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Thursday, June 15, 2017

भूमि अधिग्रहण का ‘पुरस्कार’ - मृत्युंजय पाण्डेय



भूमि अधिग्रहण का पुरस्कार
मृत्युंजय पाण्डेय

मृत्युंजय पाण्डेय युवा आलोचक और प्राध्यापक हैं।
पुरस्कार कहानी की शुरुआत भूमि अधिग्रहण के उत्सव और पुरस्कार वितरण समारोह  से होती है । कोशल के राष्ट्रीय नियम के नाम पर कृषक बालिका मधूलिका की जीविका का एकमात्र साधन उसकी पैत्रिक भूमि महाराज द्वारा अधिग्रहण कर ली जाती है । निज की भूमि महाराज (सरकार) का हो जाना जहाँ  दूसरों के लिए (वे जो किसान नहीं हैं) हर्ष और  सम्मान की बात है, वहीं मधूलिका के लिए दुख और अपराध की बात है । दुख उसे इस बात का है कि उसके पितृ -पितामहों की भूमि कोशल के रास्ट्रीय नियम में चली गई, और वह कुछ न कर सकी । इसी अपराध बोध के कारण वह राजकीय अनुग्रह ठुकरा देती है । वह अपने आप को भूमि से अलग करके नहीं देख पाती ।
          कहानी में हम देखते है कि सिर्फ उत्सव के नाम पर एक अनाथ  बालिका की भूमि छीन ली जाती है । महाराज बड़ी ही चतुराई से भूमि पर कब्जा कर लेते हैं । यह नियम नहीं बल्कि एक चाल  है । यदि हर वर्ष राष्ट्रीय उत्सव के नाम पर निरंतर भूमि पर कब्जा किया जाय तो कुछ ही सालों में सारी भूमि सरकार की हो जाएगी । आज महाराज की तरह सरकार भी विकास के नाम पर किसानों को भूमि के अधिकार से वंचित कर देना चाहती है । भूमि अधिग्रहण के बाद मधूलिका की तरह किसान भी मजदूर बन जाएँगे । समृद्धि मजदूर के हिस्से नहीं आएगी । इसीलिए मधूलिका भूमि के बदले पैसा नहीं भूमि चाहती है । वह जानती है कि सरकार द्वारा मुआवजे के नाम पर क्या मिलेगा । इन मुआवाजों से वह अपने लिए कुछ भी नहीं  कर सकती । कुछ समय बाद उसके पैसे भी खत्म हो जाएँगे और भूमि भी चली जाएगी ।
          किसानों की  जमीन किसानों के अधीन ही रहनी चाहिए न कि सरकार के अधीन । बेचने न बेचने तथा मूल्य निर्धारित करने का निर्णय उसका खुद का होना चाहिए । भूमि किसानों के लिए महज मिट्टी नहीं है । लेकिन सरकार उसे सर्फ मिट्टी के ही रूप में देख रही है । भूमि  उसके घर की तिजोरी है । उसकी बिटिया की  शादी के लिए जमा पूँजी है । उसके बुरे वक्त का सच्चा साथी है । उसके  पूर्वजों का आशीर्वाद है वह । 
           यदि मधूलिका स्वेच्छा से अपनी भूमि महाराज को दे देती तो कोई बात नहीं थी, लेकिन उसकी भूमि उसकी इच्छा से नहीं बल्कि महाराज की इच्छा से चुनी जाती है, उनकी सुविधा का ख्याल रखते हुए । महाराज के मन में कृषक बालिका के लिए  हमदर्दी वगैरह कुछ नहीं है । वह तीन साल तक जर्जर अवस्था में रहती है, लेकिन महाराज उसकी खबर तक नहीं लेते । मान लें इन तीन वर्षों में उसकी मृत्यु हो जाती या जर्जर जीवन से तंग आकर वह आत्महत्या कर लेती, जैसे आज के किसान कर रहे हैं । उसका जिम्मेवार कौन होता? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सरकार महाराज का ही आधुनिक और विकसित रूप  है ।
          आज भूमि अधिग्रहण के संदर्भ में पुरस्कार कहानी की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है । महज कुछ लोगों के फायदे के लिए किसानों की कमर तोड़ी जा रही है । ग्रामीण विकास  के नाम पर भूमि अधिग्रहण बिल पास करवाया जा रहा है । सरकार की मानें तो उसकी मंशा किसानों कि मदद करने की  है । ऐसा दावा किया जा रहा है कि भूमि अधिग्रहण विधेयक विकास का सबसे उतम मॉडल है । इससे “सिंचाई, विधुतीकरण, गरीबो के मकान, कमजोर तबकों और ग्रामीण भारत को मदद मिलेगी । ” सरकार का तो यह भी कहना है कि “ग्रामीण इलाको में औधोगीक कारीडोर और औधोगीकरण से सभी लोगों, खासकर भूमिहीनों और दलितों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने में मदद मिलेगी ।” भारत जब स्वतंत्र हुआ था, उस समय विकास के दो मॉडल थे, एक पंडित जवाहरलाल नेहरू और दूसरे महात्मा गाँधी । जाहिर सी बात है उस वक्त गाँधी के भारत निर्माण के सपनों को दरकिनार  कर नेहरू ने अपने पश्चिमी मॉडल को प्रश्रय दिया । बेशक औधोगीकरण से कुछ लोग लाभान्वित तो हुए पर लाखों- कारोड़ों लोग लगातार गरीब होते गए । नये-नये शहरों का निर्माण और विकास हुआ  लेकिन, गाँव जर्जर अवस्था में पड़ा  रहा । यदि समय रहते गाँधी के ग्रामीण विकास योजना पर पहल किया गया रहता तो आज स्थिति इतनी बद्तर  नहीं होती । आजादी के लगभग 70 बर्ष बाद भी भारतीय गाँव अपनी प्राथमिक जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है । सवाल  यह है कि भूमि अधिग्रहण से फायदा किसका होगा ? विकास किसके हिस्से आएगा ? किसानों का तो होगा नहीं, क्योंकि भूमि छिन जाने के बाद वे किसान तो रहेंगे ही नहीं । और नहीं गाँव,  गाँव ही रह पाएगा । गाँव और किसान के गायब हो जाने के साथ-साथ भारतीय परिदृश्य से बैल भी गायब हो जाएँगे । एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि जो बड़े-बड़े उद्धोग लगेंगे उसमें नौकरीयाँ किसे मिलेंगी? उन उद्धोगों के लगने से गाँव में कितनी गलत चीजों का आगमन होगा? ‘र्ंगभूमि के सूरदास की चिंता इन्हीं सब चीजों को लेकर थी । वह जनता था की गाँव में सिगरेट का कारख़ाना लगने से शराब की भट्टी खुलेगी, वेश्यालय खुलेगा, आवारा लोगों का आगमन होगा तथा ग्रामीण स्त्रियों की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी । साथ ही गाँव की संस्कृति या विस्तार दे तो भारतीय संस्कृति जिसका बखान करते हुए हमारे राजनेता फूले नहीं समाते हैं, नष्ट हो जाएगी । दुख की बात यह है कि अंधे सूरदास को इतनी सारी चीजें नजर आ रही थीं , लेकिन आज आँख वालों को कुछ भी नहीं दिख रहा । शायद आने वाले दिनों में कोई कवि भारतमता ग्रामवासिनी कविता नहीं लिखेगा और न ही गोदान’, ‘मैला आँचल’, ‘रागदरबरी और दो बैलो की कथा जैसी रचना लिखी जाएगी । साथ ही जय जवान जय किसान नारे को भी बदलना होगा ।
         
जयशंकर प्रसाद
सूरदास मरते दम तक लड़ता  है लेकिन उसकी जीत नहीं होती । प्रश्न है आखिर उसकी जीत क्यों नहीं होती
? उत्तर सूरदास के ही शब्दों में, वह कहता है  “ हमारा दम उखड़ जाता है, हाँफने लगते हैं, खिलाड़ियों को मिलाकर नहीं खेलते, आपस में झगड़ते हैं, गाली-गलौज, मारपीट करते हैं । कोई किसी को नहीं मानता । तुम खेलने में निपुण हो, हम अनाड़ी हैं । बस इतना ही फरक है ।”  सूरदास की बात बिलकुल सत्य है यदि किसान आपस में मिलकर नहीं लड़ते हैं तो उनकी हार निश्चित है । उनकी आपसी फुट से सरकार की जीत तय है । इसीलिए सरकार गाँव-गाँव जाकर किसानों को समझा रही है । ठीक रंगभूमि के जान सेवक की तरह । वह लोगों में फुट डालने और अपना काम बनाने के लिए अलग-अलग लोगों से अलग-अलग बातें करता है । वह पंडे से कहता है “यात्रियों के लिए सड़क के किनारे खपरौल के मकान बना दिये जाएंगे ।” अहीर से कहता है “हाते में गाय-बैल चराने की  इजाजत दे दी जाएगी ।” पानवाले से कहता है “मिल खुलने पर तुम्हारी बिक्री चौगुनी हो जाएगी ।” वह कहता है गाँव के लड़को को पढ़ने के लिए मदरसा खोल देगा । वह चारों तरफ से सूरदास को अकेला कर देना चाहता है । व्यापार के इस युग में सरकार भी किसानों को अकेला कर देना चाहती है । पांडेपुर में किसानों के बदले मजदूरों का जन्म होता है । मिल की नौकरी करते हुए वे अपनी सारी परंपरा और संस्कृति को भूल जाते हैं ।
          सूरदास की तरह मधूलिका भी आदर्शवादी और स्वाभिमानी स्त्री है । एक स्त्री होकर वह अपने अधिकारों के लिए लड़ती है । वह मजदूर नहीं किसान कहलाना चाहती है । कहानी में हम देखते हैं, भूमि महाराज की कही जाएगी और कृषक उस अपनी ही जमीन पर मजदूरी करेगा या करता है । यह बात मधूलिका को मंजूर नहीं । वह अहिंसक तरिके से राज्य के नियम या उत्सव का विरोध करती है । विपन्नता में होने के बाद भी वह रोटी के लिए अपनी आत्मा नहीं बेचती । वह दूसरों के खेतों में काम करके रूखा- सूखा खाकर अपना गुजर- बसर करती है । जर्जर झोपड़ी की तरह उसका जीवन भी जर्जर हो चला है । पर वह महाराज के अनुग्रह को स्वीकार नहीं करती । रूखा-सूखा खाना, वृक्ष के नीचे जर्जर पर्णकुटीर में रहना एक तरह से मूक अहिंसक विरोध ही तो है ।
          वह चाहती तो महाराज से अपने भूमि अधिग्रहण का बदला ले सकती थी, पर वह उसका निजी स्वार्थ या प्रतिशोध होता और उसके इस निजी प्रतिशोध या स्वार्थ पर हजारों- लाखों लोगों की जानें जाती और घर-परिवार बर्बाद होते । मधूलिका जैसी शख्सियत को यह मंजूर नहीं । उसके मन में विद्रोह की भावना तो उठती है पर राष्ट्र और प्रजा का हित सोच कर शांत हो जाती है । पर क्या यह संभव है कि आज का किसान भूमि छिने जाने के बाद भी विद्रोह नहीं करेगा ? वह अरुण जैसे दुश्मन का साथ नहीं देगा ? रूखा-सूखा खाकर, जर्जर अवस्था में पड़ा रहेगा ? ऐसे न जाने कितने प्रश्न हैं ? जिनके उत्तर ढूढ़ने बाकी हैं ।
          भारत में पहली बार भूमि अधिग्रहण बिल 1894 में आया था, यह कानून अंग्रेजों ने बनाया था, अपने फायदे के लिए । प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद अपनी रचना के माध्यम से भारतीय जनता को भूमि अधिग्रहण के दुस्परिणाम से आगाह करते हैं । ये दोनों लेखक इस बात को भली-भाँति जानते थे कि भविष्य में, आने वाले दिनों में  भूमि अधिग्रहण का यह  बिष बेल बिकराल रूप में फैलेगा । जिससे भारतीय किसानों की स्थिति बाद से बद्तर   होगी । यह बात भी सच है कि इससे विकाश तो होगा, पर वह विकाश गरीब किसानों के हिस्से नहीं आएगा ।
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मृत्युंजय पाण्डेय,
संप्रति : असिस्टेंट प्रोफेसर, सुरेन्द्रनाथ कॉलेज (कलकत्ता विश्वविद्यालय), कोलकाता
प्रकाशित पुस्तक : कवि जितेन्द्र श्रीवास्तव (आलोचना)
संपर्क; 25/1/1, फकीर बगान लेन, पिलखाना, हावड़ा - 711101,
मो॰ +91 9681510596 E-mail: pmrityunjayasha@gmail.c




हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

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