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Friday, March 1, 2019

साहित्यिक पत्रिका सम्मेलन: एक रिपोर्ट


साहित्यिक पत्रिका सम्मेलन
संकट से संभावनाओं की ओर
प्रस्तुति : पीयूषकांत


कोलकाता में 16-17 फरवरी 2019 को आयोजित साहित्यिक पत्रिका सम्मेलन इस दृष्टि से महत्वपूर्ण था कि यह जयपुर में आयोजित लघु पत्रिका सम्मेलन (2001) के लंबे समय बाद हुआ। इसमें देश भर से 50 से अधिक लेखक-संपादक आए थे। ये आपस में मिले-जुले। इन्होंने यह संदेश दिया कि स्वायत्तता के साथ सहयात्रा संभव है। सम्मेलन से स्पष्ट हुआ कि साहित्यिक पत्रिकाओं और इनके लेखकों-संपादकों की अपनी समस्याएं और चिंताएं हो सकती हैं और साहित्यिक माहौल बनाने में इनके साझा कार्यक्रमों की बड़ी जरूरत है। सम्मेलन का आयोजन भारतीय भाषा परिषद द्वारा अपनापे से भरे माहौल में हुआ था। पहली बार ई-पत्रिकाओं और सोशल मीडिया की संभावनाओं और सीमाओं पर भी विस्तृत चर्चा हुई। साहित्यिक पत्रिकाओं के भविष्य के समक्ष उपस्थित चुनौतियों पर खुल कर विचार विमर्श हुआ। दो दिनों के इस राष्ट्रीय आयोजन में युवाओं और प्रबुद्ध साहित्य प्रेमियों की भारी उपस्थिति थी। इससे यह निष्कर्ष भी निकला कि विभिन्न शहरों में ऐसे सम्मेलन का सिलसिला जारी रहना चाहिए। इसकी संक्षिप्त रपट इस प्रकार है।

16 फरवरी/उद्घाटन सत्र, विषय : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता : देश-दुनिया का परिदृश्य

भारतीय भाषा परिषद के मंच पर अतिथियों द्वारा द्वीप प्रज्वलन और परिषद अध्यक्ष कुसुम खेमानी द्वारा स्वागत वक्तव्य के बाद उद्घाटन सत्र प्रारंभ हुआ।

शंभुनाथ (सम्मेलन प्रस्तावना, अंश)
कोलकाता में साहित्यिक पत्रिका सम्मेलन एक संकट के माहौल में ही नहीं, एक आशा के साथ भी शुरू हो रहा है। लेखकों-संपादकों का इतनी बड़ी संख्या में शामिल होना साहित्यिक पत्रिकाओं की उस दीर्घ परंपरा में हमारी अटूट आस्था का सबूत है जिसकी शुरुआत भारतेंदु हरिश्‍चंद्र ने ‘कविवचनसुधा’ से की थी। महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित ‘सरस्वती’, निराला आदि के ‘मतवाला’, प्रेमचंद के ‘हंस’ तथा कई अन्य महत्वपूर्ण पत्रिकाओं से होते हुए यह परंपरा लघु पत्रिकाओं के मुकाम पर पहुँची। इस महान परंपरा में लेखक और संपादक अभिन्न रहे हैं और उनका लक्ष्य कभी मुनाफाखोरी नहीं रहा है। दरअसल पत्रिका निकालना एक तरह का  ‘लिटरेरी एक्टिविज्म’ है जो आज तक जारी है।
साहित्यिक पत्रिकाओं का समाज में बने रहना एक व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन से जुड़ा मामला है। इनकी विविधता को, उत्पीड़न की बहुत-सी आवाजों को फूट नहीं मानना चाहिए। इन्हें शक्ति समझना चाहिए। इनके बीच खाइयों की नहीं, पुल की जरूरत है। इस दृष्टिकोण के अलावा, इस पर बहस हो सकती है कि क्या आज सांस्कृतिक जागरूकता के बिना राजनीतिक जागरूकता संभव है। इन चीजों पर भी सोचने की जरूरत महसूस हो सकती है कि पत्रिकाएं एक व्यापक साहित्यिक-सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में समाज में रचनात्मकता को कैसे प्रोत्साहन दें, वे नई भविष्य-दृष्टियों के साथ आम असहमति का निर्माण कैसे करें और सबसे अहम बात यह है कि पढ़ने की संस्कृति का व्यापक ह्रास हुआ है तो पाठक की वापसी कैसे हो।

मुद्रित साहित्यिक पत्रिकाओं और ई-पत्रिकाओं में कोई विरोध नहीं है। लेकिन यह भ्रम दूर हो जाना चाहिए कि मुद्रित साहित्यिक पत्रिकाओं का युग बीत गया है और सोशल मीडिया या ई-पत्रिकाएं उनका विकल्प हैं। निश्‍चय ही साहित्य की मुद्रित और ई-पत्रिकाओं- दोनों की कई साझी समस्याएं हैं और ये एक ही नदी के दो किनारों की तरह हैं।
साहित्यिक पत्रिका सम्मेलन ऐतिहासिक सिद्ध हो सकता है, यदि ‘स्वायत्तता के साथ सहयात्रा’ का हम लोगों का  पुराना संकल्प फिर जी उठे, हमारा भीतरी अलगाव खत्म हो और मतभेद हो भी तो संवाद बना रहे। यह हमारी आशा है, लेकिन इस आशा की नींव में अभी बहुत कोयले की जरूरत है!
जवहर सरकार (पूर्व-सीईओ प्रसार भारती, मुख्य अतिथि)
लोकतंत्र में विरोध स्वाभाविक है, लेकिन आज का सबसे बड़ा संकट है कि हर विरोध को राष्ट्र विरोधी करार दिया जा रहा है। पिछले 50 सालों में इतने भय का माहौल कभी नहीं था।

वैभव सिंह (आलोचक, मुख्य वक्तव्य)
किसी भी भाषा की साहित्यिक पत्रिकाएं जीवन की आकाक्षांओं को ही नहीं बल्कि विभिन्न साहित्यिक आंदोलनों, जुझारूपन तथा सृजनशीलता को भी व्यक्त करती हैं। वर्तमान में साहित्यिक पत्रिकाओं की जिम्मेदारी इस रूप में बढ़ी है कि जब मुख्यधारा की पत्रकारिता पूरी तरह पूंजी के चंगुल में फंसकर भारतीय समाज पर बोझ बनकर रह गई है, तब इन छोटी, कम संसाधनों तथा सीमित पाठक-वर्ग वाली पत्रिकाओं को साहित्य-कला को बचाने का काम करना है। उन्हें अपने ‘विजन’ की शक्ति से औसतपन को लांघना होगा और बहुत सारी अनगढ़ प्रतिभाओं को जगह देकर उन्हें सामने लाना होगा। यह सही है कि हिंदी में इस समय कोई विद्रोही, बेचैन पीढ़ी नहीं है जो समाज-व्यवस्था में उलटपुलट करने का प्रयास करे। अवांगार्द, आधुनिकता, रोमांटिक विद्रोह आदि के स्वर मद्धिम पड़ चुके है कभी विभिन्न भाषाओं में इन्हीं तीखे, कठोर स्वरों ने साहित्यिक पत्रिकाओं को प्रासंगिक बनाया था। इधर पत्रिकाओं में लेखन के जरिए अपने गुस्से, आक्रोश तथा स्वप्न को प्रकट करने में रुचि कम होती दिख रही है। हिंदी क्षेत्र के विश्‍वविद्यालय, संस्थाएं, अकादमियां, पुस्तकालय जिस वृहद हिंदी जगत को तैयार करते थे, वे स्वयं जर्जर तथा आदर्शहीन हो चले हैं्। इन स्थितियों में अच्छी बात यही है कि हिंदी में दलित तथा स्त्री लेखन के साथ ही प्रगतिशीलता की बची-खुची परंपरा ने हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं को वैचारिक धार को मरने नहीं दिया है। छोटे-छोटे स्थानों से लोग मिशनरी भावना के साथ पत्रिकाओं का प्रकाशन कर रहे हैं जो हिंदी के लोकवृत्त को निर्मित करता है।
आधुनिक राजनीतिक संस्कृति तथा राजनीतिक प्रणाली को इस प्रकार से डिजाइन कर दिया गया है कि उसमें किसी नागरिक का सच्चा विवेक न कभी ठीक से स्वीकार जा सकता है, न उस विवेक को व्यक्त होने के लिए अधिक अवसर प्राप्त हो सकता है। ऐसे में लघु पत्रिकाओं को बहुत सारी अनसुनी आवाजों के साथ रहना है। धर्म, सांप्रदायिकता, संकीर्णता तथा उपभोक्तावाद के दिनोदिन बढ़ने के दौर में केवल अभिव्यक्ति नहीं बल्कि सार्थक अभिव्यक्ति के लिए प्रतिबद्ध होना होगा। उन्हें बहुआयामी भूमिका निभानी होगी जिसमें एक ओर उच्चकोटि के साहित्य लेखन को प्रोत्साहित करना होगा, दूसरी ओर वैचारिक सामग्री मुहैया करानी होगी। समाज में आधुनिकीकरण, तार्किकीकरण तथा धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया अभिव्यक्ति के उद्देश्यों के साथ जुड़ी होती है और पत्रिकाओं को इन प्रक्रियाओं को प्रोत्साहित करने के लिए साहित्य-संस्कृति के मोर्चे पर डटकर काम करना होगा।

विभूतिनारायण राय (वर्तमान साहित्य, अध्यक्षीय वक्तव्य)
कोलकाता का साहित्यिक पत्रिका सम्मेलन एक रुकी हुई यात्रा को आगे बढ़ाने का कार्यक्रम है। आज कूपमंडूकता बढ़ रही है। लघु पत्रिकाएं विचारों और साहित्य से जुड़ी पत्रिकाएं रही हैं। यह एक आंदोलन की तरह है। इससे अहसास होता है कि हम साथ हैं। मुझे आजमगढ़ में इसका तीसरा सम्मेलन कराने का अवसर मिला था। हमारा भारतीय समाज पिछले सौ-डेढ़ सौ वर्षों से आधुनिक बनने की कोशिश कर रहा है, लोकतांत्रिक बनने की कोशिश कर रहा है और सबसे महत्वपूर्ण है कि ‘नेशन-स्टेट’ बनने की कोशिश कर रहा है। आज अधिनायकवाद से लड़ने का एक तरीका कविता है, कहानी है...। इसके लिए हमें साहित्यिक पत्रिकाओं के आंदोलन को मजबूत करना चाहिए क्योंकि हम रचनाकार हैं।

खगेंद्र ठाकुर (आलोचक, अध्यक्षीय वक्तव्य)
दरअसल जो व्यावसायिक पत्रिकाएं नहीं हैं, वे ही साहित्यिक पत्रिकाएं हैं। लेकिन यह भी सच है कि पत्रिकाएं यदि बिकेंगी नहीं तो पत्रिका निकालना मुश्किल है। इसलिए व्यावसायिक पहलू पर भी ध्यान जाना चाहिए। यह उनका समय है जिनका शासन है। ऐसे माहौल में साहित्यिक पत्रिकाएं आम लोगों की भावनाओं और विचारों की रचनात्मक अभिव्यक्ति बन सकती हैं। इस समय अतीत के कई प्रसंगों की गलत व्याख्या हो रही है। हमें अतीत को बुद्धिपरक ढंग से समझना होगा।


नंदलाल शाह (धन्यवाद देते हुए)
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमेशा जरूरी है। इस पर बात करते हुए संविधान के प्रावधानों पर हमारा ध्यान जाना चाहिए। उसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की स्पष्ट परिभाषा है। कुछ कानून अंग्रेजों के समय से चले आ रहे हैं जो आजाद भारत के लिए उचित नहीं है। साहित्यिक पत्रिकाओं का बड़ा महत्व है। यह प्रसन्नता की बात है कि उनके संपादक-लेखक आज यहां संवाद कर रहे हैं।

पीयूषकांत (संचालन करते हुए)
साहित्यिक पत्रिका सम्मेलन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर चर्चा का एक खास मायने है। आज विकसित सभ्यता में भी अभिव्यक्ति पर खतरे महसूस किए जा रहे हैं। कई लेखकों-पत्रकारों को इस आजादी का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। सत्ता और सरकारी तंत्र का विरोध करना कठिन हुआ है। बोलना आसान हुआ, लेकिन कुछ भी सार्थक बोलना कठिन है। सोशल मीडिया पर मंच बढ़े हैं, लेकिन पहरेदारी भी बढ़ी है। साहित्य का स्थायी भाव हमेशा प्रतिरोध रहा है। साहित्यिक पत्रिकाओं को इसके सबसे सार्थक मंच के रूप में देखा जाता है। आज से शुरू हो रहा साहित्यिक पत्रिका सम्मेलन का आयोजन इसका प्रमाण है कि समाज में सृजन और प्रतिरोध की आग बची हुई है।

दूसरा सत्र : विषय : लघु पत्रिकाओं के समक्ष उपस्थित वर्तमान चुनौतयां

शैलेंद्र राकेश (पत्रिका किरण वार्ता)7
साहित्यिक पत्रिकाएं साधन के अभाव में बंद हो जाती हैं। इसलिए पत्रिकाओं का आपस में लेन-देन और पाठकों तक एकसाथ कई साहित्यिक पत्रिकाएं पहुंचाने का काम संपादकों-लेखकों को करना चाहिए। यदि हर लेखक पत्रिकाओं का एक केंद्र बन जाए और वह स्थानीय स्तर पर पाठकों को तैयार करे तथा उन्हें पत्रिकाएं खरीद कर पढ़ने के लिए प्रेरित करे तो कुछ समस्याओं का समाधान हो सकता है।

सुभाषचंद (अक्सर)
लघु पत्रिकाओं का एक महत्वपूर्ण काम विमर्शों की जमीन तैयार करना रहा है। आज बड़ी संख्या में पत्रिकाएं निकल रही हैं, लेकिन संपादकों को गुणवत्ता से समझौता करके पत्रिका नहीं निकालनी चाहिए। लघु पत्रिका के संपादक को पत्रिका निकालने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है। कई बार पत्रिका बंद हो जाती है, फिर दुबारा निकलती है। यह सिलसिला बंद होने वाला नहीं है। एक बड़ा अभाव महिला संपादकों का दिखता है।

अनुज लुगुन (डहर)
साहित्यिक पत्रिकाओं के अर्थ का विस्तार करने की जरूरत है। ऐसी कई आदिवासी पत्रिकाएं हैं जिन पर झारखंड में प्रतिबंध लगा दिया गया है और उन संस्थाओं को प्रताड़ित किया गया है जो उन पत्रिकाओं का समर्थन करते हैं। इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बाधित होती है।

विनोद तिवारी (पक्षधर)
सोशल मीडिया के आने पर रचनाशीलता बढ़ी है, लेकिन अच्छी रचनाओं की कमी दिखती है। लघु पत्रिकाओं की एक खूबी है कि ये अपसंस्कृति से निकाल कर संस्कृति की ओर ले जाती हैं। हमें यह भी देखना होगा कि ‘सरस्वती’ आदि के जमाने से साहित्यिक पत्रिकाओं का स्वरूप बदला है। हमारे सामने यह प्रश्‍न रहना चाहिए कि जब हम साहित्यिक पत्रिकाओं की बात करते हैं तो किस तरह के समाज और संस्कृति की बात करते हैं। साहित्यिक पत्रिका निकालने वाला संपादक एक साथ पीर, भिश्ती, बावर्ची, खर सब होता है। क्या सरकार को साहित्यिक पत्रिकाओं के लिए डाक खर्च की विशेष व्यवस्था नहीं करनी चाहिए? यह भी समझना होगा कि सभी साहित्यिक पत्रिकाएं एक ही तरह की नहीं हो सकतीं।

हेतु भारद्वाज (अक्सर, अध्यक्षीय वक्तव्य)
लघु पत्रिकाओं के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती साहस की है। सोशल मीडिया शगल है। यहां न कोई बड़ा संघर्ष संभव है और न बड़ी रचनात्मकता। यहां किसी को कोई कठिनाई झेलनी नहीं पड़ती। लघु पत्रिकाएं कठिनाइयों और चुनौतियों के बीच निकलती हैं। हम जानते हैं कि पत्रिकाओं का संपादन करना और इन्हें निकालना खुद को स्वाहा कर देने जैसा है। फिर भी हमें किसी भी कीमत पर इस परंपरा को विकसित करते रहना होगा। लघु या साहित्यिक पत्रिकाओं में संपादक का विलोप नहीं हुआ है, यह पूरी तरह जीवित है। आज भी साहित्यिक पत्रिकाओं के एक संगठन की जरूरत महसूस होती है, इनके बीच संवाद की जरूरत महसूस होती है।

रमेश उपाध्याय (‘कथन’, अध्यक्षीय वक्तव्य)
हस्तक्षेप और पक्षधरता के बिना पत्रिका निकालने की कल्पना नहीं की जा सकती। सवाल रहा है कि हस्तक्षेप किसकी तरफ से-व्यवस्था के पक्ष से या जनता के पक्ष से? लघु पत्रिका का उद्देश्य नई रचनाशीलता को लाना रहा है। बिना कुछ नया और अर्थवान दिए साहित्यिक पत्रिका निकाली नहीं जा सकती। इस कार्य से युवाओं को जोड़ना साहित्यिक पत्रिकाओं का हमेशा प्रधान लक्ष्य रहा है। नया लेखक साहित्य में आता है और देखता है कि यह जो चल रहा है, वह ठीक नहीं है। इसकी जगह कुछ नया या भिन्न होना चाहिए। यह जो नया करना होता है, मेरा मानना है कि इइससे लघु पत्रिकाओं का संबंध है। आज लघु पत्रिकाओं या साहित्यिक पत्रिकाओं के संसार में युवाओं की बहुत कमी है जो चिंता का विषय है।

संजय जायसवाल (संचालन करते हुए)
हिंदी में साहित्यिक पत्रिकाओं का उदय और विकास आधुनिक युग की एक बड़ी घटना है, जिसका महत्व किसी आंदोलन से कम नहीं है। प्रेमचंद ने 1931 के हंस में प्रकाशन का एक साल पूरा होने पर लिखा था, ‘हमें आर्थिक हानि भी हुई, राजनीतिक दंड भी भोगना पड़ा, हमने हिम्मत न हारी। पाठकों से किसी प्रकार की सहायता मांगना हम अपना अधिकार नहीं समझते। हम जब साहित्य क्षेत्र में आए थे तो पाठकों से पूछ कर न आए थे। हमें साहित्य में एक मिशन पूरा करना था, उसे पूरा करने का प्रयत्न कर रहे हैं।’ लघु पत्रिका निकालना एक मिशन है। यहां यह जोड़ा जा सकता है कि हिंदी के बुद्धिजीवी कुछ न करें तो कम से कम साहित्यिक पत्रिका अधिक से अधिक खरीदें और पढ़ें।

रमेश उपाध्याय (‘कथन’, अध्यक्षीय वक्तव्य)
साहित्यिक पत्रिकाओं के समक्ष उपस्थित चुनौतियों पर यह विचार विमर्श जारी रहेगा और ऐसे संवाद से ही नए रास्ते निकलेंगे।

तीसरा सत्र : विषय : सोशल मीडिया : संभावनाएं और सीमाएं

अनुज (कथानक)
टेक्नोलॉजी का विकास मनुष्य का विस्तार  होता है, दुनिया एक छोटे से गांव में बदल जाती है। मैक्लुहान ने कहा था कि इस दौर में आदमी का पांव पहिया में रूपांतरित हो जाएग, कान विस्तृत हो जाएगा और कुछ भी छिपा नहीं रह जाएगा। इस तरह के विकास का बुरा नतीजा यह हुआ है कि हम एलियनेशन में जीने लगे हैं। सभी मोबाइल पर शेयर कर रहे हैं, पर घर में जैसे एक-दूसरे से विलगाव है। फेसबुक के आने के बाद किसी आलोचक की जरूरत नहीं है, अब लाइक होते हैं। अब साहित्य ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँच रहा है। बड़ी संख्या में महिलाएं कविता लिख रही हैं। यह सही है कि नई तकनीक ने लोकतंत्रीकरण तीव्र किया है, लेकिन गुणवत्ता की जरूर बड़ी क्षति हुई है। कहा जाता है कि खोटे सिक्कों को सोने के सिक्कों में बदल दिया गया है।
सामान्यतः साहित्य की दुर्गति इसलिए है कि पाठक ‘रिस्पांसिव’ नहीं है। फिल्म पर प्रतिक्रिया मिलती है, पर साहित्य पर प्रतिक्रिया नहीं मिलती। दरअसल पाठक को बताना होगा, क्या ठीक है और क्या ठीक नहीं है। इसी तरह आलोचक को भी। सोशल मीडिया में संपादनहीन लेखन से पाठक का नुकसान हो रहा है और निरंकुश लेखन विचारशून्यता की स्थिति पैदा कर रहा है। फेसबुक के ज्यादातर लेखकों को पता नहीं है कि फेसबुक का लक्ष्य क्या है।

गोविंद माथुर (समय माजरा)
सोशल मीडिया अपनी बात कहने की स्वतंत्रता देता है। युवा इस पर ज्यादा सक्रिय है। कई लेखक हैं जो पत्रिकाओं को छोड़ कर अब सोशल मीडिया पर ही लिख रहे हैं। वे यह ज्यादा देखते है कि कितने लाइक मिले हैं। यह एक तरह की लत है। सोशल मीडिया का सदुपयोग किया जा सकता है और दुरूपयोग भी। इसकी सीमा  यह है कि इस पर गालीगलौज होती है जो बढ़ती जा रही है। यह एक खुला मंच है। जहां कुछ भी लिख कर पोस्ट करना संभव है। इसके बावजूद, इसकी संभावनाओं को देखना चाहिए।

नवीन कुमार नथानी (कहानीकार)
इंटरनेट का एक बड़ा योगदान यह है कि इसने ज्ञान पर बपौतियां खत्म कीं। इसकी धारणा में आत्मप्रचार अंतर्निहित है। सबसे अधिक चिंताजनक यह है कि सोशल मीडिया एक तरह के एडिक्शन, नशे का रूप लेता जा रहा है।

राजाराम भादू (मीमांसा)
हमारे देश में एक इंडिया है और एक भारत है। सवाल है कि हम भारत को कितना इंडिया में डाल पा रहे हैं। सोशल मीडिया ने निर्भया कांड के समय एक सकारात्मक भूमिका निभाई थी। लेकिन ऐसी भूमिका कभी-कभी दिखाई देती है। इस पर विद्वेष और घृणा ज्यादा फैलाया जा रहा है। एक सवाल यह है कि लघु पत्रिका आंदोलन से पैदा होती है या लघु पत्रिका से आंदोलन पैदा होता है। लघु पत्रिका को यदि टिकाए रखना है तो इसके लिए सांस्कृतिक गतिविधियां जरूरी हैं। लघु पत्रिका का मिशन एक खास विजन से जुड़ा हुआ है। इस समय देश में जो छोटे-छोटे आंदोलन हैं उनमें समन्वय जरूरी है। उसी तरह लघु पत्रिकाओं में भी जितना संभव है एक समन्वय बना कर चलना चाहिए और इसे एक सामूहिक उभार बनाना चाहिए।
तीसरे सत्र की अध्यक्षता ‘कथादेश’ के संपादक हरिनारायण ने की।

जितेंद्र जीतांशु (सदीनामा, संचालक का वक्तव्य)
सोशल मीडिया नई तकनीक के विकास का ही फल नहीं है, लोकतंत्र का विस्तार भी है। साहित्य के लिए उचित है कि नए माध्यमों को अपनाया जाए। सोशल मीडिया ने कई बार जनविक्षोभों को संगठित किया है। लघु पत्रिकाओं को यदि सांस्कृतिक आंदोलन का रूप लेना है तो सोशल मीडिया का उपयोग सार्थक साबित हो सकता है, वहीं इसका दुरूपयोग निश्‍चय ही वैचारिक प्रदूषण बढ़ाएगा।

17 फरवरी/चौथा सत्र, विषय : ई-साहित्यिक पत्रिकाओं की दशा और दिशा

मृत्युंजय (भारत भारती)
इस समय दुनिया का सबसे बड़ा व्यवसाय शब्द का है। टीवी हो, प्रिंट मीडिया हो या सोशल मीडिया, हर जगह भाषा को बड़े खतरनाक खेल में लगा दिया गया है। इसलिए उपर्युक्त जगहों पर सिगरेट के डिब्बों की तरह ऐसा कुछ लिखा होना चाहिए- ‘इसे पढ़ने से विकृति हो सकती है!’ मुद्रित पत्रिकाएं हों या ई-माध्यम की पत्रिकाएं हों, हर जगह एक सीमा तक ही प्रतिरोध की छूट होती है। खास कर ई-पत्रिकाओं पर निगरानी की ज्यादा संभावनाएं हैं। हम ई- पत्रिकाओं के युग में प्रवेश कर चुके हैं, इनकी अनदेखी नहीं की जा सकती।

साहेब अख्तर (लेखक)
आम पाठकों को साहित्य पढ़ने के लिए ई-पत्रिकाओं में घुसना मुश्किल लगता है। इनमें कई तो दिग्भ्रमित करने वाली होती हैं। इंटरनेट को सूचना का एकमात्र माध्यम मान लेना नुकसानदेह हो सकता है, क्योंकि गूगल की भी सारी जानकारियां सही नहीं होतीं। इसके अलावा, ई-पत्रिकाओं पर निर्भरता से हमारे कई अहसासों के खो जाने का खतरा है। यह एक अच्छी बात है कि कोलकाता के साहित्यिक पत्रिका सम्मेलन से ई-पत्रिकाओं पर विचारों का आदान-प्रदान शुरू हुआ है।

विमलेश त्रिपाठी (अनहद कोलकाता ई-पत्रिका)
मुद्रित हो या ई-पत्रिका, दोनों एक ही तरह की पत्रिकाएं हैं, एक कागज पर है और एक स्क्रीन पर। ई-पत्रिका की खूबी है कि इसके लिए डाकखाने की परेशानियां उठाने की जरूरत नहीं होती। ई-माध्यम किताबों को सड़ने से बचाएगा, कागज की जरूरत नहीं होगी। आजकल युवा पीढ़ी के लेखकों के अपने ब्लाग हैं। नौजवानों को इस माध्यम की ताकत को पहचानना चाहिए। इस माध्यम द्वारा भी प्रतिरोध संभव है। अभी देखा जा रहा है कि ई पत्रिकाओं के दायरे में दायित्वशील, प्रगतिशील और सुलझे हुए लोग कम हैं। वे ई-पत्रिकाओं की उपेक्षा कर रहे हैं, लेकिन बीस-तीस साल बाद एक वक्त आएगा  जब ई-पत्रिकाएं ही बची रहेंगी। ई-पत्रिकाओं को अधिक दायित्वशील बनाने का भार नौजवानों पर है। कचरा यहाँ भी है और यह मुद्रित पत्रिकाओं में भी है। भविष्य में प्रतिरोध की परंपरा यहां बचे, यह हमारा सपना है। अभी ई-पत्रिका का शैशव काल चल रहा है।

गणपत तेली (लेखक)
जब भी नई तकनीक आती है, वह जनतंत्रीकरण करती है, लेकिन समाज की वर्चस्वशाली ताकतें उस नई तकनीक को बहुत जल्दी अपनी गिरफ्त में ले लेती हैं। नई तकनीक के आने से पीढ़ियों का टकराव भी होता है। पिछले कुछ सालों में कई ई-पत्रिकाएं निकली हैं। एक ई-पत्रिका ‘रचनाकार’ है, जिसका दावा है कि वह पहली ई-पत्रिका है। बताया जाता है कि इसे 10,000 लोगों ने डाउनलोड कर रखा है। इसके अलावा ‘समालोचन’, ‘जानकीपुल’, ‘लेखनी’, ‘चोखेर बाली’, ‘शब्दांकन’, ‘सृजन समय’, ‘हस्ताक्षर’, ‘जनकृति’, ‘प्रतिलिपि’ आदि ई-पत्रिकाएं हैं। इनके अलावा ‘हंस’, ‘कथादेश’, ‘पहल’, ‘वागर्थ’, ‘तद्भव’ आदि पत्रिकाएं वेबसाइट पर उपलब्ध हैं। ‘रेख्ता’ ने महत्वपूर्ण काम यह किया है कि इसने उर्दू साहित्य का डाटाबेस बनाया है। यह नागरी, उर्दू, रोमन तीनों लिपियों में है। ‘नॉटनल’ पर कई पत्रिकाएं उपलब्ध हैं। भविष्य में वीडियो पत्रिकाएं और ऑडियो पत्रिकाएं भी आएंगी। ई-पत्रिका कम खर्च और कम संसाधनों से भी निकाली जा सकती है और इधर बड़ी संख्या में निकल रही है।

भारत यायावर (कवि-आलोचक, अध्यक्षीय भाषण)
अच्छा संपादक वही हो सकता है जो अच्छा साहित्यकार होता है। हिंदी का साहित्यिक निर्माण करने वाले बड़े तपस्वी लोग रहे हैं। उन्होंने साहित्यिक पत्रिकाएं निकाल कर यह काम किया है। साहित्यिक पत्रिकाओं का हिंदी के निर्माण और प्रसार में ऐतिहासिक भूमिका है। ई-पत्रिकाएं निकालने वालों के मन में भी हिंदी से अगाध प्रेम है, तभी वे ई-माध्यम से पत्रिकाएं निकाल रहे हैं। यह नई रचनाशीलता की देन है। पुराने लोग हमेशा नई चीजों से घबराते हैं। जब कंप्यूटर पहले-पहल आ रहा था तो कितना हल्ला हुआ था। किसी समय अकबर इलाहाबादी ने ‘नए’ का विरोध करते हुए लिखा था, ‘पानी पीना पड़ रहा है पाइप का/ अक्षर पढ़ना पड़ रहा है टाइप का।’ लेकिन समय के अनुसार चलना चाहिए। प्रतिरोध का स्वर भी समय के साथ बदलता रहता है। निश्‍चय ही ई-पत्रिकाएं मुद्रित साहित्यिक पत्रिकाओं को विस्थापित नहीं करेंगी, बल्कि उन्हें विस्तार देंगी। यह जरूर है कि हम सभी के बीच परस्पर प्रेम और आदर का भाव बना रहे।

मृत्युंजय कुमार सिंह (कवि-कथाकार)
ई-पत्रिकाओं से कुछ समस्याएं पैदा हो सकती हैं, खास कर जब ये बाढ़ की तरह हैं और अनगिनत हैं। हमें यह जरूर सोचना होगा कि दुष्प्रभावों को कैसे रोकें, कहां बांध तैयार करें, अन्यथा सब कुछ बह जाएगा।
इस सत्र में ‘भारत भारती’ के वेबसाइट का उद्घाटन हुआ।


विनोद यादव (संचालन करते हुए)
हमें इंटरनेट पर उपलब्ध साहित्य के विभिन्न प्रारूपों के बीच ई-साहित्यिक पत्रिकाओं के महत्व को समझना होगा। आज ई-प्लेटफार्म पर एक तरफ जहां फेसबुक, व्हाट्सएप, वीचैट जैसे सोशल मीडिया का वर्चस्व है, वहीं दूसरी ओर ब्लाग और विभिन्न वेबसाइटों पर भी पढ़ने की सामग्री है। ई-पत्रिकाएं अपने विशिष्ट रूप में मौजूद हैं, जिनकी सार्थक भूमिका पर चर्चा निरंतर होनी चाहिए। प्रश्‍न है कि ये कहीं महज संकलन तो नहीं हैं।

राहुल शर्मा (धन्यवाद देते हुए)
ई-पत्रिकाओं पर इस चर्चा से कई समस्याएं और संभावनाएं सामने आई हैं। किसी भी पत्रिका को द्वीप की तरह  नहीं रहना है, बल्कि एक सामूहिक अंतरसंपर्क जरूरी है।

पांचवां सत्र, विषय : साहित्यिक पत्रिकाओं का भविष्य
हरिनारायण (कथादेश, अस्वस्थता के कारण योगेंद्र आहूजा ने वक्तव्य पढ़ा)

साहित्यिक पत्रिकाओं के पाठकों में कमी आई है। इनकी बिक्री, विज्ञापन, चंदा आदि का संकट है। ऐसे लेखक भी हैं जो इन पत्रिकाओं के संकट में पड़ने पर आर्थिक मदद करते हैं। दरअसल जो लेखक हैं या संपादक भी हैं, वे अपने दिमाग में घुस चुके साहित्यिक कीड़े से परेशान रहते हैं। वे लिखे और पत्रिका निकाले बिना रह नहीं सकते। साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों की दशा आमतौर पर धीरे-धीरे खराब होती जा रही है। उन्हें पोस्ट ऑफिस-रेलवे में पत्रिका की प्रतियां भेजने के लिए लाइन में खड़ा होना पड़ता है। कई बार इन जगहों पर रिश्‍वत देनी पड़ती हैं। हम कई लोगों से आर्थिक सहयोग लेते हुए, रिश्‍वत देते हुए पत्रिका निकाल रहे हैं। यह दुखद है कि संपादक को एक भिखारी की भूमिका निभानी पड़ रही है!
‘हंस’ पत्रिका की नई शुरुआत गौतम नवलखा के पैसे से हुई थी। हिंदी भाषा जिनकी आजीविका है, वे यदि चाहें तो साहित्यिक पत्रिकाओं को नियमित रूप से खरीद कर आर्थिक सहयोग दे सकते हैं।

पल्लव (बनास जन)
हम साहित्यिक पत्रिकाएं निकालते हैं तो जानते हैं कि समस्याएं होंगी। हम क्यों शिकायत करें, किससे शिकायत करें? आवश्यकता इस बात की है कि हम लोगों में पढ़ने की रुचि पैदा करें। लोग ज्ञान की पुस्तकें इतनी ज्यादा पढ़ें कि सवाल कर सकें। सवालों का उठना जरूरी है। साहित्य पढ़ना एक तरह से असंभव स्वप्न देखने जैसा है। आज जब मीडिया की विश्‍वसनीयता खत्म होती जा रही है, साहित्यिक पत्रिकाओं को अधिक से अधिक विश्‍वसनीयता अर्जित करनी होगी। अपनी पत्रिकाओं को आत्मप्रचार का औजार बनाना गलत है, जैसा कई बार होता है। पत्रिका कैरियर बनाने के लिए नहीं है। यह आखिरी मोर्चा है जहां दक्षिणपंथी ताकतों का कब्जा नहीं हो पाया है। यहां उनकी दाल नहीं गल पाई है। यदि कठोर आत्मनियंत्रण नहीं करेंगे तो यह मोर्चा भी ध्वस्त हो जाएगा। इसके लिए अपनी निगाह को व्यापक बनाना होगा, आंदोलन के वसूलों को अपनाना होगा और ज्यादा से ज्यादा चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा।

रविकांत (अदहन)
लघु पत्रिका आंदोलन नए साम्राज्यवाद और सामंती उभारों के खिलाफ है। आज मानव चेतना पर जो चौतरफे हमले हो रहे हैं, उनसे रूबरू होकर ही साहित्य का काम सही तौर पर किया जा सकता है। कुछ साहित्यिक पत्रिकाओं में देखा गया है कि उनमें व्यक्तिगत निंदा और विद्वेष में ज्यादा रुचि ली जाती है। सोशल मीडिया भी साहित्यिक पत्रिकाओं को लेखन और पठन के स्तर पर दुष्प्रभावित कर रहा है। इस खतरे को समझना होगा। इसके लिए लिटेरेरी एक्टिविज्म जारी रखना होगा। लघु पत्रिकाओं को युवा पीढ़ी से ज्यादा से ज्यादा जोड़ना होगा।

कामेश्‍वर प्रसाद सिंह (चौपाल)
साहित्यिक पत्रिका के संपादकों  को नकारात्मक की जगह सकारात्मक दृष्टिकोण रखना चाहिए। संपादक भी मनुष्य होता है। उसे कभी मनुष्यता और अपनी जिम्मेदारियां छोड़नी नहीं चाहिए। इसके अलावा, साहित्यिक पत्रिका में सामाजिक मुद्दे जरूर हों। संपादक सिर्फ अपनी पत्रिका के बारे में नहीं, सभी साहित्यिक पत्रिकाओं के बारे में सोचें और परस्पर सद्भाव तथा कुछ साझा कार्यक्रम रखें।

मीरा सिन्हा (मुक्तांचल)
साहित्यिक पत्रिकाएं नियमित निकलें, यह संकल्प लेना चाहिए। इसके अलावा, पत्रिका को बाजार के प्रभावों से दूर रखने की जरूरत है। साहित्यिक पत्रिकाओं के लेखकों-संपादकों के बीच संवाद जारी रहे, इसकी बड़ी आवश्यकता है।

प्रेम भारद्वाज (लेखक)
हमें भविष्य को देखने से पहले वर्तमान को देखना होगा। आज झूठ को जिस तरह जादुई ढंग से सच की तरह परोसा जा रहा है, यह चिंताजनक है। हम चारों तरफ बाजार की लोभनीय वस्तुओं से घिरे हैं तो खुद हमारा भी वस्तुओं में तब्दील होना आश्‍चर्यजनक नहीं है। इधर मीडिया से साहित्य विस्थापित हुआ है, खास कर अखबारों से इसे प्रायः हटा दिया गया है। साहित्य को दूसरी वस्तुएं भी विस्थापित कर रही हैं। इसलिए साहित्यिक पत्रिकाएं स्वतंत्र रूप से पनपें, यह जरूरी है। साहित्यिक पत्रिका निकालना एक पागलपन की तरह है। आदमी आज के समय में प्रपंचवादी होगा या पागल, ये दो ही विकल्प हैं। मेरा कहना है, जब तक मनुष्य में संवेदना है तब तक साहित्य रहेगा और साहित्यिक पत्रिका निकालने वाले पागल भी रहेंगे।

शंकर (परिकथा, अध्यक्षीय भाषण)
यह सच है कि साहित्य पर संकट है, खास कर 1990 के बाद। लंबे समय से विचारधारा और इतिहास के अंत की तरह साहित्यिक पत्रिकाओं के अंत की बात कही जा रही है। ये धारणाएं गलत हैं। यह कहना भी सही नहीं है कि ई-पत्रिकाएं साहित्यिक पत्रिकाओं की कीमत पर निकलेंगी। भारत मुख्यतः गांवों, कस्बों और छोटे शहरों का देश है। ऐसी जगहों पर साहित्य और साहित्यिक पत्रिकाओं की जरूरत बनी रहेगी। दरअसल साहित्यिक दुनिया छोड़ कर सिर्फ वे ही पाठक गए जो वक्ती तौर पर पाठक बने थे। बाजार उन्हें बहा ले गया। साहित्यिक दुनिया में अब भी वे पाठक हैं और वे संवेदनशील हैं। पाठक घटते-बढ़ते रहते हैं। इसके अलावा, पाठक वर्ग की अवधारणा को एक जड़ अवधारणा के रूप में नहीं देखना चाहिए। इधर साहित्य के पाठकों में विद्यार्थी और शोधार्थी बड़े पैमाने पर बढ़े हैं! यह साहित्यिक पत्रिकाओं के लिए अच्छे भविष्य की सूचना है। साहित्यिक पत्रिकाओं की एक जिम्मेदारी साहित्य के पाठक बनाना है, अन्यथा पुस्तकें भी कोई नहीं पढ़ेगा। मैं कहना चाहूंगा कि परिदृश्य आशाजनक है।
लघु पत्रिकाओं का आंदोलन व्यावसायिक पत्रिकाओं के विरोध में था। पहले ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘सारिका’ जैसी पत्रिकाएं निकलती थीं। धर्मवीर भारती ने उपेक्षा की भावना से उस दौर में तेजी से निकल रही साहित्यिक पत्रिकाओं को ‘लघु पत्रिका’ कहा था। साहित्यिक पत्रिकाओं ने उपहास से दिए गए इस नाम को अपना गौरव बना लिया। हम आज लघु पत्रिकाओं को साहित्यिक पत्रिका कहना चाहेंगे। निश्‍चय ही पिछले लगभग 20 सालों का दौर लघु पत्रिका आंदोलन के शिथिल हो जाने का दौर था। सभी अकेला-अकेला महसूस करने लगे थे, लेकिन कोलकाता के साहित्यिक पत्रिका सम्मेलन ने हमें साथ-साथ होने का अहसास दिया है और लघु पत्रिका आंदोलन की बुनियादी भावना को फिर उजागर कर दिया है। आज हमें सोचना चाहिए कि साहित्यिक पत्रिकाओं का एक भविष्य है, यदि वे साहित्य के जरिए समाज को समझने का जरिया बनें। साहित्यिक पत्रिका एक वैकल्पिक मीडिया है।

अरुण कमल (अध्यक्षीय भाषण)
मेरे सरीखे लेखक लघु पत्रिकाओं की ही उपज हैं। लघु पत्रिकाओं का पहला लक्ष्य अव्यावसायिक होना हैं यह व्यावसायिकता के विरोध में सदा रही है। लघु पत्रिकाओं का एक काम रहा है नई रचनाशीलता के लिए जगह बनाना। साहित्यिक पत्रिकाओं की सामान्य स्थिति यह होती है कि इनके प्रकाशन में अनिश्‍चितता होती है। दरअसल समाज में जब तक विकल्प की तलाश जारी है, नए लेखक आते रहेंगे और साहित्यिक पत्रिकाएं निकलती रहेंगी। जब तक मनुश्य मात्र में श्रेष्ठता के लिए तड़प है, तब तक लघु पत्रिकाएं जो साहित्यिक पत्रिका ही हैं, निकलती रहेंगी। साहित्यिक पत्रिकाएं सामान्य तौर पर व्यवस्था के विरोध की पत्रिकाएं हैं।
यह ज्ञान के व्यवसायीकरण का युग है। हम देख रहे हैं कि समाज में धीरे-धीरे कवि सम्मेलन खत्म होते गए। आखिरकार गूगल और इंटरनेट के अन्य साधनों पर कब्जा किसका है? यह सवाल भी हमेशा खड़ा रहेगा। लघु पत्रिका आंदोलन समाज के अन्य आंदोलनों से जुड़ा आंदोलन है। साहित्यिक पत्रिकाओं का भविष्य उज्ज्वल है। अंधेरा समय होगा, हर अंधेरे समय में दीप होंगे।

संजय राय (संचालक का वक्तव्य)
लघु या साहित्यिक पत्रिकाएं रचनात्मक समझ और विवेक को पैना करने का काम करती हैं। आज छोटी पत्रिकाओं और साहित्यिक पत्रिकाओं पर कई तरह के दबाव बन रहे हैं। नए व्यक्ति की लेखकीय संभावनाओं को सामने लाने का काम लघु पत्रिकाएं ही कर सकती हैं। यह एक चिंता का विषय है कि कहीं छोटी पत्रिकाएं बड़े लेखकों की रचनाओं का संकलन भर हो कर न रह जाएं। साहित्यिक पत्रिकाओं के भविष्य पर मुकम्मल बातचीत के लिए कई मुद्दों से टकराना होगा।

सुशील पांडेय (धन्यवाद देते हुए)
साहित्यिक पत्रिकाओं के लेखकों ने लघु पत्रिकाओं के भविष्य पर जो चिंताएं की हैं, उनका संबंध मानवीय संवेदना के भविष्य से है। लघु पत्रिकाएं मानवीय संवेदना और विचारों की संरक्षक हैं।

छठा सत्र, विषय : पढ़ने की संस्कृति : पाठक कहां है?

सुधीर सुमन (लेखक)
हम अपने घरों-परिवारों में ही साहित्यिक पाठकों का निर्माण होने नहीं देते। सूचना सम्राट ने सूचना और ज्ञान के फर्क को मिटा दिया है। यदि समाज में प्रवचन और अंधविश्‍वास पनपेंगे तो पढ़ने की संस्कृति मिटेगी। मीडिया पर यौनिक विषयों की भरमार भी पढ़ने की इच्छा को मिटा रही है। हम ऐसे नए-नए अवसर खोजें जहां साहित्यिक पत्रिकाएं सामूहिक कोशिश से बिकें, जैसे- पुस्तक मेले, फिल्म फेस्टिवल आदि जगहों पर। मुद्रित पुस्तकें दशकों बाद भी पढ़ी जाती हैं और इनका विकल्प नहीं है।
हम जानते हैं कि पुस्तकालय आंदोलन खत्म हो गया है। पुराने पुस्तकालयों में बीसवीं सदी के शुरू के दशकों की जो साहित्यिक पत्रिकाएं रखी हुई हैं, उनकी दशा खराब है। इस ओर ध्यान जाना चाहिए। दरअसल राई-राई जोड़ कर पर्वत बनाने की जरूरत है। इस पर भी विचार करना चाहिए कि अपनी पत्रिका के साथ दूसरों की पत्रिकाएं भी पाठकों तक कैसे पहुंचाई जाएं। पाठक पत्रिकाएं खरीदते हैं तो पत्रिकाओं को ताकत मिलती है।
सनत कुमार जैन (बस्तर पाति)
साहित्यिक पत्रिकाओं के संबंध में यह भी सोचे जाने की जरूरत है कि ये सिर्फ लेखकों के पढ़े जाने के लिए नहीं हैं। ये साहित्यिक रुचि के आम पाठकों के पढ़े जाने के लिए हैं। साहित्यिक पत्रिकाओं में नए लेखकों के प्रकाशित होने की समस्या बनी रहती है।

अभिज्ञात (कवि)
आज पाठक दर्शक भी है और दर्शक पाठक भी है। साहित्यिक कृतियां आज वीडियो के माध्यम से भी प्रसारित होती हैं। यह पढ़ने की संस्कृति का विकास है, इसे समझना होगा। फिर भी माना जाता है कि मुद्रित माध्यम अधिक विश्‍वसनीय है।

नलिन रंजन सिंह (वरिमा)
पढ़ने के संकट के साथ लिखने का संकट भी कम नहीं है। पढ़ने से सुख मिलता है, पढ़ने से हम एक-दूसरे से जुड़ते हैं और पढ़ने से हम मुक्त होते हैं। यदि रचनाएं समय सापेक्ष होंगी तो पढ़ी जाएंगी। इसके अलावा, रचना में पठनीयता होनी चाहिए। पाठक हमेशा नई चीजें खोजता है। वह घिसीपिटी चीजें पढ़ना नहीं चाहता। इसलिए यदि लेखन बेहतर होता जाए तो पढ़ने की संस्कृति अधिक विस्तार पा सकती है। यह भी एक यथार्थ है कि सोशल मीडिया में कुंठित लोगों के कई क्लब बने हुए हैं।

नरेश चंद्र मिश्र (सोच विचार)
हिंदी में साहित्यिक पत्रिकाओं की संख्या कम नहीं है और न लेखकों-संपादकों की संख्या। साहित्यिक पत्रिकाओं का महत्व जिस दिन कम होगा, उस दिन से साहित्य भी महत्वहीन हो जाएगा। साहित्यिक पत्रिकाएं बड़े उद्देश्य से निकलती हैं। इन्हें वे निकालते हैं जिन्हें अपनी भाषा और साहित्य से प्रेम है, भले वे किसी दूसरे कार्यक्षेत्र के हों। मैं लेखकों -संपादकों का एक सम्मेलन बनारस में करने के लिए आपको निमंत्रण देता हूँ।

श्रीप्रकाश शुक्ल (परिचय)
दर्शक और पाठक का फर्क समझने पर ही पता चलेगा कि ई-पत्रिकाओं के रहते हुए भी मुद्रित साहित्यिक पत्रिकाओं की अधिक से अधिक जरूरत क्यों है। हमें देखने वाले, लाइक करने वाले, स्क्रोल करने वाले और पढ़ने वाले के अंतर को ध्यान में रखना चाहिए। साहित्य के पाठक आज भी बड़ी संख्या में हैं। दरअसल इर्ग्-पत्रिकाएं व्यक्तिवाद और एक ‘टेरेटरी’ का निर्माण करती हैं, जबकि साहित्यिक पत्रिकाएं एक सामाजिक चेतना और जवाबदेही के साथ प्रकाशित होती हैं। निश्‍चय ही इस पर बार-बार विचार करने की जरूरत है कि हम पाठकों तक संगठित तरीके से कैसे पहुंचें।

जीवन सिंह (आलोचक)
मेरा अनुभव है कि लोकभाषा में साहित्यिक पत्रिका निकालने से उसका बड़ी संख्या में प्रसार होता है। ऐसी पत्रिका वे भी पढ़ते हैं जो आमतौर पर नहीं पढ़ते। एक बड़ा सवाल है कि स्त्रियां साहित्यिक पत्रिकाएं कितना पढ़ती हैं। इसमें संदेह नहीं है कि आज भी मध्यवर्ग ही साहित्यिक पत्रिकाओं का पाठक है। यह वर्ग विभिन्न प्रलोभनों में फंसता जा रहा है। कहना होगा कि लघु पत्रिकाओं के संघर्ष बहुत बड़े हैं और ये चेतना के स्तर पर द्वंद्व के रूप में भी हैं।

राजेंद्र शर्मा (वसुधा)
साहित्यिक पत्रिकाएं कभी मुनाफा का लक्ष्य लेकर नहीं निकलती हैं, यह उनकी एक बड़ी विशेषता है। यह धारणा गलत है कि सभी चीजें डाटाबेस में हैं। बल्कि इसमें कई भ्रामक और अधूरी चीजें हैं। दूसरे, तार्किक ढंग से वैचारिक संघर्ष सिर्फ साहित्यिक पत्रिकाओं के मंच पर संभव है। सोशल मीडिया ने तो व्यक्ति को व्यक्ति से अलग कर दिया है। वहां कोई वास्तविक सामाजिकता नहीं है। यह सम्मेलन संपादकों-लेखकों की सामाजिकता का ही एक उदाहरण है। साहित्य तो फीनिक्स पक्षी की तरह होता है, अपनी राख से फिर-फिर जी उठने वाला।

समापन सत्र

शंभुनाथ (वागर्थ)
साहित्यिक पत्रिकाओं का सम्मेलन एक इंद्रधनुष की तरह है जिसमें कई रंग दिखते हैं। हम रंगों की विविधता को मिटा कर एक ही रंग में सबको रंग देने की कोशिशों के खिलाफ हैं। हमारा विश्‍वास है कि स्वायत्तता के साथ यह सहयात्रा जारी रहेगी। इसमें नए-नए पथिक जुड़ते रहेंगे और लिटिल मीडिया विशेषतः साहित्यिक पत्रिकाओं के लिए सामाजिक माहौल मिलजुल कर तरह-तरह से बनाया जाता रहेगा।

हेतु भारद्वाज (अक्सर)
लघु पत्रिकाओं का पिछला सम्मेलन जयपुर में हुआ था। उसमें देश भर से लगभग 150 लेखकों -संपादकों ने भाग लिया था। कोलकाता सम्मेलन ने फिर से शुरुआत कर दी है। मेरा प्रस्ताव है कि अगला सम्मेलन जयपुर में हो जिसमें हम अधिक ऊर्जस्वित होकर भाग  लें और एक सामूहिक कार्यनीति बनाएं। ( इस पर सभी ने प्रसन्नता व्यक्त की और इस प्रस्ताव को स्वीकार किया गया)।

रविभूषण (अध्यक्षीय वक्तव्य)
साहित्यिक पत्रिकाओं का यह सम्मेलन ऐतिहासिक है जिसमें इतनी बड़ी संख्या में संपादक और लेखक आए हैं। हम मिलते-जुलते हुए, एक नए आत्मविश्‍वास का अनुभव करते हुए साहित्यिक पत्रिकाओं के साझा कार्यक्रम के बारे में कुछ सोच रहे हैं। यह सोचना ही महत्वपूर्ण है और एक नई दिशा का सूचक है।
आज का सोशल मीडिरा पूरी तरह अमरीकी गिरफ्त में है। हिंदी क्षेत्र में पढ़ने की संस्कृति नष्ट कर दी गई। गूगल मानव मस्तिष्क को अनुकूलित और संचालित कर रहा है और मस्तिष्क का कबाड़ा कर रहा है। हर तरफ जो परिदृश्य है वह भाषा को खत्म किए जाने की गवाही दे रहा है, संवाद खत्म हो रहा है। संवाद का खत्म होना लोकतंत्र का खत्म होना है। यह संकट का ऐसा दौर है जब अर्थहीन ही अर्थवान और अर्थवान ही अर्थहीन होता जा रहा है। इसलिए समस्या सिर्फ पत्रिकाएं और पुस्तकें पढ़ने की संस्कृति को बचाने का ही न होकर समय और समाज को पढ़ने की संस्कृति को बचाने की भी है। हमारे पाठक सर्वत्र हैं, देश के हर कोने में हैं।
समापन सत्र की मुख्य अतिथि थीं विश्‍वभारती की प्रो. मंजुरानी सिंह।

इतु सिंह (संचालन करते हुए)
साहित्यिक लघु पत्रिकाओं के पाठकों की संख्या हमेशा एक समस्या रही है। ये पत्रिकाएं प्रतिवाद की संस्कृति का हिस्सा और गैर-व्यावसायिक होती हैं। आज भी हर संपादक को संवेदनशील पाठकों की जरूरत है। पढ़ने की संस्कृति का संरक्षण और विकास अकेले संभव नहीं है, एक सामूहिक प्रयास की जरूरत है।
मधु सिंह (समापन सत्र का संचालन करते हुए)
लघु पत्रिका निकालना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। इसमें पाठकों के योगदान का बड़ा महत्व है। यदि पत्रिकाओं के सामाजिक मुद्दे हों तो उनका पाठक वर्ग बढ़ सकता है।

कुसुम खेमानी (स्वागत और धन्यवाद देते हुए)
भारतीय भाषा परिषद का गौरव है कि अपना श्रम और अर्थ व्यय करके साहित्यिक पत्रिकाएं निकालने वाले इतने लेखक-संपादक कोलकाता में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में आए हुए हैं। साहित्य का भविष्य बहुत कुछ साहित्यिक पत्रिकाओं के भविष्य पर निर्भर करता है। हमारा विश्‍वास है कि आप इस अभियान को और भी व्यापक रूप देंगे। आप सभी का आभार है।

साहित्यिक पत्रिका सम्मेलन में पत्रिका प्रदर्शनी-सह-बिक्री भी लगी थी। हर तरफ बैनर थे जिनमें से एक पर लिखा था- 9 सितंबर को भारतेंदु हरिश्‍चंद्र का जन्म दिवस देश भर में ‘साहित्यिक पत्रिका दिवस’ के रूप में मनाया जाए!








हस्ताक्षर: Bimlesh/Anhad

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