और भी अधिक चिन्तनीय विषय बना दिया है। हिन्दी और हिन्दी मीडियम के भीतर जिस कमजोर भारत की छवि उभरती है वह कितनी आयातित, शर्म, उपेक्षा और आत्महीनता की शिकार है इसे समझने के लिए भारत के उन हिन्दी भाषी क्षेत्रों को देखना समझना होगा जहाँ हिन्दी 'भाषा' का मुद्दा न होकर रोजी-रोटी का मुद्दा है। स्वतंत्र भारत में भाषायी परतंत्रता का जितना बोलबाला हुआ शायद ही कभी  भारतीय भाषाओं के साथ ऐसा सुलूक हुआ हो। हमारे जेहन की भाषा में जिस स्लो प्वाइजनकी तरह अंग्रेजी रमती चली गयी उसमें हिन्दी का हश्र ऐसा ही होना था।

भारतीय शहरी मध्यवर्ग के भीतर सबसे बड़ा सवाल आमदनी का है जिसमें रोजगार की भारी जरुरत नौकरियों के इर्द-गिर्द जमा रहती है और नौकरी बिना अंग्रेजी के मुश्किलें पैदा करती है। एक ठीक-ठाक आमदनी के लिए किसी ऑफिस में अच्छा पद मतलब अंग्रेजी बोलने लिखने की अच्छी समझ और इसी की जरुरत पूरी करने के लिए शहरों, नगरों में (अब तो ग्रामीण इलाकों में भी) हर चौराहों पर आपको अंग्रेजी बोलना सीखाने के आसान तरीके के साथ 15 और  30 दिन में अंग्रेजी बोलने के दावे के पोस्टर टंगे मिलेंगे। इंजीनियरिंग, मेडिकल ,मैनेजमेन्ट आदि की उच्च शिक्षा अंग्रेजी के बिना सम्भव ही नहीं।  अब भारत का वह तबका जिसके लिए अच्छी शिक्षा दुर्लभ है वह अंग्रेजी मीडियम की ऊँची उड़ानों में कहाँ और कैसे फिट हो सकेगा ? सरकारी स्कूलों की ध्वस्त हो गयी व्यवस्थायें लगातार भारतीय शिक्षा के लिए प्रश्नचिन्ह के रुप में खड़ी हैं लेकिन ऐसी क्या मजबूरी है कि प्राइवेट स्कूलों की तरफ लगातार 10 या 15 हजार मासिक कमाने वाला परिवार भी रुख कर रहा है? आधे पेट खाना लेकिन 24/ 25 हजार ‘extra- curricular activities’ के नाम पर इन प्राइवेट स्कूलों को देने के लिए तैयार हो जाना? ये लगातार उस मानसिकता को पुष्ट करने का ही पहलू है जिसमें एक अच्छे और सुखी जीवन के लिए एक अच्छी नौकरी का होना जरुरी है 'गरीबी या खानदानी गरीबी' को दूर करने का एकमात्र इलाज फर्राटेदार अंग्रेजी में बात करता कर्मचारी बनना जिसे 'बाजार' लगातार अपने प्रचार माध्यमों के जरिये जनता की मानसिकता पर हावी करता रहा है।

पूँजीवाद का एक भाषायी रुप भी है जिसमें करोड़ो, अरबों की सम्पत्ति के मालिकों के लिए भी अंग्रेजी भाषा बहुत आदरणीय है। दर असल वह उनके स्टेटस सिंबलको पुष्ट करने का सबसे वजनदार माध्यम है। ये ऐसे पूँजीपतियों की जमात है जिनके या तो खानदानी कारोबार हैं या ये अभी- अभी नये अमीरी के आलम में प्रवेश किए हुए हैं और जिनके बोलचाल में लोकल (क्षेत्रीय) बोलियों के साथ हिन्दी का बहनापा रहा है। क्रीच पड़ी पैंटों, कड़कदार कॉलरों और टाई में सूटेट-बूटेट ब्राँडेड अंग्रेजी दाँ रईसों के साथ कदमताल करने में ऐसे लोकल रईसों के पसीने तो छूटने ही हैं, ऐसे में इन रईसों की एकमात्र उम्मीदें अपनी संतानों से बँधती हैं ताकि इनके लोकल रईस होने की खानापूर्ति उनकी संताने मँहगें अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में पढकर और अंग्रेजी तौर तरीके अपनाकर पूरी कर सकें और लोकल रईस का ठप्पा इनके वजूद से मिट सके।

हिन्दी मिडियम फिल्म इन्हीं मुद्दो के इर्द गिर्द चलती है।  हमेशा की तरह इरफान अपनी संजीदा अदायगी में कहानी के साथ न्याय करते हैं और अपनी भूमिका का अन्त 'अच्छे पति, अच्छे पिता होने से पहले अच्छे इंसान बनने  का मैसेज देकर करते हैं। शबा कमर की ब्यूटी और अदाकारी पर कोई सवाल नहीं लेकिन इरफान के साथ शबा एक बराबरी का तालमेल करने की लगातार कोशिश करती दिखती हैं। गरीबी में भी अपने बच्चे की अच्छी शिक्षा के लिए परेशान अभिभावक के रुप में दीपक दोक्यार की भूमिका शानदार रही।  राइट टू एजुकेशनकी चक्की में पिसता यह गरीब परिवार असल मायने में एजूकेटेड है क्योंकि वो 'दूसरों का हक मारना' नहीं जानता और सबसे बड़ी बात जिस अंग्रेजी मीडियम के लिए ये हिन्दी मीडियम वाले सारी जद्दोज़हद करते हैं वह भी हलक तक बाजारु सिस्टम का हिस्सा  है जिसमें दिल्ली के पाँच टॉप स्कूलों में कुछ तो फाइव स्टार एसी सुविधा से लैस एजूकेशनल सेन्टर हैं तो कुछ फॉरेन कन्ट्री की नकल का हिस्सा । कभी शाहरुख खान के बच्चों की पढाई इन्ही एसी स्कूलों में होने की खबर से मैं चौंकी थी और आये दिन ऐसे स्कूलों में नर्सरी ऐडमिशन के लिए प्रेग्नेंसी के दौरान ही लाइन लग जाने की बातों पर हँसी आती थी लेकिन तब शायद यह समझना मुश्किल था कि बाजार और पूँजी के गठजोड़ में हमारी भारतीय शिक्षा पद्धति कितने बड़े खतरे में पड़ती जा रही है और किस तरह शिक्षा का मूल अधिकार उसी असमानता का भयंकर शिकार हो रहा है जिस असमानता से हमारा भारतीय समाज धर्म, जाति, वर्ग, अर्थ के साथ लम्बे समय से जूझ रहा है। 

कुल मिलाकर फिल्म देखी जानी चाहिए और साकेत चौधरी को भारतीय शिक्षा के एक और रूप कोचिंग सेन्टरों पर भी इसी तरह की उम्दा फिल्म का निर्माण करना चाहिए।

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शिवानी गुप्ता फिलहाल वाराणसी में रहती हैं। 
उनसे यहाँ संपर्क किया जा सकता है - 08932882061
 



हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

पहली कहानी - विजय शर्मा 'अर्श'


 विजय शर्मा अर्श

कहानियों में विषय और शिल्प को लेकर लागातार प्रयोग होते रहे हैं –  हिन्दी कहानी ने इस मायने में एक लंबी यात्रा की है। कहानी का इतिहास बताता है कि अब की कहानियाँ पहले से किस मायने में भिन्न शिल्प और कहन को लिए हुए हैं। विजय की यह लगभग पहली ही कहानी है जो अपने शिल्प और कहन से आश्चर्यचकित करती है। समय के गुजरने के साथ संवेदना के रंग किस तरह बदले हैं – यह कहानी सूक्ष्म और सशक्त रूप में प्रस्तुत करती है। कहानी अंत में यह भी बताती है कि संवेदना से शून्य होते जा रहे समय में हम किस तरह अपनी आदमीयत को बचाए-जिलाये रख सकते हैं।

खास बात यह कि आज विजय का जन्मदिन भी है । अनहद की ओर से उन्हें ढेरों बधाई और उनकी रचनात्मकता के लिए अशेष शुभकामनाएँ। कहने की जरूरत नहीं कि आपके साथ ने हमें बहुत हौसला दिया है।




_______________मिसिंग_______________
                                विजय शर्मा अर्श

रवि स्टेशन की दीवार पर आख़िरी पोस्टर लगाकर कुछ देर तक स्तब्ध खड़ा रहा..पोस्टर पर बाबा की नई तस्वीर के नीचे बड़े-बड़े लाल अक्षरों में लिखे ‘मिसिंग’ को देख कर जैसे सोच रहा हो कि क्या इस उम्र में भी लोग खोते हैं !बचपन में मेले में खो जाना आम बात है.पर क्या इस उम्र में भी ये मुमकिन है? इस तस्वीर को देखकर कोई कैसे कह सकता है कि ये इंसान भी खो सकता है, कहीं भी....

वो तो अच्छा हुआ कि यहाँ आने से पहले नीसू की ज़िद पर बाबा ने उसके साथ नई तस्वीरें निकलवा लीं ,वरना पुरानी तस्वीरों के रंग तो फ़ीके पड़ चुके थे, उन तस्वीरों की मदद से वो कैसे ढूंढता...कैसे खो सकता है कोई अपने स्टेशन से एक स्टेशन पहले..बाबा ने जरा सी देर कर दी, और फिर पानी का नल भी तो दूर था ,काश! रवि उनकी जगह खुद चला जाता तो शायद बाबा आज घर में होते...घर......ओह घर भी तो जाना है...रवि ने आख़िरी बार पोस्टर पर छपा अपना फोन नंबर देखा और स्टेशन के गेट से रास्ते पर आ गया ...

आज तीसरा दिन था...रवि उन्हें ढूँढने के सारे जतन कर रहा था ..पुलिस स्टेशन, अस्पताल, मुर्दाघर हर जगह उनकी तस्वीर के साथ अपना नंबर दे चुका था ...फ़ोन की हर रिंग एक नया धोखा दे जाती थी. घर में नीसू और गौरी अपनी-अपनी जगह पर बैठे-बैठे जड़ से हो जाते थे ..शायद उन दोनों माँ-बेटी ने पहली बार कुछ खोने जैसा खोया था..ख़ासकर नीसू अभी उम्र ही क्या है इस बच्ची की! इस उम्र में भी इसने खो दिया,अपने सबसे क़रीबी दोस्त को..ये हमेश एक रहस्य रहा है कि ज़िन्दगी के सारे तज्रुबों से अन्जान एक बच्चा और ज़िन्दगी के सारे तज्रुबों का क़ैदी एक बूढा इतना घुल-मिल कर कैसे रह लेते हैं ,जैसे दोनों ही एक डाल के फूल हों और एक फूल की ख़ुशबू माँद पड़ चुकी है...

एक हफ़्ता बीत चुका था और इन सात दिनों में रवि जाने कितनी ही बार थाने के कई चक्कर लगा चुका था...घर में नीसू की उदासी थोड़ी कम हुई थी ,बीच-बीच में ऐसे सहम जाती कि उसके दादू कब घर कभी नहीं लौटेंगे...गौरी हल्का-हल्का घर के काम-काज करती पर ध्यान हमेशा फोन की तरफ़ होता....
समय गुज़र रहा था..ज़िन्दगी की रफ़्तार बाबा की तलाश में थामना नहीं चाहती थी...पंद्रह दिन, बीस दिन, फिर एक महीना ......नीसू का स्कूल जाना ज़रूरी था तो रवि का पैसे कमाना भी और गौरी का रवि और नीसू के लिये खाना पकाना भी...सारे काम वक़्त पर होने लगे थे ..अब नीसू बैठे-बैठे सहमती नहीं थी,पर दादू के हाथ की गुडिया के साथ खेलते-खेलते सामने पापा या माँ को पाकर पूछ लेती थी कि ‘दादू कब आयेंगे?’ ये सवाल नीसू की जुबान से निकलकर घर के टेलीफोन के ज़रिये थाने पहुँच जाया करता था. रास्ते में कुछ तब्दीलियाँ ज़रूर होती थीं जैसे दादू की जगह उनका नाम ‘श्री रामनाथ शर्मा’ आ जाया करता, क्योंकि वो सबके दादू नहीं थे...

अक्सर हम कहते-सुनते रहते हैं कि धीरे-धीरे सब ठीक हो जाता है..दर-असल धीरे-धीरे हम सबकुछ भूलते जाते हैं, भूलते जाते हैं क्योंकि जीने के लिये भूलना ज़रूरी है ..हम हर वक़्त स्मृतियों के साथ नहीं रह सकते ...हमें स्मृतियाँ परछायी की तरह नहीं बल्कि किसी ‘शोकेस’ में सजे खिलौनों की तरह चाहिए,जिसे जब चाहे देख लें औए जब चाहें उनसे नज़रें फेर लें..फिर धीरे-धीरे खिलौने बढ़ते जाते हैं और ‘शोकेस’ की जगहों को देखते हुए हमें पुराने खिलौने निकलने पड़ते हैं,फ़ेंकने पड़ते हैं...

घर में सबकुछ ठीक चलने लगा था..नीसू की वो गुडिया भी टूट गयी थी जो घर में वक़्त-बेवक़्त जाने-अन्जाने ‘दादू’ का ज़िक्र लाया करती थी ..रवि एक नई गुड़िया भी ला चुका था जो बैटरी से चलती थी...शायद सबके दिल में कुछ आस बची हो कि दादू की तस्वीर पर माला नहीं चढ़ी थी..ऑफिस निकलने में कुछ वक़्त था ..रवि अपने कमरे के आरामकुर्सी पर तैयार होकर पड़ा हुआ था..आँखें मूँद कर शायद अपनी स्मृतियाँ खँगाल रहा था..माथे पर उभरे शिकन से ये कहा जा सकता था कि किसी गहरी बात की चिंता है ..शायद बाबा की...बाबा के होने और न होने की चिंता ..जैसे ख़ुद से फिर वही सवाल पूछ रहा हो कि –‘क्या इस उम्र में भी लोग खोते हैं?’

हाँ- ये उम्र खोने की ही है... इसी उम्र में लोग खोते हैं अपनी जवानी के आख़िरी दिन ,अपनी नौकरी, अपना सच्चा बेटा, अपना आत्मविश्वास,कुछ रिश्ते, बहुत-से दोस्त, कुर्ते की जेब में रखी डायरी,सिरहाने रखी हाथ की घडी,माचिस की डिबिया और न जाने क्या-क्या?
इसी बीच सामने रखी टेबल पर टेलीफोन की घंटी बज उठी
-‘हेल्लो! रवि शर्मा!’
-‘जी कहिये!’
-‘जी मैं शिवाजी सरकारी अस्पताल से बोल रहा हूँ. आपने शायद एक इन्क्वायरी छोड़ी थी..’
-‘जी’ कहते हुए रवि ने रिसीवर और कस के पकड़ लिया..’
-‘हमें एक वैसी ही बॉडी मिली है जैसा आपने बताया था और कपडे भी वैसे ही हैं जो तस्वीर में थे..’
-‘जी’ रवि का गला सूखने लगता है.
-‘एक दिक्क़त है कि चेहरा पूरी तरह घायल है, जैसे किसी ने हमला किया हो, पुलिस इसकी जाँच कर रही है...पर..शिनाख्त आपको क़द-काठी और पहनावे से ही करनी होगी.आप फ़ौरन यहाँ आ जाएँ’

फोन कटने के बाद रवि कुछ देर वहीँ बैठा रहा ..वह कमरे के बाहर झाँकने की कोशिश करता है, उसकी नज़र खिड़की के काँच पर जाती है ...बाहर बादल उमड़े हुए दिखाई देते हैं ...कुछ देर में वह गौरी और नीसू को साथ लेकर निकल जाता है...रास्ते में कार के ‘फ्रंट ग्लास’ और ‘साइड विंडो’ पर बूँदा-बाँदी शुरू हो जाती है..
अस्पताल पहुँचने पर वार्डन उन्हें मुर्दा घर के सामने से उस कमरे में ले गया जहाँ पंचनामा होता है...नीसू बच्ची थी,उसे वैसे मरे हुए वातावरण में रखना गौरी ने सही नहीं समझा. वो उसे अपने साथ वार्ड से बाहर ले आयी..दोनों रवि का इंतज़ार करने लगे.. इधर कमरे में दाखिल होते ही रवि निनज़र स्ट्रेचर पर पड़ी उस बॉडी पर जाती है जिस का पहनाव अभी तक उतारा नहीं गया था बहुत ताज़ा लाश थी... सर से छाती तक एक कपडे से ढँका हुआ... रवि का हाथ अचानक उसकी कमीज़ की जेब की तरफ़ जाता है... जेब खाली थी... वो शायद बाबा की तस्वीर कार में ही भूल आया था...अगले ही पल उसे बड़ा अजीब सा लगा कि क्या गुज़रे डेढ़ महीनो ही इतना कुछ भूल चुका है कि बाबा को बग़ैर तस्वीर के नहीं पहचान सकता   ...क्या उसे बाबा का स्पर्श तक याद नहीं? ...वह अचानक ये याद करने की कोशिश करने लगता कि उसने आख़िरी बार बाबा को कब छुआ था... उसे किसी भी क़ीमत पर उसे ये याद नहीं आ पाती... फिर वो अपने सुन्न पड़े हाथों से लाश के शरीर के अलग-अलग हिस्सों को छूता ....कभी हाथ...कभी पैर... परन! कुछ भी नहीं... उसकी अंतरात्मा के लिये ये बिल्कुल नया और अन्जान स्पर्श था...वहीं उसके दिमाग़ के लिये यह स्पर्श दूसरे लाशों केस्पर्श की ही तरह ठण्डा था ...अपने शरीर के सभी अंगों को शुन्य महसूस करता रवि एकटक उस लाश को देखता रहा...उसी रंग की कमीज़, वैसी ही पैन्ट...इन सब से पूरा बाबा के होने का अहसास होता था ...वहीँ दूसरी तरफ़ कोई ऐसी चीज़ दिख जाती कि मन को खटका–  सा लग जाता... जैसे बाबा के हाथों पर इतनी झुर्रियां तो नहीं पड़ी थीं.. आदमी का मन जब दु:खी होता है तो वह तर्क नहीं चाहता बस उस क्षण सिर्फ़ मानने को तैयार हो जाताहै।..दिलो-दिमाग़ के काफ़ी जद्दो-जहद के बाद रवि ये मानने पर मजबूर हुआ कि ये लाश उसके बाबा की ही है..वह बाबा के शरीर के साथ सरकारी गाड़ी में बैठकर घर निकलता है। इधर गौरी नीसू को लेकर अपनी गाड़ी से घर पहुँचती है। आसमान बादलों से भर गया था। गौरी घर पहले पहुँची थी...वो चाहे कुछ भी कर रही थी उसकी पर आँखों के कोने लगातार बहते रहे। उसने आँगन में रखी कुछ चीजों को हटाकर जगह बनायी। कुछ देर में रवि भी घर आ गया। एक सफ़ेद कपड़े ढँके शरीर को आँगन के ठीक बीचो-बीच रखा गया। रवि अपने गिरते-थमते आँसुओं को सँभालते हुए इनकी अंतिम यात्रा की तैयारी करता रहा...नीसू का बाल मन कुछ भी समझ नहीं पा रहा था...उसने सुना तो था कि इस सफ़ेद कपड़े के नीचे उसके दादू हैं, मगर उसके उस क्षण की प्रतीक्षा थी, जब वो ख़ुद इस बात की तसल्ली कर सके।

लगभग सारी तैयारियाँ हो चुकी थीं। अब बाबा के शरीर से उनकी पुरानी क़मीज़ और पैंट हटा कर क़फ़न ओढ़ाने का समय आ गया था...इस दौरान रवि द्वारा उनके पार्थिव शरीर से कपड़ा हटाते ही नीसू उत्सुकतावश दौड़कर दादू के पास आ गयी.... घायल चेहरे का कपड़ा गले से इस तरह बाँधा हुआ था जैसे उसे खोलने की मनाही हो। नीसू का बालमन अपने दादू का चेहरा देखना चाहता था..वह अचानक चेहरे के बँधे कपड़े को हटाने की कोशिश करने लगी तो रवि ने आगे बढ़कर उसे रोका... उसने नीसू से कहा -'ये कपड़ा हटाने से दादू का वो सपना टूट जाएगा, जिसमें इस समय उन्हें उनकी प्यारी नीसू उनके साथ खेल रही है...वह बच्ची अपना नन्हा सा हाथ उस मृत हाथ में डालकर कुछ क्षण तक निस्तब्धता से एक-टक उस शरीर को देखती रही...रवि चुपचाप दोनों को देख रहा था....तभी अचानक नीसू ने पलट कर रवि का हाथ अपने दोनों हाथों से पकड़ा और उसके हाथ को झकझोरते हुए कहने लगी -'पापा...पापा! ये दादू नहीं हैं। रवि समझ पाता है कि बिना चेहरा देखे नीसू कैसे किसी को अपना दादू मान सकती है! रवि उसके पास जाकर उसे अपने गोद में उठाता है और अपनी बिखरती-सी आवाज़ में कहता है-‘बेटा! ये दादू ही हैं, देखो! उस दिन दादू ने इसी रंग की कमीज़ पहनी थी न!’

नीसू रवि के आँसुओं को पोंछते हुए कहती है-‘पर पापा दादू की शर्ट में तो पॉकेट नहीं थी।'
रवि नीसू को गोद से उतार कर दौड़ के आँगन से बाहर जाता है।वह अपने कार में रखी हुई बाबा की तस्वीर ढूँढने लगता है। तस्वीर मिलती तोहै मगर धूल की एक परत उससे चिपकी हुई होती है।ये वो धूल थी जो पिछले एक- डेढ़ महीने में रवि के मन पर चढ़ी थी...जिसे आज की घटना ने साफ़ कर दिया था। रवि तस्वीर साफ़ करके देखता है सच में बाबा की क़मीज़ में जेब नहीं थी। उसेये यक़ीन हो जाता है कि ये उसके बाबा नहीं हैं...वह ये बात गौरी को बता देता है गौरी खुल के रो देती है।

वाक़ई ये उसके बाबा नहीं हैं। रवि को इस बार एक अजीब-सी ख़ुशी होती है, बाबा के न मिलने की ख़ुशी... मगर पिछले घंटो जो भी इस लावारिस शरीर और रवि के मन के बीच गुज़रा था, वह शाश्वत था। भावनाएँ सच्ची थी... दोनों ने ये तय किया कि इस मृत शरीर को वापस किसी अँधेरे मुर्दा घरमें नहीं भेजेंगे बल्कि वे स्वयं इसका अंतिम संस्कार करेंगे..उन दोनों ने उस शरीर की अंतिम यात्रा को सफ़ल बनाया, उसे मुखाग्नि रवि ने दी, और फिर गँगा-किनारे उसकी अस्थियों को विसर्जित करते हुए, अस्ताचलगामी सूर्य देवता से अपने पिता के कुशल होने की और जल्द मिल जाने की प्रार्थना करने लगा......
                                 
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विजय शर्मा अर्श कोलकाता में रहते हैं।  उनसे आप यहाँ संपर्क कर सकते हैं :
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हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad