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Thursday, June 29, 2017

शंकरानंद की कविताएँ


शंकरानंद

पिछले कुछ वर्षों में शंकरानंद ने अपनी लागातार सक्रियता से हिन्दी युवा कविता के संसार में उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज की है। गौरतलब है कि कवि के पास अपनी एक भाषा तो है ही साथ ही उसके मानस में अपने अंचल के प्रति एक विशेष लगाव भी दिखता है। उसकी कविताओं में फूलों की गंध है, चिडियों की चहक है, चूल्हे का धुआँ है तो मतदाता सूची की पड़ताल भी है। यह कवि अपनी सजग दृष्टि से दुनिया को देख रहा है और उसको कविता में शिद्दत से दर्ज कर रहा है। कहना चाहिए कि इस कवि में विविधता है जो बड़ी कविताओं की जमीन होती है। हम इस कवि की ओर हसरत भरी निगाह और उम्मीद से देख रहे हैं।  
अनहद पर हम पहली बार शंकरानंद को प्रकाशित कर रहे हैं। हमें खुशी है कि आप लागातार हमारा हौसला बढ़ा रहे हैं।
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कटाव के बाद

ये वही जगह है जो कभी पत्तों के रंग में रंगी थी
यहां फूलों की गंध थी
यहीं थी चिड़ियों की चहक
यही अंडे थे यहीं घोंसले
और उनके बीच झड़े हुए पंख भी रहते थे

आप तस्वीरों में यहां खेलते बच्चों की हंसी को महसूस कर सकते हैं आज भी
चूल्हे का धुआं मिलेगा
कुतरे हुए नाखून और दानों के अवशेष मिलेंगे
कटे हुए घर के बीच अब बची है जीवन की गूंज

अब उन घरों के ढ़हने की याद रह गई शेष
जो गले हुए लोहे की तरह चुभती हैं

यह सब अब एक इतिहास है
आप आइये तो देखेंगे कि गांव के बीचोंबीच नदी बह रही है
एक निर्मम नदी
जिसमें मरे हुए लोगों की चीख पानी की आवाज में शोर करती है।

मतदाता सूची

जो नागरिक हैं वे दर्ज हैं हर सूची में
उनका नाम मिलेगा तस्वीर के पास
उनके माता का और पिता का भी नाम मिलेगा
उनकी जन्म तिथि मिलेगी
और भी मिलेगा सब कुछ सरकार के पास जो बताता है कि सरकार कितना चिन्तित है

पर कोई लापता हुआ उस सूची से तो सरकार नहीं बताती
कि कहां गए वे और क्यों गुम हुए शहर के बीच
उनका क्या हुआ जो लापता हुए
ये भी सरकार को नहीं मालूम न उनकी खोजबीन होती है इस तरह कि मिल जाएं
फिर लोग भूलने लगते हैं उन्हें धीरे धीरे
फिर एक दिन मतदाता सूची से भी नाम कट जाता है

अब सरकार उसमें नए नाम जोड़ लेती है।

एक बच्चे की इच्छा

रेत का बने या ईंट गारे का
या ताश के पत्तों का रहे घर मेरा
या पत्थर का ही हो गुफा की तरह

पर एक घर हो स्थायी इस दुनिया में
जिसमें मैं रहूं तो धूप नहीं आए
बारिश में पानी नहीं टपके
कोई खाली नहीं करवाए किराएदार की तरह
वह मेरा हो स्थायी पता

मैं उसकी दीवार पर असंख्य चित्र बनाना चाहता हूँ।

शिविर में रात

विस्थापन के बाद तमाम दुःख एक दिन कम पड़ जाते हैं
जब पता चलता है कि बेघर होना कितना तकलीफदेह है

तब न खाना अच्छा लगता है
न पानी न हवा न स्वप्न
तब नींद भी कई कई रात नहीं आती और कोई पूछता नहीं कि जाग क्यों रहे हो

शिविर में रात गुजारते समय यह पता चलता है कि
इस विशाल पृथ्वी पर एक इंच जमीन भी मिल जाती अपना कहने के लिए
तो वहां खड़े होकर सांस लेता
तब पता चलता कि जिन्दा होना किसे कहते हैं!

बांध की तरह   

यह दुनिया दरअसल इसलिए बची है
कि सपने जिन्दा हैं

वे बांध की तरह खड़े हैं
हर दुःस्वप्न की नदी के किनारे
वे लहरों को सहते हैं तो दुनिया तबाह होने से बच जाती है
अगर झड़ते हैं धूल की तरह तो कुछ भी शेष नहीं बचता

दुःख यही है कि हर बांध टूट जाता है एक दिन
वहां बनता है नया बांध।

लौटने की जगह

घर एक धरती है विशाल
एक अछोर आसमान
एक नदी है
एक छायादार पेड़

घर एक उम्मीद है
घर एक रात
घर एक इतिहास है
घर एक भूगोल

दुनिया में कहीं भी रहें
घर आपके लिए लौटने की जगह है
एक अंतिम आसरा तमाम सूर्यास्त के बाद

यहां कभी भी आएंगे तो दरवाजा खुल जाएगा!

उन दिनों

जब सभी लोग सो जाते
मैं जागता रहता
यही सोचता कि अगर जीवन में एक घर नहीं बना सका तो
क्या मुंह दिखाऊँगा अपने बच्चों को

जब पीठ पर सामान लादे बदलना होगा बार बार घर
तब किस घरती में छिपाऊँगा मुँह

उन दिनों बेघर होना एक अपराध की तरह था
जिसके लिए मैं नहीं
मेरी सरकार जिम्मेदार थी जो हड़प लेती थी जमीन जबरन

मैं हर बार कहता कि मेरी सरकार ने मुझे बर्बाद किया
लेकिन वह इसे मानने के लिए हरगिज तैयार नहीं थी

वह एक आदेश देती थी और मेरा सब कुछ हड़प लेती थी।

****
संपर्क-क्रांति भवन,कृष्णा नगर,खगड़िया-851204
मो0-8986933049


शंकरानंद
जन्म-8 अक्टूबर 1983
खगड़िया के एक गांव हरिपुर में
शिक्षा-एम0ए,बी0एड
प्रकाशन-आलोचना,वाक,आजकल,हंस,पाखी,वागर्थ,पक्षधर,उद्भावना,कथन,वसुधा,लमही,तहलका,पुनर्नवा,वर्तमान साहित्य,नया ज्ञानोदय,परिकथा,जनपक्ष,माध्यम,शुक्रवार साहित्य वार्षिकी,स्वाधीनता शारदीय     विशेषांक,साक्षात्कार,सदानीरा,बया,मंतव्य,दस्तावेज,जनसत्ता,समावर्तन,परिचय,
आउटलुक,दुनिया इन दिनों साहित्य विशेषांक,समय के  साखी,निकट,अनहद,युद्धरत आम आदमी,अक्षर पर्व,हिन्दुस्तान,प्रभात खबर,दैनिक भास्कर,अहा!जिन्दगी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।
आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से भी नियमित रूप से कविताएं प्रसारित।
कुछ में कहानी भी।
कविताओं का कुछ भारतीय भाषाओं में अनुवाद।

पहला कविता संग्रह दूसरे दिन के लिए‘;2012द्धभारतीय भाषा परिषद,कोलकाता से
प्रथम कृति प्रकाशन मालाके अंतर्गत चयनित एवं प्रकाशित।
दूसरा कविता संग्रहपदचाप के साथ‘;2015द्धराजभाषा विभाग के सहयोग से बोधि प्रकाशन,जयपुर से प्रकाशित।
सम्मान-2016 का विद्यापति पुरस्कार





हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Wednesday, June 28, 2017

जुनैद की हिमायत में - प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी




जुनैद की हिमायत में
प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी

प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी
आरएसएस और उनके समर्थकों में गजब की क्षमता है कह रहे हैं आरएसएस के बारे में ´षडयंत्र´के रुप में न देखें, हर घटना में न देखें। पहली बात यह कि आरएसएस सामाजिक संगठन नहीं है वह राजनीतिक संगठन है केन्द्र और अनेक राज्यों में उसके नियंत्रण और निर्देश पर सरकारें काम कर रही हैं,नीतियों के निर्धारण में उसकी निर्णायक भूमिका है।जमीनी स्तर पर आरएसएस और उसके संगठनों के बनाए नारे सक्रिय हैं,संयोग की बात है नारों के समानान्तर और संगति में सामाजिक हिंसा भी हो रही है। उनके नारों के पक्ष में न बोलनेवालों या उनका विरोध करने वालों पर आए दिन हमले हो रहे हैं, विभिन्न बहानों से उन नारों के प्रभाववश 22 निर्दोष मुसलमानों की हत्या हुई है। ये हत्याएं जिस तरह हुई हैं और जिन लोगों ने की हैं उनसे एक बात साफ है कि हत्या करने वाले स्वतःस्फूर्त हमले नहीं कर रहे।दूसरी बात यह कि आरएसएस की आलोचना करने पर जो समर्थक साइबरजगत में कुतर्क दे रहे हैं वे भी स्वतःस्फूर्त नहीं बोल रहे बल्कि आरएसएस की विचारधारा से प्रभावित होकर ही बोल रहे हैं।ऐसी अवस्था में आरएसएस की आलोचना होना उसके राजनीतिक फैसलों का विरोध करना हम सबका दायित्व बनता है।

जुनैद की हत्या सामान्य अपराध नहीं है।आरएसएस को जुनैद की हत्या का सड़कों पर उतरकर विरोध करना चाहिए। लेकिन हो उलटा रहा है। उस हत्या के खिलाफ जो आवाजें उठ रही हैं उनके खिलाफ आरएसएस भाजपा के नेता और साइबर समर्थक तरह-तरह के कुतर्क दे रहे हैं,सवाल यह है जुनैद की हत्या यदि साम्प्रदायिक हत्या नहीं है तो आरएसएस उसका जमीनी स्तर पर विरोध करने वालों का साथ क्यों नहीं देता ॽ क्यों उन पर हमले कर रहा है ॽ मुसलमान होने के कारण 22लोग अब तक मारे गए हैं एक भी हत्या के खिलाफ भाजपा आरएसएस ने पूरे देश में एक भी जुलूस नहीं निकाला,जबकि यही आरएसएस-भाजपा मिलकर तीन तलाक के मसले पर मुसलमान हितैषी होने का ढोंग करती रही है, मुसलमानों के मोदी एंड कंपनी को जमकर वोट मिले हैं।इसके बावजूद मुसलमानों पर ही हमले क्यों हो रहे हैं ॽ उनके ही धंधे को ही निशाना क्यों बनाया जा रहा हैॽ क्या मुसलमान देश में हिन्दुओं पर जुल्म कर रहे हैं या हिंदुओं के खिलाफ बोल रहे हैं ॽ
कायदे से आरएसएस और उससे जुड़े संगठन गऊरक्षकों और दूसरे किस्म साम्प्रदायिक गुंडों के द्वारा हमलों में मारे गए मुसलमानों के परिवारों के साथ आरएसएस खड़ा हो और जो लोग इन घटनाओं का विरोध कर रहे हैं उनका साथ दे,अपनी राज्य और केन्द्र सरकारों को सीधे निर्देश दे कि इस तरह के हत्याकांड करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाय।लेकिन हमें मालूम है आरएसएस यह सब करने नहीं जा रहा।वे और जोशो-खरोश से अपनी हिंदुत्ववादी मुहिम को और तेज करने जा रहे हैं और मुसलमानों के पक्ष में खड़े लोगों पर हमले कर रहे हैं, साइबर हमले कर रहे हैं। सवाल यह है जुनैद के हत्यारे अभी तक पकड़े कयों नहीं गए ॽ आरएसएस-भाजपा के लोग न्याय की मांग करने वालों या हत्यारो की गिरफ्तारी की मांग करने वालों के खिलाफ सीधे जहर क्यों उगल रहे हैं ॽ क्या जनता को विरोध का हक नहीं है ॽ अफसोस इस बात का है इस काम में अनेक शिक्षित लोग,प्रोफेसर लोग भी हत्यारों के साथ खड़े हैं।

भारत में हिंसा के पक्ष में खड़े होने, हिंसा और अत्याचार को वैध ठहराने की परंपरा है।इस परंपरा की जडें हिंदू संस्कारों से खाद-पानी लेती रहती हैं। वे घुमा-फिराकर जुनैद के मसले पर बात करने की बजाय ´पहले यह हुआ आप क्यों नहीं बोले´, ´कश्मीर में यह हुआ आप क्यों नहीं बोले ´, ’मुसलमान इतने खराब हैं आप क्यों नहीं बोले ´, आदि मुहावरों का प्रयोग करके संघियों और उसके हत्यारे गिरोहों की हिमायत कर रहे हैं।

हम विनम्रतापूर्वक एक बात कहना चाहते हैं जुनैद और इसी तरह की हत्याओं के विचारधारात्मक पहलू को देखें,छोटे-छोटे विवरण और ब्यौरों और अतीत के नरक को न देखें। मुसलमानोंके खिलाफ जो हमले हो रहे हैं ये रुटिन हमले नहीं हैं,ये रुटिन मॉब हिंसा नहीं है.बल्कि एक विचारधाराजनित हिंसा है।हम यहां जो लिख रहे हैं वह इस हिंसा के विचारधारात्मक पहलू को केन्द्र में रखकर लिख रहे हैं। दूसरी बात यह कि कांग्रेस के शासन का विरोध करने का अर्थ यह नहीं है कि लोग विकल्प के रुप में आरएसएस के जुल्मों का समर्थन करें। इससे भी बड़ी बात यह कि आरएसएस की विचारधारा के राष्ट्रव्यापी प्रभाव को देखें।आरएसएस ने लोकतांत्रिक हकों पर सीधे हमले किए हैं और सभी किस्म के बौद्धिक कर्म को निम्नस्तर पर पहुँचा दिया है।अब ज्ञान-विवेक के आधार पर संघी लोग बहस नहीं कर रहे वे गालियां दे रहे हैं या फिर आरोप लगारहे हैं या फिर सीधे शारीरिक हमले कर रहे हैं।इसमें भी उनका सबसे ज्यादा गुस्सा वामपंथियों पर निकल रहा है।वाम के प्रति उनकी घृणा का प्रधान कारण वैचारिक है, वाम के खिलाफ घृणा के कारण ही कारपोरेट घराने उनको पसंद करते हैं।संघियों की वामविरोधी घृणा का स्रोत है कारपोरेट घराने।क्योंकि वे भी वाम से नफरत करते हैं,इस मामले में संघ और कारपोरेट घराने जुडबां भाई हैं।

आरएसएस के नारों और राजनैतिक कारनामों के कारण भारत की आर्थिकदशा लगातार खराब हो रही है। जो लोग आरएसएस से प्रेम करते हैं वे कभी इस बात गौर करें कि आरएसएस की विचारधारा ने भारत के आर्थिक ढांचे को कितने बड़े पैमाने पर नुकसान पहुँचाया है।आरएसएस के लोकतंत्र में उभार को सामान्य राजनीतिक उभार के रूप में न देखें,यह असामान्य और भयानक है। ठीक वैसे ही जैसे स्पेन में फ्रेंको आया था,जर्मनी में हिटलर आया था।लोकतंत्र में इस तरह की संभावनाएं हैं कि मोदीजी फ्रेंको बन जाएं !

आरएसएस के बनाए दो नए मिथ हैं -´भारतीय हिंदुत्व´ और ´भारतीय लोकतंत्र´। वे इन दोनों की महानता बहुत गुणगान करते रहते हैं। पीएम से लेकर मोहन भागवत तक के भाषणों में इन दोनों मिथों को देख सकते हैं। इन दोनों मिथों का संघी फासिज्म से गहरा समंबंध है।इन दोनों मिथों के कारण आज समूची बहस लोकतंत्र के मसलों,मानवाधिकार के मसलों के बाहर कर दी गयी है।इसके अलावा ´हाशिए´के लोगों की लड़ाई और हितों की रक्षाके सवालों को ठेलकर समाज से बाहर कर दिया गया है।इस समय सिर्फ उन दो मिथों पर बातें हो रही हैं जिनका ऊपर जिक्र किया गया है।प्रधानमंत्री से लेकर मंत्रियों तक, मोहन भागवत से लेकर प्रवीण तोगडिया तक इन दोनों मिथों का नया-नया भाष्य रचा जा रहा है।इन दो मिथों की आड़ में सीधे हमले हो रहे हैं।हम कहना चाहते हैं ´भारतीय लोकतंत्र´ महान नहीं है। महान बनाकर लोकतंत्र के मर्म की हत्या की जा रही है,लोकतंत्र को वायवीय बनाया जा रहा है। भारत की जनता को वास्तव अर्थ में लोकतंत्र चाहिए,न कि ´भारतीय लोकतंत्र´

भारतीय हिंदुत्व´ और ´भारतीय लोकतंत्र´ के मिथों की आड़ में ´आक्रामकता´ और ´सैन्य आक्रामकता´की खुलकर वैसे ही हिमायत की जा रही है जैसी एक जमाने में हिटलर ने की थी। हिटलर की नकल करते हुए मोदी के भाषणों को ´राष्ट्रीय आख्यान´ बनाकर पेश किया जा रहा है।आज जरुरत है इन दोनों मिथों के खिलाफ आम जनता को शिक्षित करने और गोलबंद करने की।

                            
                              
                                                                   *** 

प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी वरिष्ठ प्राध्यापक और मिडिया विशेषज्ञ हैं। सेवानिवृति के बाद फिलहाल दिल्ली में रह रहे हैं।

हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

Tuesday, June 27, 2017

अदनान कफ़ील दरवेश की नई कविताएँ



अदनान कफ़ील दरवेश

अदनान कफ़ील दरवेश की बहुत कम कविताएं अब तक हमारे सामने आई हैं लेकिन उन कविताओं के ताप ने हमें गहरे कहीं छुआ है। महज़ 22 साल की उम्र में अदनान बड़ी कविताएँ लिख रहे हैं । पिछले दिनों नीलांबर कोलकाता द्वारा आयोजित एक साँझ कविता की -3 में अदनान ने अपनी कविताओं से श्रोताओं को न केवल चमत्कृत किया था वरंच उद्वेलित भी किया था। सच कहूँ तो पहली बार मैं अदनान की कविताएँ सुन रहा था और सुनते हुए इस कवि की बेचैनी को भीतर तक महसूस कर रहा था। कहना चाहिए कि अदनान अपनी कविताओं में गंगा-जमुनी संस्कृति के वाहक अकेले युवतर कवि हैं। भोजपुरी अंचल से आने वाले इस कवि में न केवल अपने अंचल की माटी की गंध है बल्कि एक अलग और नये तरह का हिन्दुस्तान भी आकार ले रहा है। यहाँ प्रस्तुत कविताओं में हम महसूस कर सकते हैं कि कवि का संसार कितना बड़ा है और एक नूतन उम्मीद से भरा हुआ भी।
यह बताते हुए बहुत हर्ष हो रहा है कि अभी कल ही अदनान को अनुनाद सम्मान दिए जाने की घोषणा प्रिय कवि शिरीष कुमार मौर्य ने की है – वे सम्मान की घोषणा करते हुए लिखते हैं – अदनान पिछले एक वर्ष से लगातार गंभीर कविकर्म में संलग्न हैं। उनके पास वैचारिक ताक़त और नई ऊर्जा है। अदनान की कविता को ध्यान में रखते हुए आज़ादी के बाद की कविता के पूरे सिलसिले को याद करें तो एक मुकम्मल दृश्य बनता है, जहां हिंदी कविता में दोआबे की वही आंच भरी ज़ुबान बार-बार लौटती है - यह केवल भाषा का सिलसिला नहीं, बच रही मनुष्यता का सिलसिला भी है, हमारे कितने ही कवियों के नाम इस सिलसिले में शामिल हैं। इस सिलसिले के बिलकुल नए नाम अदनान कफ़ील दरवेश के रचनाकर्म को लेकर मैं उत्सुक हूं, हमेशा उन पर निगाह टिकी रहेगी। उन्हें अनुनाद सम्मान देते हुए निर्णायक मंडल आश्वस्ति और हर्ष का अनुभव कर रहा है।
आइए पढ़ते हैं अदनान की कुछ नई कविताएँ। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार तो रहेगा ही।
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गायें

सुबह होती है
और गायें खूँटों पर बँधी रंभाती हैं और चारा मांगतीं हैं
गायें दिन-दिन भर चरवाहे के साथ चरने जातीं हैं
और शाम को लौट आती हैं अपने खूँटे पर
और रंभाती हैं।
दुधारू गायें दुहती हैं और पूजी जाती हैं।
गायें मुँह उठाये देखती हैं रास्तों की तरफ
मनुष्यों को गुज़रते हुए देखती हैं गायें
गायों ने देखा है कितने-कितने मनुष्यों को
कितनी-कितनी बार गुज़रते हुए
गायों ने देखा है युद्ध नायकों और सैनिकों को
कितनी-कितनी बार गुज़रते हुए
गायों की एक झपकी में समय का
पूरा लश्कर गुज़र जाता है
चुपचाप।
गायें सानी खाती रहती हैं
और मध्यप्रदेश में एक मुसलमान
गोकशी के जुर्म में मार दिया जाता है !
गायों के गले में बँधी घंटियाँ बजती हैं
गायें सुनती हैं राजस्थान में
गोकशी के जुर्म में मारे गए एक मुसलमान के बारे में
गायें अपनी पूँछ से मच्छरों को हाँकती हैं
अपने खुर पटकती हैं
पिटती हैं कोई खाने की चीज़ झपटते हुए बाज़ारों में
मंडियों में अपने पुट्ठों पर ज़ख्म लिए
फिरती हैं गायें
बूढ़ी गायें अपने डांगर शरीर लिए धीरे-धीरे चलती हैं
कभी कूड़े के ढेर में खाने की कोई चीज़ तलाशती हुई
कभी दीवार में देह रगड़ती हुई।
गायें सुनती हैं एक मुसलमान की सार्वजनिक हत्या की ख़बर
गायें अपनी नाद में मुँह घुसाये चारा खाती हैं
बैठ कर पगुरी करती हैं।
गायें गायों से मनुष्यों के बारे में नहीं पूछतीं
गायें गायों से मुसलमानों के बारे में नहीं पूछतीं
गायें मनुष्यों से मनुष्यों के बारे में कोई सवाल नहीं करतीं
बस एक दिन गायें
स्वयं उठकर चली जाती हैं
बूचड़खानों की तरफ़...
(रचनाकाल: 2017)
दिल्ली

फूल और तितली

जब मैं छोटा था
बेहद छोटा  
महज चार या पांच बरस का
तो गेंदे का फूल अपनी जेब में रखके घूमता था
और वक़्त-ब-वक़्त उसे सूंघता था
मुझे तितलियाँ बहुत लुभाती थीं
मैं घंटों उनका पीछा करता
और उन्हें छकाता
और कभी-कभी
एक दो को पकड़ भी लेता
एक दिन मैंने अपने दोस्तों की तरह ही
लपटा और काग़ज़ से
तितली का छोटा आशियाना बनाया
और उसमें तितली को बंद कर दिया
मैं बहुत ख़ुश था
अगले दिन वो तितली मर गयी
और मैं रोने लगा
मैंने अपनी नन्हीं तितली की छोटी कब्र खोदी
और उसमें उसे दफना दिया
वो तितली आज भी कभी-कभी मेरे सपने में आती है
मैं आज भी बहुत रोता हूँ उसके लिए
उस दिन के बाद
मैंने कोई तितली नहीं पकड़ी
कोई फूल नहीं तोड़ा
उस दिन से मैं ढूंढ-ढूंढ कर
हर लपटे के घर तोड़ देता...

(रचनाकाल: 2015)
दिल्ली

अपनी आत्मा से

अपनी पीड़ा की नुमाइश करके
बेहिसाब तारीफें बटोरीं
ऐ मेरी आत्मा
मेरे निकट आ
और मुझपर थूक दे !

(रचनाकाल: 2015)
दिल्ली

प्रतीक्षा

आज
जबकि मैं तुमसे
कविता में संवाद कर रहा हूँ
तो मेरी प्रतीक्षा में
समुद्र की नीलिमा
और गहराती जा रही है
और गहराता जा रहा है
गुलाब का चटख लाल रंग
रात की सियाही को
और गहराता देख रहा हूँ

मेरी भाषा के सबसे भयावह शब्द
एक घुसपैठिए की तरह
उतरना चाहते हैं मेरी कविता में
आज मैं उनसे दूर भागना चाहता हूँ
दूर बहुत दूर
जहाँ वो मेरा पीछा न करते हों

मैं इस कविता को बचा ले जाना चाहता हूँ
ठीक वैसे ही जैसे बचाता आया हूँ तुम्हारा प्रेम
जीवन के हर कठिन मरुस्थल में भी
प्रिय !

मैं अपने आप को बचाते-बचाते
अब बहुत थक गया हूँ
मेरी ये थकी प्रतीक्षा मेरे प्रेम की आखिरी भेंट है
इसे स्वीकार करो
और अंतिम बार मुझसे वहाँ मिलो
जहाँ सफ़ेद घास अब और नरम हो गयी है
और जहाँ बकरियाँ घास टूंग रही हैं......

(रचनाकाल: 2015)

सर्दियों में एक यात्रा के दौरान-1

धुंध में डूब रही है सड़क
जितनी डूबती है उतनी ही दिखती भी है
इसके यूँ डूबने और उग आने में
एक कराह शामिल है
जिसे सुनकर आँखे भर आती हैं
कितने लाचार हैं हम जो
ठीक इस सड़क की तरह ही
अपने समय में आधे धँसे और
आधे उभरे हुए हैं...

सर्दियों में एक यात्रा के दौरान-2


सड़क जानती हैं
कि हमें कहाँ जाना है
इसीलिए तो बूढ़ी पहाड़न-सी
अपने पीठ पर गट्ठर-सा लादे हुए
हमें ढो रही है
सड़क ने बहुत लंबी यात्राएँ कर लीं हैं
उसे मालूम है सारे ख़तरनाक मोड़
हमें अपनी ढलान से आगाह करती हुई
बूढ़ी सड़क हमें और ऊपर ले जा रही है
कभी-कभी तो लगता है कि हम
सड़क के ऊपर भी और सड़क के भीतर भी
यात्राएँ कर रहे हैं
वो लंबी यात्राएँ जिन्हें तय कर चुकने के बाद
हम वो जान पायेंगे
जिन्हें सड़क ने हमसे बहुत पहले ही
जान लिया है !

फिसलन

यहाँ बहुत फिसलन है साथी
चलो कहीं दूर चलते हैं
अपनी चमकीली चप्पलें उतार
धरती के किसी अपरिचित छोर पर
जहाँ धरती हमारे क़दमों के लिए
अपनी हथेली
ख़ुद-ब-ख़ुद आगे बढ़ाती हो ....

(रचनाकाल: 2015)
दिल्ली

बहुत अँधेरा है यहाँ

मैं इन्सान हूँ या कोई प्रेतात्मा
नहीं कह सकता
मैं भटकता रहता हूँ
यूनान, मेसोपोटामिया और हिंदुस्तान के खण्डहरों में
दजला के तट की घास
कोटला फिरोज़शाह की भसकी दीवार
इमामबाड़े की मुलायम सीढ़ी
मैं ही तो हूँ

मैं कोई बेचैन प्रेतात्मा हूँ
जिसकी छलांग समय की हथेली-भर है
सुनो ! मैं एक कलमा हूँ
जो तुम्हें किसी खोह में तड़पता मिलेगा
मैं एक गीत हूँ जो अभी गाया नहीं गया
मैं एक पीड़ा हूँ जो अभी पैदा नहीं हुयी
इतिहास के काले अक्षर
मेरे जिस्म के हर हिस्से पर
गरम भाले की नोक से खुदे मिलेंगे तुम्हें
मैं एक औरत की जली हुई लाश हूँ
जो हर सभ्यता के मुहाने पर मिलेगी तुम्हें
मेरा संस्कार अभी बाक़ी रहा गया तुमसे
पीसा की झुकी मीनार-सा मेरा अस्तित्व
रात के ढाई बजे
तुम्हें पुकारता है
सुनो !
एक कंदील जला दो
बहुत अँधेरा है यहाँ
बहुत अँधेरा है यहाँ ......

(रचनाकाल: 2015)

हम मारे गए

जब दुःख रिस रहे थे हमारी आत्मा
के कोनों-अँतरों से
हम पागलों की तरह सर धुनते थे
हम स्वप्न में भी भागते
और बार-बार गिर पड़ते
हम अँधेरे द्वीपों के किनारों पर
खड़े विलाप करते
हमारा अंत हमें मालूम था
आप बस इतना ही समझिये
कि हम कवि थे
और कविता के निर्मम बीहड़ एकांत में
मारे गए !

(रचनाकाल: 2016)


 ****


कवि परिचय:

नाम: अदनान कफ़ील दरवेश

उम्र: 22 साल

जन्म स्थान: ग्राम गड़वार ज़िला बलिया उत्तर प्रदेश

शिक्षा: दिल्ली विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस में B.Sc(H)

प्रकाशन: हिंदी की पत्र पत्रिकाओं और वेब ब्लॉगों पर कविताएँ प्रकाशित





हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad